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भारत के लिए सेहत की चुनौतियों से ज्यादा आर्थिक हादसा है कोरोना

हडसन की यह रिपोर्ट दक्षिण एशिया के आठ देशों पर कोरोना के असर का आकलन करने के लिए थी. इसीलिए स्वास्थ्य परिस्थितियों को सबसे पहले देखा गया. रिपोर्ट में दक्षिण एशिया को विश्व का तीसरा वह क्षेत्र बताया गया है जो कोरोना के असर से बदहाल हुआ. रिपोर्ट के मुताबिक कोरोना के फैलाव को रोकने के तमाम उपाय के बावजूद सिर्फ तीन महीने तक ही भारत में कोरोना नहीं बढ़ा.

Source: News18Hindi Last updated on: November 24, 2020, 4:19 PM IST
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भारत के लिए सेहत की चुनौतियों से ज्यादा आर्थिक हादसा है कोरोना
हडसन की यह रिपोर्ट दक्षिण एशिया के आठ देशों पर कोरोना के असर का आकलन करने के लिए थी.
एक अंतरराष्ट्रीय थिंक टैंक हडसन इंस्टिट्यूट की रिपोर्ट आई है कि दक्षिण एशियाई देशों ने कोरोना से किस तरह निपटा. दक्षिण एशियाई देशों में भारत सबसे बड़ा देश है. लिहाज़ा हडसन इंस्टिट्यूट की इस रिपोर्ट में अपने देश की चर्चा सबसे ज्यादा होनी ही थी. भारत, बांग्लादेश, श्रीलंका, और अफगानिस्तान और दूसरे चार छोटे देशों में पिछले नौ महीने में अपनाए गए तरीकों का जिक्र भी इस रिपोर्ट में है. इस रिपोर्ट का शीर्षक है पिछले नौ महीनों में दक्षिण एशिया पर कोरोना का असर. जाहिर है कि इस रिपोर्ट में कोरोना के कारण दक्षिण एशियाई देशों में स्वास्थ्य और आर्थिक परिस्थितियों पर पर पड़ने वाले असर की समीक्षा की गई है.

क्या कहा गया है भारत के बारे में
वैसे तो काफी कुछ कहा गया है लेकिन मुख्यरूप से बताया यही गया है कि भारत पर चिकित्सा और स्वास्थ्य परिस्थियों से ज्यादा आर्थिक रूप से बुरा असर पड़ा. वैसे तो यह कोई ज्यादा उल्लेखनीय बात नहीं मानी जानी चाहिए क्योंकि आठ महीने पहले 23 मार्च को जब कोरोना से निपटने के लिए लाॅकडाउन किया गया था तब यही ऐलान किया गया था कि जान है तो जहान है. ये अलग बात है कि सोचा यह गया था कि हम तीन हफ्तों में कोरोना को जीत लेंगे. लेकिन वैसा हो नहीं पाया. तीन हफ्ते के लाॅकडाउन से हालात काबू में नहीं आए और वह तालाबंदी बार-बार आगे बढ़ानी पड़ी. तीन हफ्ते के बजाए लगभग तीन महीने के लाॅकडाउन ने अर्थव्यवस्था की चिंता खड़ी कर दी. बस यही बात हडसन की रिपोर्ट में गौर से देखी गई है.

कोरोना छह महीने तक काबू में नहीं दिखा
हडसन की यह रिपोर्ट दक्षिण एशिया के आठ देशों पर कोरोना के असर का आकलन करने के लिए थी. इसीलिए स्वास्थ्य परिस्थितियों को सबसे पहले देखा गया. रिपोर्ट में दक्षिण एशिया को विश्व का तीसरा वह क्षेत्र बताया गया है जो कोरोना के असर से बदहाल हुआ. अपने देश की बात करें तो यह बात भी निकाल कर बताई गई कि कोरोना के फैलाव को रोकने के तमाम उपाय के बावजूद सिर्फ तीन महीने तक ही भारत में कोरोना नहीं बढ़ा बल्कि पूरे छह महीने यानी सितंबर मध्य तक कोरोना का ग्राफ बढ़ता ही रहा. हडसन का यह पर्यवेक्षण एक इस मायने में गौरतलब है कि सितंबर मध्य तक भारत में कोरोना के असर के बारे में देश के मीडिया में उतनी चिंता नहीं जताई गई. आज याद किया जा सकता है कि देश के स्वास्थ्य प्रशासक अपने किए उपायों को कारगर बताते रहे और कोरोना को लेकर बेफिक्री ही पैदा करते रहे. यहां यह भी गौर किया जा सकता है कि तब तक दुनिया के तमाम देशों में कोरोना की एक लहर आकर दूसरी लहर शुरू हो चुकी थी जब तक अपना देश पहली लहर को ही पूरा नहीं कर पाया था. जाहिर है कि इतने लंबे वक्त तक महामारी झेलने के कारण कामधंधों पर भारी असर पड़ा ही लिहाज़ा हडसन की रिपोर्ट में अगर यह बताया गया है कि दक्षिण एशिया के लिए कोरोना स्वास्थ्य हादसे से ज्यादा आर्थिक हादसा बन गया है तो यह कोई चैंकाने वाली बात नहीं है.

