टैक्स चार्टर का ऐलान, आखिर इससे कितना फर्क पड़ेगा

नई व्यवस्था को लागू करने के मौके पर पारदर्शिता का बार बार जिक्र किया गया है. कौन नहीं जानता कि पारदर्शिता सौ रोगों की दवा है. कई साल से अनुमान लगाया जा रहा है कि भ्रष्टाचार जैसी लाइलाज बीमारी के इलाज के लिए भी पारदर्शिता कारगर हो सकती है.

Source: News18Hindi Last updated on: August 13, 2020, 8:29 PM IST
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टैक्स चार्टर का ऐलान, आखिर इससे कितना फर्क पड़ेगा
भोपाल में इनकम टैक्स विभाग की दिल्ली की टीम कार्रवाई कर रही है.
आयकर व्यवस्था (Income Tax system) में सुधार के कुछ ऐलान हुए हैं. ये एलान प्रत्यक्ष कर सुधारों की श्रृंखला में जोड़ा गया एक कदम है. सुधारों की मुहिम के तहत आज प्रधानमंत्री के हाथों एक मंच का उदघाटन हो गया. आयकर संबंधी इस मंच के तहत दो मुख्य काम फेसलेस एसेसमेंट (Faceless Assessment) और टैक्सपेयर चार्टर के नियम आज से लागू होने का भी एलान हो गया. वैसे तो इस तरह की व्यवस्था बनाने का जिक्र पिछले बजट के दौरान ही हो गया था लेकिन अब जब इसका ढांचा बन कर आया है और लागू भी हो गया है तो यह भी समझ लेना चाहिए कि नए सुधारों से किस तरह का फर्क पड़ेगा. यह भी देख लिया जाना चाहिए कि अर्थव्यवस्था के सामने खड़ीं तमाम कठिनाइयों के बीच ये सुधार अपनी क्या भूमिका निभा सकते हैं.

फेसलैस असेसमेंट से क्या फर्क पड़ेगा?
कर सुधारों का ऐलान करते हुए बड़ी प्रभावी भाषा का इस्तेमाल हुआ है. टैक्स देने वालों की गरिमा बढ़ाने वाली भाषा इस्तेमाल हुई है. करदाताओं को राष्टनिर्माण में बड़ी भूमिका निभाने वाला महत्वपूर्ण व्यक्ति बताया गया है. कहा गया है कि आज से लागू नई व्यवस्था मिनिमम गवर्नमेंट और मैक्सिमम गवर्नेंस वाले वायदे को पूरा करने के लिए है. यानी सरकार या सरकारी अफसरों का दखल कम से कम हो. उसकी बजाए नियम कानून कायदे अच्छे बना दिए जाएं और उन्हें लागू करने का अच्छा इंतजाम कर दिया जाए.

इसके लिए आज लागू की गई नई व्यवस्था में यह आश्वासन है कि करदाताओं को अफसरों का चेहरा नहीं देखना पड़ेगा. यहां तक कि करदाता अपनी आमदनी के जो दस्तावेज पेश करेगा उसकी पड़ताल करने वालों को संबधित करदाता से आमने सामने बात करने की छूट नहीं होगी. यानी एकतरह से हम मानकर चल सकते हैं कि कर निर्धारण के काम में करदाता और अफसरों के बीच जो घूसखोरी की संभावना होती है वह खत्म हो जानी चाहिए. यानी इस व्यवस्था का एलानिया मकसद सरकार के राजस्व में सेंधमारों पर लगाम लगाना ही माना जाना चाहिए. वैसे ईमानदारी से टैक्स देने वालों को पहले भी परेशानी नहीं थी. फिर भ अब उनको यह सुबीता जरूर हो गया है फिजूल में ही परेशान करने के लिए गाहेबगाहे आ जाने वाले अफसरों से उन्हें मुक्ति मिल जाएगा. और इस बात में भी कोई शक नहीं कि कर देने में बेईमानी करने वालों के सामने यह दिक्कत जरूर हो जाएगी कि वे किस अफसर से सौदेबाजी करें.
पारदर्शिता की बात हमेशा से निर्विवाद रही है
नई व्यवस्था को लागू करने के मौके पर पारदर्शिता का बार बार जिक्र किया गया है. कौन नहीं जानता कि पारदर्शिता सौ रोगों की दवा है. कई साल से अनुमान लगाया जा रहा है कि भ्रष्टाचार जैसी लाइलाज बीमारी के इलाज के लिए भी पारदर्शिता कारगर हो सकती है. हालांकि अभी तक ऐसी कोई पुख्ता नजीर तो नहीं है लेकिन यह मानकर चलने में भी कोई हर्ज नहीं है कि पारदर्शिता बढ़ाकर हम भ्रष्टाचार पर लगाम लगा लेंगे.

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चार्टर के सार्वजनिक हो जाने के बाद और यहां तक उसके लागू हो जाने के बाद भी उसके हर नुक्ते की सिलसिलेवार समीक्षा नहीं हो पाई है. दरअसल एक सांस में इसके सारे नुक्तों का जिक्र भी नहीं हो सकता. फिर भी करदाताओं और कर अधिकारियों के लिए अलग अलग से नियम या यों कहें कि उनके लिए परामर्श बनाए गए हैं. परामर्शों की भाषा कड़ी रखने से बचा गया है. खासतौर पर करदाताओं के लिए डरावनी बात कहने से ज्यादा बचा गया है.

