Opinion: अब भी है कोरोना टेस्टिंग तेज करने का मौका

भले ही देश में अभी कोरोना मरीज (Coronavirus) सड़क पर इलाज कराते न दिख रहे हों लेकिन इस बात से भी इनकार नहीं किया जाना चाहिए कि कोविड अस्पतालों (Covid Hospitals) में बिस्तरों को लेकर मारामारी मचने लगी है.

Source: News18Hindi Last updated on: June 29, 2020, 6:55 PM IST
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Opinion: अब भी है कोरोना टेस्टिंग तेज करने का मौका
दुनिया में कोरोना वायरस के मामले घट नहीं रहे हैं (सांकेतिक फोटो)
समस्याएं जब देर तक ठहर जाती हैं तो वे रोजमर्रा की साधारण बातों में शामिल हो जाती हैं. लेकिन कोरोना वायरस (Coronavirus) को लेकर ऐसा होना भारी पड़ सकता है. यह संक्रामक रोग (Contagious Disease) है. वैसा रोग जिसे वैश्विक महामारी (Global Pandemic) घोषित किया जा चुका है. भले ही विश्व स्वास्थ्य संगठन (World Health Organisation) दिन पर दिन चुप होता जा रहा हो. तमाम पीड़ित देश इससे निपटने में अपनी कामयाबी बता रहे हों लेकिन कोरोना के आंकड़े बता रहे हैं कि यह संकट (Crisis) अभी भी बढ़त पर है. बल्कि रुझान यह है कि कई देश कोरोना के विस्फोटक चरण में पहुंचते दिख रहे हैं.

हमें खुद को भी इसी चरण में मान लेना चाहिए. और जो देश आंकड़ों के लिहाज़ से (Data wise) निश्चिंत दिख रहे हैं वे भी अभी खुद को इस संकट (crisis) से बरी न मानें क्योंकि यह महामारी (Pandemic) है. इस संकट से एकमुश्त हर देश का मुक्त होना ही दुनिया को निश्चिंत कर सकता है.

कोरोना के घटने का तर्क मुगालता है
अव्वल तो दुनिया में कोरोना के मामले घट नहीं रहे हैं फिर भी अगर कोई देश यह दावा करे कि हमारे यहां हालात काबू में आते जा रहे हैं तो उसका दावा मुगातला ही माना जाना चाहिए. क्योंकि कोरोना के मामले थोड़े बहुत घटने से महामारी से मुक्ति का भ्रम नहीं पाला जा सकता. यहां तक कि न्यूजीलैंड और चीन जैसे देश भी खुद को निश्चिंत नहीं मान सकते. वैसा मानकर चलेंगे तो कभी भी फिर संकट में पड़ सकते हैं. क्योंकि बाकी दुनिया से अलग थलग कोई भी देश नहीं रह सकता. आज नहीं तो कल उन्हें सामाजिक और आर्थिक नज़दीकियां बढ़ानी ही पड़ेंगी.
स्वास्थ्य ढांचे के चरमराने की आवाज़ क्यों?
भले ही देश में अभी कोरोना मरीज सड़क पर इलाज कराते न दिख रहे हों लेकिन इस बात से भी इनकार नहीं किया जाना चाहिए कि कोविड अस्पतालों में बिस्तरों को लेकर मारामारी मचने लगी है. ऐसे में स्वास्थ्य सेवा के आधारभूत ढांचे के चरमाने की आवाज क्यों नहीं सुनाई देगी.

रिकवरी रेट बढ़ने का तर्क काम का नहींहम खुशफहमी के लिए खूब मानते रहें कि अस्पलालों से डिस्चार्ज होने वाले मरीजों की संख्या बढ़ रही है, लेकिन क्या यह भी नहीं देखा जाना चाहिए कि दिन पर दिन नए मरीजों की संख्या उससे भी तेज रफतार से बढ़ रही है.और इसीलिए इस समय देश में अस्पतालों में भर्ती मरीजों की संख्या दिन पर दिन बढ़ते हुए दो लाख तेरह हजार से ऊपर पहुंच गई हैै. और इसीलिए अस्पतालों में बिस्तरों और स्टाफ का टोटा पड़ता दिख रहा है. हमारा स्वास्थ्य सेवा ढांचा आबादी के लिहाज से पहले ही कमजोर था. अगर सरकारी अमले को निकट भविष्य में कोरोना संकट और बढ़ता हुआ नज़र न आ रहा हो तो इसे चिंता की बात ही माना जाना चाहिए.

कोरोना की दवा या टीके की ख़बरें गायब क्यों?
देश में जब कोरोना के मामलों की शुरुआत ही हुई थी तब बड़ी चिंता जताई जा रही थी कि अगर जल्द ही दवा नहीं बनी और टीका नहीं बना तो हालात बेकाबू हो जाएंगे. तब बड़ी संजीदगी से खबरें आती थीं कि दूसरे देश और हम टीके और दवा बनाने के लिए क्या काम कर रहे हैं. लेकिन इस समय जब आफत सिर पर ही आ गई, तब पता नहीं चल रहा है कि इस मोर्चे पर सरकारी चिकित्सा संस्थानों में काम क्या हो रहा है? बहरहाल, आज दिन तक के हालात बता रहे हैं कि अगर जल्द ही विश्वसनीय दवा या टीका न बना तो भारी संकट खड़ा हो सकता है.

