OPINION: बाढ़ के दिनों में ही कर लें सूखे पर बात

पिछले कई साल का रुख देखें तो इस साल भी छह आठ महीने बाद देश में कई जगह सूखा (Drought) पड़ेगा. लगभग हर साल बड़े इलाके में सूखे जैसे हालात बनते हैं. तब देश भर में बूंद बूंद पानी बचाने और किफायत से पानी खर्च करने के नारे (Slogans) बनाए जाते हैं.

Source: News18Hindi Last updated on: July 6, 2020, 9:05 PM IST
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OPINION: बाढ़ के दिनों में ही कर लें सूखे पर बात
देश में सूखे की बात करने का सही समय (सांकेतिक फोटो)
अभी ढंग से बारिश शुरू भी नहीं हुई, लेकिन बाढ़ (Flood) और जल भराव (Water logging) की खबरें चालू हो गईं. यानी सोच लेना चाहिए कि बीच जुलाई से जब भरी पूरी बारिश (Rain) होगी तब क्या हालत बनेगी. हालांकि अब बाढ़ की रोकथाम (flood prevention) के लिए कुछ किया नहीं जा सकता. रोकथाम का वक्त बीत चुका है. अब बस बाढ़ प्रभावितों को राहत (relief) और जल भराव वाली जगहों से पानी निकालने की मशक्कत करते हुए दिखने का काम बचा है.

हालांकि एक बात याद करने का मौका जरूर है कि हर साल सूखे (Drought) के दौरान भी सूखा राहत (Drought Relief) वगैरह की कवायद इसी तरह से की जाती है. देश में उसी साल बाढ़ (Flood) और उसी साल सूखा पड़ने पर क्या हैरत नहीं होना चाहिए?

देश में सूखे पर बात करने का सही समय
लगता है संकटों से निपटने के लिए हमारा रवैया तदर्थ बनता जा रहा है. लेकिन आग लगे पर कुआ नहीं खोदा जाता. पिछले कई साल का रुख देखें तो इस साल भी छह आठ महीने बाद देश में कई जगह सूखा पड़ेगा. लगभग हर साल बड़े इलाके में सूखे जैसे हालात बनते हैं. तब देश भर में बूंद बूंद पानी बचाने और किफायत से पानी खर्च करने के नारे बनाए जाते हैं. कुछ साल से तो स्कूली बच्चों के हाथों में तख्तियां पकड़ा कर रैलियां निकाली जाती हैं कि पानी कम है सो पानी कम खर्च कीजिए. पानी की कमी वाले दिनों में स्वयंसेवी संस्थाएं भी जल जागरूकता अभियानों में लगाई जाती हैं. उस समय शायद ही याद दिलाया जाता हो कि जल संकट के आठ महीने पहले ही देश बाढ़ यानी चारों तरफ पानी ही पानी के संकट से जूझा था. यानी क्या इस बार मानसून के दिनों में ही यह सबसे अच्छा मौका नहीं है कि हम एक नज़र इस बात पर डाल लें कि आखिर हमें हर साल बारिश से पानी मिलता कितना है? और उसमें से कितना पानी बाकी आठ महीनों के लिए हम रोककर रखते हैं.
अच्छी खासी बारिश होती है देश में
पूरी दुनिया में जितनी जमीन है उसमें हमारे देश का क्षेत्रफल लगभग ढाई फीसद है. उस लिहाज से पूरी दुनिया में कुल जितना पानी गिरता है उसका ढाई फीसद पानी ही हमें खुद के लिए पर्याप्त मानना चााहिए. लेकिन हमें प्रकृति की बड़ी देन है कि दुनिया में कुल बारिश का चार फीसद पानी अपनी देश की धरती पर बरसता है. इस तरह से दूसरे देशों के मुकाबले हमें सालाना औसतन डेढ़ गुना पानी मिलता है. यानी यह कहना बेकार की बात है देश कुदरती तौर पर पानी के संकट में है. गौर से देखेंगे तो सारी झंझट जल कुप्रबंधन की निकलेगी.

आबादी ने तंगी में जरूर डाला, लेकिन अभी उतना नहींअंतरराष्ट्रीय पैमाने पर देखें तो पृथ्वी पर हर नागरिक के लिए साल में कम से कम दो हजार घनमीटर पानी की जरूरत होती है. जब देश आज़ाद हुआ था उस समय हमारी जितनी आबादी थी उस हिसाब से प्रतिव्यक्ति पांच हजार घनमीटर पानी उपलब्ध था. आज हमारी आबादी चार गुना हो गई. यानी सरल गणित के हिसाब से इस समय प्रति व्यक्ति प्रतिवर्ष सिर्फ 1250 घनमीटर पानी ही उपलब्ध है. इस लिहाज से न्यूनतम आवश्यकता के पैमाने पर देश में पानी की कमी पर बहस नहीं हो सकती. लेकिन आज प्रतिव्यक्ति जितना भी पानी उपलब्ध है उसका प्रबंधन हम किस तरह कर रहे हैं? इसे भी देख लेना चाहिए. क्या मानसून के इन दिनों में सभी को नहीं दिख रहा है कि बारिश का ज्यादातर पानी बाढ़ की तबाही मचाता हुआ वापस समुद्र में जा रहा है. और उसके बाद हर साल हम सूखे का भी रोना रोते हैं.