मसलन करदाताओं से सरकार ने उम्मीद भर जताई है कि वे ईमानदारी बरतें, टैक्स कानूनों की जानकारी रखें, अपने दस्तावेजों को ठीकठाक रखें, उन्हें परामर्श दिया गया है कि उनकी ओर से जानकारी देने वालों पर नज़र रखें कि उनके प्रतिनिधियों ने सरकार को क्या जानकारी दी, कर संबधी काम समय पर करें, समय पर टैक्स दें. अगर सरसरी तौर पर देखें तो ये सारी वे बातें हैं जो शायद इस चार्टर के लागू होने के पहले भी अपेक्षित ही थीं. फिर भी अगर इन्हें चार्टर के रूप् में दोहराया गया है तो मानकर चलना चाहिए कि सरकारी परामर्श न मानने वालों पर सरकार अब संजीदगी से कार्रवाई किया करेगी.

करदाताओं से वायदे
ये वायदे एक तरह से आयकर अफसरों को हिदायत है. कहा गया है कि आयकर विभाग न्यायपूर्ण तरीके से जल्द काम निपटाया करेगा. करदाताओं को तकनीकी और विशेषज्ञ मदद दिया करेगा. चार्टर के इसी भाग में एक दार्शनिक नुक्ता भी शामिल है. वह ये कि आयकर विभाग सैद्धांतिक रूप से मानकर चलेगा कि आयकरदाता ईमानदार है. जबकि किसी भी अफसर को जांच पड़ताल में देखना यह पड़ता है कि आयकर दाता ने कहीं गड़बड़ी तो नहीं की. यानी अफसर को मानकर चलना पड़ता है कि आयकरदाता की तरफ से चोरी या गड़बड़ी हो सकती है. यानी नए बने चार्टर में इस नुक्ते के निहितार्थ को बाद में गौर से समझा जाना चाहिए.

इस भाग के कुल 12 नुक्तों में छठे नंबर पर करदाताओं को एक भरोसा और साथ ही अफसरों को एक हिदायत है कि आयकर के मामलों में गोपनीयता बरती जाए. यानी अफसर जानकारियों को सार्वजनिक न किया करें. वैसे यह सुझाव तो सरकारें हमेशा ही सभी सरकारी विभागों को देती हैं. लेकिन सरकारी अफसरों के अपने हित जानकारी को उजागर किए बगैर सध नहीं पाते. बहरहाल चार्टर में अगर इसका जिक्र किया गया है तो इसे करदाताओं को निश्चिंत करने के लिए किया गया एक वायदा माना जाना चाहिए.

ये कोई खास बड़ी बात नहीं है कि आयकर विभाग अपने अफसरों को जबावदेह बनाएगा. आयकर विभाग ही क्या, हर विभाग के अफसरों को जवाबदेह होना ही चाहिए. ये बात तो हम पहले से मानते आ रहे हैं. कुलमिलाकर चार्टर में ऐसी कोई बात दिखाई नहीं देती जिसकी आलोचना की जा सके.

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फिर भी चार्टर मौके पर अगर कुछ कहा जा सकता है तो वह ये कि इस समय देश की अर्थव्यवस्था पर संकट आया हुआ है. पहले से चली आ रही व्यवस्थाओं को चलाए रखने के लिए भी सरकारी खजाने में धन की कमी के अंदेशे जताए जा रहे हैं. ऐसे में अगर प्रत्यक्षकर से ज्यादा कर उगाही का कोई तरीका निकाला जाता तो ज्यादा काम की बात होती. हालांकि चार्टर का काम पहले किए एक वायदे को पूरा कर देने तक सीमित था. लिहाज़ा अर्थव्यवस्था को मजबूती देने के लिए सबसे जरूरी यानी राजस्व बढ़ाने के मोर्चे पर आगे अलग से भी सोचा जा सकता है.
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
सुधीर जैन

सुधीर जैन

अपराधशास्त्र और न्यायालिक विज्ञान में उच्च शिक्षा हासिल की. सागर विश्वविद्यालय में पढाया भी. उत्तर भारत के 9 प्रदेश की जेलों में सजायाफ्ता कैदियों पर विशेष शोध किया. मन पत्रकारिता में रम गया तो 27 साल 'जनसत्ता' के संपादकीय विभाग में काम किया. समाज की मूल जरूरतों को समझने के लिए सीएसई की नेशनल फैलोशिप पर चंदेलकालीन तालाबों के जलविज्ञान का शोध अध्ययन भी किया.देश की पहली हिन्दी वीडियो 'कालचक्र' मैगज़ीन के संस्थापक निदेशक, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ क्रिमिनोलॉजी एंड फॉरेंसिक साइंस और सीबीआई एकेडमी के अतिथि व्याख्याता, विभिन्न विषयों पर टीवी पैनल डिबेट. विज्ञान का इतिहास, वैज्ञानिक शोधपद्धति, अकादमिक पत्रकारिता और चुनाव यांत्रिकी में विशेष रुचि.

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First published: August 13, 2020, 8:26 PM IST
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