अभी कोरोना की पहली लहर भी पूरी नहीं उतरी

दूसरे देशों से हमें जो सबक मिले हैं और लगातार खुद भी आठ महीने तक जूझने के बाद खुद भी हमें जो कटु अनुभव हुए हैं, उसके बाद समझदारी इसी में है कि उन अनुभवों से अपना सबक बनाएं. गौर किया जाना चाहिए कि यूरोप के देशों ने अपनी पहली लहर को जल्द नीचे ला पाया तो उसमें सबसे बड़ी भूमिका कोरोना के ताबड़तोड़ परीक्षणों की रही. इन देशों ने अपनी कुल आबादी के मुकाबले 35 से 40 फीसद संख्या में कोरोना परीक्षण कराए.

Source: News18Hindi Last updated on: October 23, 2020, 10:49 AM IST
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अभी कोरोना की पहली लहर भी पूरी नहीं उतरी
देश में कोरोना का कहर लगातार आठ महीने बढ़ते देखा था. सितंबर के तीसरे हफ्ते तक बढ़ते बढ़ते प्रतिदिन 95 हजार मरीज बढ़ने लगे थे.
अर्थव्यवस्था की चिंता ने कोरोना से ध्यान भटका दिया. यह स्थिति सिर्फ अपने ही देश की नहीं है बल्कि कुछ अपवादों को छोड़ लगभग पूरी दुनिया की है. दुनिया के तमाम देशों को अर्थव्यवस्था संभालने के चक्कर में कोरोना से बचाव के उपायों में ढील देनी पड़ रही है. शुरू में जरूर सुनने को मिला था कि जान है तो जहान है. अब दूसरे मुहावरे का इस्तेमाल हो रहा है कि जहान है तो जान है. अर्थव्यवस्था संभालने के लिए अब नौ महीने बाद कोशिश करनी पड़ रही है कि कोरोना का प्रकोप कम होने की चर्चा ज़्यादा की जाए.

आज क्या है दुनिया की हालत?
हर 24 घंटे में जारी होने वाले कोरोना के आंकड़े आज सवेरे जारी हो गए है. सनसनीखेज़ ख़बर है कि संक्रमितों के कुल आंकड़े ने अब तक का रिकॉर्ड तोड़ दिया. पिछले 24 घंटे में दुनिया में चार लाख 78 हजार मरीज बढ़ गए. क्या इस बात पर हैरत नहीं होनी चाहिए कि कोरोना से सबसे ज्यादा बदहाल तीन देश कुछ हफ्तों से दावा कर रहे हैं कि उनके यहां कोरोना का प्रकोप उतार पर है. लेकिन वैश्विक आंकड़ा बता रहा है यह प्रकोप बढ़ाव पर है. हमें याद रखना चाहिए कि इस महामारी ने एक बार फिर सिद्ध कर दिया है कि जब तक सभी सुरक्षित नहीं होंगे तब तक कोई सुरक्षित नहीं है. यानी मौजूदा हालात पर कुछ बारीकी से गौर किए जाने की दरकार है.

यूरोप के देशों ने ऐसी ही चर्चा की थी
याद किया जाना चाहिए कि कोरोना की भयावह चपेट में सबसे पहले यूरोप के कुछ देश आए थे. फ्रांस इटली, स्पेन जैसे कई देशों में भारी तबाही मचने लगी थी. ये देश आर्थिक रूप से संपन्न देशों में गिने जाते हैं. उन्होंने बचाव के ताबड़तोड़ उपाय किए. उन उपायों से हालात काबू में भी कर लिए थे. लेकिन कुछ पखवाड़ों के बाद इन देशों में कोरोना की दूसरी लहर आ गई और चैंकाने वाली बात यह है कि दूसरी लहर पहली लहर से ऊंची आई. इस समय की हालत यह है कि जिन देशों की सरकारें राहत महसूस कर रही थीं और अपनी जनता को राहत महसूस करवा रही थीं वे इस समय भयानक स्थिति में है. तमाम सरकारें और मीडिया, कोरोना की वास्तविक स्थिति बताने से कितना भी बचता रहे, लेकिन प्रतिदिन जारी होने वाले आंकडों से मुंह नहीं चुराया जा सकता. मसलन भारत में कल ही मीडिया में सुर्खियां बनी थीं कि प्रतिदिन बढ़ने वाले मरीज घटकर 46 हजार हो गए हैं, और अगले दिन आंकड़े आ गए हैं कि बढ़कर 56 हो गए हैं. आज यानी 23 अक्टूबर को जारी पिछले घंटे का आंकड़ा भी साढ़े 54 हजार है. बहरहाल दो दिन में ही प्रतिदिन बढ़ने वाले मरीजों में 20 फीसद की बढ़ोतरी की बड़ी घटना पर ग़ौर किया जाना चाहिए. यहां तक कि अमेरिका की स्थिति भी कुछ दिनों के ठहराव के बाद बिगाड़ पर आने लगी है. अमेरिकी में दूसरी लहर पहली से उंची आई थी और तीसरी लहर उससे भी उंची आती दिख रही है. ऐसी ही हालत कई देशों की है. क्या हमें इन देशों की हालत से सबक नहीं लेना चाहिए?

