राज्यों की ओर से कर्ज लेने की बात से नए विवाद का अंदेशा

वित्त मंत्रालय ने गुरुवार को कहा कि जीएसटी राजस्व में होने वाली कमी को पूरा करने के लिए राज्यों की तरफ से केंद्र सरकार खुद 1.1 लाख करोड़ रुपये का कर्ज उठाएगी.

Source: News18Hindi Last updated on: October 16, 2020, 7:34 PM IST
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राज्यों की ओर से कर्ज लेने की बात से नए विवाद का अंदेशा
प्रतीकात्मक तस्वीर
केंद्र सरकार की तरफ से राज्यों को जीएसटी घाटे की भरपाई का विवाद और बढ़ जाने का अंदेशा पैदा हो गया है. विवाद बढ़ता इसलिए लग रहा है क्योंकि गुरुवार को इस बारे में वित्त मंत्रालय ने एक नया बयान जारी किया है. इस बयान में कहा गया है कि केंद्र सरकार अब राज्यों की ओर से एक लाख दस हजार करोड़ रुपये का कर्ज उठा लेगा और राज्यों को दे देगा. गौरतलब है कि केंद्र सरकार अब तक राज्यों से कह रही थी आप खुद ही कर्ज लेकर अपना काम चला लें, जबकि राज्य सरकारें कह रही थीं कि जीएसटी लागू करने की व्यवस्था बनाते समय ही यह करार हुआ था कि अगर जीएसटी की कम उगाही हुई तो उसकी भरपाई केंद्र सरकार करेगी. जाहिर है कि कई राज्य सरकारें बिल्कुल भी तैयार नहीं हैं कि वे खुद कर्ज लेकर यह बोझ अपने ऊपर लादें. यानी फच्चर पहले से फंसा है और ये झंझट और बढ़ती दिख रही है.

राज्यों की तरफ से कर्ज लेने का मतलब?
इसका एक मतलब यह निकाला जा रहा है कि केंद्र सरकार के रुख में बदलाव आया है. पहले केंद्र सरकार कह रही थी कि राज्य खुद ही कर्ज उठा लें जबकि अब कह रही है कि आपके नाम से हम ही कर्ज उठा लेंगे. लेकिन अब नई झंझट यह खड़ी होगी कि इस कर्ज का ब्याज कौन चुकाएगा. भले ही एक लाख दस हजार करोड़ का कर्ज कोई बहुत बड़ी रकम नहीं है लेकिन इतनी कम भी नहीं है कि कोई हुनर लगाकर इसका हिसाब लेखे में न लिया जाए और खासतौर पर तब जब केंद्र सरकार अपने उस रुख पर अभी भी कायम है कि राजकोषीय घाटे पर असर नहीं होने देंगे. यह बात एक गुत्थी बनती जा रही है कि राजकोषीय घाटे से बचा कैसे जा सकता है?

क्या है बयान में
सबसे पहले यही कहा गया है कि भारत सरकार के राजकोषीय घाटे पर कोई असर नहीं आने दिया जाएगा. साफ कहा गया है कि जो भी रकम ली जाएगी वह राज्य सरकारों की पूंजी प्राप्ति में परिलक्षित
होगी और राज्य सरकारों के राजकोषीय घाटों के वित्त पोषण का हिस्सा बनेगी. यानी भले ही रकम राज्यों को वित्त पोषण के नाम पर दी जाएगी लेकिन यह अंदेशा जरूर बनता है कि आगे इसे राज्यों को दिए कर्ज का रूप न दे दिया जाए. गौरतलब है कि ज्यादातर राज्य पहले से ही कर्ज में डूबे हुए हैं. इतना ही नहीं, कर्ज की एक सीमा भी है यानी आगे और कर्ज लेने की गुंजाइश पर सीधा प्रभाव पड़ता है.

