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Opinion: शिवसेना के माइकल जैक्सन प्रेम में सहयोगी क्यों हैं महाराष्ट्र के प्रमुख दल?

महाराष्ट्र में सियासी रंग बदल चुका है. राज्य में महागठबंधन की सरकार है जिसमें शिवसेना के साथ कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी शामिल है.

Source: News18Hindi Last updated on: January 12, 2021, 1:28 PM IST
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Opinion: शिवसेना के माइकल जैक्सन प्रेम में सहयोगी क्यों हैं महाराष्ट्र के प्रमुख दल?
माइकल जैक्सन और बालासाहेब ठाकरे. फाइल फोटो सोर्स- सोशल मीडिया
24 साल पहले मुंबई में मशहूर पॉप गायक माइकल जैक्सन का कार्यक्रम आयोजित हुआ था. 1 नवंबर, 1996 को हुआ यह शो तब सुर्खियों में रहा था. इसके आयोजन की जिम्मेदारी तब शिवसेना के प्रमुख नेता और वर्तमान में महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के स्थापक अध्यक्ष राज ठाकरे के शिव उद्योग सेना ने संभाली थी. जबकि इस पूरे कार्यक्रम के संचालन का ठेका एक निजी कंपनी को दिया गया था. तब की भाजपा-शिवसेना सरकार ने इस शो के लिए निजी कंपनी को मनोरंजन कर में छूट दी थी. तत्कालीन राज्य सरकार ने इसके पीछे इसे एक चेरिटेबल कार्यक्रम होना बताया था. लेकिन, यह पूरा मामला न्यायालय में उलझ गया था. इसलिए, तत्कालीन राज्य सरकार द्वारा की गई कर माफी का मामला लंबित रह गया. अब सालों बाद यह मामला फिर से गर्मा गया है. वजह है पिछले दिनों महाराष्ट्र की उद्धव ठाकरे सरकार द्वारा उठाया गया कदम. राज्य कैबिनेट ने इस संबंध में एक ऐसा कदम उठाया है जिससे शिवसेना का जैक्सन प्रेम फिर से सुर्खियों में है. ऐसा इसलिए कि उद्धव सरकार ने ढाई दशक पहले हुए इस आयोजन के दौरान एक निजी कंपनी के लिए मनोरंजन कर में की गई माफ़ी को बहाल कर दिया है.

बता दें कि 24 साल पहले हुए इस कार्यक्रम में तीस हज़ार से ज़्यादा लोग आए थे. इस शो का एक टिकट तब करीब पांच हज़ार रुपए में बिका था. इस आयोजन से करीब दस लाख डॉलर की कमाई होनी बताई जाती है. इस आयोजन का संचालन करने वाली निजी कंपनी को मनोरंजन कर के रुप में राज्य सरकार के ख़ज़ाने में तीन करोड़ 34 लाख रुपए की राशि ज़मा करानी थी. लेकिन, ऐसा नहीं हुआ. आरोप यह लगे कि जैक्सन का यह शो फंड ज़मा करने के उद्देश्य से कराया गया. इसका लाभ शिवसेना को भी मिला.

तब भाजपा-शिवसेना गठबंधन सरकार में मनोहर जोशी मुख्यमंत्री थे और उनकी सरकार द्वारा निजी कंपनी को दी गई मनोरंजन कर में छूट को लेकर भारी विरोध हुआ था. इसके लिए तब शिवसेना प्रमुख दिवंगत बालासाहेब ठाकरे तक को आलोचना का सामना करना पड़ा था. इसके बाद तत्कालीन राज्य सरकार के निर्णय के ख़िलाफ़ एक उपभोक्ता संरक्षण समूह 'मुंबई ग्राहक पंचायत' ने न्यायालय में चुनौती दी थी. पूरे विवाद की सुनवाई उच्च न्यायालय में चलती रही.

आख़िर इस आयोजन के 15 साल बाद 2011 को उच्च न्यायालय ने अपनी टिप्पणी में राज्य सरकार द्वारा मनोरंजन कर में दी गई इस माफ़ी को तर्कहीन बताया. इस बारे में उच्च न्यायालय का कहना था कि सरकार ने समझदारी से निर्णय नहीं लिया है.
हालांकि, उस समय उच्च न्यायालय ने आयोजन का संचालन करने वाली निजी कंपनी और याचिका दाख़िल करने वाले उपभोक्ता संरक्षण समूह 'मुंबई ग्राहक पंचायत' को अपना-अपना पक्ष रखने का मौका दिया था. इस दौरान राज्य सरकार के साथ भी सुनवाई हुई थी. तब उच्च न्यायालय में राज्य सरकार का कहना था कि उसे मनोरंजन कर माफ़ करने का असीमित अधिकार है. वह किसी भी उद्देश्य से किए जाने वाले आयोजन के लिए कर में छूट दे सकती है. उसके बाद उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार से फिर इसकी समीक्षा करने के लिए कहा था. पर, बाद में सरकारें आईं और गईं लेकिन किसी ने इस बारे में कोई निर्णय नहीं लिया. इस बीच न माइकल जैक्सन रहे और न बालासाहेब ठाकरे रहे.

दूसरी तरफ़, महाराष्ट्र में सियासी रंग बदल चुका है. राज्य में महागठबंधन की सरकार है जिसमें शिवसेना के साथ कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी शामिल है.

हालांकि, राज्य में नई सरकार है और भाजपा से शिवसेना अलग हो चुकी है लेकिन नए दलों के साथ भी इस पक्ष को लेकर न शिवसेना का रुख बदला है और न ही महागठबंधन के अन्य दलों को ही इस पर आपत्ति है. इससे ज़ाहिर होता है कि शिवसेना के जैक्शन प्रेम में पहले भाजपा और अब कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी की सहमति है.राजनीतिक रुप से देखा जाए तो राज्य सरकार का यह ताज़ा निर्णय हैरान करने वाला नहीं है. वजह साफ़ है कि राज्य के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे दिवंगत बालासाहेब ठाकरे के सुपुत्र और शिवसेना के ही मुखिया हैं. इसके बावजूद सवाल यह है कि जो दल इस प्रकरण को लेकर शिवसेना पर सवाल उठाते रहे, वे भी इस निर्णय में भागीदार क्यों हैं.

दूसरी तरफ, कोरोना लॉकडाउन के दौरान जब राज्य सरकार की वित्तीय रीढ़ टूट चुकी है तो ऐसे में इस प्रकरण पर राज्य सरकार का यह निर्णय क्या संदेश देता है. वजह यह है कि महाराष्ट्र में कोरोना संक्रमण के तीव्र प्रसार और सख़्त लॉकडाउन के दौरान विकास कार्य रुक गया है. इसलिए विकास कार्यों को फिर से शुरू कराना राज्य सरकार के सामने बड़ी चुनौती है. जो परियोजनाएं 75 प्रतिशत तक पूरी हो चुकी हैं उन्हीं के लिए धन जुटाना मुश्किल कार्य हो गया है. इसलिए राज्य सरकार ने ऐसी परियोजनाओं को तुरंत धन देने के लिए एक आदेश भी जारी किया है. पर, हक़ीक़त यही है कि सरकार का ख़ज़ाना फ़िलहाल खाली है. ज़ाहिर है कि पूंजी व्यय की सीमा का होना विकास कार्यों के लिए एक बड़े झटके की तरह है. शहरी और साथ ही शहरों से ग्रामीण क्षेत्रों को जोड़ने वाली सड़कों को बनाना, बुनियादी ढांचा तैयार करना और सीवर जैसे मामूली कार्यों के लिए भी धन मुहैया नहीं हो पा रहा है. कारण यह है कि पिछली मार्च से राज्य सरकार की राजस्व आय में भारी गिरावट आई है.

राज्य में बिक्री-कर लेकर स्टांप-शुल्क, उत्पादन-शुल्क और वाहन-कर जैसे सभी मोर्चों पर फ़िलहाल तस्वीर नकारात्मक बनी हुई है. हालांकि, यह स्थिति देश भर के सभी राज्यों में अमूमन एक जैसी ही है. लेकिन, ऐसे समय भी एक निजी कंपनी को दी गई राहत महाराष्ट्र राज्य सरकार की नीयत और गैर-जिम्मेदारी की ओर इशारा करती है.

