अर्थव्यवस्था के लिए कुछ और सोचने का वक़्त, किफायत क्यों नहीं हो सकता एक विकल्प?

मंदी का अंदेशा कोरोना से बहुत पहले देखा जा चुका था. पिछले साल यानी जून 2019 में जापान के फुफुओका जी 20 के वित्त मंत्रियों की बैठक में वैश्विक मंदी का एक प्रकार का ऐलान कर दिया गया था.

Source: News18Hindi Last updated on: August 29, 2020, 5:05 PM IST
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अर्थव्यवस्था के लिए कुछ और सोचने का वक़्त, किफायत क्यों नहीं हो सकता एक विकल्प?
कुछ इंडिकेटर्स के मुताबिक, देश की अर्थव्‍यवस्‍था में हो रहा सुधार स्‍थायी नहीं है.
महामारी और उससे उपजी दूसरी समस्याओं के बाद अब अर्थव्यवस्था (Indian Economy) की चिंता बढ़ रही है. वैसे भी हर समस्या के समाधान के लिए धन की जरूरत सबसे पहले पड़ती है. इस समय अर्थव्यवस्था का चक्का घुमाने के लिए भी भारी मात्रा में धन चाहिए. जबकि मौजूदा हालात बता रहे हैं कि टैक्स से सरकार की आमदनी की व्यवस्था खस्ताहाल है. यहां तक कि जीएसटी की नई व्यवस्था में राज्यों को टैक्स के नुकसान की भरपाई का जिम्मा भी केंद्र सरकार (Central Government) ने अपने उपर ले रखा है. राज्यों की माली हालत हद से ज्यादा नाजुक हो चली है. यानी यह मान लेने में संकोच नहीं होना चाहिए कि आने वाला समय ज्यादा मुश्किलों भरा है. हमेशा से ही पूरी दुनिया का अनुभव रहा है कि ऐसे मुश्किल हालात में पहले से बने रखे उपाय काम नहीं आते. नए-नए उपाय सोचना पड़ते हैं. आमतौर पर नए उपाय तलाशने के लिए हर तबके से सलाह मशविरा करने की जरूरत पड़ती है. बहरहाल, मौजूदा माली हालात के कई पहलुओं को गौर से जांचने परखने का समय आ गया है.

सिर्फ कोरोना के मत्थे मढ़ने से कोई फायदा नहीं
भूलना नहीं चाहिए कि मंदी का अंदेशा कोरोना से बहुत पहले देखा जा चुका था. पिछले साल यानी जून 2019 में जापान के फुफुओका G20 (G20 Fukuoka Summit 2019) के वित्त मंत्रियों की बैठक में वैश्विक मंदी (Global Recession) का एक प्रकार का ऐलान कर दिया गया था. इधर अपने देश में कोरोना के पहले की छह तिमाहियों से GDP की दर गिरती चली आ रही थी. बेशक देश में कुछ साल से बढ़ती जा रही आर्थिक सुस्ती को कोरोना अचानक ठप ही कर दिया लेकिन अगर सिर्फ उसे ही मंदी का जिम्मेदार मानेंगे तो आगे के उपाय सोच नहीं पाएंगे. अगर सिर्फ महामारी को कारण मानेंगे तो मंदी की तीव्रता का सही आकलन हो नहीं पाएगा.

कोरोना के पहले किस समस्या से जूझ रही थी अर्थव्यवस्था
इसे लेकर एक विवाद था. सरकारी अर्थशास्त्री मान रहे थे दिक्कत उत्पादन कम होने की है. कई तिमाहियों तक सारा जोर उत्पादन बढ़ाने पर लगा. उत्पादकों को सरकारी मदद दी गई. जबकि ज्यादातर गैर सरकारी अर्थशास्त्री बता रहे थे समस्या बाजार में ग्राहकों की कमी आ जाने की है. इसका कारण यह बताया जा रहा था कि जनता की जेब में पैसा कम पड़ गया है. पिछले साल स्थिति यहां तक पहुंच गई थी कि रोजमर्रा का सामान यानी FMCG  क्षेत्र में बना माल बिकना कम हो गया था. इसीलिए कहा जाने लगा था कि जब तक नागरिकों की जेब में पेसा पहुंचाने का इंतजाम नहीं होगा तब तक माल की मांग उठेगी नहीं. हालांकि सरकारी विशेषज्ञों का तर्क यह था कि आर्थिक गतिविधियों के बढ़ाने से यानी उत्पादन और सार्वजनिक निर्माण खासतौर पर हाईवे बनाने से लोगों को रोजगार मिलेगा यानी उनकी जेब में पैसा पहुंचेगा. इस तरह क्या यह नहीं कहा जा सकता कि हमारी अर्थव्यवस्था, कोरोना के पहले ही एक दुविधा से जूझ रही थी.

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मंदी से निकलने के लिए अब क्या हैं विकल्पसरकारी अर्थशास्त्रयों और आर्थिक प्रशासकों की तरफ से जो भी कहा या किया जा रहा है वह आज भी किसी तरह से उत्पादक गतिविधियों को बढ़ाने वाला ही दिख रहा है. बेशक इसके लिए उद्योग और व्यापार जगत को ज्यादा से ज्यादा कर्ज मुहैया कराने का पारंपरिक उपाय आजमाया जाता दिख रहा है. उधर सरकार की तरफ से रोजगार बढ़ाने वाली या नागरिकों की जेब तक पैसा पहुंचाने के लिए भी उन्ही उत्पादक गतिविधियों का आसरा है. इसके अलावा किसानों और गरीब महिलाओं की जेब में सीधे मदद भेजने की जितनी भी योजनाएं बनाई गईं वे सीमित आकार की हैं. इतनी सीमित कि 138 करोड़ आबादी वाले देश में एक डेढ़ लाख करोड़ की सीधी मदद से अर्थव्यवस्था मे हिलन डुलन की उम्मीद भी नहीं लगाई जा सकती. अलबत्ता भारी संकट के दौर में फौरी राहत के लिए इस रकम को फिजूल कोई भी नहीं बता सकता. मुश्किल दौर में जो कुछ भी किया जाता है उसे ही बहुत माना जाता है. लेकिन इस तरह के उपाय को सरकारी विशेषज्ञ भी नहीं मान सकते कि इससे कई तिमाहियों की भयावह मंदी से निपटा जा सकता है. और वैसी हालत में तो बिल्कुल भी नहीं जब सरकारी खजाने की हालत भी हद से ज्यादा पतली होती जा रही हो. याद रखना चाहिए कि सिर्फ जीएसटी से ही सरकारी आमदनी को दो लाख 35 हजार करोड़ के नुकसान का अंदाजा लगाया जा चुका है.

अगली दो तिमाहियों तक भी नहीं है उम्मीद
अर्थव्यवस्था और कोरोना के दोहरे संकट से जल्द निजात मिलने के कहीं से कोई आसार नज़र नहीं आ रहे हैं. कुछ घंटे पहले ही रायटर का सर्वे आया है कि इस वित्तवर्ष में मंदी से निजात की उम्मीद छोड़ दी जानी चाहिए. अब अगर अगले छह महीने तक भी हालात संभलने की उम्मीद नहीं लगाई जा रही हो तो संकट की गंभीरता को समझ जाना चाहिए. ऐसे में आर्थिक वृद्धि की बात तो भूल ही जाना चाहिए बल्कि हकीकत यह बन गई है कि कुछ तिमाहियों से अर्थव्यवस्था में 15 से 20 फीसद सिकुड़न के अंदाजे़ लग रहे हैं. निकट भविष्य में सुधार की संभावनाएं भी नहीं बन रही हैं.

