कोरोना के साल की पांच बड़ी घटनाएं

Corona Virus: साल के आखिरी हफ्ते के आखिरी दिनों में ब्रिटेन में पहचाने गए नए वायरस का भारत में प्रवेश इस समय भीतर ही भीतर वैज्ञानिकों और स्वास्थ्य प्रशासकों को भी चिंता में डाले है.

Source: News18Hindi Last updated on: December 31, 2020, 5:24 PM IST
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कोरोना के साल की पांच बड़ी घटनाएं
सरकार ने उम्मीद यह लगाई थी कि भारत में इस उपाय से 21 दिन में कोरोना को हरा दिया जाएगा. लॉकडाउन से सारा देश ठहराव में आ गया. (सांकेतिक तस्वीर)
नई दिल्ली. सन 2020 का साल महामारी के नाम दर्ज हो चुका है. एक ऐसी महामारी जिसने जीवन के हर क्षेत्र को झकझोरे रखा. देश ने महामारी का जैसा भयावह दौर झेला है वह किसी दशक की नहीं बल्कि सदियों की सबसे बड़ी दुर्घटना समझी जाएगी. गुजरे साल का लेखा जोखा तैयार करना हो तो इस साल की हर बड़ी घटना इस महामारी के इर्दगिर्द ही घटती दिखती है. साल के एक दो महीने नहीं बल्कि साल के शुरू से लेकर साल के आखिरी दिन तक देश को कोरोना वायरस महामारी (Corona Virus Pandemic) से जूझते रहना पड़ा. कोरोना के मद्देनज़र गुजरे साल को सिलसिलेवार तरीके से देखना चाहें तो कम से कम पांच मुख्य घटनाओं का जिक्र जरूर आएगा.

गुजरे साल के पहले दिन ही हमें पता चल चुका था कि दुनिया में एक ऐसे रोग ने जन्म ले लिया है जो जल्द ही पूरी दुनिया को अपनी चपेट में ले सकता है. इस वायरस की पहचान साल शुरू होने के पहले ही चीन के वुहान में हो चुकी थी. चीन (China) ने विश्व स्वास्थ्य संगठन डब्ल्यूएचओ (WHO) को पिछले साल 31 दिसंबर को रिपोर्ट दे दी थी और डब्ल्यूएचओ ने 12 जनवरी 2020 को चीन में संक्रमण का ब्यौरा पूरी दुनिया को बता दिया था. वैसे डब्ल्यूएचओ की टाइम लाइन सन 2020 के उदय की पूर्व संध्या यानी 31 दिसंबर 2019 से शुरू होती है. यानी किसी भी देश की सरकार या उसके स्वास्थ्य प्रशासक यह नहीं कह सकते कि उन्हें इस आसन्न संकट की सूचना देर से मिली.

रही बात इस संक्रमण की भयावहता की तो इस बारे में हॉन्गकॉन्ग यूनिवर्सिटी में विनसैंट चैंग जैसे माइक्रोबायोलॉजिस्ट तेरह साल पहले यानी अक्टूबर 2007 में अपने शोध पत्र में चेता चुके थे कि सार्स का म्यूटेशन एक टाइम बॉम्ब होगा. यानी कोरोना की चिंता साल के पहले दिन से ही पूरी दुनिया के सर पर सवार हो जानी चाहिए थी. जाहिर है हमें भी साल के पहले दिन से ही उतना ही चिंतित हो जाना चाहिए था. लेकिन कुछ देशों को छोड़ लगभग सभी देश आसन्न संकट के प्रति शुरू से ही उतने चिंतित दिखाई नहीं दिए. इसमें हमें भी खुद को शामिल मानना चाहिए.

