भूमिका बदले, तो राहुल गांधी को कुशलता दिखाने का मौका मिल सकता है

Rahul Gandhi in Lok Sabha: भारतीय राजनीति में सत्ताधारी दल के सबसे ज्यादा निशाने पर अगर कोई रहा है तो वे राहुल गांधी ही हैं. सफलता और विफलता अपनी जगह है, लेकिन उनकी लगातार सक्रियता को कोई नहीं नकार सकता.

Source: News18Hindi Last updated on: July 5, 2021, 11:15 PM IST
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भूमिका बदले, तो राहुल गांधी को कुशलता दिखाने का मौका मिल सकता है
केरल के वायनाड से कांग्रेस सांसद और पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी. (पीटीआई फाइल फोटो)

राहुल गांधी अचानक एक बड़ी चर्चा में आ गए हैं. हालांकि चर्चा में आने के लिए उनकी तरफ से ऐसा कुछ नहीं हुआ है, लेकिन मीडिया की इन अटकलों ने हलचल मचा दी है कि राहुल गांधी को लोकसभा में कांग्रेस का नेता बनाया जा सकता है. वैसे खुद कांग्रेस प्रवक्ता ने इस खबर पर कोई भी प्रतिक्रिया देने से इनकार कर दिया है, लेकिन गौरतलब बात यह है कि कांग्रेस प्रवक्ता ने इन अटकलों का खंडन नहीं किया है क्योंकि अगर राहुल गांधी को लोकसभा में पार्टी का नेता बनाने की अटकलों में पार्टी को कोई नुकसान दिखाई देता तो पार्टी प्रवक्ता फौरन ही इस बात को जोर देकर निराधार कह देते.


बहरहाल इस खबर को कोरा कयास नहीं कहा जा रहा है, तो मान कर चला जा सकता है कि किसी स्तर पर ऐसा विचार हो रहा होगा और अगर वाकई ऐसा सोचा जा रहा है तो कल से ये चर्चाएं भी शुरू हो जाएंगी कि राहुल गांधी के लोकसभा में पार्टी के नेता बनने से कांग्रेस के राष्टीय परिदृश्य पर कैसा फर्क पड़ सकता है.


अटकलों के महत्व का आकलन
सभी विपक्षी दलों में इस समय भी कांग्रेस ही सबसे बड़ी पार्टी है. सबसे बड़े विपक्षी दल होने के बावजूद भले ही उसे संसद में विपक्ष का दर्जा न मिला हो, लेकिन सबसे बड़े दल के नाते विपक्षी दलों में सबसे ज्यादा महत्व कांग्रेस का ही है. यानी मानकर चलना चाहिए कि अगर राहुल गांधी लोकसभा में कांग्रेस के नेता बनाए जाते हैं तो उनकी हैसियत एक तरह से पूरे विपक्ष के नेता जैसी ही बन सकती है. अब यह हिसाब भी लगाया जाने लगेगा कि अगर कांग्रेस राहुल गांधी को लोकसभा में अपना नेता बनाने का विचार कर रही है तो इसका क्या और कितना असर राहुल गांधी पर पड़ेगा और कितना असर पार्टी पर पड़ेगा

पार्टी पर असर
इस तथ्य पर ज्यादा बहस नहीं हो सकती कि इस समय लोकसभा में कांग्रेस के नेता अधीर रंजन चौधरी को शुरू से ही एक वैकल्पिक उपाय ही माना जाता रहा है. उनके गुण और दोष जगजाहिर हैं. किसी राष्ट्रीय पार्टी के नेता और वह भी सबसे बड़े विपक्षी दल के नेता को जितना अनुभवी और पटु होना चाहिए उतने गुण समीक्षकों को उनमें अभी तक दिखाई नहीं दिए. बेशक इतने बड़े पद पर एक अच्छे प्रशिक्षु की तरह वे जरूर दिखाई देते रहे, लेकिन देश के मौजूदा राजनैतिक परिदृश्य में उनके प्रदर्शन को राजनीतिक समीक्षक बेहतर नहीं मानते. इस लिहाज से अगर अधीर रंजन चौधरी की भूमिका बदलने की चर्चा है, तो यह कांग्रेस के हित में ही सिद्ध की जा सकती है.


राहुल गांधी पर असरभारतीय राजनीति में सत्ताधारी दल के सबसे ज्यादा निशाने पर अगर कोई रहा है तो वे राहुल गांधी ही हैं. सन 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद सत्तारूढ़ दल के सबसे ज्यादा हमले उन्होंने ही झेले हैं, लेकिन गौर करने की बात यह है कि आज से दो साल पहले तक उनकी छवि और आज की छवि में धरती-आसमान का फर्क है. सफलता और विफलता अपनी जगह है, लेकिन उनकी लगातार सक्रियता को कोई नहीं नकार सकता. पिछले सात साल में अर्थव्यवस्था और महामारी के मामले में उनकी कही बातों पर आज गौर किया जाने लगा है. एक सांसद होने के नाते लोकसभा में उनकी मौजूदगी को लेकर जब भी सवाल उठाए गए हमेशा सत्तारूढ़ दल की तरफ से ही उठाए गए. संसदीय लोकतंत्र की राजनीति में इस तरह के आरोपों को रणनीति का हिस्सा ही माना जाता है.


