प्रशांत भूषण मामले का दंडशास्त्रीय पहलू

Prashant Bhushan case: कुल मिलाकर देखें तो न अदालत संप्रभु है और न नागरिक के तौर पर प्रशांत. सर्वसत्तावान सिर्फ संविधान है और इस लिहाज से अगर प्रशांत खुद एक नागरिक के रूप में या नागरिकों की ओर से न्यायपालिका के व्यवहार पर कुछ कह रहे हैं तो उसे लोकतांत्रिक अधिकारों के दायरे के बाहर नहीं माना जा सकता. हां यह जरूर देखा जा सकता है कि उनके कुछ भी कहने से किसी के अधिकार का उल्लंधन तो नहीं हो रहा है. यहां अदालत ने माना है कि उन्होने अदालत की अवमानना की है तो वह मसला भी हाल फिलहाल ख़त्म है

Source: News18Hindi Last updated on: August 22, 2020, 3:45 PM IST
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प्रशांत भूषण मामले का दंडशास्त्रीय पहलू
अपनी मौजूदा व्यवस्था में दंड के पांच मकसद हैं. प्रतिशोध, प्रतिरोध, प्रायश्चित, सुधार और पुनर्वास.
प्रशांत भूषण (Prashant bhushan) मामले के बहाने लोकतंत्र और उसकी न्यायव्यवस्था पर विचार के बहुत सारे नुक्ते सामने आ गए. बेशक न्यायव्यवस्था ने प्रशांत भूषण को दोषी करार देने में बिल्कुल देरी नहीं की. लेकिन सज़ा सुनाने में बहुत ज्य़ादा सोचना पड़ रहा है. दरअसल इस मामले में अभिव्यक्ति की आजादी का नुक्ता शामिल है जो इसे लोकतंत्र के सभी नागरिकों के सरोकार तक ले जाता है. हालांकि अदालत प्रशांत भूषण को दोषी करार दे चुकी है, इस तरह से उस फैसले पर सार्वजनिक नुक्ताचीनी की गुंजाइश नहीं बचती. लेकिन सज़ा तय होना बाकी है लिहाजा विद्वानों की दुनिया में सज़ा के पहलुओं पर विमर्श के बहाने चर्चा चालू है.

अब अगर बात सिर्फ सज़ा पर होनी हो तो गौर कर लेना चाहिए कि हमारे पास सजा या दंड का भी एक भरापूरा शास्त्र उपलब्ध है. सभी राजव्यवस्थाओं का अपना-अपना दंडशास्त्र होता है सो लोकतंत्र होने के नाते हमारा भी एक दंड दर्शन है. अवमानना के इस मामले में उस दंड दर्शन का ज़्रिक क्यों नहीं किया जाना चाहिए?

क्या है अपने लोकतंत्र का दंडशास्त्र
आज़ादी के पहले यानी साम्राज्यवादी व्यवस्था में न्यायव्यवस्था सिर्फ दंडात्मक थी. उसमें उदारता कम थी. उस व्यवस्था में नागरिकों को कहने सुनने की छूट नहीं थी. लेकिन जब हमने अपनी व्यवस्था बनाई तो कहने सुनने यानी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का ज्यादा से ज्यादा खयाल रखा. इसका तर्क यह है कि अपना लोकतंत्र नागरिकों ने खुद अपने लिए ही बनाया है. वह ही उसका सबसे बड़ा हितधारक है. इसीलिए यह ख़याल रखा गया कि अगर कोई लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं के खिलाफ कुछ बोले तो उसे कड़ी सज़ा की बजाए उसे सुधारने का जतन किया जाए. देश में लोकतंत्र की स्थापना के बाद इस मामले में हमारी दंड व्यवस्था ने नया रूप ले लिया था. पहले जो व्यवस्था सिर्फ दंडात्मक थी वह लोकतंत्र में दंडोपचरात्क बन गई.
हमारी व्यवस्था में दंड के मुख्य मकसद
अपनी मौजूदा व्यवस्था में दंड के पांच मकसद हैं. प्रतिशोध, प्रतिरोध, प्रायश्चित, सुधार और पुनर्वास. दंड के इन उद्देश्यों के बारे में न्यूज़18 के इसी काॅलम में पहले भी लिखा जा चुका है लिहाज़ा उसे दोहराने की जरूरत नहीं है. दंड के पांचों मकसद भले ही न्याय प्रणाली के रोजमर्रा के कामधाम में हर पल याद न किए जाते हों, और भले ही हमारा ध्यान हर स्थिति के लिए नए नए कानून बना देने पर ही लगा रहता हो, लेकिन यह जरूर याद रखा जाना चाहिए कि हमने अपने लोकतंत्र के लिए जो दर्शन अपनाया है उसके उलट हम कुछ न करें. और अगर कुछ करना पड़े तो पहले यह ऐलान करें कि हम अपना पुराना दर्शन छोड़ रहे हैं. ऐलान करें कि न्याय का नया दर्शन रच रहे हैं.

