विकास कांड का अपराधशास्त्र

विकास दुबे कांड की नज़ीर बनकर तैयार हो गई है. वरना इसके पहले अपराध के बहुकारकीय सिद्धांत को समझाने में बड़ी मेहनत मशक्कत करनी पड़ती थी. अपराधशास्त्र की कक्षा में एक मशहूर अपराधशास्त्री डेविड अब्राहमसेन का बनाया एक समीकरण पढ़ाया जाता है. इस समीकरण में अपराध के सभी प्रमुख कारणों को एकसाथ दर्शाया गया है.

Source: News18Hindi Last updated on: July 10, 2020, 9:19 PM IST
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विकास कांड का अपराधशास्त्र
अब्राहमसेन ने अपराधीकरण की प्रक्रिया में उन सभी परिस्थतियों को शामिल किया है जो अपराधी व्यवहार की पोषक बन जाती है.
अपराधशास्त्र यानी क्रिमिनोलॉजी (Criminology) के विद्यार्थियों को अब अपराध के कारण यानी ईटियोलॉजी ऑफ क्राइम समझाने में कुछ सहूलियत हो जाएगी. विकास दुबे कांड (Vikas dubey Case) की नज़ीर बनकर तैयार हो गई है. वरना इसके पहले अपराध के बहुकारकीय सिद्धांत को समझाने में बड़ी मेहनत मशक्कत करनी पड़ती थी. अपराधशास्त्र की कक्षा में एक मशहूर अपराधशास्त्री डेविड अब्राहमसेन (David Abrahamsen) का बनाया एक समीकरण पढ़ाया जाता है. इस समीकरण में अपराध के सभी प्रमुख कारणों को एक साथ दर्शाया गया है. आगे कभी अगर विकास दुबे जैसे कांडों का ढंग से दस्तावेजीकरण हुआ तो बहुत संभव है इस कांड को उदाहरण के तौर पर पढ़ाया जाने लगे.

क्या है अब्राहमसेन का सिद्धांत
ये बहुत छोटा सा समीकरण है. इस समीकरण मेंं एक तरफ सी यानी क्राइम यानी अपराध लिखा जाता है. और समीकरण के दूसरी तरफ आपराधिक प्रवृत्ति यानी टैंडेंसी यानी टी लिखते हैं और साथ में  परिस्थितियां यानी सिचुएशन यानी एस को दर्शाया गया है. और रेजिस्टैंस यानी प्रतिरोध या आपराधिक न्याय प्रणाली के लिए अंग्रेजी अक्षर आर से दर्शाया गया है. इस तरह से गणितीय समीकरण ये बना है

C=(T+S)/R
टी यानी आपराधिक प्रवृत्ति
प्रवृत्ति मनोविज्ञान का मामला है. अपराध खासतौर पर असामान्य व्यवहार का रूप है. अपराधशास्त्रीय अध्ययनों के मुताबिक अपराध एक सीखा हुआ व्यवहार है. बिल्कुल उसी तरह जिस तरह किसी छात्र को किसी प्रौद्योगिकी में प्रशिक्षित किया जाता है. हालांकि यह शोध सदरलैंड नाम के अपराधशास्त्री का है. लेकिन अब्राहमसेन ने खुद एक मनोविज्ञानी होने के नाते आपराधिक प्रवृत्तियों को अपने हिसाब से देखा. बाद में यह विचार हुआ कि ये प्रवृत्तियां पनपती कैसे हैं? बच्चे के मनोदैहिक विकास के समय कहां गड़बड़ी हो जाती है. किशोर अवस्था में व्यक्तित्व विकास की नींव पड़ते समय क्या गड़बड़ियां हो जाती हैं? इन प्रवृत्तियों के पनपने के बाद अपराधी का दिमाग कैसे काम करने लगता है? उसका विश्वास किन बातों में बन जाता है? उसे किन भावनाओं में ज्यादा रस आने लगता है? ये सारी बातें अपराध मनोविज्ञान के विषय है जिन्हें अब्राहमसेन के इस समीकरण में टी से दर्शाया है. अगर आगे कभी विकास दुबे की केस स्टडी की जरूरत पड़ी तो उसके बचपन से लेकर वयस्क होने और बाद में व्यापार और राजनीति की दुनिया में आने के इतिहास को जानना ही पड़ेगा.

परिस्थितियांअब्राहमसेन ने अपराधीकरण की प्रक्रिया में उन सभी परिस्थतियों को शामिल किया है जो अपराधी व्यवहार की पोषक बन जाती है. अगर संक्षेप में समझना चाहें तो सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और वैधानिक परिस्थितियों में सब कुछ समेटा जा सकता है. विकास दुबे के मामले में सामाजिक पहलू पर तो एक प्रदेश के पुलिस महानिदेशक ने जातिवाद के खिलाफ इतना खुलकर बोला कि उसे सुनकर किसी को भी लग सकता है बस यही कारण है जिससे लोग विकास दुबे जैसे बन जाते हैं. बहरहाल दूसरा पहलू देखें तो दबंगई से धनवान बनने का रास्ता चुनने वालों के लिए अपराध की दुनिया में चले जाना साधारण बात बनती जा रही है और अपनी सामाजिक यानी जातिगत और धर्म संप्रदाय की हैसियत के कारण राजनीतिक सरंक्षण हासिल कर लेना भी अब बड़ी अनहोनी नहीं मानी जाती. शोध परिकल्पना तैयार करें तो विकास दुबे की केस स्टडी में सबसे बड़ा नुक्ता राजनीतिक परिस्थितियों का ही निकल कर आएगा. खासतौर पर राजनीति और अपराध का गठजोड़ अगर होता ही आर्थिक कारणों से हो, तो ज्यादा बारीकी में पड़ने की जरूरत ही नहीं बचती. ऊपर से लोकतांत्रिक राजनीति भी अगर जातिधर्म क्षेत्रवाद के सहारे होने लगी हो तो फिर अपराध की प्रवृत्तियों को रोकने का और कौन सा तरीका बचेगा?

