दूसरे टी-20 की जीत में भी छुपा है एक सबक

दसवें ओवर में सिर्फ पांच रन बने. धवन और कोहली क्रीज़ पर थे. सिर्फ एक ही विकेट गिरा था. तब तक 85 रन ही बने थे. जाहिर है कि बाकी के दस ओवर में 110 रन बनाने का दबाव शुरू हो गया था. और बारहवे ओवर में तेजी पकड़ने के दबाव में ही धवन आउट हुए. यहां तक भी उतनी ज्यादा चिंता की बात नहीं थी.

Source: News18Hindi Last updated on: December 6, 2020, 8:38 PM IST
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दूसरे टी-20 की जीत में भी छुपा है एक सबक
पंड्या ने 22 गेंद में 42 रन की आक्रामक पारी खेलकर ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ दूसरे टी20 अंतरराष्ट्रीय मैच में भारत की छह विकेट की जीत में अहम भूमिका निभाई. उनकी मदद से मेहमान टीम ने अंतिम ओवर में 14 रन बनाकर तीन मैचों की टी20 सीरीज में 2-0 की अजेय बढ़त बना ली.
दूसरे टी-20 में हम जीत गए. सीरीज़ भी जीत गए. लेकिन इस जीत में भी आगे के लिए एक सबक है. यह जीत भी सिखा कर गई है कि फटाफट क्रिकेट तेजी से खेलने के हुनर वाला ही खेल है. वरना आज के खेल में कई ऐसे मौके आ गए थे कि हमने 195 का लक्ष्य पा पाना अपने लिए कुछ मुश्किल बना लिया था.

पांड्या और श्रेयस ने बात बना दी
जब विराट कोहली आउट होकर गए थे उस समय भारत को जीत के लिए 46 रन की जरूरत थी और सिर्फ 23 गेंदें बची थीं. शुरू के चार प्रमुख खिलाड़ी पैवेलियन लौट चुके थे. गौर करने की बात यह है कि पांड्या तेज खेलने के मामले में मशहूर जरूर हैं लेकिन उन्हें आॅलराउंडर ही माना जाता है और यह खुटका हमेशा बना रहता है कि तेजी से ठुकाई के चक्कर में कभी भी वापस आ सकते हैं. लेकिन आज वे काम कर गए. और बेशक नियमित बल्लेबाज श्रेयस अइयर ने भी पांडया की टक्कर की रफ्तार से ही बनाकर मैच जिता दिया.

बीच में क्यों दिखने लगी थी कमजोरी
बीस ओवर के फटाफट क्रिकेट में धांय धांय का हुनर ही काम आता है. आस्ट्रेलिया ने 195 का लक्ष्य दिया था. यानी पौने दस रन प्रतिओवर की रफ्तार से रन बनाने थे. लक्ष्य का पीछा करने वाली टीम के लिए यह रफ्तार इतनी ज्यादा होती है कि शुरुआती दस या पंद्रह ओवर तक सुरक्षित खेलने से, बाद के ओवर में आवश्यक रन रेट बहुत ही ज्यादा बढ़ जाता है. इसीलिए बड़े स्कोर का पीछा करने में समझदारी इसीमें होती है कि रन रेट का दबाव बढ़ने न दिया जाए. लेकिन आज के खेल में अपनी टीम की समीक्षा करते समय संकोच नहीं बरतना चाहिए कि पावर प्ले के बाद के आठ ओवरों में हमने अपने उपर दबाव बन जाने दिया.

