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तारापुर परमाणु संयंत्र: सब कुछ लुटाने वाले किसान-मछुआरों को कब मिलेगा न्याय?

केंद्र सरकार की तारापुर परमाणु बिजली परियोजना प्रभावितों के एक प्रतिनिधिमंडल ने पिछले दिनों दिल्ली स्थित प्रधानमंत्री कार्यालय में अपनी शिकायतें दर्ज कराई है. इस दौरान केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह ने संबंधित अधिकारियों के साथ इस मुद्दे पर एक बैठक आयोजित की और उन्होंने प्रभावितों को यह आश्वासन दिया कि जल्द ही उनकी समस्याओं के बारे में विचार किया जाएगा.

Source: News18Hindi Last updated on: February 22, 2021, 3:20 PM IST
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तारापुर परमाणु संयंत्र: सब कुछ लुटाने वाले किसान-मछुआरों को कब मिलेगा न्याय?
तारापुर परमाणु संयंत्र
देश के समग्र विकास के लिए परमाणु ऊर्जा की आवश्यकता है, इस भावना को ध्यान में रखते हुए महाराष्ट्र में तारापुर परियोजना के लिए हजारों किसानों ने अपनी उपजाऊ खेत और घर का मोह छोड़ दिया. इसी तरह, किसानों के अलावा बड़ी संख्या में समुद्री किनारे मछलियां पकड़ने वाले मछुआरों ने अपनी आजीविका से समझौता करते हुए विस्थापन को स्वीकार किया. लेकिन, इन दो दशक के दौरान केंद्र सरकार द्वारा प्रभावितों को फिर से बसाने के लिए किए गए वादे पूरे नहीं हुए हैं.

यही वजह है कि केंद्र सरकार की तारापुर परमाणु बिजली परियोजना प्रभावितों के एक प्रतिनिधिमंडल ने पिछले दिनों दिल्ली स्थित प्रधानमंत्री कार्यालय में अपनी शिकायतें दर्ज कराई है. इस दौरान केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह ने संबंधित अधिकारियों के साथ इस मुद्दे पर एक बैठक आयोजित की और उन्होंने प्रभावितों को यह आश्वासन दिया कि जल्द ही उनकी समस्याओं के बारे में विचार किया जाएगा.

इस बारे में 'वाढवण समुद्री मछुआरा बचाओ समिति' के अध्यक्ष विजय तामोरे बताते हैं कि तारापुर परमाणु बिजलीघर परियोजना से विस्थापित परिवारों ने सालों से लंबित मांगों को प्रधानमंत्री कार्यालय में जाकर एक बार फिर दोहराया है. इसमें पुनर्वास के तहत 1,250 प्रभावित परिवारों के लिए बनाए गए घटिया मकानों का मुद्दा रखा गया. साथ ही केंद्र से यह मांग की गई कि जल्द ही ऐसे मकानों की मरम्मत राशि घोषित की जाए. इसके अलावा करीब साढ़े तीन सौ परिवार ऐसे हैं जिनका आज तक पुनर्वास नहीं हुआ है, इसलिए उनके पुनर्वास की मांग की गई. वहीं, वादे के मुताबिक यह याद दिलाया गया कि केंद्र सरकार द्वारा मछुआरों और भूमिहीन परिवारों को उनकी जीविका के लिए प्रति परिवार एक हेक्टेयर कृषि भूमि दी जाए.

दरअसल, तारापुर परमाणु बिजलीघर परियोजना से उजड़े परिवार यदि आज खुद को ठगा महसूस कर रहे हैं तो इसके पीछे कुछ अन्य कारण भी हैं. इस बारे में परियोजना से विस्थापित समिति के नेता सुधीर तमोले बताते हैं कि केंद्र ने वर्ष 2007 में पुनर्वास नीति लागू की. इसके बाद परियोजना से उजड़े परिवारों को पता चला कि उन्हें बहुत कम राहत दी गई थी. इस बारे में वे कहते हैं, "जब केंद्र की पुनर्वास नीति सामने आई तो हमने जाना कि नीति के मुताबिक हम में से हर प्रभावित परिवार के किसी एक व्यक्ति को परियोजना में स्थायी नौकरी दी जानी चाहिए थी, जो नहीं दी गई.
इसी तरह, परियोजना से प्रभावित बच्चों को मुफ्त शिक्षा दी जानी चाहिए थी और आसपास के स्कूलों में ऐसे परिवारों से आने वाले बच्चों को प्रवेश दिलाने के लिए कम-से-कम 25 प्रतिशत का आरक्षण दिया जाना चाहिए था. पर, यह भी हासिल नहीं हो सका है." इसके अलावा, प्रभावितों की एक मांग यह भी है कि पुनर्वास क्षेत्र में सीएसआर (कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉसिबिलिटी) के तहत सामाजिक-कल्याण के लिए राशि खर्च की जानी चाहिए. जिससे परमाणु बिजलीघर के आसपास के गांवों में पुल के निर्माण जैसे कार्यों को कराने में आसानी हो सके.

