कोरोना परीक्षण का काम युद्धस्तर पर छेड़ने की दरकार

देश में इस समय अगर रोज कोरोना के एक लाख मरीज बढ़ रहे हों तो प्रतिदिन परीक्षणों का आंकड़ा कम से कम 20 लाख किया जाना ही समय की जरूरत है. आगे की किसी बड़ी परेशानी से बचना है तो केंद्र सरकार, राज्य सरकारों, स्थानीय निकायों और स्वयंसेवी संस्थाओं को कोरोना परीक्षणों बढ़ाने के काम पर युद्धस्तर पर लग जाना चाहिए.

Source: News18Hindi Last updated on: September 18, 2020, 10:46 PM IST
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कोरोना परीक्षण का काम युद्धस्तर पर छेड़ने की दरकार
देश में कोरोना टेस्ट बढ़ाने की जरूरत (फाइल फोटो)
कोरोना (Coronavirus) का कहर थम नहीं रहा है. सात सौ अस्सी करोड़ की आबादी वाली दुनिया में मरीजों की कुल संख्या अब तीन करोड़ पार कर गई है. हर दिन मरीजों की संख्या बढ़ती जा रही है. अब तो अपने देश की हालत भी बिल्कुल ऐसी ही हो गई है. अपने यहां दो रोज़ पहले ही संक्रमितों का आंकड़ा पचास लाख पार कर चुका है. यानी अबतक अपनी विशालकाय आबादी की ओट में जो तर्क दिया जा रहा था कि हमारी हालत ज्यादा खराब नहीं है, वह तर्क बेकार होने को आ गया है. हमें गंभीर चिंता की मुद्रा में आ जाना चाहिए, क्योंकि भारत में इस समय हर दिन एक लाख नए मरीज़ बढ़ रहे हैं. बेशक अभी न दवा बनी है और न टीका बन पाया है, लेकिन ऐसे में क्या कोई भी तरीका नहीं है कि हम इस प्रकोप का असर ज्यादा न होने दें?

रोकथाम के क्या सारे विकल्प खत्म हो गए?

लॉकडाउन, टेस्टिंग, अलगाव, मास्क, साबुन, सैनेटाइज़र, दो गज़ की दूरी सबकुछ आजमाया गया. लेकिन शुरू से लेकर अब तक कोई हफ्ता ऐसा नहीं गुज़रा कि प्रतिदिन बढ़ने वाले मरीजों की संख्या घटी हो. अब ये अलग बात है कि सरकारी अफसर यह तर्क देने लगें कि अगर उन्होंने सतर्कता नहीं बरती होती तो हालात और भी खराब हो जाते. वैसा होता तो ऐसा हो जाता, इसे जांचने का कोई उपाय नहीं है. फिर भी अपने देश में आजमाए गए एक तरीके पर जरूर गौर किया जा सकता है. वह ये है कि पिछले महीने कुछ हफ़्तों के लिए जब हमने टेस्टिंग की संख्या थोड़ी सी बढ़ाई थी उसके हफ्ते दो हफ्ते बाद प्रतिदिन मरीजों के बढ़ने की रफ्तार कम हुई थी. उस अनुभव के आधार पर स्वास्थ्य प्रशासकों को भी मान लेना चाहिए कि परीक्षणों की संख्या बढ़ाना कारगर होता है.

