सरकारी स्कूल: किस्से और कहानियों के सहारे बच्चे बन रहे अच्छे भारतीय

निजीकरण के कारण शिक्षा व्यवस्था पहले से कहीं अधिक गैर-बराबरी और भेदभाव की बुनियाद पर खड़ी हो गई है. जबकि, सबको समतामूलक शिक्षा उपलब्ध कराना संवैधानिक तकाजा था. विडंबना है कि जितनी परतों में समाज बंटा हुआ था उतनी ही परतों में बंटी शिक्षा व्यवस्था खड़ी करके शिक्षा की परिवर्तनकामी धार कुंद कर दी गई. वैश्वीकरण ने सरकारी स्कूलों को ध्वस्त करके शिक्षा का बाजारीकरण तेज कर दिया गया. आज की प्राइवेट शिक्षा वैश्विक पूंजी के लिए कुशल लेकिन गुलाम मजदूर तैयार कर रही है, न कि लोकतांत्रिक नागरिक. ऐसी चुनौती परिस्थितियों के विरुद्ध 'सरकारी स्कूल' नाम से प्रारंभ इस श्रृंखला में उम्मीद जगाती कहानियां आएंगी.

Source: News18Hindi Last updated on: August 3, 2020, 1:59 PM IST
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सरकारी स्कूल: किस्से और कहानियों के सहारे बच्चे बन रहे अच्छे भारतीय
स्कूल परिसर में झूला झूलते हुए बच्चे
खेल-खेल में सरकारी शिक्षक द्वारा शुरू की गई एक पहल के अंतर्गत कहानियों पर आधारित गतिविधियों का स्कूली बच्चों पर ऐसा प्रभाव हुआ कि वे हर दिन प्रार्थना-सभा के दौरान कहानियों का पाठ तो कर ही रहे हैं, कहानियों पर चर्चा भी आयोजित कर रहे हैं. इस तरह, यहां के बच्चे आपस में मिलकर हर दिन एक नए विषय पर अपने-अपने मत तैयार कर रहे हैं.

यह हो रहा है महाराष्ट्र के बुलढ़ाणा जिला परिषद मराठी प्राथमिक स्कूल, गोतमारा में. और, इस पहल को शुरू करने का श्रेय जाता है इस स्कूल में पदस्थ शिक्षक प्रशांत सुसर को. प्रशांत सुसर बताते हैं कि वे बच्चों की भागीदारिता से इस तरह की गतिविधि को जुलाई 2019 से लगातार आयोजित कर रहे हैं. इस पहल की खास बात यह है कि बच्चे खुद किसी समाचार-पत्र, पत्रिका या पुस्तक आदि से करीब पांच मिनट की कोई छोटी कहानी चुनते हैं और उसके बाद करीब पांच मिनट उस कहानी से जुड़े सबक के बारे में चर्चा करते हैं.

बुलढ़ाणा से लगभग 40 किलोमीटर दूर मोताला तहसील के अंतर्गत गोतमारा गांव के इस स्कूल में सितंबर 2018 से मानवीय मूल्यों पर आधारित विशेष सत्र संचालित हो रहे हैं. हर दिन प्रार्थना-सभा के दौरान कहानियों से जुड़ी गतिविधि के पीछे भी यही सत्र प्रेरक बने. सप्ताह में न्यूनतम दो बार आयोजित इन सत्रों के दौरान शिक्षक बच्चों को पढ़ाने की बजाय उनके साथ कभी किसी कहानी पर सामूहिक चर्चा करते हैं तो कभी किसी मजेदार खेल के सहारे व्यवहारिक जीवन के लिए जरूरी सबक सीखते हैं. यह सत्र हर एक कक्षा में आयोजित किया जाता है. बच्चों को यह इसलिए अच्छा लगता है कि इस समय शिक्षक पूरी तरह से उनके दोस्त बन जाते हैं और करीब 45 मिनट की अवधि में वे पाठ्यक्रम के दबाव से अपनेआप को पूरी तरह मुक्त रखते हैं.

