शबनम को फांसी; क्या ढूंढा जा सकता है मृत्युदंड का कोई विकल्प?

एक सभ्य और स्वस्थ्य समाज बनाने के लिए एक बौद्धिक कवायद की जरूरत है. ऐसी कवायद जो निरी आदर्शवादी भी न हो और न ही उसमें क्रूरता के लक्षण हों. बेशक हमें एक न्यायपूर्ण व्यवस्था की भी तलाश है जिसमें शबनम जैसे कांड आगे से कम हो सकें.

Source: News18Hindi Last updated on: February 19, 2021, 10:12 PM IST
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शबनम को फांसी; क्या ढूंढा जा सकता है मृत्युदंड का कोई विकल्प?
मथुरा जेल में कैद शबनम को फांसी की सजा से मृत्युदंड पर फिर एक बार बहस शुरू होने की संभावना. (सांकेतिक तस्वीर)

आजाद भारत के इतिहास में 60 साल के बाद एक महिला को फांसी पर चढ़ाए जाने के आसार हैं. अव्वल तो जब किसी को भी फांसी की सज़ा मिलती है तो फांसी के औचित्य भी पर चर्चा जरूर होती है. लेकिन यह मामला एक महिला को फांसी का है सो इस बार कुछ ज्यादा ही चर्चा के मौके बन गए हैं. बेशक शबनम मामले में न्यायिक प्रक्रिया पूरी हो चुकी है. सुप्रीम कोर्ट के बाद राष्ट्रपति भी दया याचिका नामंजूर कर चुके हैं. मामले का रिव्यू भी हो चुका है. यानी मामले के गुण-दोष पर चर्चा की कोई गुंजाइश बाकी नहीं है. लेकिन इसके पहले जिस तरह से दो महिलाओं रेणुका शिंदे और सीमा गावित को फांसी की सजा का क्रियान्वयन अभी बाकी है, और यह लंबे अर्से से प्रक्रिया में है, उसे देखते हुए अभी पक्के तौर पर यह नहीं कहा जा सकता है कि शबनम को फांसी लगने की स्थिति कुछ ही घंटों में बनने वाली है. दरअसल, अभी डेथ वारंट निकलना बाकी है. इसी वारंट में लिखा जाता है कि फांसी कब होगी. लेकिन इस बीच जिस तरह से मथुरा जेल में शबनम को फांसी देने की तैयारियां शुरू होने की खबर आई है, उसके बाद कम से कम फांसी को लेकर होने वाले कुछ शास्त्रीय विमर्श जरूर सुनने को मिलेंगे.


दुनिया में न्याय करने के काम को ही सबसे मुश्किल या जटिल माना जाता है. हालांकि दुनिया में तरह-तरह की आपराधिक न्याय प्रणालियां बनाकर इस काम को कुछ आसान जरूर बना लिया गया है. लेकिन एक निरापद आपराधिक न्याय प्रणाली बनाने काम आज भी चालू है. और इसीलिए कुछ अपराधों की सजा के निर्धारण को लेकर आगे के लिए सोच-विचार होता रहता है. ऐसी ही एक सजा है मृत्युदंड. जब भी किसी को मौत की सजा दी जाती है तब, कभी कम और कभी ज्यादा, विमर्श होते जरूर हैं. इधर, अपने देश में भी शबनम को मृत्युदंड या फांसी का मामला आ गया है. क्योंकि आजाद भारत में 1955 के बाद से अब तक किसी महिला को फांसी के फंदे पर चढ़ाया नहीं गया है, सो इस बार मृत्युदंड पर कुछ ज्यादा ही चर्चाएं होती सुनाई दे सकती हैं.


मृत्युदंड के औचित्य पर क्यों होती रहती है चर्चा



संक्षेप में कहें तो सिर्फ मानवीयता और अमानवीयता के विवेक को लेकर फांसी का मुद्दा चर्चा में आता है. न्याय सिद्धांत के नुक्तों पर भी विमर्श होता है. मुत्युदंड को ठीक बताने वाले तर्क देते हैं कि जिसने दूसरे के प्राण ले लिए हों उसके प्राण लेने में हर्ज क्या है? यानी जैसे को तैसा वाले सिद्धांत को आधार बनाकर यह बात कही जाती है. लेकिन मुश्किल यह है कि दुनिया में अब तक के विद्वत्तापूर्ण लंबे-चौड़े सोच विचार के मुताबिक सभ्य समाज में ऐसा सोचने से बात बन नहीं रही है. खासतौर पर मृत्युदंड जिस मकसद से दिया जाता है वह मकसद विद्वानों को पूरा हुआ दिखाई नहीं दिया है. कहा जाता है कि एक समय जेबकतरों से परेशान फ्रांस में जब जेबकतरों को चौराहे पर सरेआम फांसी दी जाने लगी, तो फांसी देखने के लिए जमा मजमे में ही जेबें कटा करती थीं. आज भी जिन देशों में मृत्युदंड का प्रावधान है वहां हत्याओं की वारदात रुक नहीं रही हैं. यानी विद्वानों को सोचना पड़ेगा कि अपराध से निपटने में झंझट कहां है?


