दूसरे देशों में चालू टीकाकरण की दिक्कतों पर नजर की जरूरत

कोरोना टीकाकरण (Coronavirus) बिल्कुल ही अलग तरह का अभियान है. इस तरह के अभियान का अनुभव किसी के पास है नहीं. लिहाजा दूसरे के अनुभव से लाभ उठाने के मौकों पर नज़र रखी जानी चाहिए.

Source: News18Hindi Last updated on: January 4, 2021, 2:26 PM IST
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दूसरे देशों में चालू टीकाकरण की दिक्कतों पर नजर की जरूरत
कोरोना टीकाकरण (Coronavirus) बिल्कुल ही अलग तरह का अभियान है. इस तरह के अभियान का अनुभव किसी के पास है नहीं. लिहाजा दूसरे के अनुभव से लाभ उठाने के मौकों पर नज़र रखी जानी चाहिए.
काफी कुछ पक्का हो गया कि देश में कोरोना टीकाकरण (Coronavirus) की शुरुआत कोविशील्ड (Covishield) नाम की वैक्सीन लगाए जाने से होगी. ऑक्सफोर्ड एस्ट्रेजेनेका की यह वैक्सीन अपने यहां सीरम इंस्‍टीट्यूट मैन्यूफैक्चर कर रही है. अपने देश में कोविशील्ड और कोवैक्‍सीन को आखिरी मंजूरी मिलने के बाद टीकाकरण की तैयारियों ने जोर पकड़ लिया है. ड्राई रन यानी टीकाकरण अभियान का रिहर्सल भी कर लिया गया है. आज दिन तक की स्थिति पर गौर करें तो दस पंद्रह दिन में टीके लगना शुरू हो सकते हैं. इस अभियान के समय पर गौर करें तो दूसरे देशों की तुलना में अपने यहां कुछ देर से टीकाकरण होने का एक फायदा भी मिलेगा. कई देशों में यह अभियान जिस तरह कुछ पहले शुरू हो चुका है, उनके अनुभव और वहां की सूचनाएं उपलब्ध हैं. दूसरे देशों में क्या क्या दिक्कत आ रही हैं, उनसे हमारी सरकार और स्वास्थ्य प्रशासक सबक ले सकते हैं.

हालात बता रहे हैं कि आगे भी हमें जानते समझता रहना पड़ेगा कि महामारी से निपटने के लिए देश दुनिया में क्या काम हो रहा है.


टीकाकरण अभियान के मोर्चे पर हमारी क्या तैयारी
ऑक्‍सफोर्ड की कोविशील्ड के अलावा पूरी तौर पर अपने देश में ही बन रही वैक्सीन कोवैक्‍सीन को भी आपात मंजूरी दे दी गई है. हालांकि पूरी तौर पर देसी कोवैक्‍सीन अभी परीक्षण के दौर में ही है लिहाजा यही मानकर चलना चाहिए कि कोविशील्ड से ही टीकाकरण अभियान की शुरुआत होगी. गौरतलब है कि ऑक्‍सफोर्ड एस्ट्रेजेनेका से 50 करोड़ टीके खरीदने का करार भारत सरकार बहुत पहले कर चुकी है. देश में टीकाकरण की मौजूदा तैयारियों की बात करते समय याद दिलाया जा सकता है कि दुनिया की विभिन्न कंपनियों से देश ने कुल 160 करोड़ डोज़ खरीदने के आर्डर पहले से बुक कर रखे हैं.
हालांकि इसमें सबसे बड़ा आर्डर अमेरिकी कंपनी नोवावैक्स के टीके खरीदने का है. उससे भारत ने टीके की 100 करोड़ डोज़ खरीदने का करार कर रखा है. लेकिन यह टीका अभी भी परीक्षण के दौर में है. बहरहाल 160 डोज में बाकी बचे दस करोड़ डोज का आर्डर रूस की स्पूतनिक का है. यानी तरह तरह के टीके खरीदने के लिए आर्डर बुक करने का काम बहुत पहले हो चुका है. दरअसल कुछ महीने पहले जब दुनिया के ज्यादातर देशों की सरकारें कोरोना से निपटने में खुद को लाचार पा रही थीं, उस समय भविष्य के कई काम निपटाए गए थे. उनमें एक काम टीकों को बुक करना भी था.

