कहानी आपातकाल की, जो कक्षा में सुनी थी

कहानी आपातकाल की, जो कक्षा में सुनी थी
मैंने इमरजेंसी नहीं देखी और न ही इमरजेंसी के दौरान लोकतंत्र पर छाए अभिव्‍यक्ति की आजादी के दम घोंटने वाले...

मैंने इमरजेंसी नहीं देखी और न ही इमरजेंसी के दौरान लोकतंत्र पर छाए अभिव्‍यक्ति की आजादी के दम घोंटने वाले बादलों की छाया का कोई अंदाजा है। आज ही के दिन यानी की 25 जून 1975 को ही स्‍वतंत्र भारत के इतिहास का देढ़ साल लंबा सबसे ज्‍यादा अलोकतांत्रिक दौर शुरू हुआ था। उस दौर की केवल कल्‍पना ही हमारे जैसे युवा कर सकते हैं, खासकर तब जबकि आज अभिव्‍यक्ति के ढेरों साधन मौजूद है और अभिव्‍यक्ति की आजादी को लेकर पूरी दुनिया में नये सिरे से आवाज उठाई जा रही है, ऐसे में बड़ा आश्‍चर्य होता है कि दुनिया के इस सबसे बड़े लोकतंत्र ने नागरिक अधिकारों को छीन लेने, विरोधियों, विपक्षियों और लाखों लोगों को जेल में डाल देने और प्रेस पर प्रतिबंध के जाने कैसे दिन देखे?

वह साल 2006-2008 के दिन थे, जब 12वीं कक्षा में पढ़ते हुए मैं अपने शिक्षक श्री रामफेर शुक्‍ल जी से 1975 से 77 तक के इस आपातकाल के दौर के किस्‍सों को सुना करता था और उनकी आप बीती को केवल महसूस ही करता रह जाता था। यकीनन उन्‍होंने न केवल खुद उस दौर को देखा था, बल्कि वे उस दौरान पुलिसिया खौफ के शिकार भी हुए थे। आपातकाल को लेकर रामफेर जी की कई स्‍मृतियां लंबे समय तक  ताजा रहीं,  और वे हमें अक्‍सर कक्षा में इसके बारे में बताया करते थे। आज जब, चूंकि खुद पत्रकार हूं, तो एक लोकतांत्रिक देश में इमरजेंसी जैसे हालातों को बेहतर तरीके से समझ सकता हूं। मुझे याद आता है अपना क्‍लास रूम और रामफेर जी की आपातकाल को लेकर गूंजती हुई आवाज। वे कहते थे- आपातकाल का डेढ़-दो साल का वो दौर ऐसा था कि मानों हम तानाशाही के आदी हो चुके हों। कोई इंदिरा गांधी का विरोध नहीं करता था। प्रशासनिक कार्य समय पर होने लगे। सरकारी अधिकारी समय पर आने लगे। पर एक बात कहूं?  हम लोग कसमसा रहे थे। आपातकाल की बेड़ि‍यो को काटने के लिए, और फिर वो मौक़ा आया, जब आपातकाल हटा दिया गया। पर, मां ने कसम दे दी कि अब और राजनीति नहीं। मैं लौटकर इलाहाबाद गया। पढ़ाई पूरी की,  फिर वहीं पढ़ाने लग गया। मन नहीं लगा, तो घर के पास यहीं दियरा इंटरकॉलेज में पढ़ाने लगा।

25 जून को इमरजेंसी को 40 साल पूरे होने और इसी बीच वरिष्‍ठ भाजपा नेता लालकृष्‍ण आडवाणी के आपातकाल को लेकर आए बयान ने मुझे एक बार फिर रामफेर जी की याद दिला दी।  आदत के मुताबिक़, याद आने पर हमेशा उनके सामने कॉलेज में ही हठ कर बैठ जाता था, लेकिन अब दिल्ली में रहकर उनसे मिलना संभव नही था। मैंने उत्तरप्रदेश के सुल्तानपुर में दियरा (हमारा गांव) अपने मित्र कुलदीप पांडे को फोन किया। वो भागकर रामफेर शुक्ल जी के घर पहुंचे और बात कराई। चूंकि अब रिटायर्ड हो चुके हैं, तो घर पर ही रहते हैं। मैंने फोन पर उन्हें बात करने की वजह बताई, और वो हंस पड़े, और तभी गंभीर हो गए। मैं उनकी गंभीरता को उनकी बदलती आवाज से महसूस कर रहा था। उनकी बातों में वह पूरा का पूरा दौर मानों साफ दिखाई दे रहा था। इस बीच इमरजेंसी पर लंबी बातचीत की भूमिका बताते हुए वे बोले- इंदिरा गांधी की पहल पर आपातकाल का लागू होना, देश के लोकतंत्र के लिए काले अध्याय की तरह है। वह एक ऐसा दौर था, जब पूरा देश इंदिरा गांधी की मुट्ठी में आ चुका था, जबकि पूरा विपक्ष जेल की चक्कियां पीस रहा था। आरएसएस और जनसंघी नेताओं के साथ ही कांग्रेस विरोधी सभी नेताओं को जेल भेज दिया गया, यहां तक कि जेपी को भी।

