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    वर्धा के सरकारी स्कूल ने महात्मा गांधी से ली प्रेरणा, तैयार किया अनूठा उपक्रम

    वर्धा जिला परिषद मराठी प्राथमिक शाला बोरखेडी (कला) के बच्चों के व्यवहार में आ रहे इस परिवर्तन के पीछे प्रेरणा के स्त्रोत हैं शिक्षक प्रफुल्ल भोगे. जिनके मार्गदर्शन में विदर्भ अंचल के इस छोटे गांव के बच्चे अनूठी प्रशोत्तरी के माध्यम से व्यक्तित्व विकास की नई तरकीब सुझा रहे हैं.

    Source: News18Hindi Last updated on: October 12, 2020, 11:30 AM IST
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    वर्धा के सरकारी स्कूल ने महात्मा गांधी से ली प्रेरणा, तैयार किया अनूठा उपक्रम
    वर्धा जिला परिषद मराठी प्राथमिक शाला बोरखेडी (कला) के बच्चे एक दूसरे से सवाल पूछते हैं.
    महाराष्ट्र के वर्धा शहर का नाम आते ही राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की छवि और उनके द्वारा स्थापित सेवा ग्राम आश्रम आंखों के सामने आकार लेने लगते हैं. वर्धा शहर से कुछ किलोमीटर दूर एक सरकारी स्कूल के शिक्षक की प्रेरणा से ग्रामीण बच्चों को गांधीजी के आदर्शों को अपने जीवन में अपनाने का अवसर मिला है. इसे गांधीजी के नैतिक मूल्यों का ही प्रभाव कहा जाएगा कि यहां के बच्चे एक के बाद एक कई नए उपक्रम शुरू कर रहे हैं. ऐसा संभव हुआ जब यहां के बच्चों ने स्व यानी खुद को पहचाना. स्व की पहचान से जुड़ा ऐसा ही एक उपक्रम है, जिसमें बच्चे हर दिन प्रार्थना-सभा के दौरान अनूठी प्रश्नोत्तरी आयोजित कर रहे हैं.

    ये स्कूल है वर्धा जिला परिषद मराठी प्राथमिक शाला बोरखेडी (कला) का और बच्चों के व्यवहार में आ रहे इस परिवर्तन के पीछे प्रेरणा के स्त्रोत हैं यहां के शिक्षक प्रफुल्ल भोगे. जिनके मार्गदर्शन में विदर्भ अंचल के इस छोटे गांव के बच्चे अनूठी प्रशोत्तरी के माध्यम से व्यक्तित्व विकास की नई तरकीब सुझा रहे हैं.

    सरकारी शिक्षक प्रफुल्ल भोगे इस बारे में अपने अनुभव साझा करते हुए बताते हैं, 15 मिनट के इस सत्र में बच्चे आपस में एक-दूसरे से गांव, तहसील, जिले, राज्य, देश से लेकर अंतराष्ट्रीय स्तर के प्रश्न पूछते हैं. इस दौरान, प्रश्न पूछने वाले बच्चे बारी-बारी से मंच पर खड़े होते हैं. प्रश्न पूछने वाले बच्चे के उत्तर देने के लिए स्कूल के अन्य सभी बच्चे अपने-अपने एक हाथ उठाते हैं. फिर, शिक्षक जिस बच्चे को उत्तर देने के लिए कहते हैं, वह बच्चा उत्तर देता है. यदि उत्तर गलत हो तो अन्य बच्चे को मौका दिया जाता है. जब कोई बच्चा सही उत्तर नहीं दे पाता है, तब प्रश्न पूछने वाला ही बच्चा उत्तर देता है."

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    वर्धा के सरकारी स्कूल के छात्र महात्मा गांधी के विचारों से ले रहे हैं प्रेरणा.
    स्कूल के अन्य शिक्षक बताते हैं कि इस प्रकार के उपक्रम से बच्चों के सामान्य ज्ञान में लगातार वृद्धि हो रही है. वहीं, उन्हें स्थानीय जानकारियां भी हासिल हो रही हैं. उदाहरण के लिए वे जान रहे हैं कि उनके गांव का सरपंच कौन हैं, या ग्राम-सेविका का नाम क्या है. इसी तरह, वे अपनी तहसील के तहसीलदार और जिले के कलक्टर के बारे में भी जान रहे हैं. दरअसल, कई बार पाठ्य-पुस्तकों की सामग्री में दुनिया भर की बातों को तो प्राथमिकता दी जाती है लेकिन उनमें स्थानीयता का अभाव देखने को मिलता है. ऐसे में इस प्रकार का उपक्रम बच्चों में स्थानीयता का महत्त्व समझने और उससे जुड़ी जानकारियां हासिल करने में सहायक हो गया है.