गुत्थी को समझते हैं विज्ञान के नज़रिए से



इस बारे में अध्ययन के लिए एक विशेष शास्त्र है जिसे अपराधशास्त्र कहते हैं. अपराधशास्त्र में दंड के उद्देश्य पढ़ाए जाते हैं. सजा के पांच मकसद तय किए गए हैं. सज़ा का पहला मकसद है अपराधी से बदला लेना. यानी समाज में उस अपराधी से बदला लिया जाए, जिसने समाज के बनाए कानून के खिलाफ काम किया. लेकिन हमेशा से दुविधा रही कि कितना बदला लिया जाए? प्राचीन काल में ज्यादातर समाज आंख के बदले आंख फोड़ने वाला सिद्धांत अपनाया करते थे. लेकिन आज सभ्य समाजों को सोचना पड़ रहा कि अपराधी से कितना बदला लिया जाए? और किस रूप में बदला लिया जाए? अपराधशास्त्र के क्षेत्र में इन सवालों पर आज भी सोच विचार जारी है.


दूसरा मकसद है प्रतिरोध. यानी अपराध रोकना. ये वह मकसद है जिसे आज दुनिया की लगभग सभी आपराधिक प्रणालियां अपना लक्ष्य मानती हैं. ज्यादातर न्याय प्रणालियां इस नुक्ते पर जोर देती हैं कि जिसने अपराध किया है उसे आगे से वैसा करने से रोका जाए. साथ में ही एक और मकसद साधा जाए कि किसी को सज़ा मिलती देखकर दूसरे लोग भी अपराध करने से डरें या बचें या रुकें. इसीलिए अपराधशास्त्र के पाठ में अपराधी को दोबारा अपराध करने से रोकने को स्पेसिफिक डेटरेंस यानी विशिष्ट प्रतिरोध कहते हैं और किसी को सजा मिलती देख दूसरों को डराने वाले मकसद को जनरल डेटरेंस यानी सामान्य प्रतिरोध कहते हैं.


सज़ा का तीसरा मकसद है प्रायश्चित का मौका देना. यह कुछ आध्यात्मिक प्रकार का मकसद है. जो लोग ज्यादा तकनीकी या यांत्रिक मिजाज के नहीं है या ज्यादा गर्म मिजाज के नहीं है, कम से कम वे लोग जरूर मानते हैं कि अपराधी को भी प्रायश्चित करने का मौका मिलना चाहिए. भले ही शबनम कांड में यह बात फिट न होती हो, लेकिन वैश्विक समाज के बदलते व्यवहार में प्रायश्चित जैसा शब्द बेमानी होता नज़र आ रहा है. सख्ती या क्रूरता के पक्ष की आवाज ज्यादा ऊंची सुनाई देती है. ऐसे में स्वाभाविक है कि विद्वान लोग यह कहने का जोखिम नहीं उठाते कि अपराधियों को प्रायश्चित करने का मौका मिलना चाहिए.


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मां-बाप समेत 7 परिजनों की हत्या की दोषी शबनम की दया याचिका राष्ट्रपति के यहां से भी खारिज हो चुकी है.



सजा का चौथा मकसद है सुधार. विश्व में अपराधियों के इलाज के लिए यह मकसद बनाया गया. खासतौर पर अपने देश में आजादी के बाद हमने अपने देश को एक सभ्य देश बनाने के लिए अपनी जो आपराधिक न्याय प्रणाली बनाई, उसमें तय किया कि हम अपराध से घृणा करेंगे, न कि अपराधी से. यह भी माना गया कि अपराध एक रोग है जिसका उपचार संभव है. और इसीलिए सजायाफ़्ता कैदियों को काम-धंधे सिखाने और सजा पूरी होने के बाद मेहनत और ईमानदारी से कमा-खाने लायक बनाने के लिए जेल व्यवस्था में सुधार किए गए. इस मकसद को पूरा करने के लिए क्या काम हुए? उनका क्या असर पड़ा? आगे और क्या किए जाने की गुंजाइश है? सरसरी तौर पर देखा जाए तो इन सवालों पर विद्वान लोग फिलहाल ज्य़ादा ध्यान देते दिखाई नहीं देते.


हमारी दंडोपचारात्मक व्यवस्था का आखिरी और पांचवां मकसद है पुनर्वास. जिस अपराधी का सुधार कर दिया गया हो उसे जेल से छूटने के बाद समाज में पुनर्वासित करने का मकसद भी हमने अपने दंड दर्शन में शामिल कर रखा है. बहरहाल, अब अगर नए मामले में फांसी दिए जाने की तैयारियों के बीच मृत्यदंड के पहलुओं का अपराधशास्त्रीय नजरिए से आकलन किया जाए तो ये बातें कही जा सकती हैं.