अगर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बाधक हो तो?नागरिकों को बोलने की आजादी से अगर इस समय व्यवस्था को कोई वाजिब अड़चन आती दिखने लगी हो तो बेशक उसका इंतजाम किया जा सकता है. दंड को ज्यादा दंडात्मक यानी प्रतिशोधी और प्रतिरोधी बनाया जा सकता है. लेकिन वैसा करने के पहले हमें ऐलान जरूर करना पड़ेगा कि हम अपने बनाए लोकतंत्र में दंड का दर्शन बदल रहे हैं.

मौजूदा मामला क्या इसीलिए है जटिल?
भले ही यह मामला इस समय इतना बड़ा न दिख रहा हो, लेकिन मामला व्यवस्था की बुनियाद का है. बुनियाद दिखती नहीं है. लेकिन सबकुछ टिका उसी पर रहता है. इसीलिए इस मामले में विद्वानों की आंखें चैकन्नी और कान खड़े हो गए हैं. खुद अदालत भी सतर्कता बरत रही है. उसने प्रशांत भूषण से चाहा कि वे माफी मांग लें. इससे लगता है कि अदालत का इरादा ज्यादा सज़ा देने का नहीं है या यों कहें कि माफ करने का ही होगा. लेकिन प्रशांत का कहना है कि उन्होंने जो कुछ कहा था वह व्यवस्था के ही हित में है, और उनका कहना उनकी पेशेवर जिम्मेदारी है. यानी उन्होंने माफी नहीं मांगने का संकेत दिया है. गौरतलब है कि इस मामले में अदालत भी शीर्ष स्तर की है और प्रशांत भी देश के शीर्ष वकीलों में एक हैं. दोनों को ही कोई भी अनिमंत्रित सुझाव नहीं दे सकता. लेकिन मसला चूंकि लोकतंत्र के सबसे बड़े गुण यानी अभिव्यक्ति की आजादी का है सो कोई भी नागरिक यह भी नहीं कह सकता कि हमें क्या लेना देना? बहुत संभव है कि इसीलिए देश के ज्यादातर लोग इस अदालती मामले में खुलकर कहसुन रहे हैं.

मौजूदा मसला क्या दंड के प्रतिरोधी असर का है?
अवमानना का दोषी सिद्ध किया जाना एक तरह से प्रतिशोध का मकसद पूरा हो गया. अब दंड के दूसरे नुक्ते यानी प्रतिरोध पर गौर हो रहा है. अपराधशास्त्रीय नजरिए से प्रतिरोध के दो भाग हैं. पहला यह कि दोषी को दोबारा वैसा करने से डराना या रोकना, और दूसरा मकसद होता है वैसी सज़ा देना कि दूसरे भी वैसा करने से डरें. अपराधशास्त्र की भाषा में दोषी को आगे से वैसा करने से रोकना विशिष्ट प्रतिरोध कहलाता है. और एक को सज़ा देकर दूसरों को रोकना सामान्य प्रतिरोध कहा जाता है. मामला क्योंकि अभिव्यक्ति की आजादी का है, इस आधार पर अनुमान लगाया जा सकता है कि सिर्फ प्रशांत को डराना उतना बड़ा मकसद नहीं हो सकता बल्कि सभी नागरिकों को संदेश देना मुख्य बात हो सकती है. जाहिर है इस मामले में सज़ा से सभी नागरिकों का सरोकार खुद ब खुद हो जाता है. लिहाजा अगर यह मामला देश में चर्चा का विषय बन गया है तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए.