देश में अभी पहली लहर ही खत्म नहीं हुई

हमने अपने देश में कोरोना का कहर लगातार आठ महीने बढ़ते देखा था. सितंबर के तीसरे हफ्ते तक बढ़ते बढ़ते प्रतिदिन 95 हजार मरीज बढ़ने लगे थे. उसके बाद प्रतिदिन मरीजों के आंकडे कुछ घटते हुए आने लगे और इसी हफ्ते देश के स्वास्थ्य मंत्री का बयान आ गया कि कोरोना का प्रकोप घटने लगा है. लेकिन गौर किया जाना चाहिए कि पिछले हफ्ते तक हर दिन औसतन 55 हजार नए मरीज बढ़ते रहे हैं. यानी सरकार की तरफ से नागरिकों में निश्चिंतता पैदा करना आगे भारी पड़ सकता है. तब तो और भी ज्यादा सतर्क रहना चाहिए जब पता चल गया हो कि कोरोना एक बार की लहर के बाद दूसरी तीसरी लहर भी पैदा करता है.दुनिया में कोई भी दावा नहीं कर पाया
भले ही देश का सरकारी अमला देश में कोरोना की दूसरी लहर की चर्चा से बच रहा हो, लेकिन इस वैश्विक महामारी के वैश्विक आंकड़े यही बता रहे हैं कि अभी तक ज्यादातर देश कोरोना से सुरक्षित होने का दावा नहीं कर पाए हैं. चीन और न्यूजीलेंड जैसे वे देश भी नहीं जिन्होंने हालात काबू में कर लिए और जो खुद को दूसरी लहर से बचाए रहे. कुछ गिनेचुने देशों ने भले ही अपने यहां संक्रमितों की संख्या लगभग शून्य या नगण्य कर ली हो लेकिन वे सतर्कता में कहीं भी कोताही नहीं बरत रहे हैं. यानी हमें भी प्रतिदिन बढ़ने वाले मरीजों की संख्या में कुछ रोज़ की कमी को यह नहीं मान लेना चाहिए कि कोरोना का प्रकोप कम हो रहा है. प्रतिदिन बढ़ने वाले संक्रमितों की संख्या का साप्ताहिक रुझान देखें तो अभी भी हर दिन 50 हजार से ज्यादा संक्रमित बढ़ रहे हैं. इस लिहाज से हमें इस बात की चिंता करनी चाहिए कि देश में अभी पहली लहर ही पूरी तौर पर नीचे नहीं आई है.

दूसरी लहर से बचाव की तैयारी का समय
दूसरे देशों से हमें जो सबक मिले हैं और लगातार खुद भी आठ महीने तक जूझने के बाद खुद भी हमें जो कटु अनुभव हुए हैं, उसके बाद समझदारी इसी में है कि उन अनुभवों से अपना सबक बनाएं. गौर किया जाना चाहिए कि यूरोप के देशों ने अपनी पहली लहर को जल्द नीचे ला पाया तो उसमें सबसे बड़ी भूमिका कोरोना के ताबड़तोड़ परीक्षणों की रही. इन देशों ने अपनी कुल आबादी के मुकाबले 35 से 40 फीसद संख्या में कोरोना परीक्षण कराए. जबकि भारत में अभी भी देश की कुल आबादी के मुकाबले सिर्फ सात फीसद परीक्षण हुए हैं. ये अलग बात है कि कल यानी बुधवार को परीक्षणों का आंकड़ा अचानक बढ़कर पौने पंद्रह लाख दिखाया गया है. लेकिन प्रशासकों को यह भी देख लेना चाहिए कि इसमें वायरस की जांच करने वाले पक्के परीक्षण कितने हैं और पहले कभी संक्रमित हो चुके व्यक्तियों के कच्चे परीक्षण यानी एंटीबाॅडी टैस्ट कितने हैं. बहरहाल, अब तक के अनुभवों से पता चल चुका है कि समय पर पर्याप्त और पक्के परीक्षण करके ही संक्रमण को ज्यादा फैलने से रोका जा सकता है.