वहीं, महाराष्ट्र सरकार यह कहती रही है कि केंद्र के साथ संबंधों में खटास से राज्य के आर्थिक हालात और अधिक तंग हो गए हैं. उदाहरण के लिए राज्य के उपमुख्यमंत्री और वित्त मंत्री अजीत पवार लगातार यह कह रहे हैं कि केंद्र से राज्य को वस्तु व सेवा कर (जीएसटी) का करीब 30,000 करोड़ रुपए आना शेष है. इस माली हालत में राजनीतिक इरादों को पूरा करने के लिए राज्य हित को ताक पर रखने और इस तरह का निर्णय लेने से कहीं-न-कहीं उद्धव सरकार की छवि खराब हुई है.

हालांकि, एक निजी कंपनी पर की गई कृपादृष्टि को लेकर सिर्फ़ शिवसेना अकेली संदेह के घेरे में नहीं हैं बल्कि राज्य के सभी प्रमुख दलों की भूमिका भी अब कठघरे में आती दिख रही है.


वहीं, इस मामले के बहाने इस बात पर चर्चा शुरू हो चुकी है कि मुंबई जैसे व्यवसायिक शहर में यदि संगीत या इसी तरह अंतर्राष्ट्रीय मनोरंजन के कार्यक्रम आयोजित होते हैं तो सरकारों को क्यों संचालन कंपनी की तरफ़दारी करनी चाहिए. एक आशंका यह भी है कि उद्धव ठाकरे के इस कदम से एक ग़लत परंपरा शुरू न हो जाए! वजह यह है कि मुंबई में मनोरंजन के बड़े आयोजन से बड़े पैमाने पर कारोबार को बढ़ावा मिलता है और इससे दर्शकों को भी आनंद मिलता है लेकिन चेरिटेबल की आड़ में अन्य कंपनियों को कर में राहत देना ग़लत नहीं माना जाएगा. हालांकि, ऐसे भव्य आयोजनों का स्वागत करना गलत बात नहीं है लेकिन किसी एजेंडे के तहत उसे वित्तीय लाभ पहुंचाना राज्य के लिए शुभ संकेत नहीं हैं.

होना तो यह चाहिए था कि ऐसी किसी कंपनी से पुराना कर वसूल कर शिवसेना अपनी ग़लती सुधारती. उससे भविष्य की सरकारों को भी सबक मिलता. लेकिन, हुआ यह कि उसने अपनी ग़लती दोहरा दी. हालांकि, साल 1996 में जब शिवसेना सरकार में थी तो एक अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम को आयोजित करने और उसमें निजी कंपनी के लिए कर माफ़ी का खेल खेलना शिवसेना के लिए संयोग भर नहीं था. इसी तरह, अब 24 साल बाद जब शिवसेना के उद्धव ठाकरे मुख्यमंत्री हैं तो उसी आयोजन के संचालक कंपनी का कर माफ़ बहाल करना भी संयोग भर नहीं है. लेकिन, हक़ीक़त यह भी है कि शिवसेना के इस खेल में हर बार उसे अपने सहयोगी दलों का समर्थन मिलता रहा है. तब उसे भाजपा का समर्थन मिला था और अब कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी का समर्थन मिला है. (डिसक्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं.)
ब्लॉगर के बारे में
शिरीष खरे

शिरीष खरेलेखक व पत्रकार

2002 में जनसंचार में स्नातक की डिग्री लेने के बाद पिछले अठारह वर्षों से ग्रामीण पत्रकारिता में सक्रिय. भारतीय प्रेस परिषद सहित पत्रकारिता से सबंधित अनेक राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित. देश के सात राज्यों से एक हजार से ज्यादा स्टोरीज और सफरनामे. खोजी पत्रकारिता पर 'तहकीकात' और प्राथमिक शिक्षा पर 'उम्मीद की पाठशाला' पुस्तकें प्रकाशित.

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First published: January 12, 2021, 1:20 PM IST
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