मसला अदालत के सम्मान का
सम्मान तो चाहे न्यायपालिका का हो या विधायिका या कार्यपालिका का, या फिर सामान्य नागरिक का, वह सबके लिए उतना ही महत्त्वपूर्ण है. लेकिन सभी के सम्मान की हिफाजत के मामले में आखिर में अदालत में ही पहुंचते हैं लिहाज़ा न्यायपालिका की विश्वसनीयता का महत्व बढ़ जाता है. अगर उसकी ही विश्वसनीयता पर सवाल उठने लगे तो व्यवस्था के दूसरे अंगों पर नज़र रखने की व्यवस्था ढहने को कौन रोक पाएगा? इसीलिए लोकतंत्र में न्यायपालिका यानी अदालत का सम्मान, गरिमा और विश्वसनीयता बनाए रखने की सबसे ज्यादा कोशिशें होती हैं. लेकिन यह भी सोचना पड़ेगा कि क्या न्यायाधीशों के व्यवहार पर टीका टिप्पणी पर परम प्रतिबंध की बात सोची जा सकती है? दरअसल छोटी अदालत, उससे ऊपर बड़ी अदालत और उससे भी बड़ी अदालत यानी सुप्रीमकोर्ट तक की व्यवस्था बनी ही इसलिए है कि कोई अदालतें भी गलत कर सकती है. एक अदालत के खिलाफ दूसरी अदालत में अपील करने का इंतजाम इसीलिए करके रखा गया है. वैसे भी लोकतंत्र में किसी को भी संप्रभु नहीं माना जाता. और अगर सैद्धांतिक रूप से किसी को संप्रभु माना भी जा सकता है तो वह सिर्फ और सिर्फ लोकतांत्रिक नागरिक हैं. लेकिन उन पर भी यह पाबंदी है कि वे अपने ही बनाए संविधान का पालन जरूर करेंगे. इस तरह संप्रभू वे भी नहीं हुए.

कुल मिलाकर देखें तो न अदालत संप्रभु है और न नागरिक के तौर पर प्रशांत. सर्वसत्तावान सिर्फ संविधान है और इस लिहाज से अगर प्रशांत खुद एक नागरिक के रूप में या नागरिकों की ओर से न्यायपालिका के व्यवहार पर कुछ कह रहे हैं तो उसे लोकतांत्रिक अधिकारों के दायरे के बाहर नहीं माना जा सकता. हां यह जरूर देखा जा सकता है कि उनके कुछ भी कहने से किसी के अधिकार का उल्लंधन तो नहीं हो रहा है. यहां अदालत ने माना है कि उन्होने अदालत की अवमानना की है तो वह मसला भी हाल फिलहाल ख़त्म है. अलबत्ता प्रशांत चाहेंगे तो उसके खिलाफ पुनर्विचार याचिका दाखिल करेंगे. मुकदमा आगे चलेगा. यानी इस समय अदालती मामला प्रशांत के लिए सिर्फ सजा तय करने का ही है. वे उसके बाद ही आगे की कार्यवाही कर पाएंगे. बहरहाल, आगे कुछ भी हो लेकिन इस मामले के जरिए लोकतंत्र में स्वतंत्रता के पहलू पर सोच विचार तो शुरू हो ही गया है.
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
सुधीर जैन

सुधीर जैन

अपराधशास्त्र और न्यायालिक विज्ञान में उच्च शिक्षा हासिल की. सागर विश्वविद्यालय में पढाया भी. उत्तर भारत के 9 प्रदेश की जेलों में सजायाफ्ता कैदियों पर विशेष शोध किया. मन पत्रकारिता में रम गया तो 27 साल 'जनसत्ता' के संपादकीय विभाग में काम किया. समाज की मूल जरूरतों को समझने के लिए सीएसई की नेशनल फैलोशिप पर चंदेलकालीन तालाबों के जलविज्ञान का शोध अध्ययन भी किया.देश की पहली हिन्दी वीडियो 'कालचक्र' मैगज़ीन के संस्थापक निदेशक, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ क्रिमिनोलॉजी एंड फॉरेंसिक साइंस और सीबीआई एकेडमी के अतिथि व्याख्याता, विभिन्न विषयों पर टीवी पैनल डिबेट. विज्ञान का इतिहास, वैज्ञानिक शोधपद्धति, अकादमिक पत्रकारिता और चुनाव यांत्रिकी में विशेष रुचि.

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First published: August 22, 2020, 3:45 PM IST
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