भारत में आर्थिक हादसे की बात किस तरह कही गई
सितंबर के मध्य तक भारत में कोरोना मामलों का तेजी से बढना लगातार जारी ही रहा. यहां तक कि प्रतिदिन संक्रमितों का आंकड़ा 97 हजार को पार कर गया था. यह बात हडसन की रिपोर्ट में खासतौर पर रेखांकित की गई है. रिपोर्ट में इस बात का जिक्र करते हुए यह भी लिखा गया है कि 23 मार्च को भारत में लाॅकडाउन लगाने के बाद से लेकर मध्य सितंबर तक प्रतिदिन कोरोना मामलों का ग्राफ एक बार भी सपाट नहीं हुआ बल्कि यह ग्राफ थोड़ा सा भी नीचे नहीं झुका. अब ये बिल्कुल ही अलग नजरिया है कि हमारे स्वास्थ्य प्रशासक तर्क दें कि लाॅकडाउन न किया गया होता तो स्थिति इससे भी ज्यादा भयावह हो जाती. ऐसे मामलों में अपनी अपनी तरह से समीक्षा करने की छूट सभी को रहती है.
समीक्षाएं तो हमेशा ही काम की होती हैं. और अगर किसी तीसरे पक्ष की तरफ से समीक्षा हो तो उस पर जरूर गौर किया जाना चाहिए.


मीडिया पर दबिश का जिक्र चैंकाने वाला है
स्वास्थ्य और आर्थिक परिस्थितियों के अलावा अगर कोई गौरतलब बात हडसन की रिपोर्ट में है तो वह मीडिया और राजनीतिक विपक्ष पर अंकुश के ज़िक्र के तौर पर है. सिर्फ भारत के बारे में ही इस तरह का जिक्र नहीं किया गया है बल्कि पाकिस्तान के लिए ज्यादा खुलकर कहा गया है. क्योंकि यह रिपोर्ट सिर्फ कोरोना के असर के आकलन तक सीमित है लिहाजा ज्यादा गुंजाइश थी नहीं कि यह विस्तार से बताया जाता कि भारत और पाकिस्तान में इस दौरान कब-कब क्या-क्या हुआ. फिर भी इसी दौरान मानवाधिकार निगरानी संस्था एमनैस्टी इंटरनेशनल का जिक्र किया गया है कि उसे इसी दौरान देश में अपना कामधाम रोकने का इरादा जताना पड़ा.

हमारे क्या काम आ सकता है रिपोर्ट का इशारा
समीक्षाएं तो हमेशा ही काम की होती हैं. और अगर किसी तीसरे पक्ष की तरफ से समीक्षा हो तो उस पर जरूर गौर किया जाना चाहिए. इस लिहाज से अगर हडसन इंस्टिट्यूट ने यह याद दिलाया है कि कोरोना ने स्वास्थ्य से भी कहीं ज्यादा आर्थिक क्षेत्र पर असर डाला है तो अब हमें अपनी तरफ से भी अपनी अर्थव्यवस्था के बारे में गंभीरता के साथ आकलन शुरू कर देना चाहिए. मसलन अगर हडसन की रिपोर्ट में बताया गया है कि कोरोना के शुरुआती नौ महीनों में 14 करोड़ लोगों के रोजगार पर असर पड़ा तो कम से कम हमें अपनी तरफ से भी एक तथ्यपरक समीक्षा कर लेनी चाहिए. बेरोज़गारी की बात इसलिए और ज्यादा गौरतलब है क्योंकि कोरोना के पहले से यह समस्या अपने पूरे उफान पर थी. हमें इसकी गंभीरता को कबूल करने में इसलिए भी कोई हिचक नहीं होना चाहिए कि भर कोरोना के बीच में ही देश में 20 लाख करोड़ रुपये के राहत पैकेज का ऐलान अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए ही किया गया था. सीधे सीधे न सही लेकिन एक तरह से यही माना गया था कि इससे घूम फिरकर यह पैसा अर्थव्यवस्था में पहुंचेगा और रोजगार के मौके पैदा होंगे.

रणनीति में सुधार की काशिशें की जाती रहें.
भले ही हडसन की रिपोर्ट ने अगर कोई नई बात न भी कही गई हो और सिर्फ याद ही दिलाया गया हो तो हमें उसे कम महत्व का नहीं मानना चाहिए. अपने देश के आर्थिक प्रशासकों को फौरन ही जांच पड़ताल में लग जाना चाहिए कि अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए जो भारी भरकम राहत पैकेज के एलान किए गए थे उन पर क्या काम चल रहा है. और क्या उसके अलावा और कुछ करने की भी जरूरत है?  (डिस्क्लेमर: यह लेखक के निजी विचार हैं.)
ब्लॉगर के बारे में
सुधीर जैन

सुधीर जैन

अपराधशास्त्र और न्यायालिक विज्ञान में उच्च शिक्षा हासिल की. सागर विश्वविद्यालय में पढाया भी. उत्तर भारत के 9 प्रदेश की जेलों में सजायाफ्ता कैदियों पर विशेष शोध किया. मन पत्रकारिता में रम गया तो 27 साल 'जनसत्ता' के संपादकीय विभाग में काम किया. समाज की मूल जरूरतों को समझने के लिए सीएसई की नेशनल फैलोशिप पर चंदेलकालीन तालाबों के जलविज्ञान का शोध अध्ययन भी किया.देश की पहली हिन्दी वीडियो 'कालचक्र' मैगज़ीन के संस्थापक निदेशक, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ क्रिमिनोलॉजी एंड फॉरेंसिक साइंस और सीबीआई एकेडमी के अतिथि व्याख्याता, विभिन्न विषयों पर टीवी पैनल डिबेट. विज्ञान का इतिहास, वैज्ञानिक शोधपद्धति, अकादमिक पत्रकारिता और चुनाव यांत्रिकी में विशेष रुचि.

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First published: November 24, 2020, 4:12 PM IST
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