किस्सागोई: वो हिट फिल्में जिनमें संजय लीला भंसाली के बचपन की छाप है?

संजय को कामयाबी का स्वाद मिला जब उन्होंने सलमान, अजय देवगन और ऐश्वर्या राय के साथ 'हम दिल दे चुके सनम' बनाई. फिल्म को अपार सफलता मिली.

Source: News18Hindi Last updated on: May 30, 2020, 9:52 AM IST
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किस्सागोई: वो हिट फिल्में जिनमें संजय लीला भंसाली के बचपन की छाप है?
फिल्म डायरेक्टर संजय लीला भंसाली.
फिल्म इंडस्ट्री में कुछ नाम ऐसे हैं जिनके साथ 'जीनियस' शब्द खुद ब खुद जुड़ जाता है. ये वो लोग हैं जो किसी एक चीज में पारंगत नहीं होते बल्कि एक साथ कई मोर्चों पर काबिलियत रखते हैं. हर मोर्चे पर सफल होते हैं. ऐसे लोग जल्दी ही एक अलग लीग में चले जाते हैं. जहां उन्हें इज्जत, शोहरत, पैसा, नाम, ईनाम, प्यार सबकुछ मिलने लगता है. संजय लीला भंसाली भी हिंदी फिल्म इंडस्ट्री की एक ऐसी ही शख्सियत हैं. वो निर्माता निर्देशक हैं, स्क्रीनप्ले राइटर हैं और संगीत निर्देशक भी. पिछले करीब तीन दशक के उनके करियर की हर एक फिल्म अपने आप में कमाल है. हम उनके बचपन में गए. वो बताते हैं- मेरे पिता डीओ भंसाली भी फिल्म इंडस्ट्री में ही थे. उनका समय खराब हुआ तो शराब की लत लग गई. लत भी ऐसी वैसी नहीं बल्कि हर वक्त वाली. हम लोगों को संभालने, पढ़ाने, लिखाने की सारी जिम्मेदारी मां पर थी. मेरी मां खुद एक अच्छी गायक और डांसर थीं. एकाध फिल्म में तो उन्होंने छोटा-मोटा काम भी किया था. लेकिन पिता के शराब में डूबने के बाद तमाम संघर्ष के अलावा उनके पास कोई रास्ता नहीं था. उन्होंने साड़ी में फॉल लगाने जैसा काम भी किया. इस काम से कुछ पैसे बचते थे. कभी तो ज्यादा साड़ियां मिलती थीं कभी बहुत कम. ऐसा नहीं था कि पिता जी को इन बातों की जानकारी नहीं थी लेकिन वो इन बातों को नजरअंदाज करते थे. अलबत्ता कई बार तो ऐसा होता था कि नाराज होने पर वो घर में तोड़ फोड़ करने लगते थे'.

संजय का बचपन इन्हीं बातों को देखकर गुजरा. उनके जीवन में ऐसी कई सच्ची और कड़वी कहानियां हैं. उन कहानियों को आप भंसाली की फिल्म में भी देख सकते हैं. बतौर असिस्टेंट डायरेक्टर आप उनकी फिल्म परिंदा देख लीजिए. बतौर डायरेक्टर उन्होंने खामोशी और ब्लैक जैसी सीरियस फिल्म बनाई है. बतौर डायरेक्टर संजय की पहली फिल्म खामोशी में नाना पाटेकर गुस्से में घर में जो तोड़ फोड़ करते हैं उसमें आप संजय के पिता की छाप देख सकते हैं. उनके खाते में हम दिल दे चुके सनम, देवदास, गलियों की रासलीला- राम लीला, बाजीराव मस्तानी और पदमावत जैसी 'कॉर्मिशयली' हिट फिल्में भी हैं. उनकी फिल्मों में एक भव्यता है. मैरीकॉम और राउडी राठौर जैसी फिल्मों के निर्माता के तौर पर उन्होंने अपनी सिनेमाई समझ का भी परिचय दिया है. संजय आज जिस मुकाम पर हैं वहां से उनके बचपन के संघर्षों का अंदाजा लगाना मुश्किल है.

