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विदेशी शिक्षा के प्रति घट रहा रुझान, क्या हैं इसके कारण?

शिक्षा, रोजगार और कौशल आधारित अन्य कार्यों से जुड़े एक करोड़ 33 लाख 19 हजार एनआरआई (अनिवासी भारतीय) पूरी दुनिया में फैले हुए हैं. इसके बावजूद, पिछले पांच वर्षों में शिक्षा के लिए विदेश जाने वाले छात्रों की संख्या घटकर 2,61,000 रह गई है. इसलिए, यह जिज्ञासा भी पैदा होती है कि क्या भारत में विदेशी शिक्षा की प्रवृत्ति धीमी हो गई है? आखिर इसकी वजह क्या है?

Source: News18Hindi Last updated on: May 20, 2022, 12:11 PM IST
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विदेशी शिक्षा के प्रति घट रहा रुझान, क्या हैं इसके कारण?
अमेरिका जाना आज भी भारतीय मध्यम वर्ग का सपना है. (AP)

यूक्रेन युद्ध के समय अचानक यह सवाल आया कि चिकित्सा शिक्षा के लिए भारत से यूक्रेन जाने वाले बच्चों की संख्या कितनी है? जल्द ही आंकड़ा उजागर हुआ कि यूक्रेन में ऐसे बच्चों की तादाद 22,500 है. अब जबकि यूक्रेन से ज्यादातर बच्चों की घर वापसी हो चुकी है तो यह सवाल भी जब-तब पूछा जाता है कि दुनिया भर में कितने भारतीय रह रहे हैं? साथ ही यह भी कि कितने भारतीय छात्र विदेश में पढ़ने के लिए आकर्षित हुए हैं?


सवाल है कि पूरी दुनिया में एनआरआई (अनिवासी भारतीय) की संख्या कितनी होगी? आंकड़ों के आइने में देख तो शिक्षा, रोजगार और कौशल आधारित अन्य कार्यों से जुड़े एक करोड़ 33 लाख 19 हजार एनआरआई (अनिवासी भारतीय) पूरी दुनिया में फैले हुए हैं. वहीं, यदि भारतीय मूल के लोगों की संख्या आंकी जाए पूरी दुनिया में 32 लाख बीस हजार यानी इस श्रेणी में हैं. इसी तरह, रोजगार पासपोर्ट चाहने वालों में अब स्वास्थ्य के क्षेत्र में कुशल पेशेवर के साथ-साथ स्वास्थ्य देखभाल कार्यकर्ता वाले युवाओं की संख्या भी बढ़ी है.


इसके बावजूद, पिछले पांच वर्षों में शिक्षा के लिए विदेश जाने वाले छात्रों की संख्या घटकर 2,61,000 रह गई है. इसलिए, इस स्थिति में यह जिज्ञासा भी पैदा होती है कि क्या भारत में विदेशी शिक्षा की प्रवृत्ति धीमी हो गई है?


मंद पड़ गई विदेश जाने के लिए सपनों की रफ्तार


अनिवासी भारतीयों या भारतीय मूल के व्यक्तियों के आंकड़े गृह-विभाग को सूचित किए जाते हैं. यह जानकारी विदेश और गृह-मंत्रालय ने हाल ही में राज्यसभा में चर्चा के दौरान दी है, जिसमें विदेशी शिक्षा औश्र इससे संबंधित कई दूसरी जानकारियां भी हासिल हुईं.


अमेरिका जाना आज भी भारतीय मध्यम वर्ग का सपना है. सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र में तेजी से हो रहे बदलावों को अपनाकर वहां मध्यम वर्ग के कई युवाओं ने नौकरी पाई है. इसमें उत्तर-भारतीय और मराठी परिवारों के युवाओं का प्रतिशत महत्वपूर्ण था और है. अब छात्र जर्मनी सहित विभिन्न देशों में शिक्षा के लिए जा रहे हैं. ये छात्र प्रबंधन, इंजीनियरिंग और चिकित्सा सहित विभिन्न विषयों की शिक्षा हासिल करने के लिए वहां जा रहे हैं.


लेकिन, बड़े परिदृश्य में देखें तो आश्चर्यजनक तौर पर यह प्रवृत्ति घटती हुई दिख रही है. पिछले पांच साल के आंकड़ों के मुताबिक विदेश जाने वाले भारतीयों की संख्या वर्ष 2016 में तीन लाख 71 हजार थी. हालांकि, वर्ष 2017 में यह संख्या बढ़ी और विदेश जाने वाले भारतीयों की संख्या चार लाख 56 हजार हो गई. लेकिन, तब से अब तक इन पांच वर्षों में यह संख्या घटकर दो लाख 61 हजार रह गई है.

पिछले दिनों महाराष्ट्र सरकार ने आंकड़े सार्वजनिक किए, जिनमें पिछले पांच वर्षों के आंकड़े बताते हैं कि महाराष्ट्र विदेशी शिक्षा के मामले में दुनिया के शीर्ष राज्यों में से एक है. राज्य में यह ग्राफ 2016 से बढ़ रहा है. यह संख्या वर्ष 2016 में 45 हजार 560 से बढ़कर वर्ष 2019 में 64 हजार हो गई. लेकिन फिलहाल राज्य से महज 10 हजार छात्र विदेशी शिक्षा के लिए गए हैं. महाराष्ट्र के साथ-साथ पंजाब, तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश के छात्रों में शिक्षा के लिए विदेश जाने की प्रवृत्ति है. लेकिन, यहां से भी काफी कम संख्या में छात्र विदेश गए हैं.


