कृषि-संकट: भारत में महिला किसानों की समस्याएं और उनकी पहचान को लेकर तीन स्तरों पर अनदेखी

प्रश्न महज किसी एक योजना का नहीं है बल्कि यहां इस बात को समझने की जरूरत है कि कृषि से जुड़ी नीति, योजना और कानूनों के लागू होने की स्थिति में सबसे अधिक असर उन महिलाओं पर पड़ता है जो खेतीबाड़ी से जुड़े काम करने के साथ-साथ अपनी घर-गृहस्थी भी संभालती हैं.

Source: News18Hindi Last updated on: April 12, 2021, 11:40 AM IST
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कृषि-संकट: भारत में महिला किसानों की समस्याएं और उनकी पहचान को लेकर तीन स्तरों पर अनदेखी
उत्तर भारत के कई राज्यों में किसान परिवार की अधिकतर महिलाएं कृषि कार्यों से सीधे जुड़े होने के बावजूद योजनाओं से मिलने वाले लाभों से दूर रही हैं. (फाइल)
क्या केंद्र सरकार महिला किसानों को लेकर कोई योजना चला रही है? यह प्रश्न जब पिछले वर्ष दिसंबर में संसद में पूछा गया तो उन्होंने लिखित उत्तर में बताया कि ग्रामीण विकास मंत्रालय कृषि क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारिता और उत्पादकता बढ़ाने के लिए महिला किसान सशक्तिकरण योजना चला रही है. इसके तहत देश भर की 36.6 लाख महिलाओं को लाभ पहुंचा है.

प्रश्न महज किसी एक योजना का नहीं है बल्कि यहां इस बात को समझने की जरूरत है कि कृषि से जुड़ी नीति, योजना और कानूनों के लागू होने की स्थिति में सबसे अधिक असर उन महिलाओं पर पड़ता है जो खेतीबाड़ी से जुड़े काम करने के साथ-साथ अपनी घर-गृहस्थी भी संभालती हैं.

प्रश्न है कि जो महिलाएं अपने खेतों में बीज रोपने से लेकर फसल कटाई तक के कामों में शामिल होती हैं वह किसानों से जुड़ी किसी भी गतिविधि या आंदोलन से कैसे दूर रहें. लेकिन, पिछले दिनों यह प्रश्न भी पूछा गया कि किसान आंदोलन में महिलाएं दिल्ली के आसपास क्यों हैं? इससे देश भर में यह बहस शुरू हुई कि खेतीबाड़ी के कामों से जुड़ी महिलाओं को आज तक वह दर्जा, पहचान और सम्मान क्यों हासिल नहीं हो सका जिसकी वह हकदार हैं.


बुनियादी समस्या
असल में भारत में महिलाओं के संकट को समझने से पहले हमें भारत की खेती की बुनियादी समस्या में जाना होगा. यह बात सच है कि पंजाब और हरियाणा के किसान इस बात को लेकर सबसे अधिक आशंकित हैं कि सरकार कहीं किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) देना बंद तो नहीं कर देगी. लेकिन, देश भर के किसानों की स्थिति देखी जाए तो पूरी खेती कुल 9.4 करोड़ हैक्टेयर में बंटी हुई है.. जबकि, इस पर 10.1 करोड़ किसान धारक (होल्डर) हैं. इस तरह, भारत में खेतों का औसत आकार एक हैक्टेयर से भी कम है. इनके पास जमीन है उनमें लगभग 85 प्रतिशत के पास एक हैक्टेयर से कम जमीन है. जाहिर है कि अधिकतर किसान परिवार जमीन के मामूली टुकड़े पर अपना गुजारा कर रहे हैं. इसके अलावा भी एक बड़ी आबादी उन खेत मजदूर परिवारों की है जिनके पास खेती का पट्टा नहीं है. एक अनुमान के अनुसार भारत में लगभग 40 प्रतिशत यानि 4 करोड़ खेत मजदूर परिवार हैं.

