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किस्सागोई: मुन्नाभाई MBBS बनाने वाले राजू हिरानी इस तरह बने हिट फिल्मों की गारंटी

एफटीआई से पढ़ाई करने के बाद राजू हिरानी 1987 में मायानगरी मुंबई पहुंचे. शुरूआती दिन मुश्किलों भरे थे. उन्होंने एक स्टूडियो में हजार रूपये की नौकरी करने से पहले वापस नागपुर लौटने की भी सोची थी.

Source: News18Hindi Last updated on: May 23, 2020, 10:55 AM IST
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किस्सागोई: मुन्नाभाई MBBS बनाने वाले राजू हिरानी इस तरह बने हिट फिल्मों की गारंटी
मशहूर फिल्म डायरेक्टर और एडिटर राजकुमार हिरानी.
आज की कहानी के किरदार की किस्सागोई उनके पिता से शुरू करते हैं. नाम- सुरेश हिरानी. सुरेश हिरानी उस वक्त सिर्फ 14 साल के थे जब भारत पाकिस्तान का बंटवारा हो गया. वो हिंदुस्तान आ गए. हिंदुस्तान आने के बाद की चुनौतियां कठिन थीं. उन्होंने अपने परिवार के साथ रिफ्यूजी कैंप में कई दिन बिताए. इसके बाद उन्हें चूड़ी के कारखाने में काम करना पड़ा. चाहते थे पढ़ाई लिखाई करें लेकिन पढ़ने से पहले पेट भरना जरूरी था. चूड़ी के कारखाने के बाद आइसक्रीम बेचकर पेट भरा. फिर वो किसी तरह अपनी बहन के पास नागपुर पहुंचे. जहां उन्होंने जनरल स्टोर में भी काम किया. इन मुश्किलों के बाद भी उन्होंने अपनी पढ़ाई की चाहत को मरने नहीं दिया. नागपुर में उन्होंने नाइट स्कूल में दाखिला लिया. धीरे धीरे जब हालात सुधरे तो उन्होंने एक टाइपराइटर इंस्टीट्यूट खोला. जिसका नाम रखा-राजकुमार कॉर्मस इंस्टीट्यूट. ये कहानी है राजकुमार हिरानी के पिता की. पहले इंस्टीट्यूट और फिर बेटे का नाम उसी इंस्टीट्यूट के नाम पर. संघर्षों के बीच ऐसी दिलचस्प कहानी किसी दिलदार इंसान की ही हो सकती है. हम राजकुमार हिरानी के जीवन में इस दिलचस्प किस्से की तलाश में गए.

वो बताने लगे-

'आपने थ्री इडियट्स का वो सीन देखा होगा. जब फरहान अपने अब्बा से बात करता है. वो कहता है कि 'मुझे नहीं समझ आती इंजीनियरिंग. बन भी गया तो बहुत खराब इंजीनियर बनूंगा, इस इमोशनल डायलॉग के बाद फरहान के पिता उसके लिए प्रोफेशनल कैमरा खरीदने की बात कहते हैं. कम ही लोग जानते हैं कि ये मेरी जिंदगी का सच्चा किस्सा है. जिसे मैंने अपनी फिल्म में उतार दिया है. मैं करीब बीस साल का था. पिता जी के कहने पर मैंने चार्टेड एकाउंटेसी में 'इनरोल' किया था. परीक्षाएं सर पर थीं. मुझे इस कोर्स में कोई दिलचस्पी नहीं थी. लेकिन चूंकि पिता जी चाहते थे इसलिए ये सब हो रहा था. आखिरकार एक दिन शाम को मैंने बड़ा फैसला किया. जो मेरी जिंदगी का सबसे बड़ा फैसला था'.