    बता दें कि वर्धा जिला मुख्यालय से करीब 30 किलोमीटर दूर सेलू तहसील के अंतर्गत बोरखेडी (कला) गांव के इस स्कूल में दो शिक्षक और कुल 25 बच्चे हैं. यहां जुलाई 2018 से प्रश्नोत्तरी के सत्र नियमित रुप से आयोजित हो रहे हैं. वहीं, करीब साढ़े पांच सौ की जनसंख्या के बोरखेडी (कला) गांव में अधिकतर मजदूर और छोटे किसान परिवार रहते हैं.

    इसलिए शुरू की प्रश्नोत्तरीइस उपक्रम के उद्देश्य के बारे में बात करते हुए शिक्षक प्रफुल्ल भोगे कहते हैं कि जून 2018 में एक दिन कक्षा चौथी के एक अतिरिक्त सत्र के दौरान आयोजित की गई गतिविधि में बच्चों को अपने पड़ोसियों से जुड़ी कुछ बुनियादी जानकारियां देनी थीं. इस दौरान, उन्होंने बच्चों से उनके घर का पूरा पता बताने के लिए कहा. लेकिन, महज दो बच्चों ने ही उनके प्रश्न का सही उत्तर दिया. उन्हें यह जानकार बुरा लगा कि कक्षा चौथी के बच्चे भी अपने घर का पूरा पता नहीं बता सकते हैं.

    इसके बाद, प्रफुल्ल भोगे ने बच्चों को गांधीजी के नैतिक मूल्यों की व्यवहारिक शिक्षा देने के उद्देश्य से सप्ताह में दो से अधिक बार स्कूल में अतिरिक्त सत्र आयोजित कराने का निर्णय लिया. ये संयुक्त सत्र होते थे जिसमें सभी कक्षाओं के बच्चों को आमंत्रित किया जाने लगा. प्रफुल्ल भोगे विस्तार से बताते हैं, "मूल्यवर्धन के सत्रों में मैंने स्व की पहचान और स्व की क्षमता से जुड़ी गतिविधियों पर जोर दिया. मैंने अनुभव किया कि इस प्रकार की गतिविधियों से बच्चों का सामान्य ज्ञान बढ़ रहा है. पर, मुझे लगा कि स्कूल के सभी बच्चों का सामान्य ज्ञान बढ़ाने के लिए प्रतिदिन एक गतिविधि जरूरी है. इसलिए, मैंने अपने साथी शिक्षक और बच्चों के साथ मिलकर प्रश्नोत्तरी से संबंधित एक नियमित उपक्रम की योजना तैयार की. यह उपक्रम पिछले दो साल से अधिक समय से नियमित और सफलतापूर्वक संचालित किया जा रहा है."

    बता दें कि हर दिन प्रार्थना-सभा में आयोजित इस उपक्रम के दौरान बच्चे प्रश्नोत्तरी की तैयारी के लिए शिक्षक की मदद लेते हैं. वे शिक्षक के मार्गदर्शन से तय करते हैं कि कौन-सा प्रश्न पूछना उचित रहेगा. क्योंकि, यदि कोई प्रश्न प्राथमिक स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों के स्तर से ऊपर है तो शिक्षक ऐसे प्रश्न पूछने से बचने का सुझाव देते हैं. बच्चे प्रश्नोत्तरी के लिए पूछे जाने वाले प्रश्न एक दिन पहले स्कूल के अतिरिक्त सत्र में तैयार करते हैं. कहने का अर्थ यह है कि भले ही यह पूरा उपक्रम बच्चों द्वारा संचालित किया जा रहा है लेकिन इसमें शिक्षक मार्गदर्शक की भूमिका में होते हैं और यह एक तरह का टीम-वर्क है जिसमें बच्चे समूह की शक्ति और उसमें अच्छी तरह से कार्य करने का ढंग सीख रहे हैं.

