सबसे ज्यादा सतर्क रहने के होंगे अगले दो महीने

कोरोना से निपटने की सरकार की नई गाइड लाइन का मुख्य जोर पहले बताए गए उपायों को कड़ाई से लागू करने पर ही है. लेकिन इस बात पर भी गौर किया जाना चाहिए कि आने वाले तीन महीने कोरोना के फैलाव के लिए सबसे ज्यादा संवेदनशील होंगे. इसके लिए अतिरिक्त सतर्कता की दरकार होनी चाहिए.

Source: News18Hindi Last updated on: November 26, 2020, 5:21 pm IST
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सबसे ज्यादा सतर्क रहने के होंगे अगले दो महीने
. (प्रतीकात्मक तस्वीर)
कोरोना मामले में मौसम के लिहाज़ से देश को नौ महीने का अनुभव हो चुका है. लेकिन इस महामारी से निपटने के लिए अगले तीन महीने के मौसम का हमें कोई तजुर्बा नहीं है. सर्दियों के अगले तीन महीने ही सबसे ज्यादा संवेदनशील हैं. हालफिलहाल सरकारी तौर पर जो चेतावनियां दी जा रही हैं वे सामान्य परिस्थितियों वाली ही नज़र आ रही हैं. राज्य और केंद्रशासित प्रदेशों से कहा जा रहा है कि गाइडलाइन का सख्ती से पालन कराएं. हालांकि साथ ही यह भी कहा गया है कि बिना केंद्र सरकार के सलाह मशविरे के राज्य लाॅकडाउन का ऐलान न करें. बेशक अर्थव्यवस्था के मद्देनज़र अब लाॅकडाउन के तरीके से बचना भी जरूरी है. अलबत्ता रात को कफ्र्यू लगाने की छूट जरूर होगी. कड़ाके की ठंड के दिनों में रात को तो वैसे भी कफ्र्यू जैसा माहौल अपने आप बन जाता है. बहरहाल, कोरोना से निपटने की सरकार की नई गाइड लाइन का मुख्य जोर पहले बताए गए उपायों को कड़ाई से लागू करने पर ही है. लेकिन इस बात पर भी गौर किया जाना चाहिए कि आने वाले तीन महीने कोरोना के फैलाव के लिए सबसे ज्यादा संवेदनशील होंगे. इसके लिए अतिरिक्त सतर्कता की दरकार होनी चाहिए.



ज्यादा बचाव की जरूरत क्यों?

भले ही सर्दी जुकाम का सीधा संबंध कोरोना पैदा होने से न हो, लेकिन चिकित्साशास्त्र के मुताबिक सर्दी के असर से नज़ला जुकाम होने से यानी नाक बहने से कोरोना को फैलने का एक साधन मिलता है. सामान्य फ्लू को हम भले ही कोरोना न मानें लेकिन कोरोना के फैलाव के लिए यह एक ऐसा मौसम होगा जिसे भारत ने कोरोना काल में अभी झेला नहीं है. यानी सबसे ज्यादा सतर्कता का समय यही है. सामान्य फ्लू कोरोना का फैलाव कई गुना बढ़ाने का सबब बन सकता है.



अभी भी कम नहीं है प्रतिदिन चलीस हजार मामले

इस समय भी औसतन हर रोज़ 40 हजार मामले बढ़ रहे हैं. यह वही स्तर है जो जुलाई के महीने में था. जुलाई में प्रतिदिन आज जितने ही मामले बढ़ने से देश में हाहाकार मचा हुआ था. ये अलग बात है कि उसके बाद बढते बढ़ते यह आंकड़ा 97 हजार प्रतिदिन तक पहुंच गया था. इस तरह उस आंकड़े से तुलना करके यह मानना एक मुगालता ही होगा कि कोरोना काबू में है. बल्कि एहतियात के तौर पर माना यह जाना चाहिए कि जुलाई का महीना सर्दी जुकाम वाला नहीं था और आने वाले दिन खांसी और जुकाम के दिन हैं. लिहाज़ा अब अगर पहले से भी ज्यादा सतर्कता नहीं बरती गई तो कोरोना के फैलाव का अंदेशा इन्हीं दिनों में सबसे ज्यादा है.



