त्वरित टिप्पणी: निर्भया के गुनहगारों को फांसी: सजा पर दंडशास्त्र का क्या है नजरिया

गुनहगारों को वे सारे मौके दिए गए जो कानूनन दिए जाने जरूरी थे. गुनहगारों को मौका दिया जाना जरूरी इसलिए था क्योंकि मामला मौत की सज़ा का था. अगर जल्दबाजी में सजा दे दी जाती और कोई नुक्ता बचा रह जाता तो भविष्य में यह कहने को रह जाता कि किसी को जल्दबाजी में मार दिया गया.

Source: News18Hindi Last updated on: March 20, 2020, 11:28 AM IST
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त्वरित टिप्पणी: निर्भया के गुनहगारों को फांसी: सजा पर दंडशास्त्र का क्या है नजरिया
निर्भया गैंगरेप के गुनहगारों को आज फांसी दे दी गई. (प्रतीकात्मक तस्वीर)
नई दिल्ली. निर्भया गैंगरेप (Nirbhaya Gangrape) के चारों गुनहगारों को आखिरकार फांसी (Hanged) हो गई. न्याय हो गया. लोगों का गुस्सा और बेचैनी भी खत्म हो गई. बहुतों को अभी भी लगता होगा कि न्याय में दरी हुई. लेकिन न्याय की प्रकिया (Legal Process) को समझने वाले इस फैसले से जरूर संतुष्ट हुए होंगे. गुनहगारों को वे सारे मौके दिए गए जो कानूनन दिए जाने जरूरी थे. गुनहगारों को मौका दिया जाना जरूरी इसलिए था क्योंकि मामला मौत की सज़ा का था. अगर जल्दबाजी में सजा दे दी जाती और कोई नुक्ता बचा रह जाता तो भविष्य में यह कहने को रह जाता कि किसी को जल्दबाजी में मार दिया गया. वैसे चारों को फांसी दिए जाने की यह घटना दुर्लभ ही है. दुनिया में सजा के इस रूप पर दशकों से सोच विचार होता चला आ रहा है. लिहाज़ा न्याय सिद्धांत के कुछ नुक़्तों पर नज़र डाल लेने का भी यह एक मौका है. खासतौर पर दंडशास्त्र के नज़रिए से इसपर विचार करना जरूरी होगा. यह इसलिए जरूरी है क्योंकि ये फांसियां भविष्य में नज़ीर बनेंगी.

दंडशास्त्र में सज़ा दिए जाने का मकसद

दंडशास्त्र दरअसल अपराधशास्त्र का एक उपविषय है. हालांकि अपने देश में अपराधशास्त्रीय अध्ययन अध्यापन पर ज्यादा जोर नहीं है. यही वजह है कि दंडशास्त्रीय विचार विमर्श में भी हम पिछड़े ही माने जाते हैं. बहरहाल दुनिया में ढाई सौ साल के विचार विमर्श के दंड या सज़ा के पांच मकसद तय किए जा सके हैं. चार लड़कों को फांसी की घटना के समय इन मकसद को दोहरा लेने में हर्ज नहीं है.

ये हैं पांच मकसद
सजा का पहला मकसद है—अपराधी से बदला लेना. अपराध विज्ञान की भाषा में इसे रेट्रीव्यूशन कहते हैं. अपराधशास्त्रीय अध्ययनों में रेट्रीव्यूशन या प्रतिशोध का इतिहास उतना ही पुराना है जितना पुराना हमारे ज्ञान का इतिहास. आंख के बदले आंख और दांत के बदले दांत के मुहावरे के रूप में इस मकसद को आज भी याद दिलाया जाता है.

