कैपिटल हिल कांड: क्या अमेरिका की आंच से दुनिया की दूसरी लोकतांत्रिक व्यवस्थाएं बची रह पाएंगी?

राजनीतिक व्यवस्थाओं की शुरुआत से लेकर आजतक लोकतंत्र से बेहतर व्यवस्था अबतक सोची नहीं जा सकी है. और लोकतंत्र को ज्यादा से ज्यादा निरापद बनाने के लिए वैधानिक लोकतंत्र ईजाद किया गया है. वैधानिक लोकतंत्र में संप्रभुता नागरिक की नहीं होती बल्कि संविधान संप्रभु होता है.

Source: News18Hindi Last updated on: January 8, 2021, 9:14 PM IST
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कैपिटल हिल कांड: क्या अमेरिका की आंच से दुनिया की दूसरी लोकतांत्रिक व्यवस्थाएं बची रह पाएंगी?
अमेरिका में हताशा या ऐसे ही दूसरे कारणों से सार्वजनिक जगहों, समारोहों में अंधाधुंध गोलियां चलाकर लोगों को हताहत करने के बहुत से मामले सामने आते हैं.
लोकतंत्र का सबसे ज्य़ादा दम भरने वाले अमेरिका में ये क्या हो गया? क्या विश्व का विद्वत समाज अभी भी चुप्पी साधे रह सकता है? क्या अमेरिका की आंच से दुनिया की दूसरी लोकतांत्रिक व्यवस्थाएं बची रह पाएंगी? आखिर लोकतंत्र के सबसे बड़े हितधारक नागरिक ही होते हैं. हर प्रकार का लोकतंत्र नागरिकों से ही बनता है, वे उसे खुद ही बनाते हैं. जाहिर है इसीलिए उम्मीद की जाती है कि नागरिक जागरूक हों. और उन्हें जागरूक बनाए रखने के लिए दुनिया में एक वि़द्वत समाज हमेशा उपलब्ध होता है. हर प्रकार के नागरिक समूहों के अपने अपने जागरूक नेता भी होते हैं. इसीलिए सवाल यह बनता है कि क्या अमेरिका के इस कांड के लिए वहां का वे बेकाबू नागरिक जिम्मेदार हैं या उनके नेता. या फिर वे वि़द्वान ज्यादा जिम्मदार हैं जो राजनीतिक विचारधाराओं के पक्ष विपक्ष में आलोचनाएं या व्याख्याएं करते हैं?

एक अंदेशा, कहीं लोकतंत्र की ही समीक्षा न होने लगे
राजनीतिक व्यवस्थाओं की शुरुआत से लेकर आजतक लोकतंत्र से बेहतर व्यवस्था अबतक सोची नहीं जा सकी है. और लोकतंत्र को ज्यादा से ज्यादा निरापद बनाने के लिए वैधानिक लोकतंत्र ईजाद किया गया है. वैधानिक लोकतंत्र में संप्रभुता नागरिक की नहीं होती बल्कि संविधान संप्रभु होता है. यह भी दोहराया जाना चाहिए कि लोकतांत्रिक व्यवस्था का संविधान बनाते खुद नागरिक ही हैं. लेकिन उसे बना देने के बाद वे उसके खिलाफ नहीं जा सकते. इस तरह वैधानिक लोकतंत्र को आज दिन तक पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा निरापद यानी सबसे कम हानिकारक माना जाता है. इस तरह अमेेरिका में हुई अनहोनी के लिए अगर किसी को जिम्मेदार माना जाएगा तो वह आपराधिक न्याय व्यवस्था को ही माना जाएगा जिसने ऐन मौके पर संविधान सम्मत कार्रवाई नहीं कर पाई.

आपराधिक न्याय व्यवस्था की नाकामी के लिए कौन जिम्मेदार?
टंªप समर्थकों की भीड़ आई और जबरन कैपिटल हिल में घुस गई. और ऐन उस समय यह कांड हो गया जब इमारत के भीतर अमेरिकी चुनाव के नतीजों पर आखिरी मुहर लगाई जा रही थी. पुलिस या सुरक्षाकर्मी इस भीड़ को रोक नहीं पाए. यानी देखा जाना चाहिए कि ऐसा क्योंकर हो गया?

