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रिजर्व बैंक गवर्नर शक्तिकांत दास की प्रेस कॉन्फ्रेंस से कितना बदला माहौल

शुक्रवार को RBI की प्रेस कॉन्फ्रेंस (RBI) हुई. लेकिन शेयर बाजार चढ़ने की बजाए घंटे भर में ही अचानक गिर गया. पूरे दिन यही आलम रहा और अंत में सेंसेक्स 260 गिरकर बंद हुआ. यानी 20 लाख करोड़ के पैकेज की तरह RBI प्रेस कॉन्फ्रेंस का भी शेयर बाजार पर कोई असर नहीं पड़ा.

Source: News18Hindi Last updated on: May 22, 2020, 5:03 PM IST
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रिजर्व बैंक गवर्नर शक्तिकांत दास की प्रेस कॉन्फ्रेंस से कितना बदला माहौल
आरबीआई गवर्नर शक्तिकांत दास
नई दिल्ली. देश के मौजूदा माली हालात के बीच रिजर्व बैंक (RBI-Reserve Bank of India) की कैसी भी प्रेस कॉन्फ्रेंस होना बहुत मायने रखती है. खासतौर पर तब तो और भी ज्यादा जब कुछ दिनों पहले ही सरकार ने 20 लाख करोड़ (Stimulus Package) के पैकेज का ऐलान किया था. इस पैकेज की ज्यादातर रकम उद्योग व्यापार जगत को कर्ज की सुविधा बढ़ाने के लिए ही थी. और इसीलिए रिजर्व बैंक की प्रेस काॅन्फेंस पर शेयर बाजार की भी नज़रें थीं. बहरहाल, शुक्रवार को सबेरे दस बजे प्रेस कॉन्फ्रेंस हुई. लेकिन शेयर बाजार सेंसेक्स चढ़ने की बजाए घंटे भर में ही अचानक उतर गया. पूरे दिन यही आलम रहा और सेंसेक्स 260 अंक का गोता लगाकर बंद हुआ. यानी बीस लाख करोड़ के पैकेज की तरह रिजर्व बैंक की प्रेस कॉन्फ्रेंस का भी शेयर बाजार पर कोई असर नहीं पड़ा. बल्कि कुछ बुरा ही असर देखा जा सकता है. यह तो एक छोटी सी बात है. लगे हाथ रिजर्व बैंक की इस कॉन्फ्रेंस के दूसरे पहलुओं पर भी गौर कर लेना चाहिए.

मुख्य बात क्या कही रिजर्व बैंक ने-रिजर्व बैंक ने रेपो रेट में 40 बेसिस प्वाइंट की कटौती का एलान किया. इस सामान्य से ऐलान के अलावा दूसरी घोषणा यह कि जिन लोगों ने कर्ज ले रखा है उन्हें अपनी ईएमआई यानी कर्ज वापसी की किस्त चुकाने के लिए तीन महीने का अतिरिक्त समय दे दिया गया है. कोरोना के कारण ईएमआई देने के लिए तीन महीने का समय पहले भी दिया गया था अब तीन महीने और बढ़ गए. ब्याज वगैरह में छूट नहीं मिलेगी. अभी पता नहीं कि भारी संकट में फंसी अर्थव्यवस्था को संभालने में इस तरह के कदम कितना असर डाल पाएंगे.

अभूतपूर्व संकट का अंदाजा नहीं लगा-आरबीआई गवर्नर का भाषण सुनते हुए एकबार भी नहीं लगा कि देश अभूतपूर्व आर्थिक संकट में है. वैसे यह जताने का काम आरबीआई का होता नहीं है. लेकिन फिर भी बीस लाख करोड़ के पैकेेज को लागू कराने से रिजर्व बैंक का लेना देना था जरूर. हो सकता है कि रिजर्व बैंक ने हालफिलहाल इस बारे में खुद से ज्यादा कहना ठीक न समझा हो. हो यह भी सकता है कि रिजर्व बैंक ने इस बारे में बाद में कभी अलग से कोई प्रेस काॅन्फे्रंस की योजना बना रखी हो. फिर भी विद्वानों के बीच कम से कम यह सोच विचार जरूर हो रहा होगा कि अभूतपूर्व संकट से निपटने के लिए अभूतपूर्व उपाय ही कारगर हो सकते हैं. आज नहीं तो कल रिजर्व बैंक को वे अभूतपूर्व और नवोन्वेशी उपाय करने ही होंगे.