क्या पड़ा था टेस्टिंग बढ़ाने का असर
उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, अपने देश में 20 मई के बाद से टेस्टिंग पर थोड़ा सा ध्यान देना शुरू किया गया था. उस समय लगने लगा था कि कोरोना परीक्षणों की रफ्तार तेजी से बढ़ाई जाएगी. लेकिन वह हर हफ्ते औसतन सिर्फ 15 फीसद की रफ्तार से ही बढ़ाई जा पाई. बहरहाल इससे हुआ यह कि 20 मई को जहां सिर्फ एक लाख टेस्ट हो रहे थे वे दो महीने बाद 20 जुलाई तक रोज चार लाख टेस्ट होने लगे. लेकिन 138 करोड़ की भारीभरकम आबादी वाले देश में चार लाख की यह संख्या नगण्य ही थी. इतने परीक्षणों के इस जाल में जितने संक्रमित आ पा रहे थे वे पर्याप्त नहीं थे. एक विश्लेषण से पता चला कि देश में पॉजिटिविटी रेट ज्यादा है. प्रति सौ परीक्षण में जितने संक्रमित निकलते हैं उसे पॉजिटिविटी रेट कहते हैं. इससे सिद्ध हो रहा था कि बहुत से संक्रमित अनजाने छूट रहे हैं और दूसरों को भी अनजाने में संक्रमित कर रहे हैं. अगर देश में हर तरकीब अपनाने के बाद भी कभी भी संक्रमण की रफतार घटी न हो तो यह मान लेने में संकोच नहीं होना चाहिए कि शुरू में टेस्टिंग पर जरूरत के मुताबिक ध्यान नहीं दिया गया.

आगाह भी किया जाता रहा

अगस्त के पहले हफ्ते में एक मीडिया प्रतिष्ठान न्यूज़फ्रंट इन की रिसर्च टीम ने अपना एक शोध सर्वेक्षण पेश किया था. इसमें पूर्वानुमान किया गया था कि अगर इसी तरह चलता रहा तो अक्टूबर के पहले हफ्ते तक देश में कुल संक्रमितों की संख्या 80 लाख तक पहुंच जाएगी. उस समय किया गया वह पूर्वानुमान सनसनीखेज लग रहा था. क्योंकि उस समय संक्रमितों का कुल आंकड़ा 16 लाख ही था. यह शोध अध्ययन आगाह कर रहा था कि दो महीने में संक्रिमितों का आंकड़ा पांच गुना हो जाएगा. इस शोध सर्वेक्षण में वे सभी आधार देखे गए थे जो आगे के आंकड़े को तय करते थे. सितंबर के तीसरे हफ्ते यानी आज से दो दिन पहले ही देश में संक्रमितों का आंकड़ा पचास लाख को पार कर गया है. और काफी अंदेशा है कि अक्टूबर के पहले हफते में संक्रिमितों का आंकड़ा 65 से 70 लाख के बीच पहुंच जाएगा. गौर करने की बात यह है कि डेढ महीने पहले के पूर्वानुमान में दस पंद्रह लाख का फर्क इसलिए दिख सकता है क्योंकि इस बीच कुछ हफ्तों के लिए देश में टेस्टिंग की संख्या बढ़ाई गई थी.टेस्टिंग के असर का एक सबूत

न्यूज़फ्रंट ने ही पिछले पखवाड़े अपने पूर्वानुमान की समीक्षा भी पेश की थी. इसी समीक्षा में यह गौरतलब बात थी कि देश में 24 जुलाई के बाद सिर्फ साढ़े तीन हफ्तों में ही परीक्षणों की संख्या चार लाख से बढ़ाकर आठ लाख तक पहुंचा दी गई. रिसर्च टीम ने सिद्ध किया कि अचानक बढ़ाई गई परीक्षणों की संख्या का असर आठ दस दिन बाद दिखा और अगस्त के पहले हफ्ते में सनसनीखेज तौर पर बढ़ रही संक्रमण की रफ्तार कुछ कम हो गई. जहां हरदिन औसतन तीन  फीसद की रफ्तार से मरीज बढ़ रहे थे वे घटकर दो से फीसद की रफ्तार पर आ गए. इससे संकेत मिला कि परीक्षण बढ़ाकर कोरोना के फैलाव कुछ कम किया जा सकता है. गौरतलब है कि परीक्षणों को बढ़ाने का असर फौरन नहीं दिखाई पड़ता बल्कि आठ दस दिन बात दिखता है. होता यह है कि जब भी परीक्षणों की संख्या बढ़ाई जाती है तो उसके एक दो रोज़ बाद संक्रमितों की संख्या उसी अनुपात में बढ़ी हुई दिखती है, लेकिन उसके आगे के समय में इसका चमत्कारिक प्रभाव दिखाई देता है.