जनवरी के महीने में ही वायरस की मौजूदगी कई देशों में दिखने लगी. अपने देश में ही इसकी आमद 30 जनवरी को पता चल चुकी थी. चीन में मच रही भारी तबाही के बावजूद दुनिया के तमाम देश जरूरत के मुताबिक चौंकन्ने नहीं हो पाए. यह पता चल चुका था कि यह वायरस एक देश से दूसरे देश में आवाजाही और आपसी संपर्कों से फैलने वाला वायरस है, लेकिन अर्थव्यवस्था की चिंता में अंतरराष्ट्रीय उड़ानों पर आवाजाही रोकने में ज्यादातर देशों ने कोताही बरती यानी देर की, हमें भी उन देशों में शामिल माना जा रहा है. हमने उड़ानों पर फौरन पाबंदी लगाने की बजाए हवाई अड्डों पर बाहर से आने वाले यात्रियों के शरीर का तापमान लेने की व्यवस्था की. बाद में पता चला कि संक्रमितों में ज्यादातर संक्रमित ऐसे होते हैं, जिनमें संक्रमण के लक्षण उभरते ही नहीं हैं और वे संक्रमण फैला सकते हैं. हालांकि बाद में उड़ानों पर पाबंदी जरूर लगी.
संक्रमण तेजी से फैल रहा था. स्वास्थ्य प्रशासकों ने वायरस परीक्षण की व्यवस्था पर ज्यादा ध्यान देना शुरू किया. इसका नतीजा यह निकला कि ज्यादा संक्रमितों का पता चलने लगा. तीन फरवरी तक देश में तीन संक्रमित उजागर हो चुके थे. उसके बाद सनसनी तब फैली जब चार मार्च को एक ही दिन में 22 संक्रमितों का आंकड़ा आया. इसके बाद ही देश में उन व्यक्तियों के यात्रा विवरण को जानने का काम तेजी से होता दिखाया गया, लेकिन हालात हाथ से निकलते जा रहे थे. गुजरे साल की एक और तारीख महत्वपूर्ण है, जब देश ने 10 मार्च को होली खेली और उस दिन देश में कोरोना के प्रति उतनी चिंता पैदा नहीं की जा सकी थी. संक्रमितों का आंकड़ा बढ़ता जा रहा था और होली के दिन यह संख्या 50 हो चुकी थी.

लेकिन अगर कोरोना के पूरे साल की समीक्षा करें तो कहा जा सकता है कि मार्च के तीसरे हफ्ते तक संक्रमण का फैलाव रोकने के उपाय करने में मुश्किल खड़ी हो चुकी थी. उधर डब्ल्यूएचओ लगातार समझाइशें जारी कर रहा था कि पूरी दुनिया को क्या क्या उपाय युद्धस्तर पर करने की जरूरत है. लेकिन इतनी जल्दी व्यवस्था बना पाना बहुत मुश्किल हो चुका था. स्थति इतनी बिगड़ने लगी कि 20 मार्च को देश में जनता कर्फ्यू लगाने का फैसला लिया गया. इधर 24 मार्च तक संक्रमितों की संख्या बढ़ते-बढ़ते 519 पहुंच गई. हालात के मद्देनज़र देश में 24 मार्च को 21 दिन की पूर्णबंदी यानी लॉकडाउन का ऐलान कर दिया गया. यह इतना बड़ा फैसला था जिसे देश में कोरोना के सिलसिले में सन 2020 की पहली सबसे बड़ी घटना माना जा सकता है.

सरकार ने उम्मीद यह लगाई थी कि भारत में इस उपाय से 21 दिन में कोरोना को हरा दिया जाएगा. लॉकडाउन से सारा देश ठहराव में आ गया. प्रवासी मजदूर आजीविका और सुरक्षा को लेकर सबसे ज्यादा चिंतित हुए. वे शहरों से अपने घरों के लिए पलायन करने लगे. लॉकडाउन के दौरान यातायात के साधनों पर पाबंदी थी. करोड़ों लोग पैदल ही निकल पड़े. मार्च के आखिरी हफ्ते की यह घटना गुजरे साल की दूसरी सबसे बड़ी घटना मानी जा सकती है.बहरहाल 21 दिन में हम कोरोना को नहीं हरा पाए. चौदह अप्रैल को पूरा हो रहा लॉकडाउन तीन हफ्तों के लिए यानी तीन मई तक और बढ़ाना पड़ा. हालात तब भी नहीं संभले. उसके बाद चौदह-चौदह दिनों के लिए दो बार लॉकडाउन को फिर बढ़ाना पड़ा. इस तरह 24 मार्च से इक्तीस मई तक लगातार लागू रहे लॉकडाउन ने देश की माली हालत की चिंता चरम पर पहुंचा दी. आज पक्के तौर पर माना जा सकता है कि पहले से मुश्किल में चली आ रही देश की माली हालत लॉकडाउन का असर नहीं झेल पा रही थी.

