अर्थव्यवस्था के सवालों से सामना तो करना ही पड़ेगा

पिछले बीस लाख करोड़ के पैकेज में पूरा ज़ोर बड़े मझोले और छोटे कारोबारियों को ज्यादा से ज्यादा कर्ज बांटने पर था. हालांकि अभी पता नहीं है कि उस तरकीब का क्या असर पड़ रहा है? संकेत जरूर हैं कि मौजूदा मंदी और आगे की मंदी की दहशत में उत्पादक ज्यादा माल बनाने से बच रहे हैं. लेकिन अब सरकार ने 73 हजार करोड़ के पैकेज में किसी तरह से उपभोक्ताओं की जेब तक कुछ पैसे पहुंचाने की तरकीब आजमाई है

Source: News18Hindi Last updated on: October 14, 2020, 11:25 PM IST
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अर्थव्यवस्था के सवालों से सामना तो करना ही पड़ेगा
प्रतीकात्मक तस्वीर
अर्थव्यवस्था को सहारा देने के लिए नए प्रोत्साहन पैकेज का ऐलान हो गया है. हालांकि इस बार का ऐलान सिर्फ 73 हजार करोड़ रुपये का है. कुछ महीने पहले सरकार ने 20 लाख करोड़ के पैकेज की घोषणा की थी. अभी तक उसके असर का ढंग से आकलन नहीं हुआ है. फिर भी नए ऐलान से यह तो संकेत मिला ही है कि पुरानी भारी भरकम राहत को खुद सरकार ने ही पर्याप्त नहीं माना है. बहरहाल, पुरानी कोशिशों का असर आगे देखा जाएगा, लेकिन हाल फिलहाल जो नई कोशिश हुई है उसके असर का अंदाजा जरूर कर लिया जाना चाहिए.

अब मांग बढ़ाने पर जोर
सोमवार को वित्त मंत्री के ऐलान से पहली बार साफ संकेत मिला है कि दिक्कत औद्योगिक माल की मांग कम हो जाने की है. मीडिया ने भी पैकेज के ऐलान के बाद ऐसी ही खबर बनाई कि मांग और निवेश बढ़ाने के लिए ही सरकार ने नायाब तरीकों से 73 हजार करोड़ का इंतजाम किया है. गौर किया जाना चाहिए कि पिछले भारी भरकम पैकेज में उत्पादन बढ़ाने या उत्पादकों को सहूलियत देने पर जोर था. ऐसे में क्या यह माना जाना चाहिए कि पुराने ऐलान से जो ज्यादा माल बनकर आने वाला है, उसके उपभोग के लिए उपभोक्ताओं तक पैसा पहुंचाने के लिए ही यह कवायद हुई है? अगर वाकई ऐसा ही हो तो यह सवाल जरूर उठेगा कि मांग बढ़ाने के लिए क्या यह पैकेज पर्याप्त है?

योजनाकारों की नायाब सोच
देश की अर्थव्यवस्था के जिस तरह के हालात हैं, उसमें सबसे बड़ी दिक्कत यह थी और अभी भी है कि आखिर पैसा लाया कहां से जाए? पिछले कई सालाना बजट यथास्थिति बनाए रखने वाले ही दिखे थे. मौजूदा सरकार सत्ता में आने के पहले से लेकर अपने पिछले छह साल के कार्यकाल में यही दोहराती रही है कि वह राजस्व और खर्च में ज्यादा अंतर नहीं होने देगी यानी वित्तीय घाटे को सीमा में बनाए रखेगी. सरकार अब तक हुनर लगाकर यही आभास दिए चली आ रही है कि इस मोर्चे पर वह मजबूती से टिकी है. यहां तक कि उसने पिछले 20 लाख करोड़ के पैकेज का ऐलान भी कर दिया और अपने खिलाफ आलोचना होने की गुंंजाइश भी नहीं छोड़ी. अब 73 हजार करोड़ के नए ऐलान के बाद भी सरकार यह दावा कर सकती है कि उसने खजाने पर कोई बोझ नहीं आने दिया. आखिर यह कमाल हुआ कैसे?