यह रकम राजस्व में कमी की आधी भी नहीं हैमोटा अनुमान लगाया गया है कि चालू वित्तवर्ष में सभी राज्यों की जीएसटी में कोई सवा दो लाख करोड़ की कमी आने वाली है. इस तरह केंद्र सरकार की तरफ से राज्यों की ओर से उठाए जाने वाली यानी एक लाख दस हजार करोड़ की रकम आधी से भी कम बैठती है और अभी यह भी पता नहीं कि देश में आर्थिक संकट और कितना लंबा खिंचेगा. यानी केंद्र सरकार की मौजूदा पहल किसी तरह सिरे चढ़ भी जाए फिर भी इसे संकट का पुख्ता इंतजाम नहीं माना जानाा चाहिए.

राजकोषीय घाटे से बचेंगे कैसे?
रकम के आने और जाने के रास्ते तो बदले जा सकते हैं लेकिन यह कैसे संभव है कि किसी रकम को लेखे में आने से रोका जा सके. उसे लेखे में इसलिए लेना पड़ेगा क्योंकि बिना ब्याज के कहीं से भी रकम उठाई नहीं जा सकती. देश के लेखे जोखे पर जो लोग नजर रखते हैं वे बहुत पहले से बताते आ रहे हैं कि धन का टोटा पड़ता जा रहा है. रिजर्व बैंक की हैसियत की भी एक सीमा है.

तात्कालिक उपायों से काम चलेगा नहीं
आर्थिक मोर्चे पर एक के बाद एक जिस तरह से नए नए संकट आ रहे हैं, उन्हें देखते हुए सरकारी अर्थशास्त्रियों को मान लेना चाहिए कि तात्कालिक उपाय कारगर नहीं हैं. कर्ज को तात्कालिक उपाय ही माना जाता है. कर्ज वहां काम करता है जहां भविष्य में उससे पूंजी के निर्माण की संभावना बनती हो. वरना वह भूत और भविष्य दोनों खा जाता है, यह समयसिद्ध पारंपरिक ज्ञान है. यानी सरकारी अर्थशास्त्रियों को स्थायी समाधान सोचने पर लग जाना चाहिए और वक्त की नजाकत देखते हुए गैरसरकारी अर्थशास्त्रियों को भी अपने रायमशविरे खुलकर सामने रखने चाहिए. कई बार यह भी होता है कि सरकार अपनी तरफ से कोई कदम उठाने में संकोच करती है लेकिन दूसरों के सुझाव मान लेने में राहत महसूस करती है. मसलन राजकोषीय घाटे के जितने भी नुकसान बताए जाते हैं वे सामान्य परिस्थितियों में तो सही हो सकते हैं लेकिन मौजूदा विकट परिस्थतियों से बाहर आने के लिए अगर वे नुकसान उठाने भी पड़े़ तो उसमें हर्ज क्यों देखा जाना चाहिए?
ब्लॉगर के बारे में
सुधीर जैन

सुधीर जैन

अपराधशास्त्र और न्यायालिक विज्ञान में उच्च शिक्षा हासिल की. सागर विश्वविद्यालय में पढाया भी. उत्तर भारत के 9 प्रदेश की जेलों में सजायाफ्ता कैदियों पर विशेष शोध किया. मन पत्रकारिता में रम गया तो 27 साल 'जनसत्ता' के संपादकीय विभाग में काम किया. समाज की मूल जरूरतों को समझने के लिए सीएसई की नेशनल फैलोशिप पर चंदेलकालीन तालाबों के जलविज्ञान का शोध अध्ययन भी किया.देश की पहली हिन्दी वीडियो 'कालचक्र' मैगज़ीन के संस्थापक निदेशक, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ क्रिमिनोलॉजी एंड फॉरेंसिक साइंस और सीबीआई एकेडमी के अतिथि व्याख्याता, विभिन्न विषयों पर टीवी पैनल डिबेट. विज्ञान का इतिहास, वैज्ञानिक शोधपद्धति, अकादमिक पत्रकारिता और चुनाव यांत्रिकी में विशेष रुचि.

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First published: October 16, 2020, 7:30 PM IST
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