क्योंकि यह सत्ता हस्तांतरण का मामला था
याद दिलाया जा सकता है कि अमेरिका में चुनाव के कुछ पहले जब एक अश्वेत की हत्या के समय अमेरिकी पुलिस ने सनसनीखेज मंजर पैदा कर दिया था तो पूरी दुनिया में सनसनी फैल गई थी. लेकिन उस समय टंªप सत्ता पर काबिज थे और यह पता नहीं था कि चुनाव के बाद वे सत्ता पर काबिज रह पाएंगे या सत्ता से बेदखल हो जाएंगे. वैसे भी आपराधिक न्याय प्रणाली यानी पुलिस, जेल और अदालतों का व्यवहार स्वतंत्र या संप्रभु रह सके इसकी व्यवस्था पूरी दुनिया में आज तक बन नहीं पाई है. माना जाता है कि पुलिस या सुरक्षाकर्मियों का व्यवहार राजनीतिक स्थितियों से अछूता रह नहीं पाता. इस तरह टंªªप समर्थकों की इस हिंसक भीड़ को सुरक्षाकर्मी रोक नहीं पाए, इसके भी राजनीतिक कारणों पर गौर किया जाना चाहिए.क्या करते सुरक्षाकर्मी
जाॅर्ज फ्लायड कांड से भारी शर्मिंदगी उठा चुकी पुलिस चाहती तो इस मामले में कड़ाई बरत सकती थी. वह अपनी बिगड़ी छवि को सुधारने की कोशिश कर सकती थी. लेकिन राजनीतिक कारण इस समय भी गायब नहीं रहे होंगे. फर्ज करें कि सुरक्षाबल ने बल लगाया दिया होता तो ट्रंप उसका बेजा फायदा भी उठा सकते थे. आखिर वे अमेरिकी चुनाव में बुरी तरह नहीं हारे हैं उन्होंने अपने समर्थक नागरिकों की भावनाओं को उघाड़ कर एक माहौल अभी भी बना रखा है. चाहे दक्षिणपंथी भावनाएं कहें या उसे देश की अस्मिता या राष्ट्र की अस्मिता की भावनाएं कहा जाए, ये भावनाएं होती ही ऐसी हैं कि उसके आगे संविधान या विधान या कानून व्यवस्थाओं के तर्कों को काटपीट कर कमजोर बना देना हमेशा ही आसान होता है. यानी राजनीतिक कारणों से कानून और व्यवस्था का कभी कमजोर पड़ना और कभी हद से ज्यादा भयावह हो जाना पूरी दुनिया में हर जगह हमेशा की बात है. यानी यह सिर्फ अमेरिका की ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया की दुष्प्रवृत्ति है. इसीलिए वि़द्वत समाज हमेशा यही परामर्श देता रहता है कि लोकतंत्र में अधिनायकवाद या भावनाजनित दक्षिणपंथ न घुस पाए और इसपर हमेशा नज़र रखी जानी चाहिए. और इसीलिए अमेरिका में ट्रंप समर्थकों के इस सनसनीखेज कांड की जिम्मेदारी पूरी दुनिया के बदलते राजनीतिक माहौल पर डाली जानी चाहिए.

आखिर ट्रंप की पार्टी पर क्या असर पड़ेगा
ट्रंप जिस पार्टी के हैं उसे रिपब्लिकन पार्टी कहा जाता है और उसे आमतौर पर दक्षिणपंथी विचारों वाली पार्टी माना जाता है. लेकिन इस पार्टी का लंबा इतिहास है और इसने रह रह कर कई बार नागरिकों की भावनाओं को अपने पक्ष में बनाया है और यह पार्टी सत्ता पर काबिज़ होती रही है. यह भी एक महत्वपूर्ण तथ्य है कि अमेरिकी लोकतंत्र और उसकी चुनाव पद्धति की दुनियाभर में शौहरत है. कोई दो सदियों से वहां बड़े मजे से सत्ता एक हाथ से दूसरे हाथ में आती जाती रही है. इसीलिए उनके लोकतंत्र को समयसि़द्ध लोकतंत्र माना जाता है. लेकिन 2021 के सत्ताहस्तांतरण के इस भीषण कांड ने उनके लोकतंत्र की समयसिद्धि को थोड़ी देर के लिए क्षत विक्षत करके रख दिया है.