कोविशील्ड का ही आसरा क्यों?
इसका एक सीधा सा कारण है कि यह वैक्सीन कम ठंडक में भी सुरक्षित बनी रहती है. जिस समय करार करने का काम चल रहा था उस समय ज्यादा चर्चित फाइजर की वैक्सीन के मुकाबले ऑक्‍सफोर्ड की यह वैक्सीन सस्ती भी थी. फाइजर के टीके ने बेशक अपना काम कुछ पहले पूरा कर लिया लेकिन मुश्किल यह थी कि फाइजर का टीका शून्य से 70 डिग्री नीचे की ठंडक में सुरक्षित रहता है. देश में इतनी ज्यादा ठंडक की व्यवस्था बनाना बड़ा मुश्किल काम था. जबकि कोविशील्ड नामक टीका शून्य से उपर दो से आठ डिग्री की ठंडक में सुरक्षित बना रह सकता है.अगर सिर्फ पांच दिन सुरक्षित रखना हो तो घरेलू इस्तेमाल के सामान्य फ्रिज में भी इसे रखा जा सकता था. यानी अच्छा हुआ कि फाइजर की वैक्सीन के कई देशों में लगनी शुरू होने के कुछ हफ्तों बाद ही ऑक्‍सफोर्ड की कोविशील्ड को भारत में आपात मंजूरी दे दी गई. वरना एक बड़ा सवाल खड़ा हो जाता कि अगर कई देशों में फाइजर की वैक्सीन लगने लगी है तो उसे खरीदकर भारत में भी फौरन क्यों नहीं लगवाई जा रही है. बहरहाल कोविशील्ड को भारत में मंजूरी मिलने के बाद अब यह सवाल बचा नहीं है.

कोविशील्ड के पांच करोड़ डोज तैयार
गौरतलब है कि सीरम इंस्‍टीट्यूट कोविशील्ड के पांच करोड़ डोज बना चुका है और उसका दावा है कि अपनी क्षमता के मुताबिक वह जुलाई तक कुल तीस करोड़ डोज बनाकर दे सकता है. यानी इस समय देश के सामने टीकों की उपलब्धता को लेकर कोई संशय नहीं है. और वैसे भी भारत ने जिस कंपनी से 100 करोड़ डोज खरीदने का करार कर रखा है उस अमेरिकी कंपनी नोवावैक्स की वैक्सीन भारत में सीरम इस्टीटयूट ही बना रही है. यह भी बड़ी काम की जानकारी है कि नोवावैक्स भारत के सीरम इंस्टिट्यूट से ही 200 करोड़ डोज बनवा रही है.

अनुमान यह है कि नोवावैक्स की सौ करोड़ डोज़ भारत में ही खप जाएंगी और बाकी बचीं 100 करोड डोज़ अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन जैसे कई देशों को चली जाएंगी. हालांकि इस समय क्योंकि यह वैक्सीन परीक्षण के दौर में है सो फौरन लगाए जाने के लिए उपलब्ध नहीं है. और इसीलिए कोरोना से बुरी तरह जूझ रहे अमेरिका में फाइजर और माडर्ना के टीके ही पहले लगना शुरू हुए हैं.

वैसे भी सभी देशों ने दुनिया की विभिन्न कंपनियों के टीके पहले से इसलिए ही बुक करके रखे ताकि ऐन मौके पर वैक्सीन मिलने में कोई झंटट न हो.


मोटे तौर पर क्या फर्क है तीनों वैक्सीनों में
प्रौद्योगिकी के नज़रिए से देखें तो फाइजर और मॉडर्ना के टीके मेसेंजर आरएनए आधारित हैं जबकि कोविशील्ड वैक्सीन चिंपाजी में संक्रमण फैलाने वाले एडिनो वायरस को मॉडिफाई करके बनी है. इस बारे आमतौर पर कोई एक राय नहीं बन पाती कि कौन सी प्रौद्योगिकी बेहतर हो सकती है. लिहाजा यही देखा जाता है कि कौन सा टीका ज्यादा सुरक्षित और ज्यादा कारगर होगा. इस लिहाज से तीनों के बीच तुलना यह है कि फाइजर और मॉडर्ना के टीकों की एफीकेसी यानी कारगर रहने की क्षमता औसतन 95 फीसद है जबकि कोविशील्‍ड औसतन 70 फीसद कारगर है. हालांकि किसी वैक्सीन को देश के स्तर पर काम का मानने के लिए 60 फीसद कारगर रहना ही पर्याप्त मान लिया जाता है.

