OPINION: कोरोना टैस्टिंग...देर आयद दुरुस्त आयद

दुनिया भर के संक्रमण रोग विशेषज्ञ सुझाते रहे हैं कि जितनी ज्यादा टैस्टिंग की जाएगी संक्रमण फैलने की रफ़्तार उपनी ही कम होगी.इसका कारण यह है कि जितने ज्यादा संक्रमितों की पहचान करके उन्हें अलग रखा जाएगा उससे वे दूसरों में संक्रमण उतना ही कम फैला पाएंगे.

Source: News18Hindi Last updated on: August 25, 2020, 11:32 PM IST
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OPINION: कोरोना टैस्टिंग...देर आयद दुरुस्त आयद
स्टडी के मुताबिक, पुरुषों की तुलना में महिलाओं में एंटीबॉडीज अधिक हैं. (सांकेतिक तस्वीर)
छह महीनों में पहली बार कोरोना (Corona virus) का फैलाव थोड़ा सा कम होता दिख रहा है.क्या इसके कारणों पर गौर नहीं होना चाहिए? अगर वे कारण पता चल जाएं तो उस तरफ कोशिशें बढ़ाई जा सकती हैं. इस सिलसिले में ज़रा गौर से देखें तो हमने पिछले दिनों एक ही काम ज्यादा किया है, वह है कोरोना टैस्टिंग की संख्या तेजी से बढ़ाई.अगर वाकई टैस्टिंग से कुछ फर्क पड़ रहा है तो यही काम युद्धस्तर पर करने में हर्ज़ क्या है?

क्यों कारगर मानी जाती है टैस्टिंग
दुनिया भर के संक्रमण रोग विशेषज्ञ सुझाते रहे हैं कि जितनी ज्यादा टैस्टिंग की जाएगी संक्रमण फैलने की रफ़्तार उपनी ही कम होगी.इसका कारण यह है कि जितने ज्यादा संक्रमितों की पहचान करके उन्हें अलग रखा जाएगा उससे वे दूसरों में संक्रमण उतना ही कम फैला पाएंगे. मौजूदा महामारी के दौर में शुरू में ज्यादा मुश्किल में आए देशों में एक जर्मनी ने ताबड़तोड़ टैस्टिंग के उपाय से हालात पर काबू पाया था.और भी कई देशों ने इसपर जोर दिया और हालात संभाले थे.

महीने भर से हमने टैस्टिंग पर ज़ोर बढ़ाया
भले ही कोरोना के शुरुआती महीनों में टैस्टिंग पर ज्यादा ज़ोर की बजाए हमने दूसरे तरीकों पर ज़ोर लगाया था.मसलन लाॅकडाउन और सोशल डिस्टेेसिंग. इन उपायों पर कुछ ज्यादा ही वक्त खर्च हो गया.लेकिन उन तरीकों से उतना फर्क पड़ा नज़र नहीं आया था.संक्रमितों की संख्या बढ़ने की रफ़्तार बढ़ती ही रही.लेकिन इधर एक महीने से टैस्टिंग बढ़ाई गई.और अब अगर कोरोना का फैलाव काबू में होता नज़र आ रहा हो तो क्या गौर से नहीं देखा जाना चाहिए कि हमने टैस्टिंग कितनी बढ़ाई? और उससे किस तरह का फर्क पड़ा?

कितनी बढ़ी टैस्टिंग
आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि शुरुआती महीनों में टैस्टिंग पर ज्यादा घ्यान नहीं दिया गया.यहां तक कि शुरू के ढाई महीनों में 138 करोड़ आबादी वाले हम प्रतिदिन टैस्टिंग का आंकड़ा एक लाख तक भी नहीं पहुंचा पाए थे.उन्नीस मई को टैस्टिंग आंकड़ा एक लाख पहुंच पाया था.उसके बाद 20 मई से लेकर 20 जुलाई के बीच यानी दो महीनों में कोरोना टैस्टिंग कोई 15 फीसद प्रतिसप्ताह की रफ़्तार से बढाई जा रही थी.लेकिन जुलाई के तीसरे हफ़्ते के बाद से अचानक टैस्टिंग औसतन 25 फीसद प्रतिसप्ताह की दर से बढ़ाई जाने लगी.इससे यह हुआ कि चार हफ्ते पहले जहां देश में औसतन चार लाख टैस्ट प्रतिदिन हो रहे थे वे साढे़ तीन हफ़्ते में ही बढ़कर औसतन आठ लाख किए जाने लगे.टैस्टिंग की संख्या में यह उल्लेखनीय बढ़त थी.ऐसी मिसाल सबसे बुरी हालत से जूझ रहे अमेरिका तक में नहीं बनी थी.अमेरिका ने चार लाख से आठ लाख टैस्ट प्रतिदिन तक पहुंचने में आठ हफ्ते लगाए थे.ये एक अलग बात है कि अमेरिका और भारत के बीच आबादी का फर्क चार गुना है.फिर भी यह निष्कर्ष तो निकलता ही है कि पिछले पांच महीनों की तुलना में पिछले चार हफ्तों में भारत में टैस्टिंग के काम ने तेजी पकड़ी.