प्राचीनकाल की बदला लेने की पद्धति के हिसाब से शबनम मामले में मौत की सजा ठीक कही जाएगी. उसके बाद प्रतिरोध के नज़रिए से फांसी के मामले में विशिष्ट प्रतिरोध का तो सवाल ही खत्म हो जाता है. रही बात सामान्य प्रतिरोध की तो कुछ विद्वान अपनी बात फिर दोहराएंगे कि मृत्युदंड का प्रावधान सामान्य प्रतिरोध पैदा करने में उतना कारगर नहीं रहा है जितना माना गया था. वे विद्वान फिर दोहराएंगे कि आगे से मृत्युदंड के बारे में तसल्ली से बैठकर सोचा जाए. इसके अलावा फांसी के मामले में प्रायश्चित वाले मकसद की तो गुंजाइश ही खत्म हो जाती है. चौथी बात सुधार की है. फांसी की सजा का मतलब है कि हम कुछ अपराधियों को सुधार लायक नहीं मानते. फांसी के बाद अपराधी के पुनर्वास की बात बिल्कुल ही बेमानी हो जाती है.


वह जरूरी बात जो इस बार भी सबसे कम होगी



अपराधशास्त्र सिर्फ अपराध होने के बाद की ही स्थितियों का अध्ययन नहीं करता, वह अपराध के निरोध यानी बचाव के तरीके भी समझाता है. इसीलिए देश में न्यायालिक विज्ञान और अपराधशास्त्र की विशेषज्ञता के लिए अलग-अलग पाठ्यक्रम हैं. अपराध की रोकथाम का विषय अपराधशास्त्र के दायरे में आता है. बहरहाल शबनम को फांसी के समय चर्चाओं के बीच अगर ज्यादा बात होनी चाहिए तो वह ऐसे अपराधों की रोकथाम के उपायों पर होनी चाहिए. लेकिन वक्त के मौजूदा मिजाज को देखें तो अपराधों की रोकथाम पर ही सबसे कम चर्चा होती है. फिर भी अगर शबनम कांड के बहाने कहीं ये चर्चा हुई तो ये जरूर सोचा जाएगा कि शबनम कांड का समाजशास्त्र क्या है? इस कांड का मनोविज्ञान क्या है? खासतौर पर यह नुक्ता कि क्या अपने प्रेमी से प्रेम का आवेग इतना भारी पड़ सकता है कि अपने मां-बाप, भाई-बहन से प्रेम की तीव्रता कमजोर पड़ जाए. गौर किया जाना चाहिए कि गिरफ़्तार किए जाते समय शबनम गर्भवती भी थी. उसने जेल में ही एक बेटे को जन्म दिया है. इस समय वह 12 साल का है.


बहरहाल, कहा जा सकता है कि एक सभ्य और स्वस्थ्य समाज बनाने के लिए एक बौद्धिक कवायद की जरूरत है. ऐसी कवायद जो निरी आदर्शवादी भी न हो और न ही उसमें क्रूरता के लक्षण हों. सोचने बैठेंगे तो कई ऐसे कारगर दंड सूझ सकते हैं जो मृत्युदंड से भी ज्यादा तीव्र हों और वे पहली नज़र में अमानवीय भी न दिखाई दें. बेशक हमें एक न्यायपूर्ण व्यवस्था की भी तलाश है जिसमें शबनम जैसे कांड आगे से कम हो सकें. (डिस्क्लेमरः ये लेखक के निजी विचार हैं.)


(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
सुधीर जैन

सुधीर जैन

अपराधशास्त्र और न्यायालिक विज्ञान में उच्च शिक्षा हासिल की. सागर विश्वविद्यालय में पढाया भी. उत्तर भारत के 9 प्रदेश की जेलों में सजायाफ्ता कैदियों पर विशेष शोध किया. मन पत्रकारिता में रम गया तो 27 साल 'जनसत्ता' के संपादकीय विभाग में काम किया. समाज की मूल जरूरतों को समझने के लिए सीएसई की नेशनल फैलोशिप पर चंदेलकालीन तालाबों के जलविज्ञान का शोध अध्ययन भी किया.देश की पहली हिन्दी वीडियो 'कालचक्र' मैगज़ीन के संस्थापक निदेशक, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ क्रिमिनोलॉजी एंड फॉरेंसिक साइंस और सीबीआई एकेडमी के अतिथि व्याख्याता, विभिन्न विषयों पर टीवी पैनल डिबेट. विज्ञान का इतिहास, वैज्ञानिक शोधपद्धति, अकादमिक पत्रकारिता और चुनाव यांत्रिकी में विशेष रुचि.

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First published: February 19, 2021, 10:09 PM IST
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