किस्सागोई: कई साल के संघर्ष के बाद उस्ताद अमजद अली ने हासिल किया मुकाम

"एक रोज एक साधु घर आए, उन्होंने मुझसे कुछ सुनाने को कहा. मैंने उन्हें सरोद बजाकर सुनाया. उन्होंने मेरा नाम पूछा. मैंने कहा मेरा नाम मासूम अली खान है. इस पर उन्होंने कहा, आज से तुम्हारा नाम है अमजद."

Source: News18India.com Last updated on: April 25, 2020, 3:57 PM IST
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किस्सागोई: कई साल के संघर्ष के बाद उस्ताद अमजद अली ने हासिल किया मुकाम
एक रोज एक साधु घर आए, उन्होंने मुझसे कुछ सुनाने को कहा. मैंने उन्हें सरोद बजाकर सुनाया. उन्होंने मेरा नाम पूछा. मैंने कहा मेरा नाम मासूम अली खान है. इस पर उन्होंने कहा, आज से तुम्हारा नाम है अमजद.
कलाकार बनने के लिए एक बहुत लंबा रास्ता होता है. बहुत संघर्ष होते हैं. समाज को ये समझने की जरूरत है कि एक संगीतकार बनता कैसे हैं. उसे अपने संघर्ष के दिनों में सरकार से कोई मदद नहीं मिलती. सरकार को तो पता तक नहीं होता कि कौन सा कलाकार कितनी मेहनत कर रहा है? कौन सा कलाकार रियाज कर रहा है या कौन नहीं कर रहा है? उसके बाद जब वो कलाकार एक तय स्तर तक पहुंच जाता है उसके बाद सरकार कृपा करती है. उसको अवॉर्ड देती है. आज के मेहमान के बचपन में आपको ले जाने से पहले ये चर्चा इसलिए की क्योंकि ये कहानी है पद्मविभूषण से सम्मानित सरोद वादक उस्ताद अमजद अली खान की. जिन्होंने जीवन में तमाम उतार-चढ़ाव देखे और आज वो दुनिया के सबसे सम्मानित कलाकारों में शुमार हैं.

उनके संघर्ष से पहले उनके बचपन की कहानी, “हम बचपन में तबला सीखते थे. गायकी भी सीखते थे. यूं तो घर में पिता जी, बड़े भाई, चाचा सब संगीत से ही जुड़े हुए थे. आते जाते वो लोग भी सिखाते रहते थे लेकिन पिता जी ने हमें गायकी सिखाने के लिए एक गुरू को जिम्मेदारी दी थी. उनका नाम था श्री एन एल गुणे. इसी तरह मुझे तबला सिखाने की जिम्मेदारी पंडित रघुबर प्रसाद की थी. पिता जी खुद भी जब हमें सिखाते थे तो गाकर ही सिखाते थे. उन्हें भी गाने का बहुत शौक था. मुझे याद है कि मुझे तबले से बहुत लगाव हो गया था. तबला मैं काफी बजाता था. पिता जी घबरा गए कि कहीं ऐसा ना हो कि मैं सरोद छोड़ दूं. उनकी इस घबराहट का नतीजा ये हुआ कि जल्दी ही हमारे घर से तबला गायब हो गया. इसके बाद मेरा ध्यान वापस सरोद की तरफ लौटा. मैं अपने घर में सबसे छोटा था. यूं तो पिता जी हर बच्चे पर ध्यान दिया करते थे. हमारे बड़े भाई लोग भी सरोद बजाया करते थे. लेकिन मुझे लेकर पिता जी की अपेक्षाएं बिल्कुल अलग थीं”.

