OPINION: राजस्थान अब आरपार के दौर में

राज्यपाल की दलील पर प्रतितर्क यह दिया जा रहा है कि अदालत में मामला तो पायलट गुट को अयोग्य करार देने के लिए विधानसभा अध्यक्ष के सिर्फ नोटिस को लेकर है. उसका विधानसभा सत्र को बुलाए जाने या न बुलाए जाने से कोई संबंध नहीं है. टीवी चैनलों परे तीन चार घंटों से विशेषज्ञ जो विमर्श करते रहे हैं उससे संदेश यही गया है कि राज्यपाल की यह दलील कच्ची पड़ सकती है.

Source: News18Hindi Last updated on: July 24, 2020, 10:39 PM IST
शेयर करें: Facebook Twitter Linked IN
OPINION: राजस्थान अब आरपार के दौर में
राजस्थान की राजनीति में आरपार की लड़ाई (फाइल फोटो)
राजस्थान में जो कुछ हो रहा है उसे अगर किसी खेल का नाम देना हो तो क्या वह शतरंज कहा जा सकता है? या उसे सांप सीढ़ी कहा जाए? कुछ लोग उसे छोटा मोटा महाभारत भी कह सकते हैं? लेकिन पिछले एक हफ़्ते से राजस्थान में जो होता रहा उसे लोकतांत्रिक राजनीति का आदर्श रूप कोई नहीं कहेगा. बहरहाल, शुक्रवार को इस मामले में खासी हलचल मची. हाईकोर्ट से यथास्थिति बनाए रखने के फैसले और राजभवन में गहलोत मंत्रिमंडल सहित विधायकों के प्रदर्शन और धरने के बाद मामला निर्णायक मोड़ पर दिखने लगा है. रात को ही गहलोत सरकार मंत्रिमंडल की बैठक करके सत्र बुलाने का औपचारिक प्रस्ताव तैयार करने वाली है. अब पूरे आसार हैं कि जल्द ही विधानसभा के भीतर सबकुछ तय हो जाएगा. क्योंकि मामले को और लटकाए रखने के सारे बहाने या तर्क खत्म हो चले हैं.

क्या कहा अदालत ने?
दरअसल, हाईकोर्ट ने शुक्रवार को भी फैसले जैसा कुछ किया नहीं है. उसने सिर्फ यथास्थिति बनाए रखने की बात कही. अलबत्ता मीडिया ने इसे पायलट के पक्ष में एक बड़ा फैसला बताते हुए खूब प्रचारित किया. जबकि इससे पायलट गुट के विधायकों बस इतनी राहत मिली है कि अदालत के आखिरी फैसले तक उसके विधायकों को आयोग्य करार नहीं दिया जा पाएगा. यानी उन्हें बस तबतक के लिए मोर्चाबंदी करने का समयभर मिला है. अगर यह गुट इस बात से खुशी जताता है तो उसे उसकी मौजूदा कमजोरी को उजागर करने वाला समझा जाना चाहिए. हालांकि हो यह भी हो सकता है कि इस बीच उस गुट को अपनी ताकत बढ़ाने का जुगाड़ करने का मौका मिल जाए. इस लिहाज से जरूर यथास्थिति का फैसला पायलट गुट के पक्ष में कहा जा सकता है. लेकिन इस बात को पायलट गुट खुलकर कह नहीं सकता. जिस फैसले पर कोई खुलकर खुशी तक न मना सके उसे उसके पक्ष में बड़ा फैसला कहना अतिश्योक्ति है.

गहलोत पक्ष को सक्रिय होने का मौका मिला
फैसला आने के चंद मिनटों के बाद ही गहलोत ने राजभवन जाकर विधायकों की परेड कराने का ऐलान कर दिया. परेड करवा भी दी. पहले से तय योजना के तहत गहलोत राज्यपाल के पास यह मांग लेकर पहुंचे कि विधानसभा का सत्र बुलाने की मंजूरी दें. गौरतलब है कि विधानसभा सत्र होने से खुद ब खुद तय हो जाएगा कि गहलोत सरकार के पास पर्याप्त विधायक हैं या नहीं. आखिरकार यही इकलौता तरीका है जिससे राजस्थान संकट का पटाक्षेप होना है. लेकिन शुक्रवार शाम तक स्थिति यह थी कि राज्यपाल ने सत्र बुलाने की मंजूरी देने में अड़चन बता दी. राज्यपाल की दलील है कि मामला अदालत में है. लिहाजा वे इस बारे में कानूनी रायमशविरा करना चाहते हैं. ये एक नया फच्चर आ गया. लेकिन कानूनी रायमशविरे में ज्यादा वक्त लगाया जाना आसान नहीं होगा. खासतौर पर तब जब गहलोत मंत्रिमंडल रात को ही बैठक करके सत्र बुलाने का औपचारिक प्रस्ताव भी पेश करने वाली है.