कर्ज, बिना ब्याज का कर्ज और अग्रिम भुगतान 
पिछले बीस लाख करोड़ के पैकेज में पूरा ज़ोर बड़े, मझोले और छोटे कारोबारियों को ज्यादा से ज्यादा कर्ज बांटने पर था. हालांकि अभी पता नहीं है कि उस तरकीब का क्या असर पड़ रहा है? संकेत जरूर हैं कि मौजूदा मंदी और आगे की मंदी की दहशत में उत्पादक ज्यादा माल बनाने से बच रहे हैं. अब सरकार ने 73 हजार करोड़ के पैकेज में किसी तरह से उपभोक्ताओं की जेब तक कुछ पैसे पहुंचाने की तरकीब आजमाई है. सवाल ये है कि इतने बड़े देश में अपनी इतनी बड़ी अर्थव्यवस्था में सिर्फ पौना लाख करोड़ की रकम के घुमावदार इंतजाम से कोई खास फर्क पड़ भी पाएगा?अच्छी बात यह है कि इस सवाल का जवाब मिलने में अब देर नहीं लगेगी क्योंकि सरकार का इरादा यह है कि त्योहारी मौसम में एडवांस पाए लोग यानी त्योहार के नाम पर अपनी तनख्वाह का कुछ पैसा पहले से पाए लोग यह रकम गैरजरूरी चीजें खरीदने पर ही खर्च कर पाएंगे. अभी यह अनुमान नहीं लगाया जा सकता कि पैसे की भारी तंगी में जूझ रहे लोग गैरजरूरी सामान खरीदने के लिए सरकारी वाउचरों का कितना इस्तेमाल करना चाहेंगे. चाहे त्योहार के मौके पर अग्रिम भुगतान हो या एलटीसी के एवज में शर्तो के साथ धन दिया जाना हो, ये साढ़े ग्यारह हजार करोड़ की रकम आखिर आएगी तो उन्हीं के पास से जिन्हें ये दी जा रही है. यह अलग सवाल है कि यह छोटी सी रकम भारी भरकम अर्थव्यवस्था में मांग को कितना बढ़ा पाएगी?

राज्यों को ब्याजमुक्त कर्ज
सरकार एक बड़े झंझट में फंसी है. केंद्र सरकार के किए करार के मुताबिक राज्य सरकारें जीएसटी घाटे की भरपाई की रकम मांग रही हैं. आज दिन तक सही-सही हिसाब तो अभी नहीं लगा है लेकिन यह रकम खासी बड़ी हो चुकी है. प्रदेश सरकारें पैसे की तंगी के मारे हाहाकार कर रही हैंं. कोई नहीं सुझा पा रहा है कि केंद्र जीएसटी की भरपाई वाली रकम राज्यों को कैसे चुकाए. हालांकि सरकार यही कहती रही है कि राज्य सरकारें कर्ज लेकर काम चला लें. लेकिन राज्यों के लिए कर्ज लेने की एक सीमा है. आमतौर पर राज्य सरकारें पहले से ही कर्ज में डूबी हैं. ज्यादा कर्ज के बाद क्या क्या समस्याएं आती हैं, यह बात अर्थशास्त्री अच्छी तरह से समझा चुके हैं.

पचास साल के कर्ज का नुक्ता
नए पैकेज में राज्यों को 12 हजार करोड़ के ब्‍याजमुक्‍त कर्ज का ऐलान 50 साल के लिए है. देखने में यह रकम अच्छी खासी दिखती जरूर है, लेकिन यह देश के सभी प्रदेशों को मिलाकर है. प्रति प्रदेश जितनी रकम बैठेगी वह कोई ज्यादा मायने नहीं रखेगी. इस तरह का ब्याजमुक्त कर्ज एक नई तरकीब जरूर है. इस तरह की व्यवस्था को गौर से देखा जाना चाहिए. इस मद के 12 हजार करोड़ का बोझ पड़ेगा किस पर? कहने को तो कोई भी कह सकता है कि किसी पर बोझ नहीं पड़ेगा, क्योंकि यह कर्ज है और 50 साल बाद वापस आ जाएगा. लेकिन, हाल फिलहाल खर्च करने के लिए जहां से भी यह रकम जाएगी उसे 50 साल तक ब्याज जरूर देना पड़ेगा. यानी कहीं से भी दिया जाए उस पर ब्याज का बोझ पड़ेगा जरूर.

यह बोझ थोड़ा बहुत नहीं बल्कि 50 साल में ब्याज जुड़कर कोई भी रकम कम से कम 32 गुनी हो जाती है. यानी भविष्य पर बोझ डाले बगैर इस तरह से बड़ी रकम का इंतजाम संभव नहीं है. इस आधार पर एक बात निकाली जा सकती है कि यदि छोटी सी रकम की बात करके अभी एक प्रयोग करके देखा जा रहा हो तो वह आगे काम आ नहीं पाएगा. वैसे भी अगर बिना किसी पर बोझ डाले इस तरह 12 हजार करोड़ निकाले जा सकते होते तो उससे दस गुनी या सौ गुनी रकम का इंतजाम करने में क्