महाराष्ट्र का यह स्कूल बन सकता है मिसाल, बच्चों ने तोड़ी भेदभाव की दीवार

निजीकरण के दौर में सरकारी स्कूलों में कमियां आसानी से गिनाई जा सकती है. लेकिन ऐसा भी नहीं है कि सब निराशाजनक ही है. महाराष्ट्र के बाणगांव गांव का स्कूल इसका उदाहरण है. यहां बच्चे छोटी उम्र में ही प़ढ़ाई के साथ-साथ समूह की शक्ति जैसी सकारात्मक चीजें भी सीख रहे हैं.

Source: News18Hindi Last updated on: August 10, 2020, 2:38 PM IST
शेयर करें: Facebook Twitter Linked IN
महाराष्ट्र का यह स्कूल बन सकता है मिसाल, बच्चों ने तोड़ी भेदभाव की दीवार
स्कूल परिसर में सुंदर रंगोली बनाती हुई बच्ची.
भारत सरकार ने 34 साल बाद एक बार फिर शिक्षा नीति में बदलाव किए हैं. वजह- सरकार को लगने लगा था कि मौजूदा नीति समय के साथ नहीं चल पा रही है. निजीकरण के दौर में सरकारी स्कूलों में कमियां आसानी से गिनाई जा सकती है. लेकिन ऐसा भी नहीं है कि सब निराशाजनक ही है. इसको कुछ उदाहरणों से समझ सकते हैं. जैसे कि भारतीय मूल्यों को बढ़ावा देने पर आधारित शिक्षण पद्धति के कारण एक स्कूल के अनेक बच्चे पढ़ाई से लेकर साफ-सफाई तक के कई कार्य समूह में कर रहे हैं. गीता भांबरे नाम की एक शिक्षिका की पहल पर बच्चे पिछले सात-आठ महीने से इस तरह का अभ्यास करते हुए धीरे-धीरे कई परंपरागत व्यवहार बदलने में सफल साबित हो रहे हैं. ये बच्चे कई उदाहरण स्थापित करके अब स्कूल की नई पहचान गढ़ रहे हैं.

बात हो रही है महाराष्ट्र के नाशिक जिले के एक स्कूल की. यह है जिला मुख्यालय नाशिक से करीब 150 किलोमीटर दूर तहसील नांदगांव के अंतर्गत बाणगांव जैसे छोटे गांव में. इस शासकीय मराठी प्राथमिकता स्कूल की विशेषता यह है कि यहां के बच्चे समूह में कई ऐसी परियोजनाओं पर कार्य कर रहे हैं जो सामाजिक हस्तक्षेप पर आधारित हैं.

ऐसा नहीं है ये बच्चे पहले समूह में नहीं रहते थे. लेकिन, बच्चों के इन समूहों में परस्पर एक-दूसरे के प्रति सहयोग, समता और बंधुता की भावना नहीं रहती थी. उदाहरण के लिए, यदि कक्षा के कमरे या स्कूल परिसर में साफ-सफाई की बात आती थी तो इस मामले में सिर्फ लड़कियां आगे आती थीं और लड़कों को यह लगता था कि यह उनका काम नहीं है. ऐसे समय शिक्षिका गीता भांबरे को लड़कों से बार-बार यह कहना पड़ता था कि लड़के भी अपने आसपास का कचरा उठाएं.

किंतु, शिक्षिका द्वारा बच्चों में संवैधानिक मूल्यों को बढ़ावा देने की भावना के कारण स्थिति बदल रही है. बदलाव की सूत्रधार गीता भांबेरे बताती हैं कि यह कार्य उन्होंने कई रचनात्मक प्रयासों से हासिल किया है. वजह यह कि यदि शिक्षिका बच्चों को कक्षा में सिर्फ भाषण की तरह सिखाने की कोशिश करतीं तो वह इस सीमा तक सफल नहीं होतीं. इसलिए, बच्चों में सामूहिक भावना लाने के लिए उन्होंने शिक्षण की पद्धति बदल दी. लिहाजा, उन्होंने शुरुआती स्तर पर कई छोटे-छोटे टास्क पूरा करने के लिए बच्चों को समूह में गतिविधियां करने के लिए प्रेरित किया.
गीता भांबरे कहती हैं, "इसका असर यह हुआ कि अब उनके स्कूल में गुमसुम रहने वाले बच्चे भी बाल-गीत, कहानी, नाटक और कक्षा या स्कूल के लिए नियम बनाने से लेकर स्वच्छता से जुड़ी अनेक गतिविधियां समूह में अच्छी तरह से कर रहे हैं." इस तरह के प्रयास इस स्कूल में कब से चल रहे हैं? इस बारे में बात करती हुईं गीता भांबरे कहती हैं कि इस स्कूल में जून 2019 से संवैधानिक मूल्यों को बढ़ावा देने के लिए लगातार सत्र संचालित हो रहे हैं. ठीक एक वर्ष बाद जब शिक्षिका बच्चों में आए बदलावों को देखती हैं तो खुशी जाहिर करती हैं. उनके मुताबिक आज ये बच्चे स्वच्छता, बुजुर्गों के प्रति सम्मान, महापुरुषों से जुड़े आयोजन और खेलकूद से जुड़े हर कार्यक्रम में सामूहिक भावना का उम्दा प्रदर्शन कर रहे हैं.