क्या है पानी का गणित
हर साल भारत की धरती पर औसतन चार हजार अरब घनमीटर पानी गिरता है. हालांकि जल प्रबंधन के काम पर लगे हजारों अफसर और जल विज्ञानी मानते हैं कि देश में बरसे कुल पानी में कमोबेश 1800 अरब धनमीटर पानी ही उपलब्ध है. यहां तक तो ठीक है. लेकिन विशेषज्ञों ने इस आंकड़े के साथ भी किंतु परंतु लगा रखे हैं. सरकारी आंकड़े बताते हैं कि हर साल 1800 अरब घनमीटर पानी उपलब्ध जरूर है लेकिन इसमें से कमोबेश 1100 अरब घनमीटर पानी ही इस्तेमाल में लाया जा सकता है. इस आंकड़े को सरकारी भाषा में यूटीलाइजेबल वाॅटर कहा जाता है. बात यहीं खत्म नहीं हो जाती. सनसनीखेज बात यह है कि हमारे पास सरकारी इंतजाम नहीं है कि इस पूरे पानी को आगे के दिनों के लिए रोककर रख लें. इस बात पर आगे गौर करेंगे कि इस समय हमारी हैसियत कितना पानी रोककर रखने की है. गौर से देखेंगे तो यह भी पता चलेगा कि जल भंडारण के मामले में भी अभीतक कुदरत ही हालात को संभाले है.

भूजल पर निर्भरता
भला हो प्रकृति का कि बारिश के दिनों में पानी का एक हिस्सा धरती सोखकर रख लेती है. सरकारी हिसाब में भूजल को देश में इस्तेमाल के लिए उपलब्ध 1100 अरब घनमीटर में ही शामिल किया गया है. क्योंकि बारिश के पानी से ही भूजल का पुनर्भरण या रिचार्ज होता है. अब ये अलग बात है कि हर साल बारिश से जितना भूजल रिचार्ज होता है उससे ज्यादा पानी हम धरती से उलीच रहे हैं. इसीलिए भूजल स्तर साल दर साल नीचे चला जा रहा है. यह हद से बड़ा संकट है. क्योंकि जल कुप्रबंधन के कारण देश के जरूरतमंद लोग अपनी निर्भरता भूजल पर बढ़ाते चले जाने को मजबूर हैं. कहते हैं इस समय देश में तरह तरह से इस्तेमाल हो रहे पानी का 68 फीसद यानी दो तिहाई जल की पूर्ति इसी भूजल पर निर्भर है. आलम यह है कि लोग अपने ट्यूबवेल, बोरवेल, हैंडपंप और कुंए साल दर साल और ज्यादा गहरे करवाने को मजबूर हो गए हैं. खासतौर पर देश में आधी से ज्यादा जमीन पर खेती बारिश पर ही निर्मर है. यानी आधे से ज्यादा किसानों को नहरों से पानी देने का इंतजाम अभी भी नहीं हो पाया. और इसलिए नहीं हो पाया कि उतने पानी के लिए हम बांध या जलाशय नहीं बना पाए.

सतही जल सिर्फ 700 अरब घनमीटर
एकबार फिर दोहरा लें कि स्रकारी गणित के हिसाब से देश को हर साल प्रकृति से 4000 अरब घनमीटर पानी मिलता है. लेकिन सरकारी दावे के मुताबिक इस्तेमाल के लिए उपलब्ध है सिर्फ 1100 अरब घनमीटर. इसमें से भी कोई चार सौ अरब घनमीटर भूजल है. यानी सरकारी गणित के हिसाब से देश की नदियों में उपलब्ध पानी कमोबेश सिर्फ 700 अरब घनमीटर है. लेकिन हद की बात यह है कि इस पानी को भी हम रोककर नहीं रख पाते. क्योंकि हमारे पास सरकारी जल भंडारण क्षमता इस समय सिर्फ 257 अरब घनमीटर ही है. देश के बड़े, मझोले और छोटे बांधों में बस इतना पानी ही जमा हो पाता है. अलबत्ता सरकारी विभाग और अफसर जवाब के लिए गुंजाइश बनाकर रखते हैं सो थोड़ी देर के लिए मान लें कि ज्यादा से ज्यादा 50 अरब घनमीटर दूसरे और तरीकों से भी बारिश का पानी जमा हो जाता होगा. इसका मतलब है कि 700 अरब घनमीटर सतही जल में से आधे से भी कम यानी सिर्फ तीन सौ अरब घनमीटर पानी ही रोककर रखने का सरकारी इंतजाम इस समय है. बाकी उससे ज्यादा 400 घनमीटर पानी हर साल बाढ़ की तबाही मचाता हुआ, वापस समुद्र में जा रहा है. इसी दौरान बेतरतीब बसते जा रहे शहर जल भराव के संकट से भी जूझते हैं. फिर वह किस तरह का तर्क हो सकता है जिसमें नागरिकों से ही कहा जाए कि देश में पानी की कमी है. और यह भी कि किफायत बरतें, बूंद बूंद पानी बचाएं.