प्रश्न है कि खेत के इतने छोटे टुकड़े होने की स्थिति में अधिकतर छोटे किसान और खेत मजदूर परिवारों को उनकी मेहनत की उपज का क्या उचित दाम मिलना संभव है? इसे इस तरह भी समझ सकते हैं कि आज चार से छह सदस्यों के एक किसान परिवार को हर महीने न्यूनतम 20 से 30 हजार रुपए तो चाहिए ही. यानि उसे साल में ढाई से तीन लाख रुपए चाहिए ही. इसमें आपातकालीन स्थितियों में होने वाला खर्च शामिल नहीं है. प्रश्न है कि एक हैक्टेयर से कम जमीन का किसान परिवार महज खेती से इतनी आमदनी हासिल कर सकेगा? इसलिए, किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य के साथ-साथ खेती में एक ऐसी व्यवस्था बनाने की जरूरत है जिसमें एक किसान परिवार को अपनी आजीविका में उतनी आमदनी तो हो कि वह बुनियादी आवश्यकताओं को पूरा कर सके.

ऐसा इसलिए कि यदि किसान आत्महत्याओं की गहराई में भी जाएं तो यह निचोड़ निकलता है- जितने लोग खेती में हैं उतने लोगों की आजीविका देने की हालत में खेती नहीं है. इसलिए खेती घाटे का सौदा है. इसके पीछे एक बड़ी वजह यह है कि किसानों के पास आवश्यक आमदनी के अनुपात में खेती की जमीन नहीं है. जब जमीन ही नहीं है तो खेती पर निर्भर लोगों को आजीविका कैसे मिलेगी.
महिलाओं का संकट
दूसरी बात, जब तक हम भूमि श्रमिक संबंधों में बड़ा परिवर्तन नहीं लाते तब तक कृषि-क्षेत्र में छाए संकट और खेतीबाड़ी से जुड़ी महिलाओं की समस्याओं से उभरना मुश्किल है. इन छोटी-छोटी जोतों को ध्यान में रखते हुए ठीकठाक आमदनी की खेती से जुड़ी संभावनाओं को सबसे अंत में टटोलने और पूरे मुद्दे को एक सूत्र में पिरोने से पहले अब आते हैं महिला किसानों की समस्याओं पर.

भारत में महिला किसानों की समस्याओं को रेखांकित करने के लिए इसे तीन अलग-अलग स्तरों पर और फिर उन्हें एक साथ देखने की जरूरत है.
एक अनुमान के अनुसार भारत में करीब दस करोड़ महिलाएं खेती से जुड़ी हैं. इनमें करीब चार करोड़ खेत मजदूर परिवारों से हैं. पहला भाग इन खेतीहर मज़दूर परिवार की महिलाओं से जुड़ा है, जिन पर अलग से सोचने की जरूरत है.

आमतौर पर हर प्रांत में पुरुषों के मुकाबले इन महिला खेत मजदूरों को कम मजदूरी दी जाती है. इसलिए, समान काम के लिए समान मजदूरी से काफी कम मजदूरी मिलना इनकी सबसे बड़ी समस्या है. इस वर्ग की महिलाएं वर्ष 2005 से मनरेगा के तहत सबसे बड़ी संख्या में जुड़ी हुई हैं.


मनरेगा वंचित समुदाय के परिवारों के लिए जीने की बड़ी राहत योजना तो है, किंतु इसके साथ ही यह बात भी किसी से छिपी नहीं है कि इसमें भी मजदूरी कम है. साथ ही, कानून के बावजूद कई जगह साल के सौ दिनों का रोजगार नहीं मिल पाता है. फिर अक्सर समय पर भी भुगतान नहीं होता है. इस तरह, महिला खेत मजदूरों को किसी तरह जो मजदूरी मिलती है उससे दो वक्त की रोटी और अपने परिजनों का पेट पालना बहुत मुश्किल होता है.

खेतीबाड़ी से जुड़ी महिलाओं का दूसरा वर्ग उन किसान परिवारों से संबंधित है जिनमें जमीन के पट्टे पुरुषों के पास हैं. इस वर्ग की करीब 75 प्रतिशत महिलाएं खेती के कामों से तो जुड़ी हैं, किंतु आमतौर पर उन्हें उनके कामों का श्रेय नहीं दिया जाता है. न उनके हाथों में सीधी मजदूरी पहुंचती है और कई बार वे खेती से जुड़ी निर्णय-प्रक्रिया से बाहर रहती हैं. वे खेती और परिवार से जुड़ी अपनी जिम्मेदारी एक साथ निभाती हैं. लेकिन, इन सबके बावजूद उनके योगदान का मूल्यांकन कहीं नहीं होता.

