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कोविड ने अमेरिका के एजुकेशन सिस्टम में नस्लीय असमानता को कैसे किया उजागर?

सार्वजनिक प्राथमिक स्कूलों में भेदभाव के कारण होने वाले नुकसान का अंतर वहां साफ दिखाई देता है. वर्ष 2019 की एक अध्ययन के मुताबिक अमेरिका में अश्वेत बहुल जिलों के मुकाबले श्वेत बहुल जिलों में अधिक धन खर्च किया जाता है.

Source: News18Hindi Last updated on: July 27, 2021, 4:00 PM IST
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कोविड ने अमेरिका के एजुकेशन सिस्टम में नस्लीय असमानता को कैसे किया उजागर?
कोविड-19 वैश्विक महामारी ने दुनिया के महाशक्तिशाली देश अमेरिका के एजुकेशन सिस्टम के भीतर व्याप्त असमानता को उजागर किया है. इस दौरान वहां एजुकेशन सिस्टम के अंतर्गत चल रही रिमोट लर्निंग ने संसाधनों, फंडिंग और तकनीक के मामले में मौजूद खाई पर ध्यान खींचा है. हालांकि, इस दौरान मामूली सुधार के संकेत भी मिल रहे हैं.

कोविड-19 महामारी से यूं तो दुनिया के ज्यादातर देशों में एजुकेशन प्रभावित हुआ है, लेकिन अमेरिका के संदर्भ में महत्त्वपूर्ण बात यह है कि अन्य देशों के मुकाबले यह अपेक्षाकृत अधिक ताकतवर और विकसित होने के बावजूद इस मोर्चे पर मौजूदा नस्लीय और आर्थिक असमानताओं से जूझता दिख रहा है. इस दौरान वहां वंचित वर्ग के बच्चों की शिक्षा के लिए किए गए अनेक प्रयासों पर पानी फिरता तो दिख ही रहा है, खास तौर से अमेरिका का गरीब अश्वेत समुदाय मुख्यधारा की शैक्षणिक गतिविधियों से दूर हो रहा है.

हालांकि, पहले भी अश्वेत और अल्पसंख्यक समुदायों के बच्चे संसाधनों (पुस्तकें और परामर्शदाताओं तक) से लेकर छात्र-शिक्षक अनुपात और अतिरिक्त पाठ्यक्रम तक कई तरह की असमानताओं का सामना कर रहे थे, लेकिन कोरोना के प्रकोप ने वहां व्याप्त इस भेदभाव को सतह पर ला दिया है.

स्वास्थ्य और कल्याण पर बुरा असर 
हावर्ड ग्रेजुएट स्कूल में एजुकेशन रिडिजाइन लैब के संस्थापक व निदेशक पॉल रेविल (Paul Reville) के मुताबिक, अमेरिका में प्रणालीगत जातिवाद (systematic racism) से पैदा हुए अतिरिक्त तनाव और गरीबी व हिंसा प्रेरित आघातों ने वंचित वर्ग के स्वास्थ्य और कल्याण पर बुरा असर डाला है और यही असर उनके बच्चों की शैक्षणिक गतिविधियों पर पड़ा है.

[/blurb]पॉल रेविल कहते हैं, "हाशिए पर रहने वाले अश्वेत और अल्पसंख्यक अमेरिकी बच्चों और उनके परिजनों की चुनौतियां अब पहले से विकट हो चुकी हैं, खासकर उच्च गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पाना उनके लिए पहले से और भी ज्यादा मुश्किल हो गया है."[/blurb]