मई के तीसरे हफ्ते में हालात ऐसे हो गए कि अर्थव्यवस्था संभालने की चिंता हद से ज्यादा बढ़ गई, लेकिन तब तक कोरोना ने और ज्यादा विकराल रूप ले लिया था. मई के तीसरे हफ्ते में ही सरकार ने अर्थव्यवस्था संभालने के लिए अर्थव्यवस्था में 20 लाख करोड़ का कर्ज डालने का फैसला किया. मई महीने की इस घटना को पिछले साल की तीसरी सबसे बड़ी घटना के तौर पर देखा जा सकता है. यह वही समय था जब हमें जान है तो जहान का तर्क बदलकर जान भी और जहान भी का तर्क देना पड़ा था. और कोरोना के जबर्दस्त तांडव के बीच ही अनलॉक की प्रकिया चालू करनी पड़ी.

गुजरे साल में मई के बाद यानी अनलॉक के बाद की घटनाओं को सिलसिलेवार देखना जरा लंबा काम है. फिर भी संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि जून से लेकर मध्य सितंबर तक कोरोना संक्रमितों का आंकड़ा दिन पर दिन बढ़ता चला गया. जो कुछ किया जा रहा था उसके अलावा कुछ और सूझ नहीं रहा था. इसबीच कुछ गैरसरकारी विशेषज्ञ कोरोना से निपटने के लिए वायरस परीक्षण की संख्या बढ़ाने के लिए जोर देकर सुझाव देने लगे. डब्ल्यूएचओ के मानदंडों के मुताबिक पॉजीटिविटी रेट को संतुलित करने का दबाव बढ़ने लगा.

जुलाई अगस्त में इस ओर ध्यान दिया गया. धीरे धीरे प्रतिदिन कोरोना टेस्टिंग की संख्या बढ़ाई गई. इससे रोज के आंकड़ों में संक्रमितों की संख्या भी तेजी से बढ़ती दिखने लगी. बिना लक्षणों वाले और हल्के लक्षणों वाले मरीजों को अलगाव में रखने का अच्छा काम इन्हीं महीनों में ज्यादा हो पाया. और संक्रमण को तेजी से फैलने को रोकने में कुछ मदद जरूरी मिली होगी. लेकिन संक्रमण इतना ज्यादा फैल चुका था कि सितबंर मध्य तक कोरोना अपने चरम पर पहुंच ही गया. लेकिन टेस्टिंग पर घ्यान देने का नतीजा ही माना जाना चाहिए कि कोरोना के फैलाव की भयावह रफ्तार को कम किए जाने में थोड़ी सहूलियत हुई.

गुजरे साल में टेस्टिंग के जरिए कोरोना को ज्यादा फैलने से रोकने की घटना को साल की चौथी बड़ी और एक अच्छी घटना माना जा सकता है. लेकिन वह देश पर महामारी का संकट खत्म होने की घटना बिल्कुल नहीं मानी जा सकती थी. मध्य सितंबर के बाद प्रतिदिन संक्रमितों की संख्या कुछ कम होने से निश्चिंत इस लिए नहीं हुआ जा सकता था क्योंकि यह वैश्विक महामारी है, जब तक दूसरे देश भी कोरोना मुक्त नहीं हो जाते तब तक निश्चिंतता बड़ी घातक समझी जाती है. लेकिन देश की अर्थव्यवस्था और राजव्यवस्था को चलाए रखने के दबाव ने हमें अनलॉक की प्रक्रिया तेज करने के लिए मजबूर किया. यहां जिक्र किया जा सकता कि चुनाव आयोग की मुस्तैदी से 28 अक्तूबर से 7 नवंबर तक बिहार में मतदान का काम निर्बाध चला. महत्वपूर्ण धटनाओं में यह कम महत्व की घटना नहीं थी.

