प्रतिदिन 29 हजार कोरोना संक्रमितों को कम मानना ठीक नहीं

आज अगर प्रतिदिन संक्रमितों का स्तर 29 हजार पर आ गया है तो पहले की भयावह स्थिति के मुकाबले एक राहत जरूर महसूस की जा सकती है. लेकिन इस स्तर को कम से कम दो तीन हफ्ते जरूर देखा जाना चाहिए. और तभी कुछ राहत मानना चाहिए.

Source: News18Hindi Last updated on: November 17, 2020, 9:03 PM IST
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प्रतिदिन 29 हजार कोरोना संक्रमितों को कम मानना ठीक नहीं
दिल्ली में कोरोना वायरस के बढ़ते मामलों को देखते हुए केजरीवाल सरकार ने सख्त कदम उठाने शुरू कर दिए हैं. दिल्ली में अब मास्क नहीं पहनने पर भारी जुर्माना भरना होगा. सड़क पर बिना मास्क पहने घूमने पर 2000 रुपये का जुर्माना लगाया जाएगा जबकि पहले ये जुर्माना 500 रुपये थे, जिसे अब 4 गुना बढ़ा दिया गया है.
प्रतिदिन कोरोना संक्रमितों के बढ़ने का आंकड़ा थोड़ा और घटकर बुधवार को 29 हजार हो गया है. संक्रमण बढ़ने का ये वह स्तर है जो इसी साल 12 जुलाई को भी था. हमें भूलना नहीं चाहिए कि जुलाई के उस रोज़ प्रतिदिन इतने ही संक्रमितों के बढ़ने से हाहाकार मचा हुआ था. यानी इस समय कोरोना को लेकर निश्चिंत होने का कारण अभी बना नहीं है. हमें भूलना यह भी नहीं चाहिए कि कोरोना संक्रामक रोग है. घोषित रूप से यह वैश्विक महामारी है. हर देश में मृत्यु के भय से जो सावधानियां बरती जा रही थीं वे अभी भी बरतने की जरूरत है. अलबत्ता अपने देश में हालफिलहाल कोरोना के फैलाव में अगर कुछ कमी आई है तो यह विश्वास जरूर बढ़ जाना चाहिए कि बचाव के उपायों का असर पड़ता है. लेकिन यह अभी निश्चिंतता के लिए काफी नहीं है. बचाव का अभियान और तेज करने की जरूरत है.

भारी पड़ सकती है निश्चिंतता
दुनिया के कमोबेश सभी देशों के प्रतिदिन के आंकड़ों के ग्राफ को देखें तो एक बात साफ दिखाई देती है कि तीन चार दिन तक तो प्रतिदिन के आंकड़ों में कमी दिखाई देती है और फिर अगले तीन चार दिन बढ़त होती दिखती है. वैश्विक स्तर पर अब तक ऐसा कोई हफ्ता नहीं गुजरा जब प्रतिदिन कोरोना संक्रमितों का आंकड़ा बढ़ा न हो. इसीलिए संक्रमण के कम या बढ़ने का अंदाजा कम से एक पखवाड़े के औसत से लगाए जाने में ही समझदारी है. मसलन अमेरिका में पिछले दो महीने से प्रतिदिन आंकड़ों में इतना उतार चढ़ाव रहा कि अंदाजा लगाना मुश्किल हो गया कि वहां वास्तविक स्थिति है क्या? इसी तरह अपने देश में जब हम प्रतिदिन लगभग एक लाख संक्रमितों को बढ़ते देख रहे थे तब पता ही नहीं चला कि सामान्य स्थितियां बताए जाने के बावजूद उतनी भयावह स्थिति बन क्यों गई थी? बहरहाल, आज अगर प्रतिदिन संक्रमितों का स्तर 29 हजार पर आ गया है तो पहले की भयावह स्थिति के मुकाबले एक राहत जरूर महसूस की जा सकती है. लेकिन इस स्तर को कम से कम दो तीन हफ्ते जरूर देखा जाना चाहिए. और तभी कुछ राहत मानना चाहिए.

