OPINION: कोरोना पॉजिटिविटी रेट पर गौर करने का यही है सही समय

विश्व स्वास्थ्य संस्था डब्ल्यूएचओ (WHO) के मुताबिक हर देश को ध्यान रखना चाहिए कि पॉजिटिविटी रेट तीन से 12 फीसद के बीच रहे. एक प्रकार से औसतन साढे सात फीसद पॉजिटिविटी रेट बनाए रखने की समझाइश दी गई है. और अगर यह रेट 12 फीसद से ज्यादा है तो वह खतरे की घंटी है. पेरू, ब्राजील, बांग्लादेश और ईरान जैसे देश इसका खमियाजा भुगत रहे हैं.

Source: News18Hindi Last updated on: August 6, 2020, 11:40 PM IST
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OPINION: कोरोना पॉजिटिविटी रेट पर गौर करने का यही है सही समय
इनमें से तीन की मौत दून मेडिकल कॉलेज में और ऋषिकेश के एम्स में दो रोगियों की मौत हुई. (सांकेतिक फोटो)
दुनिया में कोरोना मरीज हर दिन बढ़ते ही जा रहे है. तीन देश अमेरिका, ब्राजील और भारत की हालत ज्यादा खराब है. अभी हम भले ही तीसरे नबंर पर हों लेकिन हद से ज्यादा आबादी वाले देश होने के कारण आगे के दो चार महीने की स्थिति का पूर्वानुमान लगाते हुए हमें चिंता होनी चाहिए. यही वह समय है जब हम आगे की मुसीबत से बचने की तैयारी में लग सकते हैं.

मौजूदा हालात का एक सकारात्मक पहलू

अच्छी बात है कि तमाम देशों के अनुभव हमें पता चल गए हैं. भले ही अभी तक कोरोना की दवा और टीका न बन पाया हो लेकिन दुनिया भर के आंकड़े हमारे पास हैं. इन्हीं आंकड़ों के विश्लेषण से इस बीमारी के रुख का अंदाजा होता है. अब तक का अनुभव यह है कि कोरोना के परीक्षण की संख्या इस बीमारी से जूझने में बहुत मदद कर सकती है. जितने ज्यादा परीक्षण होंगे उतने ही ज्यादा संक्रमितों की पहचान हो पाती है और उन्हें अलग रखने का इंतजाम किया जा सकता है. इस तरह काफी हद तक कोरोना का फैलाव रोकने में मदद मिलती है. इसीलिए किसी भी देश में कोराना पर नियंत्रण का कामकाज जांचने का एक पैमाना पॉजिटिविटी रेट भी है.

क्या होती है पॉजिटिविटी रेट
एक दिन में जितने भी परीक्षण यानी कोरोना टेस्ट होते हैं और उनमें जितने मरीज़ संक्रमित पाए जाते हैं उस संख्या से पॉजिटिविटी रेट निकलती है. मसलन 100 परीक्षण हुए और उनमें पांच संक्रमित पाए गए तो कहते हैं पॉजिटिविटी रेट पांच फीसद है. अपना देश इस समय इसी रेट को नियंत्रित करने में लगा है. सरकार की तरफ से बार-बार कहा जा रहा है कि जल्द ही परीक्षणों की संख्या बढ़ाई जाएगी. कुछ दिनों पहले ही रोज दस लाख परीक्षण करने की व्यवस्था बनाने की बात कही गई थी. लेकिन अभी वह स्तर बनाया नहीं जा सका है.

क्या पैमाना है परीक्षण की संख्या तय करने का

विश्व स्वास्थ्य संस्था डब्ल्यूएचओ के मुताबिक हर देश को ध्यान रखना चाहिए कि पॉजिटिविटी रेट तीन से 12 फीसद के बीच रहे. एक प्रकार से औसतन साढे सात फीसद पॉजिटिविटी रेट बनाए रखने की समझाइश दी गई है. और अगर यह रेट 12 फीसद से ज्यादा है तो वह खतरे की घंटी है. पेरू, ब्राजील, बांग्लादेश और ईरान जैसे देश इसका खमियाजा भुगत रहे हैं.हमारी क्या स्थिति है इस मामले में

बेशक पॉजिटिविटी रेट के मामले में हमारी स्थिति अबतक उतनी चिंताजनक नहीं रही है. पिछले एक हफ्ते का औसत देखें तो प्रतिदिन 54 हजार मरीज़ पॉजिटिव निकल रहे हैं और औसतन हम पांच लाख 65 हजार टैस्ट रोज कर पाए. इस तरह पॉजिटिविटी रेट साढे़ नौ फीसद बैठता है. तय पैमाने के लिहाज से परीक्षणों की संख्या अभी तो रेंज में दिखाई देती है. लेकिन दो तीन दिन पहले परीक्षणों की संख्या अचानक कम हो गई थी और यह रेट 12 फीसद को पार कर गया था. पिछले एक महीने में पैमाने की रेंज को भारत तीन बार पार कर चुका है. यही चिंता की बात रही है.

दूसरे देश से क्या सबक मिले

कुछ  देशों की समीक्षा करें तो हम पाते हैं कि पॉजिटिविटी रेट अगर कई दिन 12 फीसद से ऊपर बनी रहे तो ये बहुत जोखिमभरा होता है. डब्ल्यूएचओ ने इसकी रेंज काफी सोच समझ कर निकाली है. मिसाल के तौर पर अगर दक्षिण अमेरिकी देश पेरू को देखें तो उसने एक महीने तक अपनी पॉजिटिविटी रेट 17 से 20 फीसद तक रहने दी. इससे दो हफ्ते तक वहां कोरोना संक्रमण का प्रति दिन का आंकड़ा घटता रहा. क्योंकि कम टेस्ट हुए तो संक्रमितों की संख्या कम आई. लेकिन बाद में इसका भयानक असर दिखा. वहां संक्रमितों का आंकड़ा एकदम बढ़ना शुरू हो गया.

जिन देशों में कोरोना संभला उनके यहां प्रति दिन संक्रमण के मामले घटने से नहीं बल्कि उनकी पॉजिटिविटी रेट 10 से 8 और फिर घटकर 6 फीसद होने से हालात संभले. गौर इस तथ्य पर भी किया जाना चाहिए कि तीन महीने पहले हमारा पॉजिटिविटी रेट कमोबेश छह फीसद रहा है. यानी इस समय पॉजिटिविटी रेट बढ़ रहा है जिसके आधार पर कहा जा सकता है कि हमारे स्वास्थ्य प्रशासक कोरोना  परीक्षण की संख्या बढ़ाने पर कम घ्यान दे रहे हैं. भले ही नियम के मुताबिक यह ठीक ठाक दिखता हो, लेकिन जिस तरह से एक दो हफ्ते से प्रतिदिन मरीजों की संख्या बढती़ रही है, उसके मद्देनज़र परीक्षणों की संख्या और बढ़ाई जा सकती थी. क्योंकि पॉजिटिविटी रेट का बढ़ना यह संदेश भी देता चलता है कि देश में संक्रमण तेजी से बढ़ रहा है.

चिंता घटाने के लिए और क्या कर रहे हैं हम

अब तक दवा बनी नहीं है, टीका है नहीं, फैलाव रोकने के लिए लॉकडाउन और लंबा चला नहीं सकते और देश की स्वास्थ्य सेवा मरीजों की संख्या के बोझ से दबी चली जा रही है. चार पांच महीने से दिन रात कोरोना से जूझ रहे मेडीकल और पैरा मैडीकल स्टाफ की थकान साफ दिख रही है. जाहिर है ऐसे में कोई भी चाहेगा कि किसी तरह अस्पतालों तक पहुंचने वाले मरीजों की संख्या घट जाए. ऐसे में यह चाहना भी स्वाभाविक है कि वे ही मरीज अस्पताल में भर्ती हों जिन्हें फौरन ही देखरेख की सख्त जरूरत है. इसीलिए प्रशासकों ने हल्के लक्षण वाले संक्रमित मरीजों को उनके अपने घर पर ही अलगाव में रहने के नियम पहले से ही बना लिए थे. लेकिन घर पर रहकर खुद ही अलगाव का इंतजाम इतना आसान नहीं है. देश के औसत परिवार के पास दो कमरे का मकान तक नहीं है जहां कोरोना संक्रमित को अलग से एक कमरे की व्यवस्था की जा सके. यह तरीका जोखिमभरा है. यानी तरीका यही बचता है कि दूसरे तरीकों पर ध्यान लगाया जाए.

बेशक भारी बोझ है स्वास्थ्य सेवाओं पर

देश में इस समय हर रोज़ औसतन 54 हजार नए मरीज़ बढ़ रहे हों तो स्वास्थ्य सेवाओं की चिंता समझी जा सकती है. गौरतलब है कि अच्छी खासी रिकवरी रेट के दावे के बावजूद इस समय अस्पलालों में भर्ती संक्रमितों का आंकड़ा कमोबेश छह लाख हो गया है. इधर चार छह महीने तक वैक्सीन आने के आसार नहीं दिखते. ऐसे में आगे की चिंता वाजिब है और यह तरीका सोचना भी स्वाभाविक है कि ज्यादा टेस्टिंग न करें. बेशक इससे टीका आने तक स्वास्थ्य व्यवस्था और चरमराने से बच जाएगी. लेकिन इसे देर तक नहीं किया जा सकता. क्योंकि उसके बाद स्थिति ज्यादा खराब हो सकती है. गौरतलब है कि भारत हद से ज्यादा बड़ी आबादी वाला देश है. आंकड़ों के विश्लेषण से लगाया गया एक पूर्वानुमान है कि फैलाव को न रोका गया तो तीन महीने बाद भारत के अस्पतालों मे भर्ती मरीज यानी एक्टिव केस 12 लाख तक जा सकते हैं. लिहाज़ा टैस्टिंग बढ़ाने के अलावा एक सुझाव यह भी बनता है कि हमें कोविड अस्पतालों और मेडीकल स्टाफ को बढ़ाने की तैयारी अभी से करके रख लेनी चाहिए.  (डिस्क्लेमरः ये लेखक के निजी विचार हैं)
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
सुधीर जैन

सुधीर जैन

अपराधशास्त्र और न्यायालिक विज्ञान में उच्च शिक्षा हासिल की. सागर विश्वविद्यालय में पढाया भी. उत्तर भारत के 9 प्रदेश की जेलों में सजायाफ्ता कैदियों पर विशेष शोध किया. मन पत्रकारिता में रम गया तो 27 साल 'जनसत्ता' के संपादकीय विभाग में काम किया. समाज की मूल जरूरतों को समझने के लिए सीएसई की नेशनल फैलोशिप पर चंदेलकालीन तालाबों के जलविज्ञान का शोध अध्ययन भी किया.देश की पहली हिन्दी वीडियो 'कालचक्र' मैगज़ीन के संस्थापक निदेशक, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ क्रिमिनोलॉजी एंड फॉरेंसिक साइंस और सीबीआई एकेडमी के अतिथि व्याख्याता, विभिन्न विषयों पर टीवी पैनल डिबेट. विज्ञान का इतिहास, वैज्ञानिक शोधपद्धति, अकादमिक पत्रकारिता और चुनाव यांत्रिकी में विशेष रुचि.

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First published: August 6, 2020, 11:26 PM IST
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