बच्चे समूह की शक्ति से थे अनजान
इस स्कूल की पृष्ठभूमि में जाएं तो यहां कुल पांच शिक्षक-शिक्षिकाओं सहित 218 बच्चे हैं. लगभग ढाई हजार की जनसंख्या वाले बाणगांव में अधिकतर दलहन उत्पादन छोटे किसान परिवार हैं. जून 2019 से पहले भी शिक्षिका बच्चों में सामूहिक-भावना विकसित करने का प्रयास कर रही थीं. लेकिन, उन्हें अपेक्षित परिणाम नहीं मिल रहे थे. गीता भांबरे अपना अनुभव साझा करती हुई कहती हैं कि पहले सूचनाएं एक तरफ से चलती थीं. इसमें बतौर शिक्षिका सिर्फ मैं बातें करती थीं. हां, बीच-बीच में बच्चों से पूछ भी लेती थी कि क्या उन्हें सबक समझ आ रहे हैं. लेकिन, यह एक तरह का भाषण होता था और बच्चे उसे उसी तरह लेते थे.गीता भांबरे उदाहरण देती हुई बताती हैं कि एक बार उन्होंने बच्चों को एक कौआ द्वारा मटके में बहुत सारे कंकड़ डालकर पानी का स्तर बढ़ाने और मटके से पानी पीने की कहानी सुनाई. लेकिन, कहानी समाप्त होने के बाद बच्चे उनकी अपनी जिज्ञासाओं को जाहिर नहीं कर सके. उन्हें आश्चर्य होता कि इन कहानियों को सुनने के बाद बच्चे समाज और विज्ञान से जुड़ी बातों के बारे में कई प्रश्न क्यों नहीं पूछते.

फिर शिक्षिका ने अपने सिखाने का तरीका बदला. उन्होंने भाषण की बजाय चर्चा पर अधिक जोर देना शुरू किया. इस चर्चा को भी बाल-केंद्रित रखा. कोशिश की कि बच्चे अधिक से अधिक अनुभवों को आपस में एक-दूसरे के साथ साझा करें. शिक्षिका अलग-अलग समूहों में उन्हें बांटकर तरह-तरह के खेल और कार्य कराने लगीं.

स्कूल में हाथ से बनाई चीजेंं दिखातीं बच्चियां और शिक्षिका.


वे सिर्फ मार्गदर्शन की भूमिका में रहने लगीं. इसका मतलब यह कि जब किसी समूह के पास किसी प्रश्न का उत्तर नहीं होता तो ही शिक्षिका उत्तर देतीं. अन्यथा बच्चों को अपने प्रश्नों के उत्तर समूह में खुद ही ढूंढ़ने पड़ते. इससे बच्चों में समूह के महत्त्व का पता चला और उसमें रहते हुए बच्चे अच्छी तरह से भागीदारी करने लगे. इस तरह, उनके बीच मित्रता प्रगाढ़ हुई और भेदभाव के अंतर कम होते गए.

शिक्षण की इस अनूठी पद्धति के सहारे शिक्षिका गीता भांबरे कक्षा में पढ़ाए जाने वाले विषयों से जुड़े अलग-अलग अध्याय भी बच्चों की जोड़ियों और समूहों बनाकर कराने लगीं. इस तरह, करीब आठ से दस महीने के दौरान शिक्षिका ने पाया कि इन सतत सत्रों की वजह से बच्चे सोचने से लेकर प्रश्न पूछने, स्वयं को अभिव्यक्त करने तथा किसी मुद्दे पर मिल-जुलकर कार्य करने की प्रक्रिया में शामिल हो रहे हैं.

इस दौरान कोई चुनौती आई और यदि आई तो वह क्या थी? इस बारे में गीता भांबरे कहती हैं, "इन सत्रों में आयोजित गतिविधियों के दौरान भी मुख्य चुनौती थी कि कम बोलने वाले बच्चों को समूहों में सहज कैसे बनाया जाए. तब 'मी कोण आहे?' यानि मैं कौन हूं, 'माझी ओळखपत्र' यानि मेरा पहचान-पत्र, 'माझे मित्र' यानि मेरा मित्र, 'आपली शाळा' यानि अपनी शाला और 'मी चांगले करू शकतो' यानि मैं अच्छी तरह से कर सकता हूं जैसी संवैधानिक मूल्यों से जुड़ी अनेक गतिविधियों के कारण ऐसे बच्चे धीरे-धीरे शिक्षक और सहपाठियों के साथ सहज होने लगे."