वहीं, कई शिक्षाविद इस स्थिति को सुधार की संभावनाओं के रुप में देख रहे हैं और चाहते हैं कि अमेरिका में लंबे समय से चल रहे नस्लवाद को कम करने की दिशा में पर्याप्त चर्चा और सुधार कार्यक्रम शुरू किए जाएं.लगभग सभी स्कूली बच्चे शिक्षा के मामले में पिछड़े
पॉल रेविल के मुताबिक ताजा शोध बताता है कि कोरोना प्रकोप के समय अमेरिका में भी लगभग सभी स्कूली बच्चे शिक्षा के मामले में पिछड़ चुके हैं. इनमें बड़ी संख्या अश्वेत बच्चों की है, जो विशेष रुप से गणित जैसे विषय में पीछे छूट रहे हैं. इसके अलावा वह इस बात को भी नोट करते हैं कि ऐसे समय फुल-टाइम स्कूलों को खोलकर बदलाव का परिचय दिया जा सकता है. इसी तरह, रिमोट लर्निंग से जुड़े कई नए अध्यायों को जोड़ा जा सकता है, ताकि कहीं तकनीक के विस्तार तो कहीं खेल के मैदानों के जरिए हाशिए के बच्चों को शिक्षा से दोबारा जोड़ना आसान बन सकें.

अमेरिकी जनगणना से जुड़े डाटा सेंटर के मुताबिक कोरोना महामारी की पहली लहर को नियंत्रित करने के लिए घोषित लॉकडाउन के दौरान घरों के लिए सीमित डिजिटल पहुंच की दर 42 थी, जो घटकर 31 प्रतिशत हो गई है. यह गिरावट बताती है कि वहां जिला स्तर पर रिमोट लर्निंग के अनुकूल स्कूल एजुकेशन में सुधार हुआ है. यहां महत्त्वपूर्ण बात है कि यह रिपोर्ट अमेरिका में नस्लीय और आर्थिक कारण से आई डिजिटल असमानता को भी स्पष्ट करती है. इसमें यह तथ्य सामने आया कि अश्वेत परिवारों के स्कूली बच्चों की तुलना में करीब डेढ़ गुना अधिक श्वेत परिवार के बच्चों ने कंप्यूटर और इंटरनेट का उपयोग किया.

यह एक ऐसी समस्या है जिसके वहां दूरगामी परिणाम हो सकते हैं, क्योंकि अमेरिका में ज्यादातर अश्वेत परिवारों के बच्चे दूर-दराज के गांवों में रहते हैं, जहां आज भी ऑनलाइन एजुकेशन का माहौल नहीं बन सका है.

बच्चों को शिक्षा से जोड़े रखना हुआ मुश्किल
फोर्ड फाउंडेशन के प्रोफेसर फर्नांडो रिमर्स (Fernando Reimers) अमेरिका में विभिन्न आर्थिक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए वहां के स्कूली बच्चों के बीच इस अंतर को लेकर कहते हैं, "कुछ परिवार अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए तकनीकी सुविधाएं और शिक्षक हायर कर सकते हैं, ऐसे बच्चे अच्छी तरह से पढ़ सकते हैं, लेकिन जहां एकल परिवार हैं और माएं अक्सर दो-तीन जॉब करके घर चलाती हैं, वहां देखा गया है कि बच्चों को शिक्षा से जोड़े रखना मुश्किल हो रहा है.

[/blurb]फर्नांडो रिमर्स के मुताबिक, "मुद्दे तकनीक से परे होते हैं और जब हम दूसरे इंसान से मिलते हैं तो उसके अनुभव अलग होते हैं. हम उससे कहते हैं कि आपसे मिलकर अच्छा लगा, या घर पर सब ठीक चल रहा होगा." वह बताते हैं कि उन्होंने पूरी दुनिया में शिक्षा के क्षेत्र तहत चल रहे विभिन्न नवाचारों से जुड़ी 35 केस स्टडीज की हैं. सभी में सामाजिक और भावनाओं पर आधारित कल्याण को प्राथमिकता दी गई है. इसलिए ऐसे टचपॉइंट बनाने की जरूरत है, जहां बच्चे और शिक्षक हर दिन मिल सकें.[/blurb]

अमेरिका की शिक्षाविद व अर्थशास्त्री ब्रिजेट लॉन्ग (Bridget Long) कहती हैं, "कोविड ने खुलासा किया है कि ये असमानताएं कितनी गंभीर हैं. इसने कम आय वाले परिवारों के छात्रों, विशेष जरूरतों वाले छात्रों और सीमित संसाधन वाले स्कूली सिस्टम को अत्याधिक नुकसान पहुंचाया है."