तीसरा वर्ग एक बहुत छोटा हिस्सा है. इनमें वे महिलाएं आती हैं जिन्हें अपनी जमीन पर अधिकार मिला होता है. इसमें भी दो श्रेणियां हैं- पहली श्रेणी में किसान आत्महत्या करने वाले किसानों की विधवाएं हैं. ये ऐसी महिला किसान हैं जिन्हें पति की आत्महत्या के बाद वैध तरीके से ज़मीन मिलनी चाहिए थी. हालांकि, कई जगहों पर उन्हें वैध तरीके से जमीन मिली भी, पर कई कारणों से उस जमीन पर नियंत्रण किसी और का है. बहुत लंबी लड़ाइयों के बावजूद उन्हें उनकी जमीन का अधिकार नहीं मिल सका है.


दूसरी श्रेणी में वे महिलाएं हैं जिन्हें पति की आत्महत्या के बाद वैध तरीके से जमीन हासिल हुई है और उस जमीन पर उनका नियंत्रण भी है. इसमें उन महिला किसानों को भी शामिल किया जा सकता है जिनके पिता, पति या पुत्र पलायन के कारण घर छोड़ चुके हैं और इस कारण वे खेती से जुड़े निर्णय खुद ले सकती हैं. इस तरह, तीसरे वर्ग की महिलाओं की अलग-अलग समस्याएं हैं. जैसे कि इनमें से कई महिलाओं को किसान के रुप में नहीं देखा जाता है. इसलिए, कई बार प्रशासनिक स्तर पर ऋण या किसी योजना का लाभ लेने में इन्हें खासी परेशानी का सामना करना पड़ता है.

कुल मिलाकर, यह कहा जा सकता है कि खेती के गहराते संकट में सबसे ज्यादा बुरा असर खेतीबाड़ी से जुड़ी महिलाओं पर पड़ रहा है. इन तीनों वर्गों की महिलाओं की स्थिति बाकी पुरुष किसानों से कमजोर है. इसलिए, कृषि क्षेत्र में सुधार की बात करें तो इस क्षेत्र में जो तबका सबसे कमजोर है वह मौजूदा स्थिति को बदलने के लिए सबसे आगे आ सकता है.

संभावनाएं
अंत में छोटी-छोटी जोतों को ध्यान में रखते हुए ठीक-ठाक आमदनी से जुड़ी संभावनाओं पर लौटते हैं. जाहिर है कि खेती एक घाटे का सौदा है इसलिए संकट से उभरना आसान नहीं है. लेकिन, जैसा कि पहले कहा जा चुका है कि जब तक भूमि श्रमिक संबंधों को नहीं बदला जाएगा तब तक खेती के संकट से उभरना मुश्किल होगा. इसलिए, यह छोटी-छोटी जोतों को साथ में लाकर सामूहिक खेती (कलेक्टिव फार्मिंग) पर भी सोचने का समय है.

यह विचार कहने में थोड़ा चुनौतीपूर्ण जरूर लगता है, मगर इस विचार के बिना भारत जैसे देश में इतने बड़े संकट से बाहर निकलना संभव नहीं लगता. उम्मीद इसलिए भी की जा सकती है कि खेती के संकट में छोटा किसान सबसे अधिक मार झेल रहा है, जबकि सामूहिक खेती में उसके हितों को ही सबसे ऊंचा रखा गया है.

इसमें यह समझने की जरूरत है कि जिनके पास थोड़ी-थोड़ी जमीन हैं उनके समूह बनाकर बड़ा लाभ लिया जा सकता है. फिर यह विचार बड़ा उदार भी है जिसमें खेतीबाड़ी से जुड़ी महिलाओं के दृष्टिकोण और हित दोनों निहित हैं. (डिस्क्लेमर: लेखक के विचार व्यक्तिगत हैं.)
ब्लॉगर के बारे में
शिरीष खरे

शिरीष खरेलेखक व पत्रकार

2002 में जनसंचार में स्नातक की डिग्री लेने के बाद पिछले अठारह वर्षों से ग्रामीण पत्रकारिता में सक्रिय. भारतीय प्रेस परिषद सहित पत्रकारिता से सबंधित अनेक राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित. देश के सात राज्यों से एक हजार से ज्यादा स्टोरीज और सफरनामे. खोजी पत्रकारिता पर 'तहकीकात' और प्राथमिक शिक्षा पर 'उम्मीद की पाठशाला' पुस्तकें प्रकाशित.

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First published: April 12, 2021, 11:39 AM IST
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