दसवें ओवर में दबाव शुरू हो चुका था
दसवें ओवर में सिर्फ पांच रन बने. धवन और कोहली क्रीज़ पर थे. सिर्फ एक ही विकेट गिरा था. तब तक 85 रन ही बने थे. जाहिर है कि बाकी के दस ओवर में 110 रन बनाने का दबाव शुरू हो गया था. और बारहवे ओवर में तेजी पकड़ने के दबाव में ही धवन आउट हुए. यहां तक भी उतनी ज्यादा चिंता की बात नहीं थी. लेकिन तेजी उसके बाद भी नहीं पकड़ी गई और जरूरी रन रेट 11 पहुंच गया. संजू सैमसन ने तेजी से रन का मोर्चा संभाला लेकिन थोड़ा सा काम करके वे भी आउट हो गए. तेजी के दबाव में ऐसा अक्सर होता है. उसके बाद पांड्या आए. पांडया और कोहली के सामने स्कोर बोर्ड का दबाव बड़ चुका था. बेशक कोहली ने पहल की लेकिन दबाव आखिर काम करता ही है और वे भी विकेट गंवाकर लौट आए. अलबत्ता कोहली ने 15वें ओवर में तीन चैके लगाकर तेजी दिखाई. इन तीन चैंके से उनका स्ट्राइक रेट सुधरा जरूर लेकिन जरूरत के समय उन जैसे खिलाड़ी की तरफ से 24 गेंद में 40 का स्कोर 195 रन का पीछा करने वाला स्कोर नहीं माना जाना चाहिए.खासतौर पर तब जब स्कोरबोर्ड तेजी की मांग कर रहा हो. और टीम विकेटों के लिहाज से अच्छी स्थिति में हो. वैसे उनका आउट होना भी देर से तेजी पकड़ने की कोशिश का नतीजा माना जाएगा. यहां भारतीय टीम पर मुसलसल चला आ रहा दबाव कायम था. टीम को जीतने के लिए चार ओवर में 12 रन प्रतिओवर से भी कुछ ज्यादा रफ्तार से रन बनाने की जरूरत आन पड़ी थी. ये ठीक बात है कि पांडया और श्रेयस के अपने अपने पुराने रेकार्ड के मुताबिक यह रन रेट कोई बहुत ज्यादा नहीं थी. लेकिन सवाल यह उठना चाहिए कि जब तीसरे विकेट की भागीदारी इतनी लंबी चली तो रफ्तार का यह काम पहले ही क्यों नहीं निपटा लिया गया. या उस काम को पहले ही निपटाने की कोशिश क्यों नहीं दिखाई दी. बेशक रफ्तार पकड़ने में आउट होने का जोखिम होता है. लेकिन यही जोखिम उठाकर तो ही आसानी से मैच जीते जाते हैं. और फिर मशहूर खिलाड़ी जोखिम उठा सकें इसीलिए तो उन्हें बल्लेबाजी क्रम में कुछ पहले रखा जाता है.

ये ठीक है कि पांड्या और श्रेयस जरूरत के हिसाब से तेज खेल गए और आउट नहीं हुए. लेकिन उन पर तेज खेलने का बड़ा दबाव पैदा इसीलिए ही हुआ क्योंकि प्रमुख खिलाड़ियों ने टी20 जैसे फटाफट क्रिकेट को जरूरी रफ्तार से नहीं खेला. यही कारण रहा कि मैच आखिरी ओवर तक पहुंचा जबकि हम यह मैच छह विकेट से जीते हैं. प्रमुख खिलाड़ियों के सुरक्षात्मक खेलने से पैदा हुए दबाव को पांचवे और छठे नंबर के बल्लेबाजों ने इस बार झेल तो लिया और मैच व सीरीज भी जीत ली. लेकिन क्रिकेट समीक्षकों को इस घटना की अनदेखी यह मानते हुए नहीं करनी चाहिए कि आखिर हम जीत तो गए हैं. (डिस्क्लेमरः ये लेखक के निजी विचार हैं.)
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
सुधीर जैन

सुधीर जैन

अपराधशास्त्र और न्यायालिक विज्ञान में उच्च शिक्षा हासिल की. सागर विश्वविद्यालय में पढाया भी. उत्तर भारत के 9 प्रदेश की जेलों में सजायाफ्ता कैदियों पर विशेष शोध किया. मन पत्रकारिता में रम गया तो 27 साल 'जनसत्ता' के संपादकीय विभाग में काम किया. समाज की मूल जरूरतों को समझने के लिए सीएसई की नेशनल फैलोशिप पर चंदेलकालीन तालाबों के जलविज्ञान का शोध अध्ययन भी किया.देश की पहली हिन्दी वीडियो 'कालचक्र' मैगज़ीन के संस्थापक निदेशक, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ क्रिमिनोलॉजी एंड फॉरेंसिक साइंस और सीबीआई एकेडमी के अतिथि व्याख्याता, विभिन्न विषयों पर टीवी पैनल डिबेट. विज्ञान का इतिहास, वैज्ञानिक शोधपद्धति, अकादमिक पत्रकारिता और चुनाव यांत्रिकी में विशेष रुचि.

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First published: December 6, 2020, 8:34 PM IST
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