सत्र बुलाने और अदालती सुनवाई का संबंध
राज्यपाल की दलील पर प्रतितर्क यह दिया जा रहा है कि अदालत में मामला तो पायलट गुट को अयोग्य करार देने के लिए विधानसभा अध्यक्ष के सिर्फ नोटिस को लेकर है. उसका विधानसभा सत्र को बुलाए जाने या न बुलाए जाने से कोई संबंध नहीं है. टीवी चैनलों परे तीन चार घंटों से विशेषज्ञ जो विमर्श करते रहे हैं उससे संदेश यही गया है कि राज्यपाल की यह दलील कच्ची पड़ सकती है.क्या वाकई अखिरी मैदान में आने वाला है खेल
लगता तो यही है. होटलों में जो हो सकता था वह काफी हो चुका. हाईकोर्ट में जो हो सकता था वह शुक्रवार को काफी कुछ साफ हो चुका है. अदालत अन्याय का अंदेशा खत्म करने के लिए इस विधायी मामले को सिर्फ विचाराधीन ही रख सकती है. लेकिन उसके सामने सिर्फ विधानसभा अध्यक्ष के नोटिस की वैधता का ही मामला है. विशेषज्ञ बता रहे हैं और नज़ीरें बताती हैं कि अदालत विधानसभा सत्र को रूकवाने या टलवाने यानी विलंबित करवाने पर फैसले नहीं दिया करतीं. इन मामलों में उसकी सीमाएं हैं. इस तरह से किसी का यह उम्मीद लगाना कि अदालती

सुनवाई का तर्क देकर विधानसभा का सत्र टलवाया जा सकता है यह बहुत दूर की कौड़ी लग रही है. वैसे बात इतनी आगे बढ़ गई है कि विधानसभा अध्यक्ष के नोटिस के अब ज्यादा मायने रह नहीं गए हैं.

कोरोना का बहाना भी कच्चा माना गया
शुक्रवार को कुछ देर के लिए मीडिया में यह बात भी घुमाई गई कि कोरोना की दलील देकर सत्र को टलवाया जा सकता है. इस तर्क में भी एक अड़चन है. क्योंकि मप्र के मामले में कोरोना के बीच सत्र बुलाने और राज्य सभा चुनाव होने की नज़ीर यह बहाना मिलाने में भारी अड़चन पैदा करेगी. मीडिया में कुछ देर के लिए यह चर्चा तब चली जब राजभवन में राज्यपाल और गहलोत के बीच बात हो रही थी. लेकिन जल्द ही यह समझ में आ गया है कि यह तर्क कम से कम राज्यपाल के जरिए तो नहीं ही दिया जा सकता. एकचोट सरकार या कार्यपालिका यह दलील पेश भी कर सकती है. यानी विधानसभा सत्र को टलवाने के लिए तर्क या बहाने पैदा करने का टोटा पड़ता जा रहा है. माना जाना चाहिए कि मामले को अपनी वाजिब जगह यानी विधानसभा जाने से अब और देर तक रोकना बहुत मुश्किल है.

हालांकि नामुमकिन कुछ नहीं होता
कर्नाटक, महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश, ये तीन ऐसी नायाब नज़ीरें हैं कि यह दावा कोई नहीं कर सकता कि कोई चमत्कार नहीं बचा होगा. हालांकि इस समय देश की राजनीतिक और आर्थिक स्थितियां इतनी नाजुक हैं कि कोई भी राजनीकि दल नहीं चाहेगा कि राजस्थान की सत्ता के लिए अपने पूरे भविष्य को दाव पर लगा दे. क्योंकि जनता चश्मदीद बनी सब देख रही है. लोकतांत्रिक राजनीति में जनता वोट देने के बाद कुछ साल के लिए भले ही सिर्फ चश्मदीद ही रह जाती हो लेकिन वह हमेशा के लिए वंचित नहीं होती. राजनीतिक दल यह बात याद रखेंगे तो भविष्य के भारी  घाटे से बचे रहेंगे. (डिस्क्लेमरः ये लेखक के निजी विचार हैं)
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
सुधीर जैन

सुधीर जैन

अपराधशास्त्र और न्यायालिक विज्ञान में उच्च शिक्षा हासिल की. सागर विश्वविद्यालय में पढाया भी. उत्तर भारत के 9 प्रदेश की जेलों में सजायाफ्ता कैदियों पर विशेष शोध किया. मन पत्रकारिता में रम गया तो 27 साल 'जनसत्ता' के संपादकीय विभाग में काम किया. समाज की मूल जरूरतों को समझने के लिए सीएसई की नेशनल फैलोशिप पर चंदेलकालीन तालाबों के जलविज्ञान का शोध अध्ययन भी किया.देश की पहली हिन्दी वीडियो 'कालचक्र' मैगज़ीन के संस्थापक निदेशक, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ क्रिमिनोलॉजी एंड फॉरेंसिक साइंस और सीबीआई एकेडमी के अतिथि व्याख्याता, विभिन्न विषयों पर टीवी पैनल डिबेट. विज्ञान का इतिहास, वैज्ञानिक शोधपद्धति, अकादमिक पत्रकारिता और चुनाव यांत्रिकी में विशेष रुचि.

और भी पढ़ें

facebook Twitter whatsapp
First published: July 24, 2020, 10:36 PM IST
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर