कोरोना के नए स्‍ट्रेन के मारे ब्रिटेन से सबक लेने में हर्ज नहीं

दुनिया में खासतौर पर ब्रिटेन में कोरोना वायरस का नया स्‍ट्रेन मिलने के बाद हर देश की चिंता बढ़ रही है.

Source: News18Hindi Last updated on: December 30, 2020, 10:25 AM IST
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कोरोना के नए स्‍ट्रेन के मारे ब्रिटेन से सबक लेने में हर्ज नहीं
ब्रिटेन में मिला है कोरोना वायरस का नया स्‍ट्रेन. (File pic)
बेशक देश में कोरोना के प्रतिदिन बढ़ने वाले मरीजों की संख्या घट रही है. लेकिन अभी भी कमोबेश 20 हजार लोग रोज संक्रमित हो रहे हैं. क्या हमें निश्चिंत हो जाना चाहिए? ज्यादातर विशेषज्ञों का सुझाव है कि बिल्कुल भी हमें निश्चिंत नहीं होना चाहिए. स्वास्थ्य प्रशासक भी लगातार सावधानी बरतने की सलाह दे रहे हैं. लेकिन इसी बीच दुनिया में खासतौर पर ब्रिटेन में कोरोना वायरस का नया स्‍ट्रेन मिलने के बाद हर देश की चिंता बढ़ रही है.

इमरजेंसी में बनी वैक्सीन के प्रभावी होने का सवाल
जितनी भी कंपनियां वैक्सीन बनाने में लगी थीं वे सभी अब तक अपनी अपनी वैक्सीन के कारगर होने की बातें ही ज्यादा करती रही हैं. लेकिन यह बात उजागर हो चुकी है कि निर्माणाधीन लगभग सभी प्रकारों की वैक्सीन एक निश्चित प्रकार के वायरस से निपटने के लिए बनाई जा रही है. अब अगर वायरस का नया रूप् सामने आ रहा है तो वैज्ञानिकों की चिंता स्वाभाविक है. हालांकि भारी भरकम खर्च वाले शोध के बाद वैक्सीन बनाने का काम इतना आगे बढ़ चुका है कि युद्धस्तर पर टीकाकरण अभियान चलाने की तैयारियां भी कर ली गई हैं. इसीलिए कुछ देशों के विशेषज्ञ यह उम्मीद बंधाने में लगे हैं कि उनके द्वारा विकसित की गई या विकसित की जारी वैक्सीन वायरस के नए रूप् पर भी कारगर हो सकती है. लेकिन दावे के साथ अभी किसी ने नहीं कहा है कि वह कारगर होगी ही. क्योंकि नए वायरस पर भी उसके कारगर रहने का पता टीकाकरण हो जाने के बाद ही चल सकता है. या फिर नए वायरस पर इसके असर को लेकर परीक्षण का नया दौर शुरू हो.

नए परीक्षणों में लंबा समय लगने की झंझट
वैक्सीन बनाने में सबसे बड़ी दिक्कत लंबा समय लगने की होती है. शुरू में कहा जा रहा था कि यह समयसाध्य कार्य है और जल्द ही टीका तैयार होने की उम्मीद न रखी जाए. लेकिन कोरोना के सामने लाचार लगभग हर देश की सरकार ने वैज्ञानिकों पर दबाव डालकर 15 साल का काम एक साल के भीतर ही करवाया. चिकित्सा जगत में एक नया प्रावधान तैयार किया गया कि आपात स्थितियों में समय से पहले ही टीकाकरण अभियान शुरू कर दिया जाए. अलबत्ता लगभग हर कंपनी ने टीका तैयार करने के लिए परीक्षणों के सभी दौर पूरे करने की औपचारिकताएं मजबूरी में पूरी कीं.

आपात स्थितियों की मजबूरी रही है कि दवा कंपनियों ने अपने अपने टीकों के कारगर होने का ऐलान किया है.


और अब जब अपना रूप बदलने वाले वायरस का नया स्‍ट्रेन उजागर हुआ है तो उन कंपंनियों को इसके प्रभावी होने के बारे में नए प्रकार से दिलासा देना पड़ रहा है कि निर्माणाधीन वैक्सीन वायरस के नए रूप् पर भी कारगर हो सकती है. यह वैज्ञानिकों का दावा नहीं बल्कि सदइच्छा भर है. इसीलिए मानकर चलना चाहिए कि कोरोना का नया रूप विज्ञान जगत पर आगे और परीक्षण का दबाव पैदा कर रहा है.इसे वैश्विक महामारी यूं ही घोषित नहीं किया गया
वैश्विक महामारी के बारे में एक समयसिद्ध ज्ञान यह है कि जब तक विश्व का हर कोना संक्रमणमुक्त न हो जाए तब तक कोई भी देश खुद को सुरक्षित मानकर नहीं चल सकता. खासतौर पर वैश्वीकरण के युग में एक दूसरे देश पर निर्भरता इतनी ज्यादा है कि कोरोना के रिकॉर्डतोड़ फैलाव के बीच ही लगभग हर देश को अपनी अर्थव्यवस्थाओं की चिंता करनी पड़ी और दुनियाभर में आवाजाही शुरू करनी पड़ी. इस समय ब्रिटेन में नए रूप में दिखा कोरोना वायरस दुनियाभर में फैलने का अंदेशा खड़ा हुआ है तो इसीलिए खड़ा हुआ है कि ज्यादातर देश वायुसेवाओं को रोककर नहीं रख पाए. बहरहाल, जो हुआ सो हो चुका. लेकिन आगे के लिए सबक है कि जब तक पूरी दुनिया के कोरोनामुक्त होने का एलान नहीं हो जाता तब तक वैसी ही सावधानियां बरती जाएं जैसी देश में चैतरफा लॉकडाउन के समय बरतने को कहा जा रहा था.

अपने मौजूदा हालात की समीक्षा करते रहने की जरूरत
सरकार, स्वास्थ्य प्रशासक और मीडिया का एक बड़ा तबका लगातार कोरोना को काबू में कर लेने की उपलब्धियां गिना रहा है. ये सूचनाएं नागरिकों के व्यवहार में निश्चिंतता ला रही हैं. बेशक फिजूल का भय या चिंता भी घातक होती है लेकिन वाजिब चिंता जरूरी भी होती है. याद रखना चाहिए कि कोरोना से हम हद से ज्यादा नुकसान भुगत चुके हैं.

अब तक की परिस्थितियों की सिलसिलेवार समीक्षा होगी तभी पता चलेगा कि देश में संक्रमितों का आंकड़ा एक करोड़ से भी ज्यादा क्यों पहुंच गया. तभी यह पता चलेगा कि हमसे कहां कहां कोताही हो गई? और आगे किस तरह की सतर्कता बरतने की जरूरत है.


इस समय भी प्रतिदिन मरीजों का आंकड़ा कम न माना जाए
अपने स्वास्थ्य प्रशासक 20 हजार मरीज प्रतिदिन बढ़ने की स्थिति को हालात काबू में आना बता रहे हैं. उन्हें याद दिलाया जाना चाहिए कि जिसदिन 23 मार्च को देश में पूर्णबंदी लागू की गई थी उस दिन देश में कोरोना संक्रमितों का कुल आंकड़ा 519 मरीज था. लॉकडाउन के उपाय से युद्धस्तर पर कोशिश की गई थी कि इसका फैलाव रोका जाए. अफसरों को यह भी याद दिलाया जाना चाहिए कि इस समय देश में कुल संक्रमित हुए मरीजों का आंकड़ा एक करोड़ दो लाख 30 हजार को पार कर गया है. एक लंबे अर्से से हम दुनिया में संक्रमित 215 देशों की सूची में आज भी दूसरे नंबर पर हैं. और दूर दूर तक आसार नज़र नहीं आ रहे हैं कि संक्रमितों की सूची में अपना स्थान बेहतर बना सकें. इतना ही नहीं देश में कोरोना के आंकड़ों का रूझान बता रहा है कि अभी हम पहली लहर के ही दौर में है. बेशक कुछ चुनिंदा देशों ने पहली लहर के बाद अपने देश में दूसरी लहर नहीं आने दी. लेकिन ज्यादातर देश दूसरी और तीसरी लहर से खुद को नहीं बचा पाए. यूरोप के देशों ने एक के बाद एक लहर में कोरोना का संकट और ज्यादा बढ़ता ही देखा है. अपनी समझदारी इसी में है कि दूसरी लहर से बचाव के लिए अधिकतम सावधानी बरतने पर लग जाएं. इधर ब्रिटेन में दिखे कोरोना के नए रूप् ने पूरी दुनिया की चिंता नए सिरे से बढ़ा दी है. जाहिर है हम भी खुद को उस चिंता से मुक्त मानकर नहीं चल सकते.

हमें एक दूसरे को यह याद दिलाते रहना चाहिए कि जब तक वैक्सीन का अभियान कारगर नहीं हो जाता तब तक उसी तरह की सतर्कता की जरूरत है जिस तरह की सावधानी लॉकडाउन लगने के दिन बरती जा रही थी. याद यह भी दिलाया जा सकता है कि सावधानी तभी बरती जाती है जब उस बात को लेकर जायज़ और पर्याप्त चिंता हो. महामारी के मामले में ज़रा सी खुशफहमी भी भारी पड़ सकती है. यूरोप के देश इस समय उस खुशफहमी का शिकार हो रहे हैं. ब्रिटेन की हालत से सबक लेने में हर्ज नहीं है. (डिसक्‍लेमर- यह लेखक के निजी विचार हैं.)
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
सुधीर जैन

सुधीर जैन

अपराधशास्त्र और न्यायालिक विज्ञान में उच्च शिक्षा हासिल की. सागर विश्वविद्यालय में पढाया भी. उत्तर भारत के 9 प्रदेश की जेलों में सजायाफ्ता कैदियों पर विशेष शोध किया. मन पत्रकारिता में रम गया तो 27 साल 'जनसत्ता' के संपादकीय विभाग में काम किया. समाज की मूल जरूरतों को समझने के लिए सीएसई की नेशनल फैलोशिप पर चंदेलकालीन तालाबों के जलविज्ञान का शोध अध्ययन भी किया.देश की पहली हिन्दी वीडियो 'कालचक्र' मैगज़ीन के संस्थापक निदेशक, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ क्रिमिनोलॉजी एंड फॉरेंसिक साइंस और सीबीआई एकेडमी के अतिथि व्याख्याता, विभिन्न विषयों पर टीवी पैनल डिबेट. विज्ञान का इतिहास, वैज्ञानिक शोधपद्धति, अकादमिक पत्रकारिता और चुनाव यांत्रिकी में विशेष रुचि.

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First published: December 30, 2020, 10:25 AM IST
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