बता दें कि तारापुर महाराष्ट्र के पालघर जिले का एक औद्योगिक शहर है. यहां देश का सबसे पुराना परमाणु ऊर्जा संयंत्र है. यहीं अगस्त 2007 में पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अन्य दो नाभिकीय रिएक्टर देश को समर्पित किए थे. भारत सरकार द्वारा ये दोनों रिएक्टर 1,080 मेगावाट बिजली उत्पादन के लिए स्थापित किए गए थे. इसके तहत महाराष्ट्र के समुद्री तटीय क्षेत्र में अक्कर पट्टी से पोफरन तक बारह सौ से अधिक परिवारों को हटाना आवश्यक था.

लिहाजा इस क्षेत्र में आठ से दस हजार की आबादी प्रभावित हुई. इनमें अधिकतर किसान और मछुआरे परिवार हैं. तब सरकार ने उनसे जमीन के बदले जमीन और मकान देने का वादा किया था. विस्थापितों की मदद से भारत सरकार की यह परियोजना पूरी हो चुकी है. इस बीच केंद्र में मनमोहन सिंह की सरकार के बाद नरेन्द्र मोदी की सरकार बनी, लेकिन परियोजना प्रभावित कई परिवारों के पुनर्वास से जुड़े सवालों का निराकरण अब तक संभव नहीं हो पाया है.देखा जाए तो समुद्र तट पर 'गोल्डन बेल्ट' कहे जाने वाले क्षेत्र में केंद्र सरकार की अन्य दूसरी परियोजनाओं को लेकर भी किसान और मछुआरे विरोध कर रहे हैं. राज्य की राजधानी मुंबई से लगे पालघर जिले में ही पर्यावरण के लिए अति-संवेदनशील क्षेत्र वाढ़वण में बंदरगाह बनाने से जुड़ी परियोजना को लेकर स्थानीय रहवासी आंदोलन कर रहे हैं. इस परियोजना से तेरह गांवों की करीब एक लाख आबादी के प्रभावित होने की आशंका है. यह क्षेत्र जैव-विविधता और मछुआरों की आजीविका की दृष्टि से भी अहम है.

वहीं, आसपास के क्षेत्र में हजारों किसान परिवार खेती करते हैं. वर्ष 2014 में केंद्र में भाजपानीत एनडीए सरकार आने के बाद प्रधानमंत्री ने इसे 'ड्रीम प्रोजेक्ट' बताया है. लगभग 65 हजार करोड़ रुपए की लागत से प्रस्तावित इस परियोजना में केंद्र 74 प्रतिशत और राज्य 26 प्रतिशत पैसा खर्च करेगी. वहीं, वाढ़वण की सरपंच हेमलता बालाशी बताती हैं कि पारंपरिक खेतीबाड़ी, मछलीपालन और बागवानी को देखते हुए उन्होंने पूरी परियोजना खिलाफ लोगों को एकजुट करने का निर्णय लिया है.

यहां स्थानीय लोगों ने कई संगठनों के साथ मिलकर एक संघर्ष समिति बनाई है. इनका आरोप है कि परियोजनाओं के अंतर्गत पर्यावरण को होने वाले नुकसान से जुड़े पर्याप्त अध्ययन नहीं किए जाते हैं. केंद्र की इस बंदरगाह परियोजना में भी यही चूक दोहराई जा रही है. दरअसल, सरकार की कुछ परियोजनाओं के कारण होने वाले विस्थापन और पुनर्वास के अनुभव यहां अच्छे नहीं रहे हैं.

इसलिए, सरकार की नई परियोजनाओं को लेकर स्थानीय लोगों के बीच अविश्वास और भय का वातावरण बन गया है. यही वजह है कि तारापुर परमाणु बिजलीघर से जुड़ी परियोजना में पुनर्वास संबंधित अनियमिताओं के कारण भी समुद्री तट के रहवासी वाढ़वण बंदरगाह के खिलाफ एकजुट हो रहे हैं. (डिसक्लेमर: ये लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं.)
ब्लॉगर के बारे में
शिरीष खरे

शिरीष खरेलेखक व पत्रकार

2002 में जनसंचार में स्नातक की डिग्री लेने के बाद पिछले अठारह वर्षों से ग्रामीण पत्रकारिता में सक्रिय. भारतीय प्रेस परिषद सहित पत्रकारिता से सबंधित अनेक राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित. देश के सात राज्यों से एक हजार से ज्यादा स्टोरीज और सफरनामे. खोजी पत्रकारिता पर 'तहकीकात' और प्राथमिक शिक्षा पर 'उम्मीद की पाठशाला' पुस्तकें प्रकाशित.

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First published: February 22, 2021, 3:20 PM IST
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