प्रतिकार के लिए क्या हुआ
ट्रंप समर्थकों का यह कांड जब हद से ज्यादा भयावह हो गया तो फौरन ही ट्रंप ने पहली बार इशारा किया किया कि वह चुनाव नतीजों को कबूल करेंगे. हालांकि उन्होंने अपनी वह बात भी दोहरा दी की कि चुनाव की चोरी की गई है. उन्होने कांड के ऐन मौके पर अपने समर्थकों को जब कैपिटल हिल से वापस आने को कहा तब भी उन्होंने इस भीड़ की तारीफ में भी बोला और भीड़ का महिमामंडन भी किया. यानी माना जाना चाहिए कि सबकुछ होने के बाद भी कांड को लेकर किसी प्रकार के प्रायश्चित का भाव नहीं दिखाई दिया. यानी इस कांड का प्रतिकार हुआ माना नहीं जाना चाहिए.

बाइडन के शपथ समारोह के समय क्या माहौल बन सकता है?
अमेरिका में परंपरा रही है कि नए राष्ट्रपति के शपथ समारोह में पराजित उम्मीदवार सहित सभी पूर्व राष्ट्रपति भी मौजूद रहते हैं. और वे सभी नेता नए राष्ट्रपति के साथ होने का भाव प्रगट करते हैं. नए राष्ट्रपति भी कहते हैं कि वे अब देश के सभी नागरिकों के राष्ट्रपति हैं, सभी को एक सी नज़र से देखेंगे. लेकिन अमेरिकी इतिहास में इसबार जो इतना बड़ा कांड हो गया है उसके बाद निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि शपथ समारोह में ट्रंप की मौजूदगी या व्यवहार वैसा ही रहेगा जैसा सदियों से रहता आया है.

आगे ट्रंप और उनकी पार्टी पर बड़ी जिम्मेदारी
चुनाव के पहले तक जो भी होता रहा हो लेकिन एक संवैधानिक प्रकिया से चुनाव हो जाने के बाद अमेरिका में जो भयावह माहौल बना है उसे ठीक करने की सबसे ज्यादा जिम्मेदारी किसी पर होगी तो वह टंªप और उनकी पार्टी के नेताओं की ही होगी. जाहिर है कि अमेरिकी लोकतंत्र, खुद अपनी और अपनी पार्टी की छवि की मरम्मत के काम पर ट्रंप को संजीदगी से लगना पड़ेगा. उनके पास एक तरीका डिनायल यानी अपनी हार को कबूल न करने और चुनाव की चोरी का आरोप दोहराते रहने का है और दूसरा तरीका अपने समर्थकों के बेजा व्यवहार को गलत मान लेने का है. अलबत्ता अपने समर्थकों की गलती मानते समय उनकी पार्टी के नेेताओं को यह भी देखना पड़ेगा कि समर्थकों को वैसा करने के लिए उकसाने का आरोप भी ट्रंप पर लगाया जा सकता है या नहीं? कुछ भी हो टंªप की पार्टी के सभी बड़े नेता, उनकी पार्टी के सिद्धांतकार यहां तक कि उनका समर्थक तबका इस समय एक मुश्किल सोच विचार में जरूर लगा होगा. वे इस समय क्या सोच रहे हैं? इसका पता बाइडन के शपथ समारोह के दौरान ही चल पाएगा.

(ये लेखक के निजी विचार हैं)
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
सुधीर जैन

सुधीर जैन

अपराधशास्त्र और न्यायालिक विज्ञान में उच्च शिक्षा हासिल की. सागर विश्वविद्यालय में पढाया भी. उत्तर भारत के 9 प्रदेश की जेलों में सजायाफ्ता कैदियों पर विशेष शोध किया. मन पत्रकारिता में रम गया तो 27 साल 'जनसत्ता' के संपादकीय विभाग में काम किया. समाज की मूल जरूरतों को समझने के लिए सीएसई की नेशनल फैलोशिप पर चंदेलकालीन तालाबों के जलविज्ञान का शोध अध्ययन भी किया.देश की पहली हिन्दी वीडियो 'कालचक्र' मैगज़ीन के संस्थापक निदेशक, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ क्रिमिनोलॉजी एंड फॉरेंसिक साइंस और सीबीआई एकेडमी के अतिथि व्याख्याता, विभिन्न विषयों पर टीवी पैनल डिबेट. विज्ञान का इतिहास, वैज्ञानिक शोधपद्धति, अकादमिक पत्रकारिता और चुनाव यांत्रिकी में विशेष रुचि.

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First published: January 8, 2021, 8:03 PM IST
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