आंकड़ों में मौजूदा हालात
इस समय कोरोना के मरीजों के मामले में हम दुनिया में चौथे नंबर पर हैं. महीने भर पहले जब ब्रिटेन, स्पेन, इटली जैसे देशों की दुर्गति हद से ज्यादा थी तब यही तर्क दिया गया था कि दूसरे देशों की तुलना में हमारी स्थिति बेहतर है. लेकिन अपनी स्थिति बिगड़ते बिगड़ते हालत यहां पहुंच गई कि वे देश बदहाल देशों की सूची में बेहतर होते गए और हम चिंतनीय रूप से नीचे गिरते चले गए. आज हम चैथे नंबर पर हैं और जैसा रुझान है उसके हिसाब से इसी हफ़्ते कोरोना से बदहाल देशों में हमारी स्थिति तीसरे नंबर पर काबिज रूस से भी बुरी होती दिख रही है.

अपनी बड़ी आबादी के तर्क में कितना दम
बेशक हम इस समय आबादी के लिहाज़ से दुनिया में दूसरे नंबर पर हैं. पहले नंबर पर चीन है. और कोरोना की गिरफ़्त में पहले पहल वही आया था. लेकिन उसने जैसे तैसे कोरोना से निपट लिया. अब हमारे अलावा बाकी देश छोटी आबादी के देश हैं. लेकिन अपने मुकाबले कम आबादी वाले अमेरिका, ब्राजील, रूस, मैक्सिको, पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे देशों की मौजूदा हालात से अपनी तुलना अभी से करना ठीक नहीं है. क्योंकि कोरोना अभी उतार पर नहीं बल्कि फैलाव पर है. अगर मौजूदा आंकड़ों के आधार पर खुशफहमी में रहा जाएगा तो आगे के लिए ठीक नहीं होगा. बल्कि कहा यह जाना चाहिए कि हमारी आबादी बहुत ज्यादा है लिहाजा आज दिन तक पौने छह लाख मरीजों का हो जाना हमारे लिए और भी चिंता की बात है. क्योंकि कोरोना हमारे यहां अभी फैलाव पर है. और दवा और टीके का अभी कुछ अता पता नहीं है.



नियम कायदे कानूनों से नहीं बनेगी बात
किनकी टेस्टिंग हो या किनकी पहले टेस्टिंग हो और किनकी बाद में, ये बेकार की बातें हैं. देश दुनिया के किसी भी विशेषज्ञ से पूछकर देखा जा सकता है? वह यही बताएगा कि ज्यादा से ज्यादा लोगों की टेस्टिंग करके ही कोरोना के मरीजों को जल्द पहचाना जा सकता है और उन्हें अलग रखकर संक्रमण को तेजी से फैलने से रोका जा सकता है. इस सवाल पर जरूर सोचा जाना चाहिए कि टेस्टिंग के मामले में हम दूसरे देशों के मुकाबले इतने पीछे क्यों हैं? गौरतलब है कि इस समय प्रति हजार आबादी पर हमारी टेस्टिंग दर सिर्फ छह है. जबकि कोरोना से बदहाल देशों की सूची में इस समय हम जिस देश के ठीक नीचे है उसकी यानी रूस में टेस्टिंग दर प्रति हजार 132 है. और बदहाली में जिस देश से हम आगे निकल गए हैं उस ब्रिटेन में टेस्टिंग दर प्रतिहजार 135 है. हमारे आगे पीछे इन दोनों देशों ने अपने यहां टेस्टिंग बढ़ाकर ही अपनी हालत को हाल ही में संभाला है.

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पिछले कुछ हफ़्तों में इन दोनों देशों ने अपने यहां मरीजों की बढ़ती संख्या को काफी हद तक काबू कर लिया है. यानी ज्यादा से ज्यादा टेस्टिंग अकेला ऐसा मोर्चा है जिस पर तैनात होकर हम आगे के अंदेशों को कम कर सकते हैं.  यह जरूरी काम बाद में मजबूरी में युद्धस्तर पर करना पड़े उससे बेहतर है ज्यादा से ज्यादा टेस्टिंग पर अभी से जोर लगा दिया जाए. (यह लेखक के निजी विचार हैं.)
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
सुधीर जैन

सुधीर जैन

अपराधशास्त्र और न्यायालिक विज्ञान में उच्च शिक्षा हासिल की. सागर विश्वविद्यालय में पढाया भी. उत्तर भारत के 9 प्रदेश की जेलों में सजायाफ्ता कैदियों पर विशेष शोध किया. मन पत्रकारिता में रम गया तो 27 साल 'जनसत्ता' के संपादकीय विभाग में काम किया. समाज की मूल जरूरतों को समझने के लिए सीएसई की नेशनल फैलोशिप पर चंदेलकालीन तालाबों के जलविज्ञान का शोध अध्ययन भी किया.देश की पहली हिन्दी वीडियो 'कालचक्र' मैगज़ीन के संस्थापक निदेशक, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ क्रिमिनोलॉजी एंड फॉरेंसिक साइंस और सीबीआई एकेडमी के अतिथि व्याख्याता, विभिन्न विषयों पर टीवी पैनल डिबेट. विज्ञान का इतिहास, वैज्ञानिक शोधपद्धति, अकादमिक पत्रकारिता और चुनाव यांत्रिकी में विशेष रुचि.

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First published: June 29, 2020, 6:50 PM IST
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