सरकारी स्कूल: बच्चे भूले क्रिकेट, गए जीत से आगे, बनाए सहयोगी खेल

निजीकरण के कारण शिक्षा व्यवस्था पहले से कहीं अधिक गैर-बराबरी और भेदभाव की बुनियाद पर खड़ी हो गई है. जबकि, सबको समतामूलक शिक्षा उपलब्ध कराना संवैधानिक तकाजा था. विडंबना है कि जितनी परतों में समाज बंटा हुआ था उतनी ही परतों में बंटी शिक्षा व्यवस्था खड़ी करके शिक्षा की परिवर्तनकामी धार कुंद कर दी गई. वैश्वीकरण ने सरकारी स्कूलों को ध्वस्त करके शिक्षा का बाजारीकरण तेज कर दिया गया. आज की प्राइवेट शिक्षा वैश्विक पूंजी के लिए कुशल लेकिन गुलाम मजदूर तैयार कर रही है, न कि लोकतांत्रिक नागरिक. ऐसे में 'सरकारी स्कूल' नाम से प्रारंभ इस श्रृंखला में उम्मीद जगाती कहानियां आएंगी.

Source: News18Hindi Last updated on: July 27, 2020, 10:26 AM IST
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सरकारी स्कूल: बच्चे भूले क्रिकेट, गए जीत से आगे, बनाए सहयोगी खेल
कक्षा में सहयोगी खेल के माध्यम से एक सूत्र को सुलझातीं बच्चियां
यदि स्कूल का एक प्रमुख कार्य सामाजिक और सांस्कृतिक अंतरों को पाटना है तो महाराष्ट्र में उर्दू माध्यम के सरकारी शिक्षक जैनुलआबेदिन अहमद इस अंतर को खेल-खेलकर पाट रहे हैं. इस बारे में जैनुलआबेदिन कहते हैं, "मुझे साल 2018 में सितंबर-अक्टूबर के महीने याद हैं, जब मेरे स्कूल में किसी एक टीम के बच्चे क्रिकेट जैसे परंपरागत खेल में हार जाते थे तो उनका मनोबल टूट जाता था. कुछ बच्चों को हार से उभरने में बहुत समय लगता था. अक्सर हार-जीत के इन खेलों से उनके आपसी रिश्ते बिगड़ते थे. पर, उसी साल दिसंबर में हमने कुछ नए खेल शुरू किए. ये खेल सहयोग की भावना पर आधारित थे. यही वजह है कि इन खेलों से अधिकतर बच्चों के बीच आपसी प्रतिस्पर्धा की भावना कम हो रही है. वे धीरे-धीरे सामूहिक सहयोग, मित्रता और जवाबदेही का महत्त्व समझ रहे हैं."

जैनुलआबेदिन बुलढाणा जिला परिषद उर्दू प्राथमिक स्कूल, सवणा में पदस्थ हैं. बुलढाणा से करीब 35 किलोमीटर दूर चिखली तहसील के अंतर्गत इस स्कूल में नवंबर 2018 से नियमित तौर पर सहयोग के खेल खेले जा रहे हैं. यहां कुल चार शिक्षक और 186 बच्चे हैं. लगभग पांच हजार की आबादी के सवणा गांव में अधिकतर परिवार मध्यम श्रेणी के किसान, मजदूर और छोटे दुकानदार हैं.

कैसे आया यह विचार
जैनुलआबेदिन अहमद बताते हैं कि सितंबर 2018 में पुणे की एक गैर-सरकारी संस्था द्वारा आयोजित कार्यशाला के दौरान उन्होंने सहयोगी खेलों के बारे में जाना था. वे पिछले डेढ़ वर्षों से इस तरह के खेलों को आयोजित कराते हुए इनका महत्त्व भी जान रहे हैं.
दरअसल, सहयोगी खेलों में बच्चे परस्पर एक-दूसरे की सहायता से कोई टास्क पूरा करते हैं. जैसे कक्षा दूसरी के स्तर के लिए सहयोगी खेलों की बात करें तो इनमें 'जोड़ियों में कूद', 'समूह में कहानी बताना', 'प्राणियों की आवाज निकालना' और 'संतुलन की कला' जैसे खेल प्रमुख हैं. इसी तरह, यदि कक्षा चौथी के स्तर के लिए सहयोगी खेलों की बात करें तो इनमें 'धीरे ताली बजाओ, जोर से ताली बजाओ', 'मूक अभिनय', 'मेरे हाथ बंधे हैं', 'प्राणियों के आकार बनाना', 'मिलकर गांठ खोलना' और 'मिलकर अक्षर के आकार बनाना' आदि प्रमुख हैं.

