किस्सागोई: येसुदास को सुनने के बाद लोगों ने कहा उनकी आवाज में ईश्वर बसता है

ये 60 के दशक की बात है. एक कलाकार ने फिल्मी गायकी का करियर शुरू किया. असली पहचान मिलने में...

Source: News18Hindi Last updated on: May 16, 2020, 2:15 PM IST
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किस्सागोई: येसुदास को सुनने के बाद लोगों ने कहा उनकी आवाज में ईश्वर बसता है
मशहूर प्लेबैक सिंगर येसुदास.
ये 60 के दशक की बात है. एक कलाकार ने फिल्मी गायकी का करियर शुरू किया. असली पहचान मिलने में थोड़ा वक्त लगा. कुछ साल इंतज़ार करना पड़ा. लेकिन 70 के दशक के आखिरी सालों में वक्त ने करवट ली. वो फिल्म थी- छोटी सी बात. बासु चटर्जी की उस फिल्म का संगीत सलिल चौधरी ने तैयार किया था. जिसमें उन्होंने उस कलाकार को मौका दिया था. उस फ़िल्म में एक गाना गजब हिट हुआ. जो गाना आज भी हिट है. गाने के बोल थे- जानेमन जानेमन तेरे दो नयन, चोरी चोरी लेकर गए देखो ये मेरा मन. वो कलाकार थे येसुदास. जो इसके बाद हिंदी फ़िल्मों में गायकी का एक बड़ा नाम बने. उन्होंने 8 बार नेशनल अवॉर्ड जीता. 5 बार फिल्मफेयर अवॉर्ड जीता. संगीत की दुनिया के और कई दूसरे बड़े सम्मानों से उन्हें नवाजा गया.

आज येसुदास को संगीत की दुनिया में प्यार, इज्जत, शोहरत सब कुछ हासिल है. उन्हें ये कामयाबी सिर्फ हिंदी फिल्मी संगीत में नहीं बल्कि कर्नाटिक संगीत में भी मिली. हम कामयाबी के इस दौर से भी काफ़ी पहले के उनके बचपन में चलते हैं. येसुदास बताते हैं-

"हिंदुस्तान अभी आजाद नहीं हुआ था. देश भर में आजादी के लिए तमाम आंदोलन चलाए जा रहे थे. कोच्चि के एक क्रिश्चियन परिवार में मेरा जन्म हुआ. मेरे पिता ऑगस्टीन जोसेफ शास्त्रीय संगीतकार थे. वो एक्टिंग भी किया करते थे. पिता जी हमेशा मानते थे कि दुनिया में भगवान सिर्फ एक ही है. जिसे अलग अलग नाम से बुलाया जाता है. जाहिर है अपनी इसी सोच के साथ उन्होंने मुझे बड़ा भी किया. मेरी उम्र अभी 4-5 साल ही थी जब उन्हें लगा कि मुझमें संगीत के बीज हैं. उन्होंने मुझे संगीत सीखाना शुरू कर दिया. जैसे-जैसे मैं बड़ा हुआ उन्होंने मुझे बस एक ही सीख दी कि मुझे एक बात को छोड़कर और किसी चीज की फिक्र नहीं करनी है. मेरी पढ़ाई अच्छी हो या ना हो, मैं अच्छी तरह अंग्रेजी बोल पाऊँ या नहीं लेकिन मुझे संगीत सीखते रहना है. यहां किसी तरह की गड़बड़ नहीं होनी चाहिए. पिता जी की ऐसी भी कोई चाहत नहीं थी कि मैं कम उम्र में ही बड़ी शोहरत हासिल कर लूं. वो बस इतना चाहते थे कि उनका बेटा जो सीख रहा है वो उसमें पक्का हो जाए".

ज़ाहिर है ऐसी ख्वाहिश रखने वाले पिता के बेटे को शरारतों की आज़ादी कम ही थी. परिवार की आर्थिक स्थिति भी अच्छी नहीं थी. परिवार ने आर्थिक परेशानियों का सामना भी किया लेकिन न पिता की प्राथमिकता बदली न ही बेटे की. येसु दास बताते हैं -
"मैंने पिता के साथ-साथ और भी कई गुरूओं से संगीत की बारीकियां सीखीं. सीखने का मेरा ये दौर करीब बीस साल तक चलता रहा. 1964 में पिता जी दुनिया छोड़ कर चले गए. उनके जाने के बाद हम लोगों ने तंगी का बुरा दौर भी देखा. लेकिन पिता जी संगीत का जो संस्कार देकर गए वो अब भी क़ायम है".