जेपी को याद करते हुए वे अतीत के आंदोलनकारी दौर में पहुंच गए। बोले- जेपी उस समय चंडीगढ़ में थे, वरिष्ठतम नेता और स्वतंत्रता सेनानी तो थे ही, इंदिरा गांधी के खिलाफ देश को खड़ा करने के पीछे भी जेपी की करिश्माई शक्ति थी। जेपी के उस सम्पूर्ण क्रांति के नारे के पीछे आम लोगों, खासकर छात्रों का खड़ा होना कोई आम बात नहीं थी। जनता आक्रोशित हो उठी थी। छात्रों के साथ ही शिक्षक भी सरकारी नौकरियों को लात मार रहे थे। जेपी की हुंकार और छात्रों से अपील पर छात्र परीक्षा पहले ही छोड़ चुके थे। इसी दौरान मैं इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पढ़ाई करता था और छात्रों के बीच काफी लोकप्रिय था। मैं अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् से संबद्ध था इसलिए प्रदर्शनों की वजह से प्रशासन की निगाह में ही था, लेकिन समय रहते सूत्रों की सूचना पर हम सभी छात्र सतर्क रहने लगे। देखा जाए तो हम हॉस्टल में होकर भी नहीं थे। उस वक्त सिविल लाइन्स इलाके में प्रशासन की नाक के नीचे 2 दिन बिताए। बिना कुछ खाये पिए। हम पुलिसिया अत्याचार नहीं झेलना चाहते थे, पर लड़ने की ताकत क्षीण हो चली थी। लगता था हम अंग्रेजी हुकूमत के दौर में फिर से आ गए थे, जहां अपनों को ही शिकार बनाया जा रहा था। ऐसा कहते-कहते रामफेर शुक्ल की आवाज रुआंसी हो गई।

लंबी सांस लेते हुए वे फिर बोले- नौजवानी का जोश था। हम बदलाव के लिए कुछ भी कर गुजरने को तैयार थे। हर रोज धरना प्रदर्शन करते थे, पर 25 जून को इमरजेंसी की घोषणा के बाद ऐसा लगा, जैसे पैरों तले जमीन खिसक गई हो। हमने इमरजेंसी थोपे जाने की बात तो समझ ली, पर नागरिक अधिकार किस कदर निलंबित रहेंगे पता नहीं चल पाया था। इमरजेंसी की घोषणा होते ही हमें भी हॉस्टल से दूर रहने को कह दिया गया। पर जाते भी तो कहां? पूरा दिन-इधर उधर में बिखरते हुए काट दिया। शाम को मिलने की जगह हॉस्टल के गेट से दूरी पर तय हुई, पर मिल पाते  इससे पहले ही पुलिसिया कहर टूट पड़ा। सब भाग खड़े हुए। कुछ साथी पकड़े गए। शायद उन पर मीसा लगा दिया गया। हम सिविल लाइन्स इलाके में छिपे रहे। पर कब तक छिपते? कई किमी तक पैदल ही भागते रहे। मुश्किल से रेलवे स्टेशन पहुंचे। सुबह का समय था। फैज़ाबाद जाने वाली ट्रेन जा चुकी थी। वहां रुकना भी मुश्किल था। स्टेशन पर कड़ा पहरा था। हम खाइयों के साथ छिपे रहे। जून की धूप हमारा इम्तिहान ले रही थी। भूखे रहने का ये तीसरा दिन था।

इस बीच किसी ने हमारे स्टेशन के आसपास होने की सूचना पुलिस को दे दी। हालांकि हम खुशकिस्मत रहे कि पुलिस के हत्थे नहीं चढ़े। हमने सुबह ही सोच लिया था कि यहां से बचकर निकलेंगे। कुछ देर माहौल के शांत होने का इन्तजार करेंगे। फिर सक्रिय होंगे। इसी उधेड़बुन में छिपते-छिपाते सुल्तानपुर पहुंच गए। घर शहर से 25 किमी दूर था। आधी रात किसी तरह घर पहुंचे तो और भी मुश्किल की घड़ी थी। पिताजी स्थानीय तौर पर आरएसएस से जुड़े होने की वजह से जेल भेज दिए गए थे। आपातकाल के लागू होने की तीसरी रात ने मुझे निजी तौर पर तोड़ दिया था। रामफेर शुक्ल इतना बताते हुए रुक जाते हैं।

फिर कहते हैं, उस समय मेरी मां ने लड़ने की हिम्मत दी। उन्होंने कहा, यहीं रहकर काम करो। खेती बाड़ी संभालो। पिताजी की चिंता मत करो। वो दुनिया देख चुके हैं, तुम दूर रहो। सक्रियता अभी दिखाने की जरुरत नहीं है। पुलिस ने तुम्हारे बारे में भी पूछा था, पर, इलाहाबाद होने की जानकारी देने पर फिर नहीं पूछा। शायद यहां भी पुलिस आ जाए। इतना बोलकर वे फिर चुप हो गए। फोन पर उनकी खामोशी का अंदाजा मैं लगा सकता हूं और आपातकाल का साक्षी तो नहीं रहा, लेकिन मेरे अपने शिक्षक की वह खामोशी और फिर अचानक हंसते हुए हालचाल लेने का अंदाज 40 साल पुराने दौर की गंभीरता का अहसास कराता है।

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