इन खेलों की विशेषता यह होती हैं कि यह महज पांच से दस मिनट के होते हैं. इस वजह से इन्हें किसी भी मौके पर कराए जा सकते हैं. सुविधा के अनुसार इन्हें कक्षा या उसके बाहर भी आयोजित कराए जा सकते हैं. यदि कक्षा में बच्चों की संख्या बीस से अधिक हो तो इन्हें अलग-अलग समूहों में भी आयोजित कराए जा सकते हैं.

बाल दिवस के मौके पर ब्लैक-बोर्ड के सामने खड़ा एक बच्चा
बाल दिवस के मौके पर ब्लैक-बोर्ड के सामने खड़ा एक बच्चा
जैनुलआबेदिन कहते हैं, "जब मैंने पहली बार सहयोगी खेलों के बारे में पहली बार जाना-समझा तभी मेरे दिमाग में एक आइडिया क्लिक हुआ. आइडिया यह कि इन खेलों के जरिए किस तरह बच्चे एक साथ किसी कार्य को पूरा कर सकते हैं और मिलकर आनंद उठा सकते हैं. फिर इन खेलों की खासियत यह है कि इन्हें कभी भी आयोजित कराए जा सकते हैं. मैं इन्हें सत्र शुरू होने के पहले या बाद में आयोजित कराता हूं. इसके बाद मैं इन्हें अक्सर व्यायाम-सत्र और प्रार्थना-सत्र में भी आयोजित कराता हूं."

क्यों लगा ऐसा जरूरी है
जैनुलआबेदिन अहमद उनके अपने स्कूल में परिवर्तन से पहले की स्थिति बताते हैं. वे कहते हैं कि परंपरागत खेलों में शारीरिक व मानसिक रूप से कमजोर बच्चों को पर्याप्त अवसर नहीं मिल पाता था. कई बार खेलने के दौरान वे आपस में लड़ने-झगड़ने लगते थे.

इन स्थितियों को बदलने के लिए जैनुलआबेदिन अहमद ने सहयोगी खेलों का सहारा लिया. इस बारे में एक अन्य शिक्षक तजामुल अहमद कहते हैं कि सहयोगी खेलों में बच्चों की बढ़ती रूचि और उत्साह को देखते हुए धीरे-धीरे स्कूल के सभी शिक्षकों ने उनकी अपनी-अपनी कक्षाओं में भी सहयोगी खेल कराए.

तजामुल अहमद का अनुभव है कि सहयोगी खेलों से स्कूल के कई बच्चों में प्रेम, भाईचारा और एकता की भावना बढ़ रही है. अपनी बात को स्पष्ट करने के लिए वे एक घटना सुनाते हुए कहते हैं, "मुझे मालूम है कि पहले बहुत सारे बच्चे उनकी अपनी चीजें आपस में नहीं बांटते थे. पर, पिछली जनवरी (2020) में एक दिन कक्षा के किसी बच्चे के पास पेंसिल नहीं थी. तब मैंने कक्षा में बाकी बच्चों से पूछा कि किसी बच्चे के पास यदि अतिरिक्त पेंसिल हो तो वह अपना हाथ ऊपर करें. तब बहुत सारे बच्चों ने एक साथ अपने हाथ ऊपर किए."

सहयोगी खेल कैसे सहायक
जैनुलआबेदिन अहमद बताते हैं कि वे बच्चों के लिए दी गई पुस्तिकाओं और यूट्यूब के मुताबिक कई सारे सहयोगी खेल आयोजित करा रहे हैं. उदाहरण के लिए वे कुछ सहयोगी खेलों का उल्लेख करते हुए इनका बच्चों पर पड़ रहे प्रभावों के बारे अपने अनुभव साझा करते हैं.

