क्या अज्ञान ही है कोरोना के कहर का कारण

कोरोना वायरस (coronavirus) की जीवन शैली या रहन-सहन को फौरन जाने बगैर हम उससे निपट नहीं सकते. विशेषज्ञ मानते हैं कि यह पता चलते ही उस वायरस से निपटने की दवाइयां भी बन जाएंगी और जल्द ही टीका बनाना आसान हो जाएगा. आगे से उसके प्रकोप से बचने के इंतजाम हो जाएंगे.

Source: News18India Last updated on: March 31, 2020, 8:47 PM IST
शेयर करें: Facebook Twitter Linked IN
क्या अज्ञान ही है कोरोना के कहर का कारण
कोरोना वायरस (coronavirus) की जीवन शैली या रहन-सहन को फौरन जाने बगैर हम उससे निपट नहीं सकते. विशेषज्ञ मानते हैं कि यह पता चलते ही उस वायरस से निपटने की दवाइयां भी बन जाएंगी और जल्द ही टीका बनाना आसान हो जाएगा. आगे से उसके प्रकोप से बचने के इंतजाम हो जाएंगे.
कोरोना वायरस (Coronavirus) मानव प्रजाति को सबक सिखाता चल रहा है. अभी पता नहीं हैं कि और कितने? और क्या-क्या? सबक मिलेंगे. लेकिन कोरोना ने अब तक जितना सिखाया है, उसे दर्ज करके रखते रहने में ही समझदारी है. ऐसा न हो कि बाद में भूल जाएं. मसलन कोरोना ने अब तक हमें यह पाठ याद दिलाया है कि दुख का सबसे बड़ा कारण अज्ञान है.

पता पहले से भी है
भारतीय ज्ञान परंपरा के रूप में जैन दर्शन का एक सूत्र है कि सभी दुखों का मूल कारण अज्ञान है. इसीलिए जैन दर्शन में सम्यक ज्ञान, सम्यक दर्शन और सम्यक चरित्र का एक एकीकृत अध्याय है. इन तीनों को जैन दर्शन में त्रिरत्न कहा जाता है. अलबत्ता यह विचार विमर्श आज भी होता रहता है कि इन तीनों में प्रमुख कौन है या सबसे पहले किसे साधा जाए. आजकल के कुछ जैनाचार्य मानते हैं कि सबसे पहले सम्यक दर्शन यानी सही तरीके से देखना जरूरी है. कुछ आचार्य सबसे पहले सम्यक चरित्र यानी अनुशासन या धार्मिक कर्मकांड वगैरह पर जोर देते हैं. और कुछ यह मानकर चलते हैं कि सम्यक ज्ञान सबसे महत्वपूर्ण है. ज्ञान हो जाए तो देखने का सलीका भी आ जाता है और व्यवहार अनुशासित भी हो जाता है. इधर, मानव समाज को कोरोना से यह सबक मिला है कि ज्ञान के बिना हम मौजूदा संकट या दुख से पार नहीं पा सकते.

अब तक सही-सही पता नहीं
कोरोना नाम के जैविक पदार्थ की प्रकृति के बारे अब तक हमें निश्चित रूप से कुछ नहीं पता. उस जैसे दूसरे वायरस के बारे में जितना पहले से ज्ञान था, वह काम नहीं आ रहा है. पुरानी दवाइयां काम नहीं कर रही हैं. यानी जरूरत यह आन पड़ी है कि वायरस के इस नए रूप के गुण-धर्म को जाना जाए. यानी कोरोना वायरस की जीवन शैली या रहन-सहन को फौरन जाने बगैर हम उससे निपट नहीं सकते. जीवविज्ञानी इसे किसी जीव के हैबिटेट को समझना कहते है. सभी विशेषज्ञ मानते हैं कि यह पता चलते ही उस वायरस से निपटने की दवाइयां भी बन जाएंगी और जल्द ही टीका बनाना आसान हो जाएगा. आगे से उसके प्रकोप से बचने के इंतजाम हो जाएंगे.

पलटकर देखना पड़ेगा
देखा जाना चाहिए कि पिछले कुछ साल से मानव समाज विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में करता क्या रहा. सामान्य अनुभव है कि पूरी दुनिया प्रौद्योगिकी के विकास की होड़ में लग गई. मानकर चला गया कि ज्ञान का सृजन बहुत हो गया, अब उसके औद्योगिक इस्तेमाल की जरूरत है. विज्ञान के क्षेत्र में बारहवीं के बाद पढ़ाई के लिए विद्यार्थियों को प्रौद्योगिकी के स्नातक कोर्स ज्यादा सुझाए जाने लगे. शुद्ध ज्ञान को हतोत्साहित किया जाने लगा.
साइंस और टेक्नॉलजी का फर्क
तीन-चार दशकों से पूरी दुनिया में टेक्नॉलजी का ऐसा दौर चला कि उसे ही विज्ञान समझा जाने लगा. इसे भुलाया गया कि विज्ञान का काम ज्ञान सृजित करना यानी ज्ञान को पैदा करना है. जबकि प्रौद्योगिकी उस सृजित ज्ञान का औद्योगिक इस्तेमाल करने का हुनर पैदा करती है. क्या कोविड-19 का मौजूदा संकट हमें यह याद नहीं दिला रहा है कि इस वायरस ने विज्ञान जगत को भौंचक कर दिया है. अचानक हमें बायोटेक के विशेषज्ञों की बजाए माइक्रोबायोलजी के विद्वानों को ढूंढना पड़ रहा है. उनसे पूछना पड़ रहा है कि ऐसे वायरस के बारे में क्या पता करके रखा गया?

