OPINION: कोरोना वायरस को लेकर बहुत दूर की सोची स्वास्थ्य मंत्रालय ने

संदिग्ध मरीजों को या हल्के लक्षण वाले मरीजों को घर पर ही रहकर क्वारंटाइन या अलगाव का नियम बनाने के बारे में जिन सरकारी लोगों ने नया नियम सोचा है वह सही समय पर सही फैसला ही जान पड़ता है.

Source: News18Hindi Last updated on: April 28, 2020, 6:21 PM IST
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OPINION: कोरोना वायरस को लेकर बहुत दूर की सोची स्वास्थ्य मंत्रालय ने
स्वास्थ्य मंत्रालय के नए नियम की भाषा से आभास यही है कि कुछ नागरिकों को सरकार ने यह एक बड़ी सुविधा दे दी है.
कोरोना वायरस के मद्देनज़र केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने सही समय पर दूर की बात सोच ली है. मंत्रालय ने निर्देश जारी कर दिए हैं कि जिन मरीजों में कोरोना के हल्के लक्षण दिखें वे अपने घर पर रहकर ही क्वारंटाइन यानी अपने घर पर ही अलगाव में रह सकते हैं. अलबत्ता मंत्रालय ने अपने निर्देशों की भाषा में एक शब्द “अगर” भी जोड़ दिया है. कहा गया है कि अगर संदिग्ध या हल्के लक्षण वाले मरीजों के घर में अलग रहने की जगह है और उनकी तीमारदारी के लिए घर में पर्याप्त लोग हैं तो वे अपने घर पर ही क्वारंटाइन या अलगाव में रह सकते हैं. स्वास्थ्य मंत्रालय के नए नियम की भाषा से आभास यही है कि कुछ नागरिकों को सरकार ने यह एक बड़ी सुविधा दे दी है. लेकिन इस व्यवस्था का आगा-पीछा भी सोचा जाना चाहिए.

किस तरह है दूर की सोच
क्योंकि कोरोना अबतक काबू में नहीं है. संक्रमितों की संख्या तीस हजार के करीब पहुंच गई है. पूरे देश में लॉकडाउन के बावजूद हर दस दिन में यह संख्या दोगुनी होती जा रही है. मौतों का आंकड़ा भी हर दस दिन में दोगुना होता जा रहा है. पुराने मरीज जिस संख्या में संक्रमण मुक्त होकर अस्पताल से बाहर आ रहे हैं उससे कहीं ज्यादा नए मरीज अस्पताल में भर्ती हो रहे हैं.

जाहिर है कि महीने दो महीने बाद कोरोना संक्रमितों और कोरोना संदिग्धों को भर्ती करने के लिए सरकारी अस्पतालों में जगह कम पड़ सकती है. गौरतलब है कि इस समय देश के पास सवा से डेढ़ लाख बिस्तरों की ही व्यवस्था है. स्वास्थ्य सेवा का आधारभूत ढांचा भी उस हिसाब का नहीं है. बहरहाल, संदिग्ध मरीजों को या हल्के लक्षण वाले मरीजों को घर पर ही रहकर क्वारंटाइन या अलगाव का नियम बनाने के बारे में जिन सरकारी लोगों ने नया नियम सोचा है वह सही समय पर सही फैसला ही जान पड़ता है.
स्वास्थ्य बीमे के खर्च का झंझट खड़ा न हो जाए
महीनेभर से लॉकडाउन सख्ती से लागू करवाया जा रहा है सो संक्रमितों की संख्या की समस्या अभी उतनी बड़ी नहीं दिखती. लेकिन जिस रफ्तार से संक्रमण बढ़ोतरी पर है उस हिसाब से आयुष्मान भारत नाम की सरकारी स्वास्थ्य बीमे की व्यवस्था को भी बोझ उठाना पड़ेगा. देश के कोई पचास करोड़ लोगों को पांच लाख का स्वास्थ्य बीमा कानूनन मुहैया है. कोरोना की भयावहता के बीच इस बीमे के नियम लागू करने के लिए बीमा ठेकेदारों की बेचैनी स्वाभाविक है. संक्रमितों के अस्पताल में भर्ती होने पर मरीज बीमे के हकदार होंगे. यानी सोचकर रखने में हर्ज नहीं है कि अफेदफे की हालत में मरीजों को घर पर ही रहकर ही स्वास्थ्य लाभ करने की कुछ व्यवस्था अभी से बन जाए तो अच्छा है. वरना कोरोना से निपटने के लिए एक से एक अमीर देश अपनी स्वास्थ्य सेवाओं को चरमराता देख रहे हैं.