ये येसुदास के संगीत की ताकत ही थी कि वो हिंदी फिल्मों के साथ साथ कई दूसरी भाषाओं के गीत गा रहे थे. ताकत यानी वो परिपक्वता जो उन्होंने बचपन में ही हासिल की थी. उनकी इस परिपक्वता का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि 1977 में जब येसुदास की उम्र सिर्फ 37 साल थी तब भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया था. येसुदास खुद कहते हैं- "मेरे पिता की चाहत नहीं थी कि मुझे कोई ‘चाइल्ड प्रॉडजी’ कहकर पुकारे. बल्कि वो चाहते थे कि जब भी लोग मेरा गाना तो वो समझ आए कि मेरी गायकी की परिपक्वता का स्तर क्या है".

खैर, लौटते हैं येसुदास के फिल्मी सफर पर. सलिल चौधरी के बाद जिस संगीतकार के साथ येसुदास की जोड़ी सुपरहिट साबित हुई वो थे- राजकमल. राजकमल और येसुदास की जोड़ी उन दिनों अच्छी चल रही थी. दोनों ने ‘सावन को आने दो’ फिल्म की थी. येसुदास करियर के उन दिनों को याद करते हैं, “1981 में सई परांजपे ने फिल्म बनाई- चश्मेबद्दूर. इस फिल्म को बहुत कामयाबी मिली थी. इस फिल्म में मैंने भी दो गाने गाए. कहां से आए बदरा और काली घोड़ी”. इन दोनों गाने को येसुदास के साथ हेमंती शुक्ला ने गाया था. दोनों ही गानों की लोकप्रियता ये है कि अब भी टेलीविजन रिएलिटी शो में अक्सर प्रतिभागी इस गाने को गुनगुनाते मिलते हैं.

खैर, इसके बाद येसुदास को बतौर गायक रवींद्र जैन के संगीत से भी काफी नाम मिला. रवींद्र जैन कहा करते थे कि अगर कभी उन्हें दुनिया को देखने का मौका मिलता तो वो सबसे पहले येसुदास को देखना चाहते जिनकी आवाज में ईश्वर बसता है. बप्पी लाहिड़ी कहा करते हैं कि किशोर दा के बाद येसुदास ने उनके संगीत का ‘बेस्ट’ सुनने वालों के सामने रखा. एआर रहमान जिसकी आवाज को दुनिया की सबसे खूबसूरत आवाज मानते हैं. येसुदास के करियर की शुरूआती सफलता बासु चटर्जी की फिल्मों से मिली. सुरमई अंखियों में नन्हा मुन्ना एक सपना दे जा रे, जब दीप जले आना...जब शाम ढले जाना, गोरी तेरा गांव बड़ा प्यारा मैं तो गया मारा, तू जो मेरे सुर में सुर मिला ले, आज से पहले आज से ज्यादा खुशी आजतक नहीं मिली, मधुबन खुशबु देता है, चांद जैसे मुखड़े पे बिंदिया सितारा, मोहब्बत बड़े काम की चीज है, कोई गाता मैं सो जाता इस तरह के हिट गानों की फेहरिस्त आसानी से याद की जा सकती है. फ़िल्म के शौक़ीनों के लिए येसुदास अब एक चहेते गायक बन चुके थे. वो बताते हैं - 80 के दशक में मैंने अपनी एक म्यूजिक कंपनी शुरू की. प्लेबैक सिंगिग चलती रही. इन सबके बाद भी बचपन में दी हुई अपने पिता की सीख को नहीं भूला-ईश्वर एक है. यही भावना मेरी आवाज में ही उतरती चली गई”.
ब्लॉगर के बारे में
शिवेन्द्र कुमार सिंह

शिवेन्द्र कुमार सिंहवरिष्ठ पत्रकार | स्वतंत्र पत्रकार

टीवी और प्रिंट में काम का दो दशक का अनुभव। तीन विश्वकप, दो  ओलंपिक समेत तमाम खेल प्रतियोगिताओं की कवरेज। 35 विदेश यात्राएं। तीन पुस्तकों के लेखक। शास्त्रीय संगीत के प्रचार प्रसार के लिए रागगीरी नाम की संस्था चलाते हैं

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First published: May 16, 2020, 2:15 PM IST
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