संजय कहते हैं-

'इन मुसीबतों के बाद भी मां ने कभी हमसे अपनी परेशानियों और संघर्षों का रोना नहीं रोया. लोग कहते रहे कि बच्चों को सरकारी स्कूल में डाल दो लेकिन उन्होंने हमें अंग्रेजी मीडियम स्कूल में अच्छी शिक्षा दिलाई. हमें खुश रखने के लिए वो गाती गुनगुनाती रहीं, लेकिन हम लोगों से कुछ छिपा नहीं था. मैं हर रोज अपने पिता को नशे में डूबा हुआ देख रहे थे. यही वजह है कि पिता से लगाव का जो रिश्ता होना चाहिए वो कभी मेरे अंदर पैदा ही नहीं हुआ या पैदा हुआ भी तो आगे नहीं बढ़ा'.
ये संजय की मां का प्रयास ही था कि बच्चों ने अपनी पढ़ाई सही ढंग से पूरी की. पढ़ाई पूरी करने के बाद संजय पुणे में एफटीआईआई गए. वहां से निकले तो फिल्मों की अपनी दुनिया में कदम रखा. उन्हीं दिनों विधु विनोद चोपड़ा मुख्यधारा के बड़े एक्टर्स को लेकर अपनी फिल्म परिंदा बना रहे थे. जिसमें जैकी श्रॉफ, अनिल कपूर और माधुरी दीक्षित जैसे कलाकार थे. संजय भंसाली ने इस फिल्म में विधु विनोद चोपड़ा को असिस्ट किया. फिल्म सुपरहिट हुई. सर्वश्रेष्ठ निर्देशक, सर्वश्रेष्ठ अभिनेता, सर्वश्रेष्ठ सहअभिनेता समेत कुल पांच फिल्मफेयर अवॉर्ड इस फिल्म की झोली में आए.


संजय उस फिल्म के बनने के दौरान का एक बड़ा किस्सा बताते हैं-

'ये उस दिन की बात है जब फिल्म के क्रेडिट तय किए जा रहे थे. जब बतौर असिस्टेंट डायरेक्टर मेरे नाम की बारी आई तो मैंने कहा कि मैं अपना नाम संजय लीला भंसाली लिखना चाहता हूं. ऐसा इसलिए क्योंकि मेरी मां का नाम लीला है. कामयाबी की इस पहली सीढ़ी पर पैर रखते वक्त अगर सबसे पहले मैं किसी को शुक्रिया अदा करना चाहता था तो वो मेरी मां थीं'. संजय आज भी अपनी मां का नाम आशीर्वाद की तरह साथ लिखते हैं. परिंदा की सफलता के बावजूद संजय लीला भंसाली और विधु विनोद चोपड़ा की जोड़ी लंबी नहीं चली. दोनों ने अलग अलग रास्ते पकड़े. इसके बाद संजय ने बतौर निर्देशक पहली फिल्म बनाई-खामोशी. ये फिल्म नहीं चली लेकिन फिल्म को तारीफ मिली.

संजय को कामयाबी का स्वाद अगली फिल्म में मिला. जब उन्होंने सलमान, अजय देवगन और ऐश्वर्या राय के साथ 'हम दिल दे चुके सनम' बनाई. फिल्म को अपार सफलता मिली. फिल्म का संगीत भी बहुत पसंद किया गया. तीन साल के भीतर ही संजय लीला भंसाली देवदास लेकर आए. देवदास में एक बार फिर ऐश्वर्या राय थीं. ऐश्वर्या के अलावा उस दौर के सुपरस्टार शाहरुख खान और माधुरी दीक्षित स्टारकास्ट में थे. संजय बताते हैं- शाहरूख के किरदार में तमाम 'शेड्स' ऐसे थे जो मैंने अपने पिता में देखे थे. यहां तक कि जब मेरे पिता की मौत हुई थी तो उन्होंने भी हथेलियां फैलाकर मां का हाथ थामना चाहा था. वही देवदास फिल्म का आखिरी सीन है'. संजय आज अपने बचपन के संघर्षों के दौर से निकलकर सब कुछ हासिल कर चुके हैं. फिल्म ब्लैक के लिए उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार से भी नवाजा गया था. उनका करियर उन तमाम लोगों के लिए मिसाल है जो घर की चुनौतियों में खुद भी गलत रास्ते पर चल देते हैं.
ब्लॉगर के बारे में
शिवेन्द्र कुमार सिंह

शिवेन्द्र कुमार सिंहवरिष्ठ पत्रकार | स्वतंत्र पत्रकार

टीवी और प्रिंट में काम का दो दशक का अनुभव। तीन विश्वकप, दो  ओलंपिक समेत तमाम खेल प्रतियोगिताओं की कवरेज। 35 विदेश यात्राएं। तीन पुस्तकों के लेखक। शास्त्रीय संगीत के प्रचार प्रसार के लिए रागगीरी नाम की संस्था चलाते हैं

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First published: May 30, 2020, 9:52 AM IST
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