Opinion: शिक्षा व्यवस्था का रूपरंग बदलने का इरादा

मंत्रिमंडल से नई शिक्षा नीति को मंजूरी मिलने के बाद हुईं चर्चाओं को देखें तो सबसे ज्यादा बात प्राथमिक शिक्षा भारतीय या क्षेत्रीय भाषा में देने की हुई है. इस लिहाज़ से नई शिक्षा नीति में भाषाई अस्मिता को एक लक्ष्य के रूप में देखा जा सकता है.

Source: News18Hindi Last updated on: July 31, 2020, 1:58 PM IST
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Opinion: शिक्षा व्यवस्था का रूपरंग बदलने का इरादा
नई शिक्षा नीति में तमाम तरह के बदलाव किए गए हैं.
34 साल बाद अब नई शिक्षा नीति बना ली गई है. अभी इसे केंद्रीय मंत्रिमंडल ने मंजूरी दी है. मौजूदा सरकार लगातार पांच साल से शिक्षा व्यवस्था बदलने की बात कह रही थी. हालांकि गुज़रे 34 साल में पुरानी वाली नई शिक्षा नीति में भी फुटकर फुटकर कई बदलाव हुए थे. लेकिन अब थोक में बदलाव हुए हैं. लिहाजा देखने में यही लगता है कि शिक्षा नीति में आमूल चूल परिवर्तन का इरादा बनाया गया है.

पुरानी वाली यानी साल 1986 की शिक्षा नीति की तारीफ में एक बात कही जाती थी कि उसे तय करने में बहुत बड़ी संख्या में नागरिकों की भागीदारी थी. यानी 1986 की नीति को जन आकांक्षा के अनुरूप बनाया गया था. इस बार की नीति के बारे में भी ऐसा ही दावा किया जा रहा है. यानी नई शिक्षा नीति की कमियां देखने की गुंजाइश बचती नहीं है. वैसे भी उस हर नीति को सर्वोत्तम माना जाता है जिसमें ज्यादा से ज्यादा लोगों की भागीदारी हो यानी ज्यादा से ज्यादा लोगों से रायमशविरा किया गया हो.

तीन दशक में हालात बहुत बदले
साल 1986 की नई शिक्षा नीति को 34 साल गुजर चुके थे. इतने लंबे अंतराल में तमाम चीज़ें बदल गईं. हालात बदल गए और जीवन के प्रति नज़रिया बदल गया, वैश्वीकरण का दौर चला, पूरी दुनिया एकगांव हो गई. जाहिर है ऐसे में शिक्षा नीति में बदलाव समय की मांग थी.
क्या कोई नया लक्ष्य बना है?
हर नीति का एक विशिष्ट लक्ष्य जरूर होता है. नई नीति में भी वह लक्ष्य तलाशा जाना चाहिए. अगर मंत्रिमंडल से नई शिक्षा नीति को मंजूरी मिलने के बाद हुईं चर्चाओं को देखें तो सबसे ज्यादा बात प्राथमिक शिक्षा भारतीय या क्षेत्रीय भाषा में देने की हुई है. इस लिहाज़ से नई शिक्षा नीति में भाषाई अस्मिता को एक लक्ष्य के रूप में देखा जा सकता है. अब ये अलग बात है कि विविध भाषाओं वाले देश में शिक्षा के लिए किसी एक भाषा का ऐलान करना राजनीतिक तौर पर बहुत कठिन होता है. फिर भी नई नीति में प्राथमिक स्तर की पढ़ाई में अंग्रेजी को बेदखल करने का इरादा साफ है.

शिक्षा पर खर्च बढ़ाने पर जोरदूसरी खास बात शिक्षा पर खर्च बढ़ाने की है. यह इस मायने में खास है कि इससे नई शिक्षा नीति के तमाम ऐलान खुद ब खुद संभल जाएंगे. अभी तक क्रियान्वयन के स्तर पर जो दिक्कत आती थी, वह पैसे की कमी की ही थी. हो यह रहा था कि शिक्षा के आधारभूत ढांचे की सार संभाल में ही सारा धन खर्च हो जाता था. नया जोड़ने की गुंजाइश ही नहीं बचती थी. कहने में संकोच नहीं होना चाहिए कि कुछ साल से देश में शिक्षा का निजीकरण या व्यापारीकरण होते जाने का एक बड़ा कारण शिक्षा पर सरकारी खर्च का कम होना ही माना जाता रहा है. यानी नई शिक्षा नीति में अगर यह साफ साफ कहा गया है कि शिक्षा पर जीडीपी की छह फीसद रकम जरूर खर्च की जाएगी तो यह छोटा ऐलान कतई नहीं है. ये बात अलग है कि सालाना बजट में से हर साल शिक्षा के लिए जीडीपी का छह फीसद धन निकालना आसान नहीं. कई साल से शिक्षा पर खर्च एक फीसद से भी कम है. इसीलिए शिक्षा पर खर्च अचानक छह गुना बढ़ाने की नीति सनसनीखेज खबर से कम नहीं है.

बाकी सब बातें प्रयोग ही मानी जाएंगी
नई नीति में बदलावों की सूची बहुत लंबी है. इसी आधार पर इसे शिक्षा में आमूलचूल परिवर्तन का इरादा बताया गया है. गौर से देखें तो ज्यादातर बदलाव व्यवस्थाओं के रूप बदलने तक सीमित हैं. किसी दार्शनिक बदलाव के लक्षण नहीं दिख रहे हैं. बहरहाल, चाहे प्राइमरी और सेकेंडरी शिक्षा में 5,3,3,4 वाली व्यवस्था हो और चाहे स्नातक स्तर पर चार साल के कोर्स की नई व्यवस्था हो, ऐसे बदलावों के असर का अंदाजा अभी नहीं किया जा सकता. हालांकि चार साल के स्नातक कोर्स वाली व्यवस्था कुछ देशों में पहले से चालू है लेकिन अचानक इस बदलाव से अपने देश की शिक्षा की गुणवत्ता पर क्या असर पड़ेगा? इसका पूर्वानुमान गंभीर समीक्षाओं के बाद ही हो पाएगा. अभी सिर्फ इतना कहा जा सकता है कि जो नई व्यवस्थाएं, संस्थाएं या प्रतिष्ठान बनाए जा रहे हैं उनके ऐलान कर देने भर से काम पूरा हुआ न माना जाए. क्योंकि अब तक का अनुभव यही है कि समस्या नीतियों के अच्छे या बुरे होने की नहीं बल्कि अड़चन उनके क्रियान्वयन में ही आती है.

महामारी का दौर शामिल नहीं दिखा
इस समय देश महामारी की आपदा के दौर में है. इतनी बड़ी आपदा सदियों में कभी-कभी ही आती है. मान लिया जाना चाहिए कि इस आपदा से निपटने में हम अपनी बेचारगी महसूस कर रहे हैं. कोरोना को लेकर अपने ज्ञान विज्ञान की कमी को कबूल किया जा चुका है. हम ही नहीं पूरी दुनिया इसे कबूल कर रही है. लिहाजा कितना अच्छा होता अगर प्राथमिक स्तर पर भाषा और व्यावसायिक शिक्षा पर जोर दिए जाने जितना ही महत्व ज्ञान के सृजन यानी रिसर्च को भी मिल जाता. हालांकि ऐसा नहीं है कि नई नीति में उच्च शिक्षा और शोध संस्थानों की बिल्कुल ही अनदेखी की गई हो. बल्कि शोध को बढ़ावा देने का काम तो स्नातक पाठ्यक्रम के साथ ही जोड़ दिया गया है. लेकिन उच्चस्तरीय शोध की उम्मीद परास्नातक स्तर के बाद ही लगाई जाती है. और इसीलिए कुछ साल से विज्ञान के क्षेत्र में गुणवत्तापूर्ण शोध को बढ़ावा देने की काफी गुंजाइश बाकी दिखाई दे रही है. लेकिन ज्यादा अफसोस की बात नहीं है क्योंकि ये काम शिक्षा नीति के एलान के बाद भी किया जा सकता है.बहरहाल, नई शिक्षा नीति का प्रारूप ऐसा बनाया गया है ताकि कोई बेझिझक और खुलकर आलोचना कर ही न पाए और सरकार ने अपने बहुप्रचारित इरादे भी पूरे कर लिए हैं.
ब्लॉगर के बारे में
सुधीर जैन

सुधीर जैन

अपराधशास्त्र और न्यायालिक विज्ञान में उच्च शिक्षा हासिल की. सागर विश्वविद्यालय में पढाया भी. उत्तर भारत के 9 प्रदेश की जेलों में सजायाफ्ता कैदियों पर विशेष शोध किया. मन पत्रकारिता में रम गया तो 27 साल 'जनसत्ता' के संपादकीय विभाग में काम किया. समाज की मूल जरूरतों को समझने के लिए सीएसई की नेशनल फैलोशिप पर चंदेलकालीन तालाबों के जलविज्ञान का शोध अध्ययन भी किया.देश की पहली हिन्दी वीडियो 'कालचक्र' मैगज़ीन के संस्थापक निदेशक, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ क्रिमिनोलॉजी एंड फॉरेंसिक साइंस और सीबीआई एकेडमी के अतिथि व्याख्याता, विभिन्न विषयों पर टीवी पैनल डिबेट. विज्ञान का इतिहास, वैज्ञानिक शोधपद्धति, अकादमिक पत्रकारिता और चुनाव यांत्रिकी में विशेष रुचि.

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First published: July 31, 2020, 1:28 PM IST
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