याद रहे कि ये पहली ही लहर है
इस महामारी से बुरी तरह जूझते हुए दुनिया को दस महीने हो गए हैं. दो सौ से ज्यादा देशों का अनुभव यह है कि अगर तमाम उपायों के बाद कोरोना संक्रमण कुछ हफ्तों के लिए कम भी होता है तो निश्चिंत हो जाने से कुछ दिनों बाद फिर बढ़ने लगता है. इसीलिए कई देशों में इस समय संक्रमण की तीसरी लहर चल रही है. जबकि पहली लहर उतरने के बाद वे निश्चिंत हो रहे थे और सावधानियां कम बरतने लगे थे. खासतौर पर यूरोप के कई देशों में पहली लहर में संक्रमण का चरमावस्था का आंकड़ा चार से छह हजार प्रतिदिन के बीच था. दूसरी लहर की चरमावस्था में वह बढ़कर 10 से 15 हजार प्रतिदिन पहुंच गया था. और तीसरी लहर में इस समय उन देशों में 20 से 30 हजार संक्रमित रोज बढ़ रहे हैं. इस समय उन सभी देशों में हाहाकार मचा हुआ है. इससे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है दुनिया में कोरोना का प्रकोप कम नहीं बल्कि बढ़त पर है. पूरी दुनिया के ग्राफ पर गौर किया जाना चाहिए. इस ग्राफ में नज़र आता है पिछले दस महीनों में कोई हफ्ता नहीं गुज़रा जब प्रतिदिन संक्रमितों की संख्या कम हुई हो. फर्क अलग अलग देशों में उतार चढ़ाव में ही दिखा. न्यूज़ीलेंड जैसे कुछ ही देश हैं जिन्होंने अपने यहां कोरोना के फैलाव को काबू में रख पाया है. यह ठीक बात नहीं है कि कई देश अपने अलावा किसी और देश के अच्छे प्रदर्शन की चर्चा करने से बच रहे हैं. ऐसे में कम से कम विश्व स्वास्थ्य संस्था डब्ल्यूएचओ को अच्छा प्रदर्शन करने वाले देशों की चर्चा करनी चाहिए ताकि दूसरे देश सबक ले सकें.

बिना वैक्सीन के निश्चिंत होना बिल्कुल ठीक नहीं
कुछ पखवाड़ों के अंतराल से कोरोना वैक्सीन की चर्चा हो जरूर जाती है लेकिन अब तक कहीं से कोई पुख्ता खबर नहीं है कि वैक्सीन कब तक उपलब्ध हो पाएगी. दुनिया में बन रही हर वैक्सीन अभी भी परीक्षण के स्तर पर ही है. हाल ही में फाइज़र की वैक्सीन चर्चा में लाई जरूर गई है लेकिन उसके साथ यह शर्त दिख रही है कि उसे इस्तेमाल करने के पहले सुरक्षित रखने में भारी झंझट है. खासतौर पर गैरसंपन्न देशों में स्वास्थ्य सेवाओं का वैसा आधारभूत ढ़ांचा ही नहीं है कि वे देश के अंदरूरी हिस्सों तक वैक्सीन पहुंचा सकें. वैक्सीन को बर्फीली ठंडक में रखने के लिए कोल्ड चेन न होना बड़ी बड़ी चुनौती नज़र आ रही है. अगर यह हकीकत पता चल चुकी है तो क्या माली तौर पर कमजोर देशों को अभी से तैयारियों में नहीं लग जाना चाहिए? हमें खुद को उन्ही देशों में शामिल मानना चाहिए.अर्थव्यवस्था का पहिया रोक कर रखने की झंझट
वैश्विक स्तर पर यह साफ हो चुका है कोरोना से बचाव के तात्कालिक उपाय देर तक चालू रखना संभव नहीं है. नागरिकों के बीच शारीरिक दूरी बनाए रखने का उपाय कमजोर पड़ता जा रहा है. अमेरिका और यूरोप के कई मालदार देश तक अपनी अर्थव्यवस्थाओं को संभालने की चिंता में डूबे जा रहे हैं. जाहिर है कोरोना से बचाव के जो खर्चीले उपाय किए जा रहे हैं वे ज्यादा समय तक चालू नहीं रखे जा सकते. उसके बाद कोरोना की नई नई लहरों का अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है.