क्यों पीछे छूटा वैज्ञानिक शोध
क्योंकि वैज्ञानिक शोध कुछ महंगी चीज है. इसीलिए यह कम मुनाफे का काम बनता गया. ऐसा इसलिए भी हुआ क्योंकि शुद्ध विज्ञान के क्षेत्र में कोई कितना भी करके दिखा दे, उसे गुजारे लायक पैसे नहीं मिलते. अपने देश की ही मिसाल लें तो क्या पांच-सात साल से आर्थिक वृद्धि के चक्कर में हम प्रौद्यागिकी के विकास की ही बात नहीं करते आ रहे हैं. शुद्ध ज्ञान का सृजन करने वाले विश्वविद्यालयों को क्या हम हिकारत की नज़र से नहीं देखने लगे हैं. विश्वविद्यालयों की गुणवत्ता की वैश्विक रैंकिंग में अपने भारतीय प्रौद्यागिकी संस्थानों को देखने की चाह में उन पर ही ज्यादा खर्च करने की प्रवृत्ति बता रही है कि हमारा सारा जोर प्रौद्योगिकी पर ही है. कुल मिलाकर पिछले कुछ साल हम नवोन्मेष या इनोवेशन के ही पीछे पड़े रहे. गौरतलब है कि इनोवेशन किसी काम को करने के नए और सस्ते तरीके तक सीमित है.

वायरस के इस नए रूप के गुण-धर्म को जाना जाए

किन देशों की तरफ देखना चाहिए
ज्ञान और जानकारियों से परहेज के युग में आंकड़ों का टोटा सा पड़ा हुआ है. यह जानना भी मुश्किल हो रहा है कि आज की तारीख में कौन सा देश मेडिकल रिसर्च पर सबसे ज्यादा खर्च कर रहा है. अलबत्ता तीन साल पहले का यह आंकड़ा जरूर मिलता है कि विज्ञान और विकास पर सबसे ज्यादा खर्च करने वाले कौन से देश हैं. मसलन तीन साल पहले की सूचना के मुताबिक दक्षिण कोरिया अपनी जीडीपी का सबसे ज्यादा प्रतिशत हिस्सा वैज्ञानिक शोध पर खर्च करने वाला देश है. उसके बाद इजराइल, चीन और जापान भी वैज्ञानिक शोध पर सबसे ज्यादा खर्च करने वाले देशों में हैं. दक्षिण कोरिया और इजराइल जहां अपनी जीडीपी का साढ़े चार फीसद खर्च वैज्ञानिक शोध पर करते हैं, वहां हमारे देश में यह खर्च एक फीसद से भी कम यानी कोई 0.7 फीसद है. यानी कोरोना के कहर से विभिन्न देशों में नुकसान का हिसाब लगाया जाएगा तो बहुत संभव है यह भी पता चले कि जिन देशों ने कोरोना से कम नुकसान झेला वे देश यह काम कैसे कर पाए.

कौशल विकास से ज्यादा वैज्ञानिक शोध की बात करनी पड़ेगी
नए दौर ने इस मामले में एक भ्रम पैदा किया है. वह ये कि अक्लमंद होने से ज्यादा जरूरी हुनरमंद होना है. जबकि दुनिया के हर भूखंड में सदियों से यही माना जाता रहा है कि जो जितना ज्ञानवान होगा वह उतना ही निश्चिंत और सुखी रहेगा. ज्ञानवान को तो सीमित संसाधनों में भी सलीके से रहना आ जाता है. कई भारतीय ज्ञान परंपराएं यही बताती आई हैं कि परिग्रह, हिंसा, चोरी, छीना-झपटी से दुख ही उपजता है. खासतौर पर जैन विद्या तो सम्यक ज्ञान की सबसे बड़ी प्रवक्ता है. इधर आधुनिक वैज्ञानिक शोध का भी यही लक्ष्य माना जाता है
.