क्या है इस समय टेस्टिंग की स्थिति

23 जुलाई के बाद कोरोना परीक्षण जिस तरह से साढे तीन हफ्ते में चार लाख से आठ लाख टैस्ट होने लगे थे, उनमें कुछ ठहराव सा आ गया. सरसरी तौर पर देखें तो उसके बाद के चार हफ्तों में परीक्षणों की संख्या आठ से बढ़कर कम से कम 16 लाख प्रतिदिन हो जानी चाहिए थी. लेकिन उसकी बजाए टेस्टिंग इस समय औसतन दस ग्यारह लाख प्रतिदिन ही है. जाहिर है कि टेस्टिंग बढ़ाने से जो हासिल हो रहा था उसका लाभ बरकरार नहीं रखा जा सका.

मौजूदा पॉजिटिविटी रेट पर गौर करने की जरूरत

अगर हर दिन कमोबेश एक लाख मरीज आ रहे हों और टेस्टिंग प्रतिदिन सिर्फ लगभग 11 लाख ही हो रही हो तो पॉजिटिविटी 9 फीसद बैठता है. भले ही यह रेट डब्ल्यूएचओं के पुराने मानक की रेंज में हो लेकिन है ज्यादा की तरफ. विश्वसंस्था के शुरुआती मानकों के मुताबिक पॉजिटिविटी रेंज की खिड़की बहुत बड़ी है. इसे तीन से लेकर 12 फीसद तक रखा गया है. लेकिन विश्व में महामारी के बेकाबू होते जाने के दौर में डब्ल्यूएचओ ने ही इस साल मई में यह समझाइश भी दी थी कि पॉजिटिविटी रेट को पांच फीसद पर नियंत्रित करने की कोशिश होनी चाहिए. साफ कहा गया था कि अगर दो हफ्ते तक पांच फीसद पॉजिटिविटी रेट का स्तर बना रहता है तभी कोरोना पाबंदियों में छूट दी जानी चाहिए. जबकि हमारी पॉजिटिविटी रेट लगभग दुगना है और चारों तरफ से पाबंदियां हटाने की कोशिशें होती दिख रही हैं.

इस समय कितने परीक्षणों की दरकार

देश में इस समय अगर रोज कोरोना के एक लाख मरीज बढ़ रहे हों तो प्रतिदिन परीक्षणों का आंकड़ा कम से कम 20 लाख किया जाना ही समय की जरूरत है. आगे की किसी बड़ी परेशानी से बचना है तो केंद्र सरकार, राज्य सरकारों, स्थानीय निकायों और स्वयंसेवी संस्थाओं को कोरोना परीक्षणों बढ़ाने के काम पर युद्धस्तर पर लग जाना चाहिए. (डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं.)
ब्लॉगर के बारे में
सुधीर जैन

सुधीर जैन

अपराधशास्त्र और न्यायालिक विज्ञान में उच्च शिक्षा हासिल की. सागर विश्वविद्यालय में पढाया भी. उत्तर भारत के 9 प्रदेश की जेलों में सजायाफ्ता कैदियों पर विशेष शोध किया. मन पत्रकारिता में रम गया तो 27 साल 'जनसत्ता' के संपादकीय विभाग में काम किया. समाज की मूल जरूरतों को समझने के लिए सीएसई की नेशनल फैलोशिप पर चंदेलकालीन तालाबों के जलविज्ञान का शोध अध्ययन भी किया.देश की पहली हिन्दी वीडियो 'कालचक्र' मैगज़ीन के संस्थापक निदेशक, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ क्रिमिनोलॉजी एंड फॉरेंसिक साइंस और सीबीआई एकेडमी के अतिथि व्याख्याता, विभिन्न विषयों पर टीवी पैनल डिबेट. विज्ञान का इतिहास, वैज्ञानिक शोधपद्धति, अकादमिक पत्रकारिता और चुनाव यांत्रिकी में विशेष रुचि.

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First published: September 18, 2020, 10:46 PM IST
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