महंगाई का हल्का सा ज़िक्र-अर्थशास्त्र के सामान्य विद्यार्थी भी जानते हैं कि रिजर्व बैंक का एक काम महंगाई पर नज़र रखने का होता है. आमतौर पर जब भी कोई सरकार महंगाई बढ़ने के अंदेशे में घिर जाती है तो रिजर्व बैंक अपने मौद्रिक उपायों से बाजार में गतिशील मुद्रा को निकाल लेने का इंतजाम कर देता है. और जब उद्योगधंधों को बढ़ाने की जरूरत पड़ती है तोे रिजर्व बैंक कर्ज की सुविधाएं बढ़ाने की कवायद करता है. यानी वाणिज्यिक बैंकों को कर्ज बांटने के लिए रकम को कम या ज्यादा करने के तरीके रिजर्व बैंक के पास होते है. इन्ही तरीकों को मौद्रिक उपाय कहा जाता है. इसके पीछे का तर्क यह है कि अगर कर्ज ज्यादा बांट दिया जाए तो घूमफिरके लोगों की जेब में पैसे ज्यादा उपलब्ध हो जाते हैं और वे ज्यादा सामान खरीदने लगते हैं. मांग बढ़ जाती है. हालांकि इसका एक बुरा असर भी जरूर पड़ता है. वह ये कि अगर बाजार में वस्तुओं की मांग बढ़ जाए और आपूर्ति उतनी ही हो तो महंगाई बढ़ जाती है.
इसीलिए यह कुछ ज्यादा ही गौरतलब है कि गवर्नर की प्रेस काॅन्फे्रस में महंगाई को लेकर अनिश्चिता जताई गई है. महंगाई का जिक्र भर ही यह अनुमान लगाने के लिए काफी है कि रिजर्व बैंक निकट भविष्य में महंगाई को लेकर चिंताशील है. यह पहले से सिद्ध है कि कर्ज ज्यादा बांटने से महंगाई हरहाल में बढ़ती है.

एक नज़र महंगाई के कारणशास्त्र पर-क्या यह मान लिया गया है कि सरकार और रिजर्व बैंक के किए उपायों से उपभोक्ताओं की जेब तक भी पैसा पहुंच जाएगा? गौर किया जाना चाहिए कि देश में लगातार दो महीने के लाॅकडाउन के बाद सबसे बड़ी झंझट यह खड़ी हुर्ह है कि देश के अधिकांश लोगों की जेब में पैसे की कमी पड़ गई है. कामधंधे ठप हैं. बेरोज़गारी आसमान पर है. जीडीपी में सिर्फ पंद्रह फीसद योगदान वाले कृषि क्षेत्र के अलावा कहीं भी उत्पादकता का कोई लक्षण नहीं दिख रहा है. देश की आधी से ज्यादा आबादी वाले किसान और खेतिहर मजदूरों के सामने पहले से ही आर्थिक संकट था और अब गांव में करोड़ों प्रवासी मजदूरों को काम मुहैया कराने की नई चुनौती जुड़ गई है.

जानकारों ने हिसाब लगा लिया है कि इस काम के लिए मनरेगा के एक लाख करोड़ उंट के मुंह में जीरा हैं. अर्थशास्त्रीगण गाहे बगाहे बताते रहते हैं कि यही तबका देश का असंठित क्षेत्र है और यही तबका देश के कुल उत्पादन का एक बड़ा हिस्सा उपभोग में लाता है. यानी अगर उसकी जेब में पर्याप्त पैसा पहुंचने का कोई बड़ा उपक्रम न दिख रहा हो तो महंगाई का अंदेशा किस आधार पर जताया जा सकता है? फिर भी ज्यादा कर्ज बांटने से महंगाई बढ़ने का तर्क कमजोर नहीं पड़ता. फिर भी एक रूप में नहीं तो दूसरे किसी रूप् में महंगाई का अंदेशा है जरूर. खासतौर पर मध्य वर्ग पर महंगाई के हमले के रूप में. 

जब उत्पादन जरूरत से बहुत कम होने लगे-क्या अभी से यह हिसाब लगाकर नहीं रखा जाना चाहिए कि मांग कम होने की स्थिति में उद्योग और व्यापार जगत उत्पादन कितना घटा देगा. और अगर उत्पादन मांग से बहुत ज्यादा घटा तो महंगाई को कोई नहीं रोक सकता. कोरोना संकट के पहले के दौर पर नज़र डालें तो बहुत लंबे अर्से से मंदी की चर्चाएं हो रही थीं. अगर अधिकाशं उपभोक्ताओं के पास पहले से ही पैसे कम थे. लिहाजा उत्पादन बढ़ाने के लिए सस्ते कर्ज की व्यवस्था के जरिए अर्थव्यवस्था को संभालने के उपाय कितने कारगर होंगे इस बात पर सरकारी अर्थशास्त्रियों को अभी से सोच विचार कर लेना चाहिए.