पाबंदियों में इतनी ज्यादा छूट ठीक नहीं
अर्थव्यवस्था संभालने के लिए जिस तरह से पाबंदियों में ताबड़तोड़ छूट देने का सिलसिला चल पड़ा है वह आगे भारी पड़ सकता है. दूसरे देशों के सबक सामने हैं. खासतौर पर अपने देश की जलवायु के लिहाज से जिस तरह सर्दी ज़ुकाम ख़ांसी का मौसम आने वाला है उसमें संक्रमण के फैलाव का भारी अंदेशा है. लगातार पड़ने जा रहे त्योहार के दिनों में अगर बचाव के उपायों में ज्यादा छूट दी गई तो हम बड़ी मुसीबत में फंस सकते हैं.

समय पर नहीं चेतने का कटु अनुभव
हमें याद करना चाहिए कि जब संक्रमण फैलने की शुरुआत थी तब विश्व स्वास्थ्य संगठन की चेतावनी के बावजूद बहुतेरे देशों ने गंभीरता नहीं दिखाई थी. हमें यह कबूल करने में संकोच नहीं होना चाहिए कि मार्च के शुरूआती तीन हफ्तों में हमसे हीला हवाली हुई थी. तब तक काफी फैलाव हो चुका था. बाद में हमने सबकुछ किया लेकिन हालात संभाले नहीं संभले. अब जब दूसरी लहर का जोखिम सामने है तो हमें इसबार समय पर सतर्कता बरतने से चूकना नहीं चाहिए.

याद रखने की जरूरत है कि सबसे बदहाल देशों की सूची में हम इस समय दूसरे नंबर पर हैं. अपने देश में संक्रमितों का आंकड़ा 78 लाख पार कर चुका है. याद यह भी रखना चाहिए कि अपने देश में कोरोना काफी देर से पहंुचा था. हमें याद यह भी रखना होगा कि कोरोना की बदहाली में पहले नंबर पर खडे़ अमेरिका के मुकाबले हमारी आबादी चार गुनी है. लिहाजा हमारे सामने आगे किसी संकट में फंसने का जोखिम अमेरिका की तुलना में चार गुना ज्यादा है. इसीलिए दूसरी लहर से निपटने की तैयारी अभी से करके रखने में ही समझदारी है.
ब्लॉगर के बारे में
सुधीर जैन

सुधीर जैन

अपराधशास्त्र और न्यायालिक विज्ञान में उच्च शिक्षा हासिल की. सागर विश्वविद्यालय में पढाया भी. उत्तर भारत के 9 प्रदेश की जेलों में सजायाफ्ता कैदियों पर विशेष शोध किया. मन पत्रकारिता में रम गया तो 27 साल 'जनसत्ता' के संपादकीय विभाग में काम किया. समाज की मूल जरूरतों को समझने के लिए सीएसई की नेशनल फैलोशिप पर चंदेलकालीन तालाबों के जलविज्ञान का शोध अध्ययन भी किया.देश की पहली हिन्दी वीडियो 'कालचक्र' मैगज़ीन के संस्थापक निदेशक, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ क्रिमिनोलॉजी एंड फॉरेंसिक साइंस और सीबीआई एकेडमी के अतिथि व्याख्याता, विभिन्न विषयों पर टीवी पैनल डिबेट. विज्ञान का इतिहास, वैज्ञानिक शोधपद्धति, अकादमिक पत्रकारिता और चुनाव यांत्रिकी में विशेष रुचि.

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First published: October 23, 2020, 10:49 AM IST
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