टेस्टिंग बढ़ाने का अच्छा मौका
दो महीने पहले अपने देश में जब प्रतिदिन संक्रमितों का आंकड़ा 97 हजार पार कर गया था. उस समय जरूरत के मुताबिक प्रतिदिन कोरोना परीक्षणों का आंकड़ा बहुत कम दिखने लगा था. एक मानदंड के मुताबिक 20 लाख परीक्षण की जरूरत थी लेकिन अपनी माली हालत को ध्यान में रखते हुए वह स्तर बनाने में दिक्कत आने लगी थी. लेकिन अब जब प्रतिदिन संक्रमितों का आंकड़ा उतरकर 29 हजार आ गया है तब परीक्षणों पर जोर लगाकर ज्यादा से ज्यादा परीक्षण करके संक्रमण को काबू करना आसान माना जा सकता है. लेकिन गौर करने की बात यह है कि परीक्षणों की संख्या पहले से कम होती जा रही है. मंगलवार को जारी आंकड़े के मुताबिक पिछले 24 घंटे में सिर्फ 8 लाख 44 हजार 324 परीक्षण हुए हैं. जबकि एक महीने पहले यह संख्या 13 लाख तक पहुंचा ली गई थी. यानी देश में उतने परीक्षणों की क्षमता बना ली गई थी. अगर उसी स्तर को कायम रखा जा सके तो आज संक्रमण को और कम करना आसान हो सकता है. ये वही समय है जब हम कोरोना की दूसरी लहर के अंदेशे को कम कर सकते हैं. याद दिलाया जा सकता है कि आज अगर 15 लाख टैस्ट प्रतिदिन हो रहे होते तो देश में कोरोना पाॅजीटिविटी रेट घटकर सिर्फ दो फीसद आ गया होता जो किसी देश के लिए कोरोना को काबू में करने के लिए बहुत बड़ा लक्षण साबित किया जा सकता था. जबकि इस समय प्रतिदिन 29 हजार मरीज़ और प्रतिदिन आठ लाख 44 हजार परीक्षण के लिहाज से पाॅजीटिविटी रेट तीन फीसद से ज्यादा ही बैठ रहा है.

गौर किया जाना चाहिए कि प्रतिदिन संक्रमितों के आंकड़े उतने ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं होते. उससे ज्यादा महत्वपूर्ण पाजीटिविटी रेट है जिससे पता चलता है कि प्रति सैकड़ा परीक्षणों में कितने संक्रिमितों का पता चल रहा है. ध्यान रखने की दूसरी बात यह भी है कि देश के स्वास्थ्य प्रशासक, वायरस के परीक्षण और एंटीबाॅडी के परीक्षणों की संख्या को मिलाकर ही कुल परीक्षण बता रहे हैं. आसानी से अनुमान लगाया जा सकता है कि कोरोना वायरस के वास्तविक परीक्षणों की संख्या कुल परीक्षणों में काफी कम होगी. यानी अभी सही सही अंदाजा नहीं लगाया जा सकता कि देश में वास्तविक पाॅजीटिविटी रेट है कितनी? लेकिन इतना तय है कि यह रेट निकलेगी ज्यादा ही. यानी 29 हजार के आंकड़े को देखकर निश्चिंत होना खतरे से खाली नहीं है.
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
सुधीर जैन

सुधीर जैन

अपराधशास्त्र और न्यायालिक विज्ञान में उच्च शिक्षा हासिल की. सागर विश्वविद्यालय में पढाया भी. उत्तर भारत के 9 प्रदेश की जेलों में सजायाफ्ता कैदियों पर विशेष शोध किया. मन पत्रकारिता में रम गया तो 27 साल 'जनसत्ता' के संपादकीय विभाग में काम किया. समाज की मूल जरूरतों को समझने के लिए सीएसई की नेशनल फैलोशिप पर चंदेलकालीन तालाबों के जलविज्ञान का शोध अध्ययन भी किया.देश की पहली हिन्दी वीडियो 'कालचक्र' मैगज़ीन के संस्थापक निदेशक, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ क्रिमिनोलॉजी एंड फॉरेंसिक साइंस और सीबीआई एकेडमी के अतिथि व्याख्याता, विभिन्न विषयों पर टीवी पैनल डिबेट. विज्ञान का इतिहास, वैज्ञानिक शोधपद्धति, अकादमिक पत्रकारिता और चुनाव यांत्रिकी में विशेष रुचि.

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First published: November 17, 2020, 9:03 PM IST
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