लिहाजा यह बात बहुत ज्यादा मायने नहीं रखती. लेकिन तीनों टीकों के दाम में काफी अंतर है. कोरोना की भयावह समस्या के मद्देनज़र दामों में यह अंतर भी ज्यादा मायने नहीं रखता. लेकिन फाइजर के टीके को बरतने के लिए जिस तरह की व्यवस्थाएं चाहिए वह बहुतेरे देशों में बन पाना मुश्किल दिखाई दे रही हैं. खासतौर पर इस टीके को बचाए रखने के लिए शून्य से नीचे यानी माइनस 70 डिग्री की ठंडक की व्यवस्था होनी चाहिए. जबकि मॉडर्ना की वैक्सीन माइनस 20 डिग्री तापमान में छह महीने टिकी रहेगी. लेकिन ऑक्‍सफोर्ड की वैक्सीन जिसे अपने देश में कोविशील्ड नाम दिया गया है वह शून्य के उपर दो से आठ डिग्री तापमान में भी सुरक्षित रह सकती है. इसीलिए भारत में उपलब्ध कोल्ड चेन व्यवस्थाओं के मद्देनजर ऑक्‍सफोर्ड की वैक्सीन को माकूल समझा गया है.

क्या फाइजर के टीके की संभावनाएं खत्म मानी जाएं?
किन्हीं कारणों से आगे अगर जरूरत पड़ी तो भारत में फाइजर की वैक्सीन इस्तेमाल होने की संभावनाएं अभी खत्म नहीं मानी जानी चाहिए. क्योंकि कुछ दिन पहले ही फाइजर ने भारत के लिए अपनी वैक्सीन के दाम को कम करने और ठंडक की खर्चीली व्यवस्था के लिए तापमान नियंत्रित बक्सों में टीके अस्पतालों तक कंपनी के खर्चे पर भिजवाने की बात कही है. इन बक्सों में दस दिन तक माइनस 70 डिग्री तापमान को बनाए रखने की व्यवस्था होगी बशर्ते बीच में उसे खोला न गया हो. और अस्पतालों पर पहुंचने के बाद उसे सिर्फ दो से आठ डिग्री तापमान पर पांच दिन के लिए स्टोर किया जा सकता है. जाहिर है कि किसी अफे दफे की हालत में अगर फाइजर की वैक्सीन इस्तेमाल करने की जरूरत पड़ गई तो वैसी संभावनाएं अभी खत्म नहीं हुई हैं.

वैक्सीन के अलग-अलग दाम
प्रमुख वैक्सीनों के दामों पर सरसरी नज़र डालें तो फाइजर की वैक्सीन 20 डालर की है और मॉडर्ना के दाम 33 डालर हैं. जबकि ऑक्‍सफोर्ड की एक डोज़ सिर्फ चार डालर की यानी 300 रुपये की है. भारत सरकार क्योंकि भारी मात्रा में खरीद रही है तो इसका दाम घटाकर 200 रुपए करने की बात कही गई है. लेकिन अगर निजी तौर पर भी इसे भारतीय बाजार में बेचने की व्यवस्था बनानी पड़ी तो इसे कम से कम 500 रुपए प्रति डोज के दाम पर बेचने की बात कही जा रही है.

ज्यादातर टीके दो डोज में पैदा करेंगे पूरा असर
अब तक चर्चा में आईं ज्यादातर वैक्सीन दो डोज में पूरा असर पैदा करने वाली हैं. इन दो डोज को एक निश्चित अंतराल के बाद लगाना पड़ेगा. लेकिन एक वैक्सीन ऐसी भी आ रही है जो सिर्फ एक डोज में ही पूरा असर पैदा कर देगी. यह है जॉनसन एंड जॉनसन की वैक्सीन. लेकिन यह वैक्सीन अभी परीक्षण के तीसरे चरण में ही है.

सरकारों और दवा कंपनियों के दावों को परखने में लंबा वक्त लगेगा
सबके दावों को परखने में लंबा वक्त लगेगा. टीकों के दामों में फर्क? उसे लगाने की व्यवस्थाओं में लंबा चैड़ा फर्क, उनके सुरक्षित और कारगर रहने के संभावनाएं जैसे नुक्ते कंपनियों के अपने अपने दावों पर ही आधारित हैं. सभी को सरकारी मंजूरी भी आपात स्थितियों के नाम पर मिली है. पक्के तौर पर तभी कुछ कहा जा सकेगा जब टीकाकरण अभियान को शुरू हुए कम से कम दो महीने गुजर जाएंगे. अभी एक और मसला यह भी है कि ये टीके लगने के बाद कितने समय के लिए प्रतिरोधी क्षमता बढाए रख पाएंगे. इसका पक्का पता साल भर बाद ही चल पाएगा.