फैलाव पर किस तरह पड़ा असर
अध्ययन से पता चला कि जुलाई के तीसरे हफ़्ते में जब ज्यादा टैस्टिंग हुई तो उसके आठ दस दिन बाद संक्रमितों के बढ़ने की रफ़्तार बहुत तेजी से घटती दिखी.उसी तरह अगस्त के तीसरे हफ़्ते में जब टैस्टिंग आठ लाख प्रतिदिन को भी पार करा दी गई तो पिछले कुछ दिनों से संक्रमण की रफ़्तार और तेज़ी से घट गई.मसलन 23 अगस्त को एक दिन में संक्रमितों की संख्या एकसाथ दस हजार कम होकर 61 हजार रह गई.और सबसे ज्यादा उम्मीद जगाने वाली बात यह कि उसके अगले दिन इस आंकड़े में और एक हजार की घटोतरी हो गई.यानी अब तक के रुख से यही निष्कर्ष निकल रहा है कि टैस्टिंग बढ़ाने का अच्छा असर आठ दस दिन के भीतर दिखने लगता है.

अब अगर यह पता चल गया तो?
तो फिर टैस्टिंग की संख्या और भी ज्यादा बढ़ाने में हिचक क्यों होनी चाहिए.वैसे भी विश्व में अब तक का कोई भी ऐसा अघ्ययन नहीं है जो टैस्टिंग की संख्या को नियंत्रित करने का सुझाव देता हो.बेशक विश्व स्वास्थ्य संगठन ने टैस्टिंग की न्यूनतम संख्या का पैमाना जरूर बना कर दिया है.लेकिन याद दिलाया जाना चाहिए कि यह न्यूनतम संख्या है.अधिकतम संख्या का कोई सुझाव नहीं है.अगर कोई बाधा हो सकती है तो वह टैस्टिंग का इंतजाम करने की अपनी हैसियत का हो सकती है.

खर्च का सवाल
ज्यादा टैस्टिंग करने में कोई अड़चन हो सकती है तो वह सिर्फ खर्च की हो सकती है.और कोई बाधा देखी जाए तो वह टैस्टिंग प्रयोगशालाओं के आधारभूत ढांचे की हो सकती है.लेकिन कोरोना से अब तक देश की अर्थव्यवस्था में जो भारी तबाही मची है वह तो 10 लाख करोड़ से भी ज्यादा हो चुकी है.और कोरोना के चलते अभी भी कामधंधे जल्द ही पटरी पर आते नज़र नहीं आ रहे हैं.इससे तो कोई भी इनकार नहीं कर सकता कि जितनी जल्दी कोरोना से छुटकारा मिलेगा उतनी ही जल्दी अर्थव्यवस्था को संभालने का काम शुरू होगा.

अब अगर टैस्टिंग बढ़ाने के तरीके से कोरोना को काबू मे करने की उम्मीद दिख रही हो तो स्वास्थ्य प्रशासकों को इस काम पर युद्धस्तर पर लग जाने में कोई हिचक नहीं होनी चाहिए.वैसे भी जब कोरोना की दवा या वैक्सीन जल्द आती न दिख रही हो इसके अलावा और चारा भी क्या बचता है.
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
सुधीर जैन

सुधीर जैन

अपराधशास्त्र और न्यायालिक विज्ञान में उच्च शिक्षा हासिल की. सागर विश्वविद्यालय में पढाया भी. उत्तर भारत के 9 प्रदेश की जेलों में सजायाफ्ता कैदियों पर विशेष शोध किया. मन पत्रकारिता में रम गया तो 27 साल 'जनसत्ता' के संपादकीय विभाग में काम किया. समाज की मूल जरूरतों को समझने के लिए सीएसई की नेशनल फैलोशिप पर चंदेलकालीन तालाबों के जलविज्ञान का शोध अध्ययन भी किया.देश की पहली हिन्दी वीडियो 'कालचक्र' मैगज़ीन के संस्थापक निदेशक, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ क्रिमिनोलॉजी एंड फॉरेंसिक साइंस और सीबीआई एकेडमी के अतिथि व्याख्याता, विभिन्न विषयों पर टीवी पैनल डिबेट. विज्ञान का इतिहास, वैज्ञानिक शोधपद्धति, अकादमिक पत्रकारिता और चुनाव यांत्रिकी में विशेष रुचि.

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First published: August 25, 2020, 11:13 PM IST
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