Opinion: कुशल युवाओं की बेरोजगारी पर चर्चा का मौका था आज

क्या आज का दिन देश में कुशल युवाओं की बेरोजगारी पर चर्चा के लिए सबसे माकूल दिन नहीं था? खासतौर पर उन युवाओं की बेरोजगारी जिनके पास कोई न कोई हुनर या कौशल भी है फिर भी उनके पास काम करने का मौका नहीं है. हालांकि देश में बेरोजगारी का हिसाब किताब उपलब्ध नहीं है. और यह आंकड़ा तो मिल पाना और भी मुश्किल है कि बेरोजगारों में पढ़े लिखे या प्रशिक्षित बेरोजगारों की तादाद कितनी है. सामाजिक कार्यकर्ताओं के लिए ऐसे सर्वेक्षण करना बहुत ही मुश्किल है.

Source: News18Hindi Last updated on: July 15, 2020, 8:55 PM IST
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Opinion: कुशल युवाओं की बेरोजगारी पर चर्चा का मौका था आज
कुशल युवाओं की बेरोजगारी पर होनी चाहिए थी चर्चा (सांकेतिक तस्वीर)
विश्व युवा कौशल दिवस पर आयोजन की रस्म हर साल होती है. इस बार भी निभाई जा रही है. ऐसे विश्व दिवसों को मनाने के लिए अंतरराष्टीय संस्थाएं एक विषय का ऐलान करती हैं. सो इस बार कोरोना के चलते इसकी प्रासंगिकता भी तलाश ली गई. पहले से ऐलान कर दिया गया था कि इस बार कोरोना काल में कुशल युवाओं की भूमिका पर विमर्श होंगे.

यह विश्व दिवस वही दिन है जब 2015 में भारत में स्किल इंडिया मिशन चालू किया गया था. याद किया जाना चाहिए कि पांच साल पहले आज के दिन ही लक्ष्य बनाया गया था कि देश में 2022 तक 40 करोड़ नागरिकों को प्रशिक्षण देकर उनका कौशल विकास किया जाएगा. यह वाकई बहुत बड़ा लक्ष्य था. जल्द ही यह पता चलने लगा था कि जिन्हें प्रशिक्षण दिया जा रहा है उन्हें रोजगार दिलाने में अड़चन आ रही है. बहरहाल प्रशिक्षण के लक्ष्य आगे पीछे करना पड़े. जून 2020 तक स्थिति यह बनी है कि 2015 से लेकर अब तक 68 लाख लोग कौशल विकास प्रशिक्षण से गुजरे हैं. और इनमें से साढे 15 लाख लोगों को रोजगार पाने का मौका मिला. यानी पूरी कवायद के बाद सिर्फ 23 फीसदी लोग अपना सीखा हुआ काम पा सके. ये आंकड़ा यह बताने के लिए काफी है कि देश में कुशल मजदूरों की मांग और आपूर्ति में कितना अंतर है.

अभी पक्के तौर पर तो नहीं कहा जा सकता लेकिन शायद ही होगा कि आज के दिन कहीं कुशल युवाओं की मौजूदा हालत पर चर्चा हुई हो. दरअसल, ऐसे विश्व दिवसों पर आमतौर पर सरकारी आयोजन ही होते हैं. सरकार किसी भी देश की हो, वह क्यों चाहेगी कि इस समय भयावह वैश्विक मंदी के दौर में बेरोजगारी और कौशल की बेकदरी की बात उठे. जबकि इस तरह के वैश्विक दिवस संबधित क्षेत्र की मौजूदा स्थिति की समीक्षा और भविष्य की चुनौतियों पर तसल्ली से बैठकर विचार विमर्श के लिए भी होते हैं.

क्या आज का दिन देश में कुशल युवाओं की बेरोजगारी पर चर्चा के लिए सबसे माकूल दिन नहीं था? खासतौर पर उन युवाओं की बेरोजगारी जिनके पास कोई न कोई हुनर या कौशल भी है फिर भी उनके पास काम करने का मौका नहीं है. हालांकि देश में बेरोजगारी का हिसाब किताब उपलब्ध नहीं है. और यह आंकड़ा तो मिल पाना और भी मुश्किल है कि बेरोजगारों में पढ़े लिखे या प्रशिक्षित बेरोजगारों की तादाद कितनी है. सामाजिक कार्यकर्ताओं के लिए ऐसे सर्वेक्षण करना बहुत ही मुश्किल है. हालांकि सीएमआइई ने हाल ही में जो अनुमान लगाया था उनमें युवा बेरोजगारों का एक अनुमान था. उसके मुताबिक लॉकडाउन के दौरान 12 करोड़ नौकरियां गईं जिनमें युवाओं की संख्या दो करोड़ 70 लाख थी. आज के दिन चर्चा के लिए सवाल सिर्फ कौशल विकास केंद्रों से सनद लेकर निकले बेरोजगारों का ही नहीं है. बल्कि उन कुशल युवाओं का भी है जो पुश्तैनी तौर पर कोई हुनर हासिल कर लेते हैं. उनकी बेरोजगारी का भी कोई हिसाब उपलब्ध नहीं है. वैसे यह कवायद न हो पाना कोई बड़ी बात भी नहीं है. और फिर इस बार महामारी का संकट भी है. लेकिन हमें यह कबूल करने में संकोच नहीं होना चाहिए कि मंदी के इस दौर में कोरोना के कारण किए गए लंबे लॉकडाउन की मार अगर किसी पर पड़ी है तो वह कुशल और अर्धकुशल मजदूर वर्ग पर पड़ी है. लांकडाउन के दौरान बेरोजगारी से घबराकर जो बीसियों लाख प्रवासी मजदूर पैदल अपने घर की तरफ भागते दिखे थे उनमें सबसे बड़ा हिस्सा इन्हीं कुशल युवाओं का दिखा था. इस सैलाब में निर्माण कार्य में लगने वाले राजमिस्त्री, बढ़ई, लुहार, टाइल फिंटिग, फर्श घिसाई, प्लंबिंग वगैरह का काम करने वाले कुशल मजदूर ही ज्यादा थे. प्रवासी मजदूरों के इस सैलाब में जिन युवाओं से मीडिया ने बातचीत की उससे यही पता चला था कि लॉकडाउन के कुछ दिन के भीतर ही उनकी जेब खाली हो चुकी थी क्योंकि वे कोरोना के दिनों में ही नहीं बल्कि उसके पहले से नियमित रूप से काम न मिलने से परेशान थे.
इस बात को बार बार दोहराने की जरूरत नहीं है कि कोरोना के बहुत पहले से देश में औद्योगिक गितिविधियां मंद पड़ने लगी थीं. और इसका सीधा असर असंगठित क्षेत्र के अर्धकुशल और कुशल मजदूरों पर पड़ा था. कोरोना के पहले बेरोजगारी को लेकर जो चीखपुकार मची हुई थी वह अकुशल मजदूरों और कुशल मजदूरों की तरफ से ही सुनाई दे रही थी. बेशक वह मंदी का असर था जिसे संभालने के लिए सरकार भी तैयार होने की  मुद्रा बना रही थी. लॉकडाउन के बीच ही जिस तरह से बीस लाख करोड़ के पैकेज का एलान किया गया वह सरकार की चिंता का सबूत है. खासतौर पर एमएसएमई सैक्टर के लिए भारी भरकम कर्ज का ऐलान बताता है कि कुशल और अर्धकुशल मजदूरों की बेरोजगारी कितनी बड़ी चिंता का सबब है.