दूसरा मकसद है-प्रतिरोध. इसका मतलब है अपराध को रोकना. अपराधी को सजा देकर भविष्य में उसे अपराध करने से रोकना. इसका ही एक और मकसद है कि ऐसी सजा़ देना कि उसे देखकर दूसरे भी अपराध करने से बाज आएं. दंड के मामले में यह दर्शन भी कड़ी सज़ा का सुझाव देता है. ये अलग बात है कि कोई ढाई सौ साल पहले फ्रांस में जेबकतरों को चैराहों पर फांसी देकर इस तरह का प्रतिरोध लगाने की कोशिश की गई थी. लेकिन देखा गया कि इसका ज्यादा असर नहीं होता है. चौराहे पर फांसी देखने के लिए जमा भीड़ में ही जेब कटने लगी थीं.
दंड का तीसरा उद्देश्य प्रायश्चित है. यह ज़रा आध्यात्मिक प्रकार का उददेश्य है. इस सिलसिले में ज्यादा शोध अध्ययन तो उपलब्ध नहीं है, लेकिन इतना जरूर है कि जब अपराधियों को सुधारने की बातें शुरू हुईं तो यह देखा गया कि किसी गुनहगार के सुधारने की पहली शर्त यही है कि उसमें प्रायश्चित का बोध आ जाए. बहरहाल यह आजतक विचार का ही विषय है कि अपराधियों में प्रायश्चित का भाव लाया कैसे जाए?दंड का चैथा मकसद है— सुधार. दुनिया जब से मानवतावाद के प्रति सजग हुई है उसने मानवाधिकारों पर गौर करना शुरू किया. हालांकि दूसरे के मानवाधिकार का हनन करने की सूरत में कोई कैसे अपने मानवाधिकार की मांग कर सकता है. यह सवाल पहले भी था और आज भी है. लेकिन मामला जटिल वहां बनता है जब मानसिक या सामाजिक व्याधि से पीड़ित व्यक्ति अपराध करता है. उसी आधार पर अपराधशास्त्र सुझाव देता है कि अपराधियों के सुधार की गुंजाइश है. हालांकि, चार अपराधियों को फांसी के मामले में सुधार के मकसद की चर्चा ही बेमानी है.

इसी तरह दंड के पांचवे मकसद पुनर्वास की चर्चा भी इस समय नहीं की जा सकती क्योंकि अपराधी को सुधारने के बाद जब जेल से उसकी रिहाई होती है तभी पुनर्वास का काम शुरू होता है. यानी फांसी की सजा के मामले में पुनर्वास के मकसद की चर्चा भी बेकार है.

दंड के उपायों का एक और पक्ष

निर्भया गैंगरेप केचारों अपराधियों को फांसी दिए जाने के दिन दंड के एक और दार्शनिक पक्ष पर बात की जा सकती है. वह ये कि दंड के शुरू के दो मकसद यानी प्रतिशोध और प्रतिरोध को दंडात्मक उपाय कहा जाता है. और जब प्रायश्चित सुधार और पुनर्वास को भी उनमें जोड़ा जाता है तो उसे दंडोपचरात्मक या पीनोकरैक्शनल अप्रोच कहा जाता है. हमारी आपराधिक न्याय प्रणाली में दंड की यही पीनोकरैक्शनल यानी दंडोपचारात्मक प्रणाली को अपनाया गया है.

बहरहाल, चारों को फांसी के दिन हमें कहीं यह जरूर दर्ज़ करके रखना चाहिए कि इन चारों अपराधियों के हाथों आगे कोई अपराध होने की संभावना का खत्म कर दिया गया. अपराधशास्त्र की भाषा में इसे स्पेसिफिक डेटरेंस या विशिष्ट प्रतिरोध कहते हैं. लेकिन प्रतिरोध का दूसरा रूप वह है जिसमें दूसरे संभावित अपराधियों में सज़ा का खौफ पैदा करने की उम्मीद लगाई जाती है. इसे जनरल डेटरेंस या सामान्य प्रतिरोध कहते हैं. देश का जो तबका गुस्से और बेचैनी में था उसका तर्क यही था कि फांसी से दूसरे भी ऐसे अपराध करने से बचेंगे.