वैसे हर्ज भी क्या हैजब अबतक हम कोरोना का इलाज ही नहीं ढूंढ पाए हैं तो कोरोना संक्रमित को बाकी स्वस्थ्य लोगों से अलग रखने के अलावा चारा ही क्या है. कोई इलाज पता नहीं होने के कारण संक्रमण के पहले चरण में अस्पतालों में किसी तरह का उपचार नहीं किया जा पा रहा है. एक प्लाज़्मा थेरेपी नाम का इलाज चालू हुआ है लेकिन वह भी संक्रमण के दूसरे या तीसरे चरण में ही शुरू किया जाता है. इस तरह से स्वास्थ्य मंत्रालय के नए नियम में अगर संदिग्ध या हल्के लक्षण वाले मरीजों को घर पर रहकर ही अलगाव में रहने की व्यवस्था बनाई जा रही हो तो उसे दूर की सोच ही समझा जाना चाहिए.

कितने परिवार सक्षम हैं अपना इंतजाम खुद करने में
एक मोटा अनुमान है कि देश के 41 फीसद लोगों के पास रहने के लिए एक कमरे से बड़ा घर ही नहीं है. यानी एक तिहाई आबादी के लिए स्वास्थ्य मंत्रालय की इस नई छूट या नए नियम का कोई मतलब ही नहीं रह जाता. वैसे भी इस सुविधा को लेने के लिए संभावित मरीज की मर्जी भी जरूरी है. सो लॉकडाउन के कारण जिस तरह से निम्न और निम्न मध्यम वर्ग के सामने आजीविका का संकट आ गया है वह कैसे अपने बूते क्वारंटाइन कर पाएगा.

किसे मिली होगी नए नियम से राहत
कोरोना के बहुत हल्के और हल्के लक्षण वाले संभावित मरीजों के लिए अभी तक कोविड केयर सेंटर में भेजने की औपचारिक व्यवस्था है. इन सेंटरों की व्यवस्थाओं के बारे में संपन्न समृद्ध तबका भी खबरें पढ़ता रहता है. जबकि उनके लिए अलग से सुविधापूर्ण व्यवस्था का नियम बन नहीं सकता. जाहिर है यही तबका नए नियम से बहुत राहत मससूस कर रहा होगा. वरना लोकतांत्रिक व्यवस्था में गरीबों और अमीरों के लिए अलग अलग व्यवस्था बनाना आसान नहीं था. लेकिन नए नियम के तहत अब उन्हें अपना इंतजाम खुद करने का बड़ा सुबीता हो गया है. उन्हें बस लिख कर देना होगा कि उनके पास क्वारंटाइन के लिए पर्याप्त बड़ा घर है और तीमारदारी के लिए पर्याप्त तीमारदार हैं.

वैसे उतना अंदेशा बचा नहीं
कोरोना संक्रमण का नवीनतम पर्यवेक्षण यह है कि संक्रमण के बावजूद बहुत से लोगों में बीमारी के लक्षण दिखते ही नहीं है. चिकित्सा विशेषज्ञों का अनुभव है कि जिन मरीजों की इम्यून प्रणाली ठीक से काम कर रही होती है उनमें कोरोना से प्रतिरक्षा के लिए एंटीबॉडी अपने आप ही विकसित हो जाती हैं. यह प्रतिरक्षा प्रणाली प्रकृति से मिला वरदान है. कहते हैं कि कोरोना के इलाज की अनुपलब्धता के इस संकटकाल में यही वरदान काम आ सकता है या यों कहें कि इस समय अच्छा खासा काम आ रहा है. वरना अस्पतालों से कोरोना के जो ज्यादातर मरीज ठीक होकर बाहर आए हैं उनके बारे में यही रहस्य बना रहता कि वे किस इलाज से ठीक हुए हैं.