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    शिक्षक प्रफुल्ल भोगे बच्चों में सामान्य ज्ञान बढ़ाने के लिए रोज कराते हैं प्रश्नोत्तरी.


    बच्चों के लिए यह उपक्रम ऐसे फायदेमंद
    प्रफुल्ल भोगे बताते हैं कि हर दिन प्रश्नोत्तरी का आयोजन होने के कारण अधिक से अधिक बच्चे अच्छी तरह से आपस में संवाद कर रहे हैं. इस तरह, सामान्य पारिवारिक पृष्ठभूमि से आने वाले इन बच्चों में जिज्ञासा का स्तर दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है. यही कारण है कि अब वे पहले से अधिक व्यवहारिक ज्ञान रखते हैं. वहीं, जो बच्चे ठीक से अपने घर का पता नहीं बता पाते थे, वे अब पूरा पता बताते हैं. इनमें पहली और दूसरी कक्षा के छोटे बच्चे भी शामिल हैं. इस बारे में प्रफुल्ल भोगे कहते हैं, "प्रश्नोत्तरी के सत्र में बच्चों को प्रश्न पूछने के लिए उन्हें कोरे पन्ने पर शुद्ध और स्पष्ट लिखना होता है. इससे उनके लेखन में सुधार हो रहा है. साथ ही, बच्चों में प्रश्न पूछने और उत्तर देने का कौशल बढ़ रहा है."

    अन्य गतिविधियों से इन बातों को भी सीखा
    यहां महत्त्वपूर्ण बात यह है कि प्रश्न बनाते और उन्हें लिखते समय बच्चे गांधीजी के विचारों पर आधारित नैतिक मूल्यों पर आधारित शैक्षणिक पद्धति को अपना रहे हैं. वे जोड़ी या समूह के माध्यम से अपना कार्य पूरा कर रहे हैं. इससे उन्हें आपस में एक-दूसरे के बारे में अधिक से अधिक जानने का मौका मिल रहा है और उनकी मित्रता पहले से अधिक मजबूत हो रही है. साथ ही, अन्य उपक्रमों के माध्यम से बच्चे मनोरंजन-पूर्ण तरीके से आजादी, बराबरी, इंसाफ और भाईचारे का महत्त्व समझ रहे हैं. प्रश्नोत्तरी पर आधारित उपक्रम से जुड़ी चुनौती के बारे में पूछने पर प्रफुल्ल भोगे बताते हैं, कई बार कुछ बच्चे प्रश्नोत्तरी के दौरान बाधा डालते हैं. इस दौरान, उनके समूहों में रखकर जिम्मेदारी दी जाती है. कई बार उनसे कहा जाता है कि वे ही प्रश्न सुझाएं. इससे उनमें जिम्मेदारी का अनुभव होता है और उन्हें अन्य बच्चों से सहयोग मिलता है जिससे वे प्रेरित होते हैं."

    दूसरी तरफ, प्रफुल्ल भोगे बच्चों का सामान्य ज्ञान बढ़ाने के लिए एक अन्य कदम उठाने के बारे में सोच रहे हैं. अंत में वे कहते हैं, "जल्द ही हम स्कूल परिसर में सामान्य ज्ञान से संबंधित मासिक आयोजन करने के बारे में विचार कर रहे हैं. ऐसे आयोजनों में गांव के लोगों को भी शामिल किया जा सकता है. इसलिए हमारी योजना है कि इसी उपक्रम को कभी-कभी गांव के लोगों की भागीदारी से भी आयोजित किया जाए.
    ब्लॉगर के बारे में
    शिरीष खरे

    शिरीष खरेलेखक व पत्रकार

    2002 में जनसंचार में स्नातक की डिग्री लेने के बाद पिछले अठारह वर्षों से ग्रामीण पत्रकारिता में सक्रिय. भारतीय प्रेस परिषद सहित पत्रकारिता से सबंधित अनेक राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित. देश के सात राज्यों से एक हजार से ज्यादा स्टोरीज और सफरनामे. खोजी पत्रकारिता पर 'तहकीकात' और प्राथमिक शिक्षा पर 'उम्मीद की पाठशाला' पुस्तकें प्रकाशित.

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    First published: October 12, 2020, 11:30 AM IST
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