उस्ताद जी के जवाब में ही एक सवाल छुपा हुआ है. पिता जी की अपेक्षाएं बिल्कुल अलग थीं, इसका आशय? उस्ताद जी कहते हैं-

दरअसल, हम अपने बचपन की आजादी का मजा नहीं ले पाए. हमारे पिता जी बहुत बुजुर्ग थे. हमारे पिता जी के समकालीन कलाकार उस्ताद अब्दुल करीम खान साहब, फैयाज खान साहब और विलायत खान साहब के पिता जी  इनायत खान साहब या कंठे महाराज जी जैसे कलाकार हुआ करते थे. मैंने बचपन में हमेशा अपने पिता जी के चेहरे पर दुख देखा था. उन्हें इस बात का दुख था कि उनके समकालीन कलाकारों की अगली पीढ़ी मंच पर आ चुकी थीं. लेकिन हमारे यहां अभी वो जगह खाली थी. पिता जी के जो दोस्त यार आते थे, शिष्य आते थे वो भी यही बात दोहराते थे कि बेटा अब सबकुछ तुम्हें ही करना है...तुम्हें ही करना है. तुम्हें ही इस वंश को आगे चलाना है. लिहाजा 12 साल की उम्र से ही हम बुजुर्ग बन गए, जिम्मेदार बन गए. ये एक जिम्मेदारी का अहसास ही था कि मुझे बचपन से ही इस बात का डर लगा रहता था कि मेरे बारे में कोई गलत बात पिता जी के कानों तक ना पहुंचे. कोई ये शिकायत लेकर पिता जी के पास ना जाए कि मैंने उसे थप्पड़ मार दिया है, पत्थर मार दिया है या सिर फोड़ दिया है. इससे अच्छा है कि हम खुद ही पिट लिया करते थे. जाहिर है बचपन की शरारतों का मजा नहीं लिया”.
उस्ताद जी के नाम की कहानी भी दिलचस्प है. अम्मी अब्बा ने नाम रखा था मासूम लेकिन वो नाम एक दिन बदल गया. उस्ताद जी बताते हैं-

एक रोज एक साधु घर आए थे, उन्होंने मुझसे कुछ सुनाने को कहा. मैंने उन्हें सरोद बजाकर सुनाया. उन्होंने मेरा नाम पूछा, मेरा नाम रखा गया था मासूम. मैंने उन्हें बताया कि मेरा नाम मासूम अली खान है. इस पर उन्होंने कहा- आज से तुम्हारा नाम अमजद है. उस वक्त तक हमें इस नाम का मतलब तक नहीं पता था. बाद में पता चला कि ये एक अरबी शब्द है, ये भगवान का ही नाम है. उस घर से हमें ये नाम मिला. उस घर को आज सरोद घर के नाम से जाना जाता है. उसी घर में हमारी पैदाइश हुई थी. बाद में बहुत से लोगों ने उस घर को लेकर कहाकि उसे होटल बना दीजिए, गेस्ट हाउस बना दीजिए आपको बहुत सारे पैसे मिल जाएंगें लेकिन हमने ऐसा नहीं किया. ऐसा सिर्फ इसलिए क्योंकि हमारे पिता जी ने हमें सिर्फ संगीत नहीं सिखाया बल्कि जिंदगी को जीने का तरीका भी सिखाया था. उन्होंने इस बात का इल्म बहुत बचपन में दे दिया था कि जायज और नाजायज पैसे के बीच का फर्क क्या होता है. चूंकि उस घर में हमारी शिक्षा दीक्षा हुई थी. वो हमारे लिए बहुत पूज्यनीय जगह है, इसलिए वहां होटल या गेस्टहाउस बनाने का सवाल ही नहीं था. हमने वहां म्यूजियम बना दिया. मैं इसे अपने गुरूओं के प्रति, अपने पूर्वजों के प्रति गुरूदक्षिणा मानता हूं.