महंगाई से ज्यादा खतरनाक है कालाबाजारी-भले ही कालाबाजारी के सबूत बताना बहुत कठिन माना जाता हो, लेकिन यह मान लेने में ही समझदारी है कि लाॅकडाउन के दौरान बहुत सी चीजों की कालाबाजारी जरूर होने लगी होगी. यु़द्धों के समय और अकालों या महामारियों के संकट को व्यापारी भी एक असवर के रूप में लेते हैं. अच्छा यही हो कि देश में कानून व्यवस्था को अभी से चैकस कर दिया जाए. वरना एमआरपी वाली व्यवस्था के कारण महंगाई के आंकड़े भले न बिगड़ें लेकिन जमाखोरी और कालाबाजारी से मध्यमवर्गीय जनता हाहाकार कर उठेगी. सिर्फ मध्यमवर्गीय तबका ही महंगाई की ज्यादा चपेट में आएगा क्योंकि गरीब और बेरोज़गारों पर ज्यादातर उत्पादों की महंगाई या कालाबाजारी का ज्यादा असर पड़ता नहीं है. इस मजबूर तबके को मुफलिसी में रहने की पहले से आदत है. वे पहले से ही न्यूनतम जरूरतों में गुज़र बसर कर रहे होते हैं.

तो फिर क्यों किया गया महंगाई का जिक्र?-रैपो रेट जब भी घटाया जाता है तो महंगाई का अंदेशा होता ही होता है. अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए इमरजंसी में अगर ब्याज दरें कम की जा रही हैं और आसानी से ताबड़तोड़ कर्ज मुहैया कराने की कवायद की जा रही है तो रिजर्व बैंक के मंच से महंगाई का चिंताशीलता विरोधाभासी लग रही है. इसीलिए वक्त आ गया है जब बाकायदा कबूल कर लेना चाहिए कि बड़ी समस्या महंगाई नहीं बल्कि मंदी होती है.

महंगाई का अनोखा नज़ारा बनने के आसार-इस बार महंगाई के अंदेशे को लेकर एक रोचक नज़ारा बनने के भी आसार बन गए हैं. क्योंकि इतिहास में झाकें तो महंगाई को राजनीतिक रूप् से हमेशा ही एक संकट के रूप् में दिखाया गया है. महंगाई को लेकर हमेशा ही हो हल्ला मचाया जाता रहा है. यानी नई परिस्थिति में यह तर्क गढ़ने में बड़ी दिक्कत आने वाली है कि महंगाई आर्थिक वृद्धि का एक सूचक या लक्षण भी होता है. अगर ऐसी स्थिति बनी तो इस बार उस समझ को ठीक कर लेने का अच्छा मौका आने वाला है.यानी रिजर्व बैंक की प्रेस काॅन्फे्रेंस में अगर महंगाई का जिक्र आया है तो यह यूं ही नहीं है.

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ब्लॉगर के बारे में
सुधीर जैन

सुधीर जैन

अपराधशास्त्र और न्यायालिक विज्ञान में उच्च शिक्षा हासिल की. सागर विश्वविद्यालय में पढाया भी. उत्तर भारत के 9 प्रदेश की जेलों में सजायाफ्ता कैदियों पर विशेष शोध किया. मन पत्रकारिता में रम गया तो 27 साल 'जनसत्ता' के संपादकीय विभाग में काम किया. समाज की मूल जरूरतों को समझने के लिए सीएसई की नेशनल फैलोशिप पर चंदेलकालीन तालाबों के जलविज्ञान का शोध अध्ययन भी किया.देश की पहली हिन्दी वीडियो 'कालचक्र' मैगज़ीन के संस्थापक निदेशक, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ क्रिमिनोलॉजी एंड फॉरेंसिक साइंस और सीबीआई एकेडमी के अतिथि व्याख्याता, विभिन्न विषयों पर टीवी पैनल डिबेट. विज्ञान का इतिहास, वैज्ञानिक शोधपद्धति, अकादमिक पत्रकारिता और चुनाव यांत्रिकी में विशेष रुचि.

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First published: May 22, 2020, 4:56 PM IST
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