फौरी तौर पर जरूरी सबक क्या?
मेडिकल रिसर्च एक जरूरी काम है. इस पर एकदम खर्चा बढ़ा दिया जाना चाहिए. हालांकि ऐसा भी नहीं कि इसपर हम खर्च कर नहीं रहे हैं. लेकिन एक बार सिलसिलेवार तरीके से जांच पड़ताल करेंगे तो विश्व की पांच बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में गिने जाने के बावजूद हमें मेडिकल रिसर्च पर अपने खर्च की मात्रा का अंदाजा लग जाएगा. लगे हाथ इस बात का जिक्र भी किया जा सकता है कि देश की स्वास्थ्य संबंधी नियामक संस्था इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च को कोरोना से पीड़ितों के आंकड़े जारी करने का काम कम कर देना पड़ा है. एक दो रोज से मीडिया को देश में कोरोना के फैलाव की विश्वसनीय जानकारी मिलने में दिक्कत आने लगी है. दरअसल यह काम आईसीएमआर का उतना ज्यादा था नहीं. संकट की घड़ी में उसका ज्यादा काम यह था कि कोरोना के गुणधर्म समझने वाली शोध परियोजनाओं को युद्धस्तर पर शुरू करवा देती. दवा बनाने वाली फार्मास्यूटिेकल कंपनियों को छूट देकर प्रोत्साहित करती कि अपनी निजी प्रयोगशालाओं में कोरोना के बारे में जो जितना ज्यादा ज्ञान पैदा करेगा, उसे सरकार से उतना ज्यादा इनाम दिलाया जाएगा.

विद्वानों को रोकना अच्छा नहीं
कोरोना के कहर ने राजसत्ताओं को इतना चौकन्ना कर दिया है कि वे इस बारे में विद्वानों को बोलने से हतोत्साहित करने लगी हैं. नया माहौल ऐसा बनाया गया है कि कोरोना को लेकर गैरसरकारी स्तर पर कोई भी कैसी भी बात होने से रोका जाए. कहा ये जा रहा है कि निराशाजनक वातावरण बनने से रोका जाए. लेकिन मुश्किल यह है कि बिना विचार विमर्श के ज्ञान के सृजन की संभावना ही खत्म हो जाती है. संकट के समय में समस्या के समाधान के सभी पक्षकार आमतौर पर शोध परिकल्पनाएं बनाकर देते हैं. किसी भी वैज्ञानिक शोध का पहला कदम शोध परिकल्पना ही होता है. कोरोना का संकट इतना जटिल होता जा रहा है कि इस समय तो हमें चारों तरफ से संभावित उपायों की सूची बनाने की जरूरत है. विज्ञान जगत में जटिल समस्याओं के समाधान के लिए बुद्धि उत्तेजक आयोजन करवाए जाते हैं. इन्ही ब्रेन स्टॉर्मिंग आयोजनों में साधारण और असाधारण विद्वान और यहां तक कि सामान्य नागरिक भी समाधान सुझाते हैं. इसी विचार विमर्श में आमतौर पर काम का ज्ञान यानी समाधान हासिल हो जाता है. कोरोना से निपटने के लिए पूरी दुनिया में भूल सुधार पद्धति से जो कुछ भी किया जा रहा है उसकी आलोचना-समालोचना से डरना नहीं चाहिए. ऐसे विमर्शों और सुझाव की इस समय बड़ी भूमिका हो सकती है.

(सुधीर जैन वरिष्ठ पत्रकार हैं. लेख में व्यक्त विचार उनके निजी विचार हैं.)

ये भी पढ़ें - 

कोरोना वायरस से निपटने के लिए क्यों नहीं काफी हैं इतने उपाय?

राहत देना और अर्थव्यवस्था को संभालना, इन दोहरी चुनौतियों से जूझ रहा है RBI
ब्लॉगर के बारे में
सुधीर जैन

सुधीर जैन

अपराधशास्त्र और न्यायालिक विज्ञान में उच्च शिक्षा हासिल की. सागर विश्वविद्यालय में पढाया भी. उत्तर भारत के 9 प्रदेश की जेलों में सजायाफ्ता कैदियों पर विशेष शोध किया. मन पत्रकारिता में रम गया तो 27 साल 'जनसत्ता' के संपादकीय विभाग में काम किया. समाज की मूल जरूरतों को समझने के लिए सीएसई की नेशनल फैलोशिप पर चंदेलकालीन तालाबों के जलविज्ञान का शोध अध्ययन भी किया.देश की पहली हिन्दी वीडियो 'कालचक्र' मैगज़ीन के संस्थापक निदेशक, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ क्रिमिनोलॉजी एंड फॉरेंसिक साइंस और सीबीआई एकेडमी के अतिथि व्याख्याता, विभिन्न विषयों पर टीवी पैनल डिबेट. विज्ञान का इतिहास, वैज्ञानिक शोधपद्धति, अकादमिक पत्रकारिता और चुनाव यांत्रिकी में विशेष रुचि.

और भी पढ़ें

facebook Twitter whatsapp
First published: March 31, 2020, 8:33 PM IST
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर
corona virus btn
corona virus btn
Loading