किस देश में कितने ‘भारतीय’


दुनिया भर के 208 देशों में भारतीय मूल के भारतीयों और एनआरआई की संख्या एक करोड़ 33 लाख 19 हजार से ज्यादा है. संयुक्त अरब अमीरात में 34 लाख 20 हजार एनआरआई हैं. इसके बाद 12 लाख 80 हजार भारतीय संयुक्त राज्य अमेरिका में रहते हैं. इसी तरह, मास्टर ऑफ साइंस के लिए अमेरिका और जर्मनी जाने वाले छात्रों की संख्या खासी है. ओपन डोर रिपोर्ट के अनुसार, अकेले संयुक्त राज्य अमेरिका में, 2021 में 9 लाख चौदह हजार छात्र अध्ययन कर रहे हैं. दूसरी तरफ, ऑस्ट्रेलिया में भी भारतीय मूल के लोगों और अनिवासी भारतीयों की संख्या दो लाख इकतालीस हजार से अधिक हो गई है. विदेशी में रहने वाले एक करोड़ तैंतीस लाख भारतीय नागरिकों में से 13 लाख इक्यानवे हजार 36 छात्र हैं जो विभिन्न देशों में पढ़ रहे हैं.


‘राज्य स्तरीय बैंकर्स समिति’ के अनुसार देश-विदेश में पढ़ने वाले 23.3 लाख छात्रों को 84,965 करोड़ रुपए का शैक्षिक ऋण वितरित किया गया. इसमें से करीब 3.5 लाख खाते 8,263 करोड़ रुपए यानी 9.7 फीसदी बकाया हैं. नर्सिंग और इंजीनियरिंग के छात्रों के बकाया होने के आसार अधिक हैं. बता दें कि अकेले यूक्रेन से लौटने वालों का 121.51 करोड़ रुपये बकाया है. इन छात्रों को बिना किसी जमानत के 4 लाख रुपए तक का शैक्षिक ऋण दिया जाता है. लेकिन, अब बैंक बढ़ते कर्ज और वसूली न कर पाने के चलते छात्रों को कर्ज देने से कतरा रहे हैं.


बैंकिंग विशेषज्ञों के मुताबिक, कोरोना-काल में घटती रोजगार दरों के साथ-साथ इंजीनियरिंग शिक्षा के कारण गैर-निष्पादित ऋण बढ़ रहे हैं. विदेश में पढ़ाई करने पर भी अपेक्षित वेतन नहीं मिलता है. यही वजह है कि समय पर किस्त चुकाने दर गड़बड़ा गई है.


सपनों पर भारी कर्ज और बेरोजगारी


‘सेंटर फॉर इंडियन मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी’ के एक अध्ययन के अनुसार, बेरोजगारी दर 8.74 से बढ़कर 27.11 हो गई है. विदेशी शिक्षा की ओर रुझान अब कम दिखाई दे रहा है, इसका कारण बाजार में मंदी और महामारी का प्रभाव बताया जा रहा है.


एक धारणा है कि जब कुशल जनशक्ति विदेश जाती है तो देश को नुकसान होता है. इसलिए देश में गुणवत्तापूर्ण और सस्ती शिक्षा सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए कई वर्षों से चर्चा चल रही है. लेकिन, बौद्धिक संपदा में बाधा डालने के बजाय समर्थन और पोषण किया जाना चाहिए. जैसे-जैसे दुनिया करीब आ रही है, बैंकों को शिक्षा ऋण बढ़ाने के लिए भी कहा जा सकता है. लेकिन, कोरोना की वजह से एजुकेशन लोन की जरूरत ज्यादा है और वे ऐसा करने से कतरा रहे हैं. आंकड़े भी बता रहे हैं कि वर्ष 2018-19 में विदेशी शिक्षा का रुझान ठीक ठाक था. हालांकि, गिरावट का स्तर कोरोना महामारी के पहले से शुरू हो गया था. बताया जा रहा है आने वाले शैक्षणिक वर्ष में विदेशी शिक्षा का रुझान घटता ही जाएगा. इसमें कोरोना महामारी भी एक कारण है.


‘राज्य स्तरीय बैंकर्स समिति’ के मुताबिक विदेशी शिक्षा का रुझान घटने की दूसरी वजह है लोन में आ रहीं परेशानियां. समिति द्वारा महाराष्ट्र राज्य में शिक्षा ऋण लेने वालों पर दी गई जानकारी के अनुसार 48 लाख खातों में 965 करोड़ रुपये का ऋण वितरित किया गया, जो कि पिछले वर्षों के मुकाबले कम है. अब जबकि कोरोना काल की किस्त की सुविधा बंद कर दी गई है, किस्तों का भुगतान करना मुश्किल होता जा रहा है. लोकसभा में पूछे गए एक सवाल में आया कि कोरोना-काल में बिहार और तमिलनाडु शिक्षा ऋण के मामले में दो सबसे ज्यादा प्रभावित राज्यों में से हैं.


(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi उत्तरदायी नहीं है.)
ब्लॉगर के बारे में
शिरीष खरे

शिरीष खरेलेखक व पत्रकार

2002 में जनसंचार में स्नातक की डिग्री लेने के बाद पिछले अठारह वर्षों से ग्रामीण पत्रकारिता में सक्रिय. भारतीय प्रेस परिषद सहित पत्रकारिता से सबंधित अनेक राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित. देश के सात राज्यों से एक हजार से ज्यादा स्टोरीज और सफरनामे. खोजी पत्रकारिता पर 'तहकीकात' और प्राथमिक शिक्षा पर 'उम्मीद की पाठशाला' पुस्तकें प्रकाशित.

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First published: May 20, 2022, 12:11 PM IST
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