प्राथमिक से लेकर उच्‍च शिक्षा तक हुआ नुकसान
ब्रिजेट लॉन्ग के मुताबिक यह नुकसान प्राथमिक से लेकर उच्च शिक्षा में भागीदारिता निभाने वाले बहुत सारे बच्चों को उठाना पड़ा है, जो ऑनलाइन क्लास बंद कर चुके हैं. सामुदायिक आधारित कॉलेज निम्न-आय के परिवार वाले छात्रों के लिए प्रवेश-द्वार होते हैं, जहां वे विभिन्न मुद्दों पर शोध-अध्ययन कर सकते हैं. ब्रिजेट लॉन्ग कहती हैं, "कोविड ने इस प्रक्रिया को दस गुना बदतर बना दिया है. इसलिए सामुदायिक आधारित कॉलेजों में नामांकन की संख्या अत्याधिक घट गई है."

सार्वजनिक प्राथमिक स्कूलों में भेदभाव के कारण होने वाले नुकसान का अंतर वहां साफ दिखाई देता है. वर्ष 2019 की एक अध्ययन के मुताबिक अमेरिका में अश्वेत बहुल जिलों के मुकाबले श्वेत बहुल जिलों में अधिक धन खर्च किया जाता है.

[/blurb]ब्रिजेट लॉन्ग के मुताबिक स्कूल अध्ययन केंद्र के अलावा भी अन्य कारणों से महत्त्वपूर्ण हैं और ऐसी बातें कोविड के समय कहीं अधिक अच्छी तरह से स्पष्ट भी हुई हैं. दरअसल, स्कूल बच्चों का सामाजिक व भावनात्मक रुप से समर्थन करते हैं, उन्हें सुरक्षा प्रदान करते हैं. स्कूल भोजन सुरक्षा और स्वास्थ्य देखभाल की प्रणाली भी है. जाहिर है कि इसका सबसे ज्यादा नुकसान अश्वेत परिवारों के बच्चों को उठाना पड़ा है.[/blurb]

ब्रिजेट लॉन्ग कहती हैं कि जब स्कूली बच्चों को सुरक्षा और समर्थन की सबसे ज्यादा जरूरत है, तब इस सुरक्षा जाल को काट दिया गया है, जबकि ऐसे बच्चों की संख्या कहीं अधिक है. वह कहती हैं, "अमेरिका में कोविड से करीब 4 लाख मौतें हो चुकी हैं, स्वास्थ्य से लेकर आजीविका के संकट के मामले में यह प्रकोप अश्वेत समुदायों को आसमान रुप से प्रभावित कर रहा है, ऐसे में आप उन बच्चों की कल्पना कर सकते हैं, जो इस परिस्थिति में घरों में हैं. क्या उन्हें इस परिस्थिति से निपटने के लिए स्कूल आने और इस परिस्थिति से बाहर निकालने से लेकर इस परिस्थिति से लड़ने के लिए सिखाने की जरूरत नहीं है?
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi उत्तरदायी नहीं है.)
ब्लॉगर के बारे में
शिरीष खरे

शिरीष खरेलेखक व पत्रकार

2002 में जनसंचार में स्नातक की डिग्री लेने के बाद पिछले अठारह वर्षों से ग्रामीण पत्रकारिता में सक्रिय. भारतीय प्रेस परिषद सहित पत्रकारिता से सबंधित अनेक राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित. देश के सात राज्यों से एक हजार से ज्यादा स्टोरीज और सफरनामे. खोजी पत्रकारिता पर 'तहकीकात' और प्राथमिक शिक्षा पर 'उम्मीद की पाठशाला' पुस्तकें प्रकाशित.

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First published: July 27, 2021, 4:00 PM IST
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