इनके अलावा बिल्कुल नया सवाल यह भी पैदा हो गया है कि ये सारी वैक्सीन कोरोना के नए नए रूपों पर भी कारगर होंगी या नहीं. हालांकि दावा सभी ने किया है कि उनकी वैक्सीन कोरोना वायरस के सभी रूपों पर कारगर हो सकती है लेकिन पक्का यकीन दिलाने का तर्क अभी तक किसी के पास नहीं है. पुख्ता जवाब के लिए इंतजार करना पडेगा. यह इंतजार सिर्फ अपने देश को ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया को करना होगा. बस अपने लिए कोई अच्छी बात है तो यही है कि हम दूसरे कुछ देशों के मुकाबले कुछ देर से टीकाकरण अभियान शुरू कर रहे हैं. जाहिर है इस बीच टीकाकरण चालू होने के बाद दूसरे देशों को आ रही परेशानियों से सबक लेने का मौका हमारे पास है.

नागरिकों में उत्साह और हिचक का नुक्ता
अपने देश में टीकाकरण शुरू होने के पहले हमें इस बात को जरूर गौर से देख लेना चाहिए कि अमेरिका में सारी सुविधाओं के बावजूद टीकाकरण का काम लक्ष्य के तुलना में बहुत धीमी रफ्तार से चल पा रहा है. वहां नागरिकों का एक तबका टीका लगवाने से परहेज कर रहा है. अमेरिका में टीकाकरण विरोधी इस तबके का नाम एंटीवैक्स रखा गया है. अमेरिका में एक विकट स्थिति यह भी है कि एंटीवैक्स के बावजूद टीके लगाने की जगह लोगों की लंबी-लंबी लाइनें लग रही हैं. बुजुर्गों को बहुत लंबे समय के लिए लाइनों में इंतजार करना पड़ रहा है.

समयवद्धता का जो लक्ष्य बनाया गया था वह बहुत पीछे छूट गया है. इसीलिए अमेरिका में टीकाकरण अभियान को सफल बनाने के लिए वहां की सेलेब्रिटी यानी मशहूर हस्तियों को टीका लगवाते हुए प्रसन्न मुद्रा में दिखाने का प्रचार अलग से करना पड़ रहा है. अभी यह साफ नहीं है कि इस तरह की बातों के पीछे अमेरिका में स्वास्थ्य संबंधी अंदेशे हैं या कोई राजनीतिक कारण है या वहां के नागरिकों का स्वभाव संबंधी कोई कारण हैं. लेकिन इस समस्या पर उन देशों को गौर जरूर करना चाहिए जहां अभी यह अभियान शुरू नहीं हुआ है.

दुनिया में कहा-कहां शुरू हो चुका है टीकाकरण
दुनिया में दो रोज पहले तक कम से कम एक करोड़ टीके लग चुके थे. इसमें चीन में 45 लाख, अमेरिका में 28 लाख, ब्रिटेन और इजराइल में दस दस लाख टीके लगाए जा चुके हैं. इसके अलावा जर्मनी रूस और कनाडा जैसे तमाम देशों में भी टीकाकरण शुरू हो चुका है. हमारे स्वास्थ्य प्रशासकों को इन देशों की टीकाकरण गतिविधियों को गौर से देखते रहना चाहिए. कोरोना टीकाकरण बिल्कुल ही अलग तरह का अभियान है. इस तरह के अभियान का अनुभव किसी के पास है नहीं. लिहाजा दूसरे के अनुभव से लाभ उठाने के मौकों पर नज़र रखी जानी चाहिए.(डिसक्‍लेमर: यह लेखक के निजी विचार हैं.)
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
सुधीर जैन

सुधीर जैन

अपराधशास्त्र और न्यायालिक विज्ञान में उच्च शिक्षा हासिल की. सागर विश्वविद्यालय में पढाया भी. उत्तर भारत के 9 प्रदेश की जेलों में सजायाफ्ता कैदियों पर विशेष शोध किया. मन पत्रकारिता में रम गया तो 27 साल 'जनसत्ता' के संपादकीय विभाग में काम किया. समाज की मूल जरूरतों को समझने के लिए सीएसई की नेशनल फैलोशिप पर चंदेलकालीन तालाबों के जलविज्ञान का शोध अध्ययन भी किया.देश की पहली हिन्दी वीडियो 'कालचक्र' मैगज़ीन के संस्थापक निदेशक, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ क्रिमिनोलॉजी एंड फॉरेंसिक साइंस और सीबीआई एकेडमी के अतिथि व्याख्याता, विभिन्न विषयों पर टीवी पैनल डिबेट. विज्ञान का इतिहास, वैज्ञानिक शोधपद्धति, अकादमिक पत्रकारिता और चुनाव यांत्रिकी में विशेष रुचि.

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First published: January 4, 2021, 2:16 PM IST
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