प्रतिरोध यानी रेजिस्टेंस
यहां अवधारणा यह है कि आपराधिक न्याय प्रणाली यानी पुलिस, अदालत और जेल अपराध रोकने के लिए ही होते हैं. खासतौर पर पुलिस, क्योंकि आपराधिक न्याय प्रणाली का ऐसा अंग है जो चाहे तो मामला आगे बढ़ने दे और चाहे तो अड़ंगा डाल दे. उसका निष्क्रिय हो जाना भी अड़ंगा ही माना जाता है. और अब ये कौन नहीं जानता कि राजव्यवस्था में राजनीति के सामने पुलिस की हैसियत है कितनी.
बहरहाल, अगर कुछ लोगों की वाकई दिलचस्पी हो और वे आपराधिक न्याय प्रणाली पर सोच विचार करना चाहते हों तो सबसे पहले उन्हें यह तय कर लेना चाहिए कि वे लोकतंत्र की तीनों व्यवस्थाओं में संप्रभुता किसे देना चाहते हैं.

किसे मानें संप्रभु या सर्वशक्तिमान
अब तक का विमर्श यह है कि लोकतंत्र में अगर कोई संप्रभु यानी सर्वशक्तिमान माना जा सकता है तो वह नागरिक है. अब क्योंकि नागरिक एक व्यक्ति नहीं बल्कि एक समूह है सो इस मान्यता को मूर्त रूप देने में दिक्कत है. इसीलिए सभी नागरिकों की इच्छा आकांक्षा से एक संविधान बना लिया गया. इससे बेहतर कोई और तरीका अभी ढूंढ़ा नहीं जा सका है. और इसीलिए एक तरह से उसी संविधान को सर्वशक्तिमान का ओहदा हासिल है. और इसीलिए आपराधिक न्याय प्रणाली में पुलिस को बहुत ज्यादा अधिकार नहीं दिए जाते. पुलिस पर न्याय पालिका का अंकुश रहता है कि संविधान यानी कानून के खिलाफ कुछ नहीं होना चाहिए. अब अगर विकास दुबे कांड के आधार पर समझना चाहें तो यह जरूर याद किया जाना चाहिए कि हफ्ते भर पहले विकास  को पकड़ने गई पुलिस को ही मार डाला गया. बाद में पता चलने लगा कि पुलिस के ही कई लोग विकास के मददगार थे, उन पुलिसवालों पर कार्रवाई करनी पड़ी. फिर विकास के राजनीतिक रिश्तों की नई नई कहानियां बाहर आने लगीं. याद दिलाया जाने लगा कि उसके खिलाफ तो पुलिसवाले भी गवाही नहीं देना चाहते थे. यानी यह मामला जंजाल बनता जा रहा था. आखिर अदालत में पेशी के लिए ले जाते समय मुठभेड़ में उसके मारे जाने को यही कहा जाएगा कि उप्र पुलिस अपने कई पुलिसवालों की जान गंवाकर, अपनी छवि को क्षतविक्षत करवाकर हालफिलहाल बड़ी मुश्किल से विकास से पिंड छुड़ा पाई.

लेकिन भूलना नहीं चाहिए कि पुलिस का पिंड सिर्फ विकास दुबे से ही छूटा है. आपराधिक प्रवृत्तियां और उन्हें पैदा करने वाली परिस्थितियां अभी नहीं मरी हैं. विकास कांड से कोई सबक लेना हो तो सबसे जरूरी पाठ यही बनना चाहिए कि सबसे पहले राजनीतिक सुधारों के बारे में सोचना शुरू कर दें.
ब्लॉगर के बारे में
सुधीर जैन

सुधीर जैन

अपराधशास्त्र और न्यायालिक विज्ञान में उच्च शिक्षा हासिल की. सागर विश्वविद्यालय में पढाया भी. उत्तर भारत के 9 प्रदेश की जेलों में सजायाफ्ता कैदियों पर विशेष शोध किया. मन पत्रकारिता में रम गया तो 27 साल 'जनसत्ता' के संपादकीय विभाग में काम किया. समाज की मूल जरूरतों को समझने के लिए सीएसई की नेशनल फैलोशिप पर चंदेलकालीन तालाबों के जलविज्ञान का शोध अध्ययन भी किया.देश की पहली हिन्दी वीडियो 'कालचक्र' मैगज़ीन के संस्थापक निदेशक, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ क्रिमिनोलॉजी एंड फॉरेंसिक साइंस और सीबीआई एकेडमी के अतिथि व्याख्याता, विभिन्न विषयों पर टीवी पैनल डिबेट. विज्ञान का इतिहास, वैज्ञानिक शोधपद्धति, अकादमिक पत्रकारिता और चुनाव यांत्रिकी में विशेष रुचि.

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First published: July 10, 2020, 6:00 PM IST
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