सीखने की प्रक्रिया कैसे बेहतर
इस स्कूल की एक अन्य शिक्षिका हर्षा बिसंदरे कहती हैं कि संवैधानिक मूल्य पर आधारित गतिविधियों के कारण बच्चे समूह में रहते हुए स्वतंत्रता, समता, न्याय और बंधुत्व को न सिर्फ पहचान रहे हैं, उनका महत्त्व भी समझ रहे हैं. इस कारण बच्चों को समूह में ज्यादा से ज्यादा सीखने के लिए अवसर मिल रहे हैं.

हर्षा बिसंदरे बताती हैं, "बच्चों द्वारा किए जाने वाले 'शांत संकेत' का उपयोग एक सामूहिक प्रक्रिया है. इसमें बच्चे जब अपना कार्य पूरा कर लेते हैं तो बिना शोर किए कोई एक हाथ अधिकतम आधा मिनट के लिए उठाते हैं. ऐसे ही, कई बार बच्चे उनके अपने घरों से थोड़ा-थोड़ा खाने का सामान लाते हैं और किसी खाली सत्र में मिलकर कभी भेल तो कभी पोहा तो कभी चाय बनाना सीखते हैं."

शिक्षिका गीता भांबरे बताती हैं कि इस तरह के प्रयासों के तहत वे सहयोगी खेलों को बढ़ावा देती हैं. ये विशेष प्रकार के खेल होते हैं जिनमें प्रतिस्पर्धा के स्थान पर सहयोग को प्रोत्साहित किया जाता है. इस तरह के खेल में बच्चे समूह में आपसी मदद से कोई भी कार्य पूरा नहीं कर सकते हैं. इस दौरान समूह का कोई खिलाड़ी उलझ जाता है तो बाकी खिलाड़ी मिलकर उसकी मदद करते हैं.

शिक्षिकाएं बताती हैं कि सहयोगी खेल के नियमों का पालन करने से बच्चे समूह में अनुशासित होकर समूह में कार्य पूरा करने की जिम्मेदारी समझ रहे हैं. इसी तरह, संवैधानिक मूल्यों को प्रोत्साहित करने वाली गतिविधियों के अंतर्गत 'माझा जबाबदारी' यानि मेरी जिम्मेदारी से जुड़े लगभग एक दर्जन अध्याय हैं. इनमें शिक्षिका सिखाती हैं कि बच्चों को समूह में रहते हुए खुद और स्कूल की चीजों की देखभाल किस प्रकार करनी चाहिए. इसके अलावा उन्हें यह भी सिखाया जाता है कि वे आपसी सहयोग से कक्षा और शाला का प्रबंधन कैसे कर सकते हैं.

वहीं, बच्चे 'आरोग्याच्या चांगल्या आणि वाइट सवयी' यानि स्वास्थ्य के लिए अच्छी और बुरी आदतें जैसी गतिविधि को भी समूह के माध्यम से अच्छी तरह समझ रहे हैं. इस बारे में कक्षा दूसरी की कृष्णा सरडे बताती हैं, "हम बच्चे कुछ-कुछ दिनों में एक-दूसरे के नाखून और बाल चेक करते हैं. ऐसे देखते हैं कि कौन-कौन सफाई का ध्यान रख रहा है."

इस पहल से हासिल उपलब्धियां
गीता भांबरे बताती हैं कि एक साल पहले कक्षा दूसरी में पढ़ने वाले कमलेश (परिवर्तित नाम) को कितना भी बोला और समझाया जाता था तब भी वह पढ़ाई से बचता था. हालांकि, शिक्षण पद्धति बदलने के बाद भी वह इस पर आधारित गतिविधियों में शामिल तो होता था लेकिन पढ़ाई नहीं कर रहा था. लेकिन, समूह में अन्य बच्चों के साथ कार्य करने के मामले में वह सहज होता जा रहा था. एक दिन कमलेश ने पढ़ाई न करने का कारण बताया. उसने कहा कि लगभग हर बार उसके पिता के पास कॉपियां खरीदने के लिए पैसे नहीं होते हैं. इस बारे में कक्षा दूसरी में ही पढ़ने वाली पल्लवी जाधव बताती हैं, "जब हमें इस बात का पता चला तो हम बच्चों ने मिलकर चंदा किया और कमलेश के लिए कॉपियां खरीदीं. अब वह हम सबके साथ खूब पढ़ाई-लिखाई कर रहा है." (डिस्क्लेमरः ये लेखक के निजी विचार हैं)
ब्लॉगर के बारे में
शिरीष खरे

शिरीष खरेलेखक व पत्रकार

माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय से साल 2002 में जनसंचार में स्नातक की डिग्री लेने के बाद पिछले अठारह वर्षों से ग्रामीण पत्रकारिता में सक्रिय. भारतीय प्रेस परिषद सहित पत्रकारिता से सबंधित अनेक राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित. देश के सात राज्यों से एक हजार से ज्यादा स्टोरीज और सफरनामे. खोजी पत्रकारिता पर 'तहकीकात' और प्राथमिक शिक्षा पर 'उम्मीद की पाठशाला' पुस्तकें प्रकाशित.

और भी पढ़ें

facebook Twitter whatsapp
First published: August 10, 2020, 2:38 PM IST
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर