कोरोना मामले में आशावादी रवैया जोखिम भरा

Corona Case Hike in India: आज डब्ल्यूएचओ ने जिस बारे में चेताया है वह लाॅकडाउन में ज़्यादा छूट दने को लेकर है. बेशक हर देश की मजबूरी हो गई है वे अपने अपने देशों में कामधाम चालू करें. मास्क, दो गज की दूरी हाथ धोने और सेनेटाइज़र के इस्तेमाल और लाॅकडाउन में सीमित छूट की सतर्कता के साथ कामधाम चालू भी हो गए हैं. लेकिन क्या सतर्कता बरतने के ये तरीके काफी हैं?

Source: News18Hindi Last updated on: September 27, 2020, 5:10 PM IST
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कोरोना मामले में आशावादी रवैया जोखिम भरा
पहले से अधिक खतरनाक हो रहा कोरोना वायरस.
कहावत है कि हर संकट की एक उम्र होती है और आखिर हर मुद्दा मर ही जाता है. लेकिन कोरोना के मामले में ऐसी उम्मीद लगाकर बैठना जोखिम भरा है. कोरोना कोई राजनीतिक मुद्दा नहीं है बल्कि एक महामारी है. ऐसी महामारी जिससे पूरी दुनिया की जान जोखिम में पड़ी हुई है. हालांकि एक लिहाज़ से यह राजनीतिक जरूर है, क्योंकि इस महामारी से निपटने की जिम्मेदारी के कारण दुनियाभर की सरकारों की साख भी दांव पर है.

खबरें कम हुई हैं बीमारी का असर नहीं घटा
दुनियाभर की तमाम सरकारें भरसक कोशिश में है कि वे महामारी से निपटने में अपनी नाकामी को छुपा लें. इस मामले में वे काफी कुछ कामयाब भी हैं. लेकिन जिस तरह से रीयल टाइम आंकड़े आ रहे हैं उनसे साफ दिख रहा है कि दुनिया में कोरोना बिल्कुल भी उतार पर नहीं है. पूरी दुनिया का ग्राफ देखें तो प्रतिदिन संक्रमितों का आंकड़ा बढ़ता ही जा रहा है. इस समय तो रोज़ तीन लाख संक्रमित बढ़ने लगे हैं. आठ महीने से यह आंकड़ा लगातार बढ़त पर है और कुल आंकड़ा तीन करोड़ तीस लाख को पार कर गया है.

हमारी स्थिति अलग नहीं
महामारी के आंकड़ों के मुताबिक हमारी स्थिति बाकी दुनिया जैसी ही है. बल्कि कुछ मामलों में कई देशों की स्थिति हमसे बेहतर है. कुछ देश दावा कर सकते हैं कि उन्होने संक्रमण बढ़ने की रफ्तार काबू में कर रखी है. मसलन यूरोप, अफ्रीका और खुद एशिया महाद्वीप के कई देश बदहाल देशों की सूची में नीचे उतर गए. लेकिन हम अब तक एक बार भी सूची में अपनी स्थिति नहीं सुधार पाए. बदहाल देशों की सूची में हम दूसरे नंबर पर पहुंचे हुए हैं और रूख के हिसाब से नंबर एक पर आने का खतरा भी मंडरा रहा है. हमारे देश में कुल संक्रमितों का आंकड़ा 60 लाख पार कर चुका है और अभी भी हर रोज़ कोई 90 हजार संक्रमित बढ़ते जा रहे हैं. यानी हमें फौरन चिंता करनी चाहिए.

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गौर से देखें तो हम अपनी आबादी में सिर्फ लगभग पांच फीसद परीक्षण कर पाए हैं.


डब्ल्यूएचओं ने भी चेताया हैविश्व स्वास्थ्य संगठन यानी डब्ल्यूएचओ ने शनिवार को चेतावनी जारी की है. भले ही अलग से हमें नहीं चेताया बल्कि पूरी दुनिया को चेताया है कि ऐसा ही रवैया रहा तो महामारी से मरने वालों का आंकड़ा 20 लाख तक पहुंच जाएगा. गौरतलब है कि दुनिया के 193 देशों में इस महामारी से शनिवार शाम तक दस लाख लाख से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं. हमारे देश में भी अब तक 95 हजार मौतें हो चुकी हैं और साढे नौ लाख मरीज़ संक्रमण से जूझ रहे हैं. डब्ल्यूएचओ हमें लगातार वास्तविक स्थिति बताती रहती है, साथ ही सभी देशों को मशविरा भी देती है कि ऐसे संकट काल में क्या किया जाना चाहिए. ये अलग बात है कि कोई देश माने या न माने.

इस समय कौन सी सलाह है काम की
आज डब्ल्यूएचओ ने जिस बारे में चेताया है वह लाॅकडाउन में ज़्यादा छूट दने को लेकर है. बेशक हर देश की मजबूरी हो गई है वे अपने अपने देशों में कामधाम चालू करें. मास्क, दो गज की दूरी हाथ धोने और सेनेटाइज़र के इस्तेमाल और लाॅकडाउन में सीमित छूट की सतर्कता के साथ कामधाम चालू भी हो गए हैं. लेकिन क्या सतर्कता बरतने के ये तरीके काफी हैं? भले ही डब्ल्यूएचओ ने नई समझाइश में पहले बताए कई तरीके दोहराए नहीं है लेकिन वह चार महीने पहले यह समझा चुका है कि हर देश को अपने यहां कोरोना परीक्षणों की संख्या को लेकर चैकस रहना चाहिए. वह कह चुका है कि प्रतिदिन संक्रमितों की संख्या के हिसाब से ही परीक्षणों की संख्या तय की जानी चाहिए.
डब्ल्यूएचओ सुझा चुका है कि पाॅजीटिविटी रेट जब दो हफ्ते तक पांच फीसद या उससे कम रहे तभी लाॅकडाउन की पाबंदियों में छूट दी जानी चाहिए. हम अपने देश की स्थिति देखें तो पिछले एक दो हफ्ते से अपने यहां 90 हजार संक्रमित रोज़ाना बढ़ रहे हैं. उधर परीक्षणों की संख्या औसतन सिर्फ 10 लाख प्रतिदिन रही है. जबकि पांच फीसद पाॅजीटिवी रेट बनाए रखने के लिए जरूरत प्रतिदिन 18 लाख परीक्षण होने चाहिए.
जाहिर है कि पर्याप्त संख्या में परीक्षण न होने के कारण वे लोग वायरस लिए घूम रहे होंगे जिनमें बीमारी के लक्षण तो नहीं हैं लेकिन वे संक्रमित हैं. इनकी पहचान होकर उन्हें अलगाव में रखने से ही संक्रमण कम होगा. विशेषज्ञ यही सुझाते रहे हैं कि परीक्षणों की संख्या ही वह मोर्चा है जो साध लिया जाए तो संक्रमण की रफ्तार बढ़ने से रोकी जा सकती है.



परीक्षणों के मामले में हमारी वास्तविक स्थिति
गौर से देखें तो हम अपनी आबादी में सिर्फ लगभग पांच फीसद परीक्षण कर पाए हैं. दूसरे देशों से अपनी तुलना करें तो इस मामले में 215 देशों में हमारा नंबर 109 वां है. कई देशों ने अपनी एक तिहाई आबादी का परीक्षण करके हालात काबू में किए हैं. रूस और ब्रिटेन जैसे कई देश मिसाल हैं. ये देश अपनी कुल आबादी में एक तिहाई परीक्षण कर चुके हैं. इन देशों में महामारी पर काफी कुछ में हो जाने का एक बड़ा कारण परीक्षणों की संख्या ही माना जा रहा है. उनके अनुभव दूसरे देशों के काम आ सकते हैं.

भारी पड़ सकता है आशावाद का जोखिम
देश के स्वास्थ्य प्रशासकों का ध्यान प्रतिदिन अस्पतालों से छुट्टी पा रहे मरीजों की संख्या यानी रिकवरी रेट के आंकड़े पर ज्यादा है. वे इसी के सहारे आशावादी माहौल बना रहे है. लेकिन वास्तविक चिंता संक्रमण बढ़ने की रफ्तार की है. हमें अपनी स्थिति की चिंता इसलिए भी करनी पड़ेगी क्योंकि हम 138 करोड़ आबादी वाले देश हैं. यानी हमारे ऊपर जोखिम की रेंज बहुत बड़ी है. इस लिहाज़ से इस समय दुनिया में सबसे ज्यादा संवेदनशील स्थिति में हम ही हैं.
ब्लॉगर के बारे में
सुधीर जैन

सुधीर जैन

अपराधशास्त्र और न्यायालिक विज्ञान में उच्च शिक्षा हासिल की. सागर विश्वविद्यालय में पढाया भी. उत्तर भारत के 9 प्रदेश की जेलों में सजायाफ्ता कैदियों पर विशेष शोध किया. मन पत्रकारिता में रम गया तो 27 साल 'जनसत्ता' के संपादकीय विभाग में काम किया. समाज की मूल जरूरतों को समझने के लिए सीएसई की नेशनल फैलोशिप पर चंदेलकालीन तालाबों के जलविज्ञान का शोध अध्ययन भी किया.देश की पहली हिन्दी वीडियो 'कालचक्र' मैगज़ीन के संस्थापक निदेशक, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ क्रिमिनोलॉजी एंड फॉरेंसिक साइंस और सीबीआई एकेडमी के अतिथि व्याख्याता, विभिन्न विषयों पर टीवी पैनल डिबेट. विज्ञान का इतिहास, वैज्ञानिक शोधपद्धति, अकादमिक पत्रकारिता और चुनाव यांत्रिकी में विशेष रुचि.

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First published: September 27, 2020, 5:10 PM IST
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