बता दें कि इस सरकारी स्कूल में प्रधानाध्यापक सहित कुल चार शिक्षक और लगभग सौ बच्चे हैं. इनमें अधिकतर बच्चे छोटे किसान और मजदूर परिवार से हैं. इस गांव की जनसंख्या डेढ़ हजार से अधिक हैं.
बच्चों को नहीं पता थी कहानी की ताकत
प्रशांत सुसर बताते हैं कि कक्षा में आयोजित होने वाले विशेष सत्रों से पहले भी बच्चे कहानियां सुनते थे. लेकिन, तब वे कहानी सुनते हुए सामान्यत: कोई प्रश्न नहीं करते थे. इस दौरान उनके मन में न कोई खास उत्सुकता पैदा होती थी और न उनमें सोचने की प्रवृति होती थी. ये स्कूली बच्चे तब शिक्षक या वयस्क व्यक्ति के कहे अनुसार कहानी का अर्थ समझने की कोशिश करते थे. आमतौर पर सन्नाटा पसरा रहता था.

वे कहते हैं, "एक साल पहले तक बच्चों के लिए कहानी का मतलब सिर्फ किताबों की बातें हुआ करती थीं. उन कहानियों को लेकर बच्चों का अपना कोई मत या अनुभव नहीं होता था. वे किसी विषय पर परस्पर एक-दूसरे के साथ अपने मत या अनुभव साझा नहीं करते थे."तरीका बदला तो बढ़ने लगी बच्चों की कल्पनाशीलता
विशेष सत्रों के दौरान ज्यादातर बच्चों में कहानी के प्रति रूचि जागने लगी, क्योंकि इन सत्रों में वे किसी कहानी के कथानक से लेकर उसकी विषय-वस्तु में खुद शामिल होने लगे.

इस दौरान बच्चों द्वारा ही कहानियों का प्रस्तुतिकरण किया जाने लगा. इससे उनकी भीतर की रचनात्मकता उजागर हुई. कहने का मतलब शिक्षक ने कहानी के प्रस्तुतीकरण का तौर-तरीके बदले और उसमें बच्चों की भागीदारिता को बढ़ाया. इससे कक्षा में बच्चों के आपसी संबंध और क्रिया-कलापों सकारात्मक परिवर्तन आए और अभिव्यक्ति की सृजनात्मकता उजागर हुई.

इस बारे प्रशांत सुसर अपना अनुभव बताते हैं, "कहानियों पर आधारित गतिविधियों को इस तरह से कराते हुए मुझे लगा कि बच्चे कहानियों से प्रेरणा ले रहे हैं. बच्चे पहले से अधिक कल्पनाशील हो रहे हैं. इसलिए एक दूसरी पहल करने की प्रेरणा हासिल हुई. सोचा क्यों नहीं बच्चों की मदद से प्रतिदिन कहानी-पाठ का कार्यक्रम किया जाए. फिर एक साल से यह सिलसिला चल रहा है और बच्चों का व्यवहार बदल रहा है. उनमें आत्मविश्वास आ रहा है और उनका व्यक्तित्व दिन-प्रतिदिन निखर रहा है."

अपने स्कूल के बच्चों को कहानी सुनाती एक बच्ची


बच्चे गांव की गतिविधियों पर भी कर रहे बातचीत
इस स्कूल के ज्यादातर बच्चे अनेक अपने आसपास की अनेक अनुभवों का संकलन करके उन्हें फाइलों में सुरक्षित रख रहे हैं. कई बार वे कहानी की बजाय कई अनुभवों को लिख कर सुना रहे हैं. उदाहरण के लिए बच्चे बताते हैं कि उनके गांव के व्यक्तियों को किन वस्तुओं की आवश्यकता के लिए नजदीक के मोताला जैसे कस्बों में जाना पड़ता है. इस दौरान वे यह भी बताते हैं कि उनके गांव से कौन-सी वस्तुएं नजदीक के बाजार में बिकने के लिए जाती हैं.

प्रशांत सुसर के अनुसार नैतिक मूल्यों से जुड़ी हुई ज्यादातर कहानियां आपसी सहयोग और सौहार्द पर जोर देती हैं. वे बताते हैं, "कहानी-पाठ के पीछे मुख्य उद्देश्य यह है कि बच्चों को मूल्यों के बारे में सीधे बताने की बजाय उन्हें कहानियों के माध्यम से मूल्यों को अपनाने के लिए प्रेरित करना. यही वजह है कि बच्चे कहानियों के बहाने इन मूल्यों से जुड़ी बातों को बार-बार दोहरा रहे हैं."