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इस बीच क्या करते दिख रहे हैं हम
अर्थव्यवस्था को संभालने रखने के लिए हम अभी भी बाजार में कर्ज बढ़ाते दिख रहे हैं. बेशक बाजार में पैसा आर्थिक गतिविधिया बढ़ाता है. लेकिन मौजूदा दुविधापूर्ण स्थितियों में ऐसा होना बिल्कुल निश्चित नहीं माना जा सकता. क्योंकि मौजूदा हालात बाजार में पैसे की कमी के नहीं बल्कि उपभोक्ताओं की माली हालत कमजोर पड़ जाने के हैं. और अगर कर्ज के सहारे अर्थव्यवस्था संभालने का पारंपरिक उपाय अपनाया जाता है तो पारंपरिक ज्ञान के मुताबिक यह भी तय है कि महंगाई काबू में नहीं रह पाएगी. लिहाज़ा जो अर्थशास्त्री इन नियमों को जानते समझते हैं उन्हें बताते रहना चाहिए कि देश के कुल अर्थव्यवस्था और कुल कर्ज का अनुपात किस तरह से बराबरा होता चला जा रहा है. यानी समष्टिभाजी अर्थशास्त्र के लिहाज से सोचकर कुछ करने की गुंजाइश दिन पर दिन कम होती जा रही है. समय सूक्ष्मभाजी अर्थशास्त्र पर ध्यान लगाने का जान पड़ रहा है. खासतौर पर नागरिकों के तात्कालिक संकट को सामने रखकर नया सोचने की जरूरत है. हर समय इस नियम को याद करते रहने का है कि ज्यादा कर्ज बांटना महंगाई बढ़ाता है.

उपभोक्ता पर दोहरे संकट का अंदेशा
इधर बेरोजगारी और उधर महंगाई बढ़ी तो विशेषज्ञों को यह भी सोचकर रख लेना चाहिए कि मध्यवर्ग और उसके नीचे के सारे तबके भारी मुश्किल में नज़र आएंगे. इससे औद्योगिक उत्पाद की खपत घटेगी. जाहिर है कि उत्पाद की खपत नहीं बढ़ने से देश के सकल घरेलू उत्पाद का पूरा हिसाब ही गड़बड़ा सकता है. अर्थशास्त्री अच्छी तरह जानते हैं कि मंदी को तोड़ना कितना मुश्किल होता है. कई बार तो सिर्फ इंतजार करते रहने के अलावा कोई चारा नहीं बचता.

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फौरी तौर पर क्या हो सकता है विकल्प
मौजूदा हालात अगर वाकई मंदी के ही हों, और सरकार कर्ज का बोझ उठाने की अपनी हैसियत पहले ही इस्तेमाल कर चुकी हो, तब एक ही चारा बचता है कि किफायत पर उतर आया जाएं. मुश्किल दौर में किफायत का तरीका सबसे सुरक्षित माना जाता है. वैसे भी कहावत है कि मनी सेव्ड इज़ मनी अन्र्ड यानी व्यक्ति जितनी बचत करता है उसे उसकी आमदनी ही माना जाता है. हालांकि अर्थशास्त्रियों की ऐसी बातें बिल्कुल अच्छी नहीं लगतीं. लेकिन लोकतांत्रिक सरकारों का काम आखिरकार जनता का हित ही है. यह समय पूंजी के निर्माण के लिए कतई मुफीद नहीं दिख रहा है. आने वाले छह महीने या साल दो साल अगर किफायत से गुजार लें तो आगे आर्थिक विकास करने के मौके खत्म नहीं हो जाएंगे.
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
सुधीर जैन

सुधीर जैन

अपराधशास्त्र और न्यायालिक विज्ञान में उच्च शिक्षा हासिल की. सागर विश्वविद्यालय में पढाया भी. उत्तर भारत के 9 प्रदेश की जेलों में सजायाफ्ता कैदियों पर विशेष शोध किया. मन पत्रकारिता में रम गया तो 27 साल 'जनसत्ता' के संपादकीय विभाग में काम किया. समाज की मूल जरूरतों को समझने के लिए सीएसई की नेशनल फैलोशिप पर चंदेलकालीन तालाबों के जलविज्ञान का शोध अध्ययन भी किया.देश की पहली हिन्दी वीडियो 'कालचक्र' मैगज़ीन के संस्थापक निदेशक, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ क्रिमिनोलॉजी एंड फॉरेंसिक साइंस और सीबीआई एकेडमी के अतिथि व्याख्याता, विभिन्न विषयों पर टीवी पैनल डिबेट. विज्ञान का इतिहास, वैज्ञानिक शोधपद्धति, अकादमिक पत्रकारिता और चुनाव यांत्रिकी में विशेष रुचि.

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First published: August 29, 2020, 5:03 PM IST
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