Budget 2021: हौसले से बना अभूतपूर्व बजट, वित्तीय घाटे के बावजूद सरकार ने बढ़ाया खर्च

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण (Finance Minister Nirmala Sitharaman) ने जिस तरह के संकेत दिए थे, वे सारी बातें इस बजट (Budget 2021) में दिखाई दे रही हैं. अलग अलग मदों में खर्च के लिए जिस तरह के प्रावधान दिखाई दे रहे हैं, उस लिहाज़ से इसे अभूतपूर्व ही कहा जाना चाहिए.

Source: News18Hindi Last updated on: February 2, 2021, 12:53 AM IST
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Budget 2021: हौसले से बना अभूतपूर्व बजट, वित्तीय घाटे के बावजूद सरकार ने बढ़ाया खर्च
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण (Finance Minister Nirmala Sitharaman) ने जिस तरह के संकेत दिए थे, वे सारी बातें इस बजट (Budget 2021) में दिखाई दे रही हैं. अलग अलग मदों में खर्च के लिए जिस तरह के प्रावधान दिखाई दे रहे हैं, उस लिहाज़ से इसे अभूतपूर्व ही कहा जाना चाहिए.

जिसका बड़े कुतूहल के साथ इंतजार था, वह बजट (Budget 2021) आ गया. वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण (Finance Minister Nirmala Sitharaman) ने जिस तरह के संकेत दिए थे, वे सारी बातें इस बजट में दिखाई दे रही हैं. अलग अलग मदों में खर्च के लिए जिस तरह के प्रावधान दिखाई दे रहे हैं, उस लिहाज़ से इसे अभूतपूर्व ही कहा जाना चाहिए. खासतौर पर महामारी से जूझते देश में स्वास्थ्य के लिए 2 लाख 24 हजार रुपए खर्च करने का इरादा वित्त मंत्री के संकेत के मुताबिक ही है. सड़क मंत्रालय को एक लाख 18 हजार रूपए का ऐलान दूसरा बड़ा ऐलान है. हालांकि, सड़कों के लिए किया गया यह प्रावधान ज्यादा बड़ी बात नहीं है क्योंकि यह काम पहले से लगभग इसी आकार में होता चला आ रहा है.


बजट के दूसरे बड़े प्रावधान देखें तो शहरी जल जीवन मिशन के लिए के लिए दो लाख 87 हजार करोड़ का प्रावधान उल्लेखनीय है. बेशक पीने और सिंचाई के लिए पानी की कमी और पानी की गुणवत्ता आज की सबसे बड़ी समस्याओं में शामिल है. गौरतलब है कि बजट भाषण में पानी की गुणवत्ता को लेकर डब्ल्यूएचओ की चिंता का उल्लेख किया गया है. आत्मनिर्भर भारत के लिए एक लाख 97 हजार करोड़ दिए जाने की बात है. हालांकि, इसकी समीक्षा बाद में हो पाएगी क्योंक बजट के पहले लाए गए भारीभरकम आत्मनिर्भर पैकेजों के असर का साफ साफ आकलन अभी हो नहीं पाया है. बजट के पहले प्रधानमंत्री ने भी संकेत दिया था कि यह बजट पिछले वित्तीय वर्ष में आत्मनिर्भर पैकेजों का ही विस्तार होगा.



कहां से आएगा पैसा?

इस मोर्चे पर अब ज्यादा बारीकी से देखने की जरूरत इसलिए नहीं बची है क्योंकि जब वर्तमान वित्तीय वर्ष में वित्तीय घाटा सनसनीखेज रूप से 9.5 तक बताया गया है और अगले साल के लिए 6.8 रखा गया है तो इसका मतलब है कि आमदनी से बहुत ज्यादा खर्च का फैसला लिया गया है. इस नुक्ते को वित्तमंत्री के उस संकेत के मुताबिक माना जा सकता है कि जिसमें उन्होंने कहा था कि यह बजट अभूतपूर्व होगा. ज्यादा से ज्यादा धन के प्रबंध के लिए अप्रत्यक्ष रूप से किए गए कदमों को पहचानें तो एलआईसी आईपीओ लाने का ऐलान एक बड़ी बात ही मानी जानी चाहिए. एलआईसी के शेयर खरीदने के लिए लोगों ने अगर उम्मीद के मुताबिक निवेश किया तो आखिर इसे सरकार निजी निवेश का बढ़ना ही मानेगी. इसके अलावा सरकारी कंपनियों का विनिवेश और विदेशी निवेश की सीमा बढ़ाने का इरादा भी धन के प्रंबध के लेखे में माना जाना चाहिए. धन के ये सारे प्रबंध अभी उम्मीद के रूप में ही हैं. इस उम्मीद को पूरा करने के लिए सरकार को लगातार लगे रहना पड़ेगा. गौर करने लायक बात यह भी है कि आमदनी बढ़ाने के लिए सरकार प्रत्यक्षकर बढ़ाने से बचती नज़र आई है.


बजट में कृषि के लिए क्या?