प्रार्थना-सभा में हर कक्षा के बच्चों को कहानी सुनाने का मौका दिया जाता है. इस दौरान कई बार छोटे बच्चे भी उनके अपने परिजनों से सुनी कहानियां सुनाते हैं. बच्चों द्वारा कहानियां सुनाने का क्रम कक्षा शिक्षक निर्धारित करते हैं. जो बच्चा कहानियां सुनाना चाहता है वह अपना नाम कक्षा शिक्षक को दे देता है. फिर कक्षा शिक्षक कार्यक्रम की रूपरेखा के अनुसार यह निर्णय लेते हैं कि कौन बच्चा किस दिन कहानी सुनाएगा.

इस बारे में प्रधानाध्यापक अजय माडीवाले कहते हैं कि प्रेरक किस्सों से जुड़ी अनेक बातों पर आधारित गतिविधियों से बच्चे जल्दी सीख रहे हैं. कारण, बच्चों को कहानियों के विवरण और घटनाएं लंबे समय तक याद रहते हैं.

अजय माडीवाले बताते हैं, "बच्चे अपनी कहानियों के जरिए प्रेरक प्रसंग साझा कर रहे हैं. वे पशु-पक्षियों और पर्यावरण के प्रति लगाव प्रदर्शित कर रहे हैं. इसके अलावा उनकी अनेक कहानियों में ईमानदारी, अनुशासन और परिश्रम से जुड़ी हुई बातें होती हैं."

कहानी-पाठ के बाद नैतिक मूल्यों की पहचान करने के बाद बच्चों ने बनाया पोस्टर
कहानी-पाठ के बाद नैतिक मूल्यों की पहचान करने के बाद बच्चों ने बनाया पोस्टर


बच्चे स्थानीय घटना को कहानी की तरह सुना रहे
प्रशांत सुसर बताते हैं कि कई बार ऐसा भी होता है कि बच्चे किसी घटना को कहानी समझ लेते हैं या उसे कहानी की तरह सुनाते हैं. इस मौके पर शिक्षक बच्चों को ऐसी सच्ची घटनाओं पर आधारित कहानी सुनाने के लिए भी प्रेरित करते हैं. वजह, वे स्थानीय सच्ची घटनाओं को किस्से की तरह सुनाने का कौशल सीखते हैं. साथ ही, इससे स्पष्ट होता है कि बच्चे उनके अपने समुदाय के प्रति कितने सचेत और संवेदनशील हैं.

उदाहरण के लिए इस बारे में कक्षा चौथी के आदित्य खांडेलकर बताता है कि एक बार उनके गांव में एक बुजुर्ग महिला सामान बेचने आई थी. लेकिन, उसका सामान गुम हो गया. तब एक बच्चे ने प्रार्थना-सभा में यह बात बताई. इस दौरान बच्चों ने चर्चा की कि उस बुजुर्ग महिला की मदद करनी चाहिए.

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आदित्य खांडेलकर कहता है, "तब हमने चंदा किया और ढाई से रुपए जमा किए. पर, इतने पैसे कम थे. बाद में शिक्षकों ने उन्हें साढ़े पांच सौ रूपये दिए. कुछ दिन बाद एक दिन वह बूढ़ी अम्मा फिर गांव आईं. हमने उन्हें आठ सौ रुपए दिए. उनकी आंखों में आंसू आ गए."
ब्लॉगर के बारे में
शिरीष खरे

शिरीष खरेलेखक व पत्रकार

माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय से साल 2002 में जनसंचार में स्नातक की डिग्री लेने के बाद पिछले अठारह वर्षों से ग्रामीण पत्रकारिता में सक्रिय. भारतीय प्रेस परिषद सहित पत्रकारिता से सबंधित अनेक राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित. देश के सात राज्यों से एक हजार से ज्यादा स्टोरीज और सफरनामे. खोजी पत्रकारिता पर 'तहकीकात' और प्राथमिक शिक्षा पर 'उम्मीद की पाठशाला' पुस्तकें प्रकाशित.

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First published: August 3, 2020, 1:59 PM IST
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