जैनुलआबेदिन अहमद बताते हैं कि वे एक सहयोगी खेल के माध्यम से छोटे बच्चों को जोड़ियों में खेलने के लिए बढ़ावा देते हैं. इसमें बच्चों को बारी-बारी से गेंद लेकर एक रेखा से दूसरी रेखा पार करनी होती है. इसी तरह, एक अन्य सहयोगी खेल है जिसमें बच्चे एक वृत्त बनाकर खड़े होते हैं और एक के बाद एक वाक्य बोलते हैं और इस तरह समूह में कहानी बनाना सीखते हैं.

इसी तरह, कुछ सहयोगी खेल आवाज के जरिए विभिन्न प्राणियों को पहचानने से जुड़े हैं. वहीं, कुछ सहयोगी खेल मूक-अभिनय से स्वयं को अभिव्यक्त करने से संबंधित हैं. जैनुलआबेदिन अहमद बताते हैं, "ऐसे खेलों से बच्चे आपस में एक-दूसरे को अच्छी तरह से समझने के साथ समूह में जिम्मेदारियां बांटना सीख रहे हैं. साथ ही वे अपनेआप को व्यक्त करने के कौशल भी सीख रहे हैं."

बच्चों ने जीवन में अपनाए जाने योग्य गुणों को एक पोस्टर के जरिए प्रदर्शित किया.
बच्चों ने जीवन में अपनाए जाने योग्य गुणों को एक पोस्टर के जरिए प्रदर्शित किया.


बच्चे भी जान रहे महत्त्व
अच्छी बात यह है कि सहयोगी खेलों से बच्चों में आ रहे सकारात्मक बदलावों को शिक्षकों के साथ ही अब खुद बच्चे भी समझ रहे हैं. उदाहरण के लिए, कक्षा चौथी की सानिया शाह कहती है, "पहले खेल में कोई एक बच्चा कप्तान होता था. उसे लगता था उसी ने जिताया है. लेकिन सहयोग के खेलों में कोई कप्तान नहीं होता. इसलिए, अब सब मिलकर खेलना सीख रहे हैं."

इसके अलावा, जिस प्रकार बच्चे समूह में मिलकर खेल रहे हैं, उसी प्रकार वे समूह में मिलकर अन्य कार्य कर रहे हैं. कक्षा चौथी की शादमा अंजुम कहती है, "यदि मैदान में कचरा जमा हो जाए तो हम सब मिलकर उसे साफ कर देते हैं."

इस तरह, स्कूल की चारदीवारी के भीतर और बाहर जहां बच्चों को हर समय तथा हर स्तर पर प्रतिस्पर्धाओं के कारण भारी दबाव का सामना करना पड़ रहा है वहीं सहयोग के खेल उन्हें थोड़े समय के लिए सही लेकिन कुछ राहत दे रहे हैं. इससे बच्चे खुद-ब-खुद तमाम तरह के भेदभाव मिटाकर परस्पर एक-दूसरे के साथ घुल-मिल रहे हैं और उनके आपसी संबंध पहले से अधिक सौहार्दपूर्ण हो रहे हैं. सहयोग खेलों से उन्हें समन्वय और नेतृव्य के कौशल सीखने के मौके मिल रहे हैं. अंततः बच्चे परोक्ष रुप से संगठन का महत्त्व भी समझ रहे हैं.
ब्लॉगर के बारे में
शिरीष खरे

शिरीष खरेलेखक व पत्रकार

माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय से साल 2002 में जनसंचार में स्नातक की डिग्री लेने के बाद पिछले अठारह वर्षों से ग्रामीण पत्रकारिता में सक्रिय. भारतीय प्रेस परिषद सहित पत्रकारिता से सबंधित अनेक राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित. देश के सात राज्यों से एक हजार से ज्यादा स्टोरीज और सफरनामे. खोजी पत्रकारिता पर 'तहकीकात' और प्राथमिक शिक्षा पर 'उम्मीद की पाठशाला' पुस्तकें प्रकाशित.

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First published: July 27, 2020, 10:22 AM IST
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