तथ्यपरक समीक्षा की जाए तो जनमानस के पटल पर राहुल गांधी गायब कभी भी नहीं रहे. यह अलग बात है कि राहुल गांधी हमलावर मुद्रा में नहीं आ पाए, बल्कि वे ही हमलों के निशाने पर बने रहे. इस तरह अगर उन्होंने आज दिन तक अपने आप को टिकाए रखा है तो इसे उनकी एक बड़ी उपलब्धि माना जा सकता है. उनकी दूसरी उपलब्धि यह मानी जा सकती है कि इस बीच लगातार उपहास का पात्र बनाए जाने से उपहास करने वालों की धार भी कुंद पड़ गई है. यानी अगर राहुल गांधी एक नई भूमिका में आते हैं, तो उनके पास अपनी कुशलता दिखाने का एक अच्छा और अनुकूल मौका होगा.


आगे क्या रुख हो सकता है राहुल गांधी का
एक पहेली की तरह यही सबसे बड़ा सवाल है. इस जटिल सवाल पर कोई पूर्वानुमान करना हो, तो देश की मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों को लेखे में लेना पड़ेगा. खासतौर पर यह तथ्य कि मौजूदा लोकसभा के कार्यकाल के दो साल गुज़र चुके हैं. वक्त गुजरते देर नहीं लगती, इस साल के अंत तक अगले लोकसभा चुनावों की तैयारियां होने लगेंगी. सत्तारूढ़ दल जिस मजबूती के साथ 2019 में सत्ता में आया था और विपक्ष का कोई भी दल विपक्ष का दर्जा भी नहीं पा सका था उस स्थिति में लोकसभा में विपक्ष के पास ज्यादा कुछ करने की गुंजाइश थी भी नहीं. उसके बाद भी एक सांसद के नाते राहुल गांधी ने राजनीतिक मंच पर खुद को बनाए रखा इसे राजनीतिक समीक्षक उनकी उपलब्धि ही मानेंगे और यही तथ्य कांग्रेस के नीति निर्माता नेताओं के सामने भी जरूर होगा. एक पार्टी के रूप में भी कांग्रेस के सामने यह तथ्य होगा कि लोकसभा के लिए उनके सामने आज राहुल गांधी से बेहतर कोई विकल्प है नहीं. ऐसा विकल्प जो बहुभाषी देश से संवाद कर सके. इस बात से भी कोई इनकार नहीं कर सकता कि देश का मीडिया आज विपक्ष में अगर किसी को सबसे ज्यादा समय और महत्त्व दे रहा है तो वे राहुल गांधी ही हैं. वैसे भी उन्हें अब खासा राजनीतिक अनुभव भी हासिल है. बहुत संभव है कि राहुल गांधी जिस तरह से पार्टी अध्यक्ष पद पर बने रहने को राजी नहीं हुए थे उस तरह लोकसभा में पार्टी का नेता बनने से इनकार न करें. अगर कोई दुविधा खड़ी हो सकती है तो वह सिर्फ अनुकूल समय की हो सकती है. लोकसभा के बाकी बचे एक लंबे कार्यकाल को देखते हुए यह रणनीति जरूर बन सकती है कि अभी कुछ ठहरा जाए.


स्वॉट एनालिसिस करने का सही समय
अगर उन्हें लोकसभा में पार्टी का नेता बनाने की अटकलें लगाई जा रही हैं, तो राजनीतिक समीक्षकों को राहुल गांधी की ताकत यानी स्ट्रेंथ, उनकी कमजोरी यानी वीकनेस, उनके सामने अवसर यानी ऑपरच्युनिटी और चुनौती यानी थ्रैट का विश्लेषण शुरू कर देना चाहिए. एसडब्ल्यूओटी यानी स्वॉट के नाम से प्रबंधन प्रौद्योगिकी का यह उपकरण राहुल गांधी की नई भूमिका तय करने में बहुत काम आ सकता है. वैसे तो राहुल गांधी के साथ ही कांग्रेस को भी अपना ऐसा विश्लेषण करना या करवाना चाहिए ताकि वह आगे की कारगर रणनीति बना सके. यह काम फिजूल का इसलिए नहीं होगा क्योंकि अब जनता के एक तबके में भी यह बात उठने लगी है कि लोकतंत्र में विपक्ष को खासा मजबूत होना चाहिए.


(ये लेखक के निजी विचार हैं)


(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
सुधीर जैन

सुधीर जैन

अपराधशास्त्र और न्यायालिक विज्ञान में उच्च शिक्षा हासिल की. सागर विश्वविद्यालय में पढाया भी. उत्तर भारत के 9 प्रदेश की जेलों में सजायाफ्ता कैदियों पर विशेष शोध किया. मन पत्रकारिता में रम गया तो 27 साल 'जनसत्ता' के संपादकीय विभाग में काम किया. समाज की मूल जरूरतों को समझने के लिए सीएसई की नेशनल फैलोशिप पर चंदेलकालीन तालाबों के जलविज्ञान का शोध अध्ययन भी किया.देश की पहली हिन्दी वीडियो 'कालचक्र' मैगज़ीन के संस्थापक निदेशक, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ क्रिमिनोलॉजी एंड फॉरेंसिक साइंस और सीबीआई एकेडमी के अतिथि व्याख्याता, विभिन्न विषयों पर टीवी पैनल डिबेट. विज्ञान का इतिहास, वैज्ञानिक शोधपद्धति, अकादमिक पत्रकारिता और चुनाव यांत्रिकी में विशेष रुचि.

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First published: July 5, 2021, 11:13 PM IST
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