नवंबर में सर्दियां आने के पहले सामान्य फलू की इतनी चिंता इस साल के पहले कभी नहीं देखी गई. विशेषज्ञों की बात ठीक भी थी क्योंकि सर्दियों में सामान्य फ्लू का रोग भले ही ज्यादा घातक न हो लेकिन सर्दी खांसी जुकाम का यह मौसम कोरोना के फैलाव का अंदेशा बढ़ाने वाला था. लेकिन गुजरती सर्दियों को माना जा सकता है कि लगातार नौ महीने कोरोना से बचाव का अभ्यास करते नागरिकों ने इस साल अतिरिक्त सावधानी बरती और फैलाव के अंदेशा कम हो गया.

दिसंबर आते आते कोरोना का भय एक थकान का रूप ले चुका था. साल के आखिरी महीने के आखिरी हफ्ते में प्रतिदिन संक्रमितों का आंकड़ा कमोबेश 20 हजार है. लेकिन मध्य सितंबर में हम प्रतिदिन संक्रमितों के आंकड़े का जितना भयावह रूप देख आए थे उसने 20 हजार के आंकड़े को एक साधारण आंकड़ा बना दिया है. लेकिन यह निश्चिंतता हमें नए साल में मुश्किल में डाल सकती है. मुश्किल में इसलिए डाल सकती है क्योंकि साल के गुजरते गुजरते एक और बड़ी दुर्घटना की खबर है कि कोरोना वायरस ने अपना नया रूप अख्तियार कर लिया है.

साल के आखिरी हफ्ते के आखिरी दिनों में ब्रिटेन में पहचाने गए नए वायरस का भारत में प्रवेश इस समय भीतर ही भीतर वैज्ञानिकों और स्वास्थ्य प्रशासकों को भी चिंता में डाले है. नागरिकों की चिंता कम करने के लिए भले ही यह प्रचार सफलतापूर्वक किया जा रहा हो कि अब तक कोरोना के जो टीके बनकर तैयार हुए हैं वे नए वायरस से निपटने में भी कारगर हो सकते हैं. लेकिन इसका पक्का पता तभी चलेगा जब नए साल में टीके लगेंगे और उनके असर को बड़े पैमाने पर जांचा जाएगा. बहरहाल, विदेश यात्रा से लौटे व्यक्तियों के जरिए नए वायरस के भारत में प्रवेश को गुजरे साल की पांचवी सबसे बड़ी घटना मानी जानी चाहिए.

बहरहाल, गुजरा साल कोरोना के नाम रहा. उसने राजनीतिक क्षेत्र के अलावा आर्थिक और सामाजिक यानी लगभग हर क्षेत्र पर अपना शिंकजा कसे रखा. उम्मीद की जानी चाहिए कि नए साल में दुनिया जल्द ही कोरोना से निजात पाने में कामयाब होगी.

(ये लेखक के निजी विचार हैं)
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
सुधीर जैन

सुधीर जैन

अपराधशास्त्र और न्यायालिक विज्ञान में उच्च शिक्षा हासिल की. सागर विश्वविद्यालय में पढाया भी. उत्तर भारत के 9 प्रदेश की जेलों में सजायाफ्ता कैदियों पर विशेष शोध किया. मन पत्रकारिता में रम गया तो 27 साल 'जनसत्ता' के संपादकीय विभाग में काम किया. समाज की मूल जरूरतों को समझने के लिए सीएसई की नेशनल फैलोशिप पर चंदेलकालीन तालाबों के जलविज्ञान का शोध अध्ययन भी किया.देश की पहली हिन्दी वीडियो 'कालचक्र' मैगज़ीन के संस्थापक निदेशक, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ क्रिमिनोलॉजी एंड फॉरेंसिक साइंस और सीबीआई एकेडमी के अतिथि व्याख्याता, विभिन्न विषयों पर टीवी पैनल डिबेट. विज्ञान का इतिहास, वैज्ञानिक शोधपद्धति, अकादमिक पत्रकारिता और चुनाव यांत्रिकी में विशेष रुचि.

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First published: December 31, 2020, 5:24 PM IST
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