बचपन में ही जिम्मेदारियों का अहसास लिए उस्ताद अमजद अली खान की उम्र से पहले उनका दिमाग बड़ा हो गया. 11-12 साल की उम्र रही होगी जब उन्हें लोगों ने कार्यक्रम के लिए बुलाना शुरू कर दिया था. उस्ताद जी याद करके बताते हैं-

“उस दौर में कार्यक्रमों के बाद जो पैसे हमें मिलते थे वो पैसे हम अपनी मां को देते थे. जिससे घर चलता था. सिर्फ बड़े शहरों में ही नहीं उस दौर में छोटे छोटे शहरो में जैसे मेरठ, खुर्जा, हाथरस, रामपुर जैसी जगहों पर नुमाइशें होती थीं और एक ही स्टेज पर मुकेश जी गा रहे हैं. मैं बजा रहा हूं. बिस्मिल्लाह खान साहब बजा रहे हैं. यामिनी कृष्णमूर्ति डांस कर रही है. वैसे भी उत्तर प्रदेश में बनारस औऱ इलाहाबाद मेरे लिए बहुत खास शहर हैं. इलाहाबाद में प्रयाग संगीत समिति है. उस संस्था ने मुझे बहुत कम उम्र में ही सरोद सम्राट का ‘टाइटिल’  दे दिया था.

लेकिन संघर्ष अभी खत्म नहीं हुए थे. अमजद अली को उनके पिता 1957 में दिल्ली लेकर आए. वो एक संस्था में संगीत सिखाते थे. उस संस्था ने उस्ताद अमजद अली से कहाकि कि वो उन्हें भी नौकरी देंगे. लेकिन वहां हुई वादाखिलाफी की वजह से उस्ताद जी को दिल्ली छोड़ना पड़ा था. उस्ताद जी बताते हैं-

“जब नौकरी देने की बात हुई थी तब 500 रुपये देने का वायदा था लेकिन असल में जब नौकरी मिली तो वो रकम घटकर 300 रुपये हो गई. संस्था की तरफ से कह दिया गया कि हम 300 रुपये ही दे पाएंगे नौकरी करना हो तो करिए वरना जाइए. अभी नौकरी करना शुरू ही किया था कि हमें अलग अलग जगहों से कार्यक्रम के न्यौते मिलने शुरू हो गए. जल्दी ही मुझे लगा कि अपने कार्यक्रमों की वजह से मैं अपनी नौकरी के साथ न्याय नहीं कर पा रहा हूं इसलिए मैंने 6 महीने के भीतर ही इस्तीफा भी दे दिया. एक दिन अचानक उस ‘कल्चरल ऑर्गनाइजेशन’ की तरफ से नोटिस आ गया कि आप लोग 15 दिन के भीतर घर खाली कर दीजिए. 15 दिन के भीतर दिल्ली में नया घर लेना मुश्किल था. मजबूरन हम लोग पिता जी को लेकर ग्वालियर चले गए”.  लेकिन फिर उसी शहर में उस्ताद जी वापस लौटे. शादी के बाद यहीं रहना शुरू किया. कला में निखार आता चला गया. कला के प्रति समर्पण भी बढ़ता गया. देश विदेश में उस्ताद जी का नाम होता गया. शोहरत के साथ साथ आर्थिक स्थिति भी सुधरती चली गई. आज जब अपने पूरे सफर को उस्ताद अमजद अली खान याद करते हैं तो बस एक बात कहते हैं- सबसे ज्यादा खुशी इस बात की है कि अब मेरा परिचय कोई उस्ताद, लीजेंड, मैस्ट्रो या ग्रेट कहकर नहीं बल्कि ये कहकर कराता है कि वो कलाकार जिन्हें दुनिया सबसे ज्यादा प्यार करती है. इस प्यार से बढ़कर कुछ और नहीं”.
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
शिवेन्द्र कुमार सिंह

शिवेन्द्र कुमार सिंहवरिष्ठ पत्रकार | स्वतंत्र पत्रकार

टीवी और प्रिंट में काम का दो दशक का अनुभव। तीन विश्वकप, दो  ओलंपिक समेत तमाम खेल प्रतियोगिताओं की कवरेज। 35 विदेश यात्राएं। तीन पुस्तकों के लेखक। शास्त्रीय संगीत के प्रचार प्रसार के लिए रागगीरी नाम की संस्था चलाते हैं

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First published: April 25, 2020, 3:57 PM IST
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