फांसी के पक्ष या विपक्ष में तर्क का यह सही समय नही

चारों को जिस मामले में फांसी हुई है, वह इतना वीभत्स और जुगुप्सा वाला था कि उसके लिए फांसी तो क्या उससे भी कड़ी सज़ा की भी सजा की वकालत हो सकती है. क्योंकि फांसी का स्नायु विज्ञान बताता है कि सबसे कम यातना या दर्द वाली कोई सज़ा है तो वह फांसी ही है। इसमें मौत दम घुटने से नहीं बल्कि स्पाइनलकाॅर्ड टूटने से होती है जो सेकेंड के छोटे से भाग में ही टूट जाती है.

ये अलग बात है कि चारों अपराधियों ने अपनी मृत्यु का लंबा इंतजार किया. बस इसे ही कड़ी सज़ा माना जा सकता है और जहां तक फांसी के पक्ष और विपक्ष में वैश्विक विचार विमर्श का सवाल है तो यह इतनी पेंचीदा गुत्थी है कि कुछ भी सेाचते हैं उसके खिलाफ तर्क खड़ा हो जाता है.

मसलन स्वतंत्र इच्छा के सिद्धांत के तहत जीवन के हनन की गुंजाइश ही नहीं बनती. लेकिन जहां किसी ने दूसरे के जीवन के हनन का अपराध किया हो तो प्रतिशोध के सिद्धांत के हिसाब से फांसी का तर्क भी ठीक दिखने लगता है. बहरहाल इसके पक्ष और विपक्ष में तर्कों की सूची बहुत लंबी है। लेकिन यह समय ऐसे तर्कों का जिक्र करने का है नहीं है.

सवाल अपराध रोकने के उपायों का होना चाहिए

अपराधशास्त्र उपाय ढूंढकर लाता है. इसी शास्त्र में समझा और समझाया जाता है कि अपराध के कारण क्या क्या होते हैं. उसके बाद उसके निवारण की बात सुझाई जाती है. मसलन अपराध के कारणों की छोटी सी सूची बनाएं तो वे कारण सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और वैधानिक हो सकते हैं. यहां चारों अपराधियों के मामले का अगर अपराधशास्त्रीय नजरिए से कभी अध्ययन हुआ तो शोधार्थियों को इन चारों सज़ायाफ्ताओं कीे सोशल साइकाॅलजी को देखना पड़ेगा. उनके बचपन से लेकर किशोरावस्था तक के सामाजमनोवैज्ञानिक विकास की पड़ताल होनी चाहिए थी। इस अध्ययन से बहुत कुछ काम की बातें पता चलतीं.

वैसे इन सजायाफ्ता लड़कों पर अपराधशास्त्रीय अध्ययन की गुंजाइश अभी भी बाकी है. उनके परिवार, बचपन के यार दोस्तों से तथ्य जमा किए जा सकते हैं. यानी तभी जाना जा सकता है कि इस तरह के अपराधों को कम करने के लिए आपराधिक न्याय प्रणाली में क्या क्या सुधार किए जा सकते हैं?

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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सुधीर जैन

सुधीर जैन

अपराधशास्त्र और न्यायालिक विज्ञान में उच्च शिक्षा हासिल की. सागर विश्वविद्यालय में पढाया भी. उत्तर भारत के 9 प्रदेश की जेलों में सजायाफ्ता कैदियों पर विशेष शोध किया. मन पत्रकारिता में रम गया तो 27 साल 'जनसत्ता' के संपादकीय विभाग में काम किया. समाज की मूल जरूरतों को समझने के लिए सीएसई की नेशनल फैलोशिप पर चंदेलकालीन तालाबों के जलविज्ञान का शोध अध्ययन भी किया.देश की पहली हिन्दी वीडियो 'कालचक्र' मैगज़ीन के संस्थापक निदेशक, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ क्रिमिनोलॉजी एंड फॉरेंसिक साइंस और सीबीआई एकेडमी के अतिथि व्याख्याता, विभिन्न विषयों पर टीवी पैनल डिबेट. विज्ञान का इतिहास, वैज्ञानिक शोधपद्धति, अकादमिक पत्रकारिता और चुनाव यांत्रिकी में विशेष रुचि.

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First published: March 20, 2020, 9:28 AM IST
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