बहरहाल विश्व युवा कौशल दिवस के मौके पर कुशल युवाओं की परेशानियों की बात करना रंग में भंग लग सकता है. लेकिन आज के दिन कम से कम कुशल युवाओं के सामने भविष्य की चुनौतियों की चर्चा जरूर की जानी चाहिए थी.

मौजूदा हालात में हम कितने भी आशावादी होना चाहें लेकिन इस बात से इनकार नहीं कर पाएंगे कि कोरोना से फौरन निजात मिलती नहीं दिखती. आलम यह है कि लाॅकडाउन में ढील देने के बाद यानी अनलाॅक की प्रकिया चालू होने के बाद कोरोना का असर बढ़त पर है. कई प्रदेशों में फिर से कड़ाई से लॉकडाउन का ऐलान करना पड़ रहा है. यानी हाल फिलहाल औद्योगिक उत्पादन और निर्माण क्षेत्र की जल्द बहाली के आसार नज़र नहीं आ रहे हैं.  शहरों में मजबूरी में जो अतिआवश्यक औद्योगिक गतिविधियां चालू होंगी वे सीमित मात्रा में ही होंगी. यानी शहरी मजदूर या वे प्रवासी मजदूर जो किन्हीं कारणों से शहर नहीं छोड़ पाए उन तक को ही पर्याप्त काम मिलने के आसार नहीं है. जाहिर है गांवों से शहरों की तरफ कुशल और अर्धकुशल मजदूरों की वापसी दूर की बात लगती है. यानी सबसे बड़ा संकट देश के गांवों में कुशल मजदूरों की बेरोजगारी का माना जाना चाहिए.इस मौके पर याद दिलाया जा सकता है कि अभी ग्रामीण रोजगार योजना यानी मनरेगा में कुशल मजदूरों के लिए व्यस्थित रूप से और अलग से रोजगार का कोई इंतजाम नहीं है. मरनेगा के तहत काम और उनकी मजदूरी अकुशल मजदूरों के हिसाब से ही है. विश्व युवा कौशल दिवस की संध्या पर अच्छा हो कि गांवों में कुशल मजदूरों के लिए काम निकालने पर घ्यान दे दिया जाए.

बेशक पहले यह देखना पडे़गा कि इस समय गांवों में मौजूद कुशल मजदूरों के कौशल के प्रकार क्या हैं? उन्हें किस तरह की उत्पादक गतिविधियों में लगाया जा सकता है? उनका बनाया माल कहां बिकवाया जा सकता है? सब देखना पड़ेगा. और पैसे का इंतजाम भी. (ये लेखक के निजी विचार हैं)
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
सुधीर जैन

सुधीर जैन

अपराधशास्त्र और न्यायालिक विज्ञान में उच्च शिक्षा हासिल की. सागर विश्वविद्यालय में पढाया भी. उत्तर भारत के 9 प्रदेश की जेलों में सजायाफ्ता कैदियों पर विशेष शोध किया. मन पत्रकारिता में रम गया तो 27 साल 'जनसत्ता' के संपादकीय विभाग में काम किया. समाज की मूल जरूरतों को समझने के लिए सीएसई की नेशनल फैलोशिप पर चंदेलकालीन तालाबों के जलविज्ञान का शोध अध्ययन भी किया.देश की पहली हिन्दी वीडियो 'कालचक्र' मैगज़ीन के संस्थापक निदेशक, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ क्रिमिनोलॉजी एंड फॉरेंसिक साइंस और सीबीआई एकेडमी के अतिथि व्याख्याता, विभिन्न विषयों पर टीवी पैनल डिबेट. विज्ञान का इतिहास, वैज्ञानिक शोधपद्धति, अकादमिक पत्रकारिता और चुनाव यांत्रिकी में विशेष रुचि.

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First published: July 15, 2020, 8:44 PM IST
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