संयुक्त राष्ट्र के कमजोर पड़ने की चर्चा चिंताजनक

Coronavirus Epidemic: दुनिया को महामारी से जूझते हुए नौ महीने होने को आ गए. बहुत से देशों ने इस मामले में ऊंच नीच देख ली है. सभी को पता है कि निजीतौर पर किस देश ने महामारी से निपटने के लिए क्या किया? लगभग सभी देश अपनी अपनी स्थिति दैनिक आधार पर सार्वजनिक भी करते हैं. फिर भी अगर समीक्षाएं न हो पाती हों तो हैरत होनी चाहिए.

Source: News18Hindi Last updated on: September 30, 2020, 9:24 PM IST
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संयुक्त राष्ट्र के कमजोर पड़ने की चर्चा चिंताजनक
सांकेतिक तस्वीर
महामारी से निपटने में संयुक्त राष्ट्र की नाकामी की बातें कुछ ज्य़ादा ही होने लगी हैं. खासतौर पर दुनिया के देशों की एकजुटता को लेकर खुलकर सवाल उठने लगे हैं. बात सिर्फ महामारी के मोर्चे पर नाकामी तक सीमित नहीं रही. बल्कि महामारी के अलावा दुनिया में असमानता, भूख और जलवायु संकट के मुद्दों पर भी विश्व निकाय की नाकामियों का जिक्र हो रहा है. और इसीलिए संयुक्तराष्ट्र में सुधारों की आवाज भी ऊंची होती नज़र आ रही है.

संस्था भी कबूलने लगी
संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुतेरिस कबूल कर चुके हैं कि महामारी वाकई अंतरराष्ट्रीय सहयोग के काम का एक इम्तिहान है और इसमें हम नाकाम रहे हैं. कहीं ऐसा तो नहीं कि गुतेरिस का इशारा अप्रत्यक्ष रूप से उन देशों की तरफ हो जिन्होंने इस संकट से निपटने में वांछित सहयोग नहीं किया? विश्वमंच पर ऐसे देशों का नाम लिया जाना तो बहुत मुश्किल काम है लेकिन उन देशों की तारीफ करने में तो कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए जिन्होंने कुछ अच्छा काम किया हो. लेकिन कितनी अजीब बात है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में किसी की तारीफ किया जाना भी मुश्किल हो चला है.

उन देशों का नाम लेने में दिक्कत क्या है?
दुनिया को महामारी से जूझते हुए नौ महीने होने को आ गए. बहुत से देशों ने इस मामले में ऊंच नीच देख ली है. सभी को पता है कि निजीतौर पर किस देश ने महामारी से निपटने के लिए क्या किया? लगभग सभी देश अपनी अपनी स्थिति दैनिक आधार पर सार्वजनिक भी करते हैं. फिर भी अगर समीक्षाएं न हो पाती हों तो हैरत होनी चाहिए. संयुक्तराष्ट्र तो खैर एक औपचारिक संगठन है और उसकी बहुत सी सीमाएं हैं, लेकिन विश्व मीडिया को इस तरह की समीक्षाएं करने में बिल्कुल भी अड़चन नहीं आनी चाहिए थी. लेकिन ये कमी दिखाई दी. और शायद इसलिए दिखाई दी क्योंकि किसी देश की तारीफ से दूसरे देशों की बदनामी होने लगती है.

एकमत होने में भारी अड़चन
संयुक्त राष्ट्र महासभा में विश्व नेताओं की ऑनलाइन बैठक में दुनिया के तमाम देश मुख्य मुद्दों पर एकमत नहीं हो पाए. मीडिया में इन कठिनाइयों की खुलकर चर्चा होती नहीं दिखी. अलबत्ता यह जरूर सुनाई दिया कि विश्वयुद्ध के बाद 50 देशों के एकसाथ आने से बने संयुक्त राष्ट्र ने संकल्प किया था कि युद्ध से बचा जाएगा. लेकिन इस संकल्प को पूरा करने में अड़चन आई. कहा यह गया कि दुनियाभर में असामनता, भूख और जलवायु संकट के कारण संघर्ष बढ़ते ही चले गए. क्या यह सवाल नहीं उठता कि ये जो तीन प्रमुख कारण बताए जा रहे हैं उन्हें दूर करने का काम किसका था? बेशक यह काम भी एकजुट होकर ही हो सकता था, लेकिन नहीं हो पाया. और सबसे बड़ी हैरत इस बात पर जताई जानी चाहिए कि बाधक बनने वाले देशों को सामने लाने में विश्व मीडिया का साहस भी नहीं दिखाई दिया.नेताओं के बयानों से भी अंदाजा लगाएं
संयुक्त राष्ट्र की मौजूदा स्थिति का अंदाजा दो नेताओं के बयानों से भी लगता है. मसलन फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुअल मैक्रोन अगर यह कह रहे हों कि छोटी-छोटी बातों पर भी सहमति बनने में अड़चन आई तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि संयुक्त राष्ट्र किस स्थिति में पहुंच गया है. मैक्रोन ने तो यहां तक कह दिया है कि संस्था के कमजोर पड़ने का जाखिम नज़र आने लगा है. इसी तरह स्विटजरलैंड के राष्ट्रपति सिमिनेटे सोमेरूगा अगर यह बात कह रहे हों कि समस्या संस्था के रूप में संयुक्तराष्ट्र के साथ नहीं बल्कि उसके सदस्य देशों के साथ है. तो क्या यह माना जाए कि संस्था में सदस्य देशों की दिलचस्पी कम हो चली है.

जबकि आज तो और भी जरूरी है संयुक्तराष्ट्र
संयुक्त राष्ट्र दूसरे विश्वयुद्ध की तबाही झेलने के बाद बना था. उसके बाद संस्था ने कोई कम काम नहीं किया है. आज विश्व के सामने कई चुनौतियां आकर खड़ी हो गई हैं. महामारी तो है ही, वैश्विक मंदी और उससे उपजने वाले ढेरों संकट सामने हैं, खासतौर पर असमानता बढ़ने और भूख के संकट का अंदेशा. ऐसे में संयुक्तराष्ट्र को अपनी भूमिका बढ़ाने और उसे और ज्यादा मजबूत बनाने की दरकार है. और अगर वह कमजोर होता दिखाई दे रहा हो तो दुनिया के जागरूक समाज को चिंता की मुद्रा में आ जाना चाहिए.
ब्लॉगर के बारे में
सुधीर जैन

सुधीर जैन

अपराधशास्त्र और न्यायालिक विज्ञान में उच्च शिक्षा हासिल की. सागर विश्वविद्यालय में पढाया भी. उत्तर भारत के 9 प्रदेश की जेलों में सजायाफ्ता कैदियों पर विशेष शोध किया. मन पत्रकारिता में रम गया तो 27 साल 'जनसत्ता' के संपादकीय विभाग में काम किया. समाज की मूल जरूरतों को समझने के लिए सीएसई की नेशनल फैलोशिप पर चंदेलकालीन तालाबों के जलविज्ञान का शोध अध्ययन भी किया.देश की पहली हिन्दी वीडियो 'कालचक्र' मैगज़ीन के संस्थापक निदेशक, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ क्रिमिनोलॉजी एंड फॉरेंसिक साइंस और सीबीआई एकेडमी के अतिथि व्याख्याता, विभिन्न विषयों पर टीवी पैनल डिबेट. विज्ञान का इतिहास, वैज्ञानिक शोधपद्धति, अकादमिक पत्रकारिता और चुनाव यांत्रिकी में विशेष रुचि.

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First published: September 30, 2020, 9:23 PM IST
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