इतना जानने के बाद उस बड़े फैसले की तस्वीर तो काफी हद तक साफ हो जाती है. फिर भी इसे उन्हीं की जुबान से सुना जाए,'जब मैं पिताजी के कमरे में गया तो वो अकेले थे. सूखे गले और धीमी चाल से मैं उनके पास गया. बहुत डरते डरते मैंने पिताजी से कहाकि मैं चार्टेड एकाउंटेसी का इम्तिहान नहीं देना चाहता. मैंने जो सोचा था वैसा ज्यादा कुछ नहीं हुआ. पिताजी ने इतना सुनने के बाद बगैर ज्यादा पूछताछ किए कहाकि कल से ऑफिस को ज्वॉइन कर लो. मेरे मन का बोझ उतर चुका था. मैं इतना खुश हो गया कि पतंग उड़ाने चला गया'. कहानी अभी पटरी पर नहीं आई थी. क्योंकि अभी सीए के कोर्स से तो छुट्टी मिली थी लेकिन नौकरी तो करनी ही थी. पिता से मिली छूट के बाद राजकुमार हिरानी अपने कुछ ऐसे दोस्तों से जुड़ गए जो नियमित तौर पर थिएटर किया करते थे. बचपन में उन्होंने भी थोड़ा बहुत थिएटर किया था. लेकिन अब थिएटर से जुड़ने की गंभीरता अलग थी. वो बताते हैं-'मैं तमाम ऐसे लोगों के संपर्क में आ गया था जो थिएटर में खासे सक्रिय थे. मेरे एक दोस्त देबाशीष थे. उनके साथ मिलकर मैंने बांग्ला नाटकों का हिंदी अनुवाद भी किया. इन तमाम नए अनुभवों के बाद मैंने एक बार फिर अपने पिताजी से हिम्मत करके बात की और थिएटर कोर्स से जुड़ने के लिए हरी झंडी ली. एफटीआई में एडमिशन लेने का मेरा पहला प्रयास नाकाम रहा. अगले साल मैंने फिर इम्तिहान दिया. इस बार डायरेक्शन में नहीं बल्कि एडिटिंग में. मुझे एफटीआई में एडमिशन मिल गया. यहीं से मेरी जिंदगी में दूसरा बड़ा बदलाव शुरू हो गया था'.
फिल्म डायरेक्टर राजकुमार हिरानी.


एफटीआई से पढ़ाई करने के बाद राजू हिरानी 1987 में मायानगरी मुंबई पहुंचे. शुरूआती दिन मुश्किलों भरे थे. उन्होंने एक स्टूडियो में हजार रूपये की नौकरी करने से पहले वापस नागपुर लौटने की भी सोची थी. लेकिन उनकी किस्मत में कुछ और लिखा था. वो बताते हैं-'एक रोज मेरे पास संजय लीला भंसाली का फोन आया. संजय लीला भंसाली एफटीआई में मेरे साथ थे. भंसाली ने ही मुझे बताया कि विधु विनोद चोपड़ा अपनी फिल्म 1942-ए लव स्टोरी के प्रोमो के लिए एडिटर ढूंढ रहे हैं. इस तरह फिल्मों में मेरी 'एंट्री' हुई. उस वक्त तक मैंने एक कंपनी भी खोल ली थी. मैं टेलीविजन के लिए विज्ञापन बनाया करता था. दिलचस्प बात ये है कि भले ही राजू हिरानी को फिल्मों में बहुत काम नहीं मिल रहा था लेकिन उनकी कंपनी ठीकठाक बिजनेस कर रही थी. कुल मिलाकर 'फाइनेंसियली' राजू बेहतर स्थिति में थे. फेवीकोल का मशहूर विज्ञापन 'जोर लगा के हइशा' उन्हीं का बनाया हुआ था. अपने आगे के सफर के बारे में वो बताते हैं 'विधु विनोद चोपड़ा ने मुझसे फिल्म करीब का प्रोमो एडिट कराया. इसके बाद बतौर एडिटर मैंने मिशन कश्मीर फिल्म एडिट की. फिल्म निर्माण की तमाम बारीकियां मैंने इस दौरान सीख ली थी. फिर वो वक्त आ गया जब मुझे लगा कि अब उन्हें अपनी फिल्म बनानी चाहिए'.

इसके आगे की कहानी हर किसी को पता है. राजू हिरानी ने जो पहली फिल्म बनाई उसने ही धमाल मचा दिया. आपको याद ही होगा वो फिल्म थी – मुन्नाभाई एमबीबीएस. इस फिल्म के बाद राजू हिरानी हिट फिल्म की गारंटी हो गए. उन्होंने मुन्नाभाई का सीक्वल बनाया लगे रहो मुन्ना भाई. फिर उनकी फिल्म आई थ्री इडियट्स, फिर पीके, फिर संजू. इन पांचों फिल्मों ने बॉक्स ऑफिस पर जबरदस्त कामयाबी हासिल की. राजू हिरानी अब तक 15 फिल्मफेयर अवॉर्ड जीत चुके हैं. कई नेशनल अवॉर्ड उनकी झोली में हैं. लेकिन इन सबकी जड़ में हैं उस रोज का वो बड़ा फैसला जो उन्होंने हिम्मत करके लिया था.
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ब्लॉगर के बारे में
शिवेन्द्र कुमार सिंह

शिवेन्द्र कुमार सिंहवरिष्ठ पत्रकार | स्वतंत्र पत्रकार

टीवी और प्रिंट में काम का दो दशक का अनुभव। तीन विश्वकप, दो  ओलंपिक समेत तमाम खेल प्रतियोगिताओं की कवरेज। 35 विदेश यात्राएं। तीन पुस्तकों के लेखक। शास्त्रीय संगीत के प्रचार प्रसार के लिए रागगीरी नाम की संस्था चलाते हैं

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First published: May 23, 2020, 10:55 AM IST
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