सर्दी जुकाम से बचाव के उपाय बढ़ाने की जरूरत

ठंड से बचाव के सरकारी उपाय करने में भी इस बार दिक्कत आएगी. इस बार कड़ाके की सर्दी में जगह जगह अलाव जलाने के लिए लकड़ियों के प्रबंध या रैन बसेरों की व्यवस्था भी आसान नहीं होगी. सोशल डिस्टेंसिंग में ये तरीके बाधक होंगे. और वैसे भी ये तरीके उस पैमाने पर किए जाना कभी भी संभव नहीं हो पाए हैं. इस बार तो नौ महीने तक कामधंधे ठप रहने से आमतौर पर लोगों की माली हालत ऐसी नहीं बची कि वे अपना अतिरिक्त बचाव खुद कर लें. स्थिति अभूतपूर्व है. उपाय भी नया ही सोचना पड़ेगा.



मनोस्नायुविक परिस्थितियां बनने का अंदेशा

सामान्य फ्लू और कोरोना का भेद अब जगजाहिर है. अब तक के कोरोना काल में सामान्य फ्लू का मौसम आया नहीं था. लेकिन अब ये मौसम आ जाने के बाद यह भेद करने का तरीका सिर्फ कोरोना परीक्षण ही होगा. जाहिर है कि अब तक लक्षण विहीन कोरोना मामलों ने मनावैज्ञानिक समस्याएं पैदा नहीं कीं. लेकिन आने वाले मौसम में यह मनोस्नायुविक समस्या बड़े पैमाने पर खड़ी हो सकती है. ऐसे में इसके अलावा कोई चारा है नहीं कि बड़े पैमाने पर कोरोना परीक्षण की व्यवस्था अभी से बना लें.



ताबड़तोड़ टेस्टिंग से बेहतर उपाय कोई नहीं

बिना दवाई और बिना टीके के दुनिया के पास एक ही चारा है कि किसी तरह कोरोना को फैलने से रोकें. अब तक बार बार साबुन से हाथ धोने, सेनिटाइज़र और सोशल डिस्टेंसिंग पर ही ज्यादा जोर दिया जाता रहा. अलबत्ता एक और उपाय हमारे पास था कि ज्यादा से ज्यादा टेस्टिंग बढ़ाकर ज्यादा से ज्यादा संक्रमित लोगों को अलगाव में रखा जाए. हमें यह कबूल कर लेना चाहिए कि साफ सफाई और सोशल डिस्टेंटिंग का उपाय भारी खर्चीला साबित हुआ. देश में बढ़ते कोरोना मामलों के बीच ही लाॅकडाउन खत्म करने का फैसला भी हमें अर्थव्यवस्था की मजबूरी में करना पड़ा था. आज दिन तक वे मजबूरियां जहां की तहां हैं. हमें यह भी मान लेना चाहिए कि इस साल के मार्च जैसे लाॅकडाउन से बचा जा रहा है. ऐसे में एक ही तरीका बचता है कि देश में कोरोना के पक्के परीक्षणों यानी आरटी पीसीआर टैस्टिंग की मुहिम छेड़ दी जाए.



सर्दियों के मौसम में कोरोना का फैलाव कम करने के लिए जब तक कोई व्यावहारिक तरीका नहीं खोजा जा पाता तब तक बाकी छुटपुट उपायों के साथ साथ युद्धस्तर पर कोरोना टैस्टिंग बढ़ाने से बेहतर कोई उपाय नज़र नहीं आ रहा है. (ये लेखक के निजी विचार हैं)
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi उत्तरदायी नहीं है.)
ब्लॉगर के बारे में
सुधीर जैन

सुधीर जैन

अपराधशास्त्र और न्यायालिक विज्ञान में उच्च शिक्षा हासिल की. सागर विश्वविद्यालय में पढाया भी. उत्तर भारत के 9 प्रदेश की जेलों में सजायाफ्ता कैदियों पर विशेष शोध किया. मन पत्रकारिता में रम गया तो 27 साल 'जनसत्ता' के संपादकीय विभाग में काम किया. समाज की मूल जरूरतों को समझने के लिए सीएसई की नेशनल फैलोशिप पर चंदेलकालीन तालाबों के जलविज्ञान का शोध अध्ययन भी किया.देश की पहली हिन्दी वीडियो 'कालचक्र' मैगज़ीन के संस्थापक निदेशक, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ क्रिमिनोलॉजी एंड फॉरेंसिक साइंस और सीबीआई एकेडमी के अतिथि व्याख्याता, विभिन्न विषयों पर टीवी पैनल डिबेट. विज्ञान का इतिहास, वैज्ञानिक शोधपद्धति, अकादमिक पत्रकारिता और चुनाव यांत्रिकी में विशेष रुचि.

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First published: November 26, 2020, 5:21 pm IST
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