बेशक किफायत जरूरी है
आंकड़े ही बता रहे हैं कि एक व्यक्ति के लिए प्रतिवर्ष न्यूनतम जितना पानी जरूरी है उससे कम पानी उपलब्ध है. लेकिन काम फिर भी चल रहा है. क्योंकि भूजल पर निर्भरता बढ़वाई जा रही है. देश के तमाम शहर अपने पीने नहाने धाने के लिए ज्यादातर भूजल के सहारे ही हैं. और इसी बीच यानी कोई दो साल पहले एक सरकारी रिपोर्ट बताकर गई है कि कम से कम 21 शहर इस हालत में है वे जल्द ही भूजल उलीच नहीं पाएंगे क्योंकि उनका भूजल खत्म हो रहा है. बहरहाल ये तो बीस पच्चीस शहरों की बात है लेकिन अपना देश इस समय 137 करोड़ आबादी वाला देश हो चुका है. दशकों पहले से हमने जो पांच हजार बांध बना कर रखे हैं उनकी हैसियत बस यहीं तक जरूरत पूरी करने की थी. गौरतलब है कि हर दस साल में कम से कम 15 करोड़ आबादी बढ़ती है. लिहाजा देश में जल भंडारण क्षमता हर साल बढाने के अलावा और कोई चारा है नहीं.

बाढ़ का समाधान भी जल भंडारण ही है
ये कोई नई बात नहीं है. यह समयसिद्ध है कि बांध या जलाशय बाढ़ नियंत्रण भी करते हैं. खासतौर पर तब तो और भी ज्यादा जब जमीन की बढ़ती जरूरत के कारण नदियों के किनारों की जमीन पर बसावट बढ़ाई जा रही हो. नदियों में बेकाबू उफान को रोकने का एक ही तरीका बचता है कि नदियों के ऊपर की तरफ ज्यादा से ज्यादा बांघ या जलाशय बनाकर रखे जाएं. बारिश के पानी को सहायक नदियों में आने से पहले ही जमा कर लिया जाए. एक बार फिर दोहरा लेना चाहिए कि वर्षाजल को जमा करके रखने वाले यही जलाशय पानी की कमी के दिनों में सूखे के संकट से बचाते हैं. आज ही नहीं बल्कि हजारों साल से नहरों से सिंचाई होती रही है.

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बहरहाल, इस साल अच्छा रहेगा कि बारिश और बाढ़ की खबरों के बीच बाढ़ का आगा पीछा भी देखते चलें. बाढ़ के आगे और उसके पीछे देखेंगे तो दोनों जगह सूखा ही दिखाई देगा. समाधान तलाशेंगे तो बाढ़ और सूखे दोनों का समाधान एक ही काम में है कि अपना जल भंडारण बढाने पर युद्धस्तर पर लग जाया जाए. यह भी याद दिलाया जा सकता है कि बांध, जलाशय, नहरें बनाने का काम ही है जो रोजगार के सबसे ज्यादा मौके पैदा करता है. अर्थव्यवस्था जिस हाल में और बेरोजगारी की समस्या जितनी विस्फोटक स्थिति में है उसके मद्देनज़र मंदी के इस दौर में आखिर जल भंडारण से बेहतर दूसरा और क्या काम होगा?(ये लेखक के निजी विचार हैं.)
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
सुधीर जैन

सुधीर जैन

अपराधशास्त्र और न्यायालिक विज्ञान में उच्च शिक्षा हासिल की. सागर विश्वविद्यालय में पढाया भी. उत्तर भारत के 9 प्रदेश की जेलों में सजायाफ्ता कैदियों पर विशेष शोध किया. मन पत्रकारिता में रम गया तो 27 साल 'जनसत्ता' के संपादकीय विभाग में काम किया. समाज की मूल जरूरतों को समझने के लिए सीएसई की नेशनल फैलोशिप पर चंदेलकालीन तालाबों के जलविज्ञान का शोध अध्ययन भी किया.देश की पहली हिन्दी वीडियो 'कालचक्र' मैगज़ीन के संस्थापक निदेशक, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ क्रिमिनोलॉजी एंड फॉरेंसिक साइंस और सीबीआई एकेडमी के अतिथि व्याख्याता, विभिन्न विषयों पर टीवी पैनल डिबेट. विज्ञान का इतिहास, वैज्ञानिक शोधपद्धति, अकादमिक पत्रकारिता और चुनाव यांत्रिकी में विशेष रुचि.

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First published: July 6, 2020, 7:40 PM IST
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