कृषि के लिए इस बार बजट में कुछ अभूतपूर्व होने की अटकलें थीं. बेशक अर्थव्यवस्था का यह क्षेत्र अपने कार्यबल के आकार के लिहाज़ से महत्वपूर्ण माना जाता है. इस बजट में कृषि कर्ज के लिए 16 लाख 50 हजार करोड़ का भारी भरकम जिक्र है. कृषि कर्ज की सहूलियत बढ़ाने के मकसद से बजट में इस तरह के इरादे को पूरा करने के लिए सरकार को लगातार कदम उठाते रहने पड़ेंगे. वैसे मौजूदा सरकार जिस तरह से बजट पेश होने के बाद भी मिनी बजट के रूप में राहत पैकेजों का ऐलान करती रही है उसके मददेनज़र मान कर चलना चाहिए कि कृषि के लिए आगे बड़े ऐलान की गुंजाइश बनी हुई है. खासतौर पर ग्रामीण रोजगार योजना मनरेगा के लिए 73 हजार करोड़ का प्रावधान है. पिछले साल के बजट में इस मद में शुरू में 61 हजार का प्रावधान था, जिसे बाद में राहत पैकेज के जरिए बढ़ाकर एक लाख करोड़ तक पहुंचा दिया गया था. यानी मानकर चलना चाहिए कि आगे नए आत्मनिर्भर पैकेजों में मनरेगा को और पैसा मिल सकता है.


बेरोज़गारी के लिए क्या?

इस मोर्चे सीधे सीधे भले ही कोई बड़ा ऐलान न दिखता हो लेकिन जिस तरह से सड़क योजनाओं पर भारी भरकम खर्च जारी रखने का इरादा है, उससे यह माना जा सकता है कि इस काम से रोजगार पैदा होंगे. वैसे भी इस बार का बजट जिन विषम परिस्थियों पर आया है उसमें बेरोज़गारी से निपटने के लिए किसी बड़ी योजना पर भारीभरकम खर्च की गुंजाइश थी नहीं. सरकार का पहले से तर्क रहा है कि खर्च बढ़ाने से रोजगार बढ़ते हैं. यानी स्वास्थ्य, रेलवे, जल मिशन जैसी मदों में खर्च की जो रकम बढ़ी है उसे बताते हुए सरकार दावा कर सकती है कि इससे रोजगार के मौके बढ़ेंगे ही.


महंगाई की कितनी चिंता?





बजट को अगले साल की आर्थिक दशा और दिशा तय करने वाला दस्तावेज माना जाता है. कोई भी सरकार आमदनी से बहुत ज्यादा खर्च करने से इसलिए बचती है क्योंकि ज्यादा पैसे के प्रवाह से महंगाई बढ़ती है. लेकिन वर्तमान वित्तीय साल में भारीभरकम राहत पैकेजों के बाद भी देश में उतनी महंगाई बढ़ी नहीं है. इसके कारणों का तो अभी साफ साफ पता नहीं है, लेकिन इतना तय है कि अर्थव्यवस्था में मांग बढ़ नहीं रही है. जाहिर है इस बजट में काफी ज्यादा खर्च के बाद भी महंगाई बढ़ने की उतनी चिंता हाल फिलहाल तो दिखाई नहीं दे रही है.


पब्लिक ट्रांसपोर्ट पर जोर यानी पर्यावरण की चिंता

बेशक प्र्यावरण को लेकर वैश्विक चिंता को कम करने के लिए सार्वजनिक यातायात पर जोर देने की बात पूरी दुनिया में हो रही है. भले ही इस मोर्चे पर सिर्फ 11 हजार करोड़ का ही प्रावधान है लेकिन विश्व मंचों पर कहने के लिए एक तर्क जरूर बना लिया गया है.


कुलमिलाकर इस बजट को इस लिहाज़ से अभूतपूर्व माना जाएगा क्योंकि सरकार ने वित्तीय घाटे से समझौता करके ज्यादा से ज्यादा खर्च करने का फैसला किया है. फैसला बिल्कुल नया है. लिहाजा इस बड़े फैसले के नफे नुकसान का अंदाजा फौरन ही नहीं लगाया जा सकता. इसके लिए कुछ महीने नहीं बल्कि कुछ साल इंतजार करना पड़ सकता है. (डिस्क्लेमर: यह लेखक के निजी विचार हैं.)


(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
सुधीर जैन

सुधीर जैन

अपराधशास्त्र और न्यायालिक विज्ञान में उच्च शिक्षा हासिल की. सागर विश्वविद्यालय में पढाया भी. उत्तर भारत के 9 प्रदेश की जेलों में सजायाफ्ता कैदियों पर विशेष शोध किया. मन पत्रकारिता में रम गया तो 27 साल 'जनसत्ता' के संपादकीय विभाग में काम किया. समाज की मूल जरूरतों को समझने के लिए सीएसई की नेशनल फैलोशिप पर चंदेलकालीन तालाबों के जलविज्ञान का शोध अध्ययन भी किया.देश की पहली हिन्दी वीडियो 'कालचक्र' मैगज़ीन के संस्थापक निदेशक, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ क्रिमिनोलॉजी एंड फॉरेंसिक साइंस और सीबीआई एकेडमी के अतिथि व्याख्याता, विभिन्न विषयों पर टीवी पैनल डिबेट. विज्ञान का इतिहास, वैज्ञानिक शोधपद्धति, अकादमिक पत्रकारिता और चुनाव यांत्रिकी में विशेष रुचि.

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First published: February 1, 2021, 3:02 PM IST
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