बहरहाल हकीकत कुछ भी हो लेकिन एंटीबॉडी टेस्टिंग के जरिए यह पता चल चुका है कि मानव में प्राकृतिक प्रतिरक्षा क्षमता अभी चुकी नहीं है और कोरोना के मामले में वह काम करती दिख रही है. अगर यह वैज्ञानिक अधिकल्पना डॉक्टरों के साथ साथ जनसाधारण में भी उजागर हो गई तो कोरोना से मौत का भय अपने आप कम हो जाएगा. वैसे भी पूरी दुनिया में अभी इस संक्रमण से मौतों का आंकड़ा औसतन साढ़े छह फीसद बैठ रहा है.

दुनिया की ज्यादातर सरकारें अपनी तारीफ में बता रही है कि अस्पतालों में भर्ती कुल मरीजों में कोई एक चौथाई मरीज ठीक होकर अपने घर जा रहे हैं. लिहाजा वक्त के साथ कोरोना से मौत का भय कम होते जाने का अनुमान लगाया जा सकता है. अब तक के हालात का बस यही एक सकारात्मक पहलू है. लेकिन सभ्य समाज वाली सरकारें ऐसी बातें ज्यादा कर नहीं सकतीं. उन्हें तो यह कहना ही पड़ेगा कि हमारे लिए हरेक जान कीमती है. और इसीलिए उन्हें सबकी देखभाल की कवायद करते हुए दिखना जरूरी होता है.

बीमार को कलंकित करने का पहलू
अपने देश में अभी कलंक के अपराधशास्त्रीय पहलू पर चर्चा होती नहीं है. अगर जांच पड़ताल करने निकलेंगे तो बहुत संभव है यह पता चले कि कोरोना पीड़ित को कलंक समझने की प्रवृत्ति कितनी बढ़ गई है. हो सकता है कि कुछ लोगों को लगने लगा हो कि अगर किसी को पता चल गया कि वह कोरोना संक्रमित हो गया है तो पता नहीं सरकारी कर्मचारी और समाज का असभ्य तबका उनकी क्या गत बना देगा.

अगर यह प्रवृत्ति वाकई आ चुकी हो तो बहुत संभव है कि संक्रमित व्यक्ति खुद ही अपने घर में दुबक कर रहने में अपना भला समझने लगा हो. बेशक एक सभ्य समाज के तौर पर यह बेहद दूर्भाग्यपूर्ण है. लेकिन कोरोना संदिग्ध और हल्के लक्षण वाले कुछ मरीज अपने घर पर ही क्वारंटाइन होने में राहत महसूस करेंगे. सरकारी व्यवस्था के लिए तो यह बहुत बड़ी राहत होगी ही होगी.

(ये लेखक के निजी विचार हैं)
ब्लॉगर के बारे में
सुधीर जैन

सुधीर जैन

अपराधशास्त्र और न्यायालिक विज्ञान में उच्च शिक्षा हासिल की. सागर विश्वविद्यालय में पढाया भी. उत्तर भारत के 9 प्रदेश की जेलों में सजायाफ्ता कैदियों पर विशेष शोध किया. मन पत्रकारिता में रम गया तो 27 साल 'जनसत्ता' के संपादकीय विभाग में काम किया. समाज की मूल जरूरतों को समझने के लिए सीएसई की नेशनल फैलोशिप पर चंदेलकालीन तालाबों के जलविज्ञान का शोध अध्ययन भी किया.देश की पहली हिन्दी वीडियो 'कालचक्र' मैगज़ीन के संस्थापक निदेशक, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ क्रिमिनोलॉजी एंड फॉरेंसिक साइंस और सीबीआई एकेडमी के अतिथि व्याख्याता, विभिन्न विषयों पर टीवी पैनल डिबेट. विज्ञान का इतिहास, वैज्ञानिक शोधपद्धति, अकादमिक पत्रकारिता और चुनाव यांत्रिकी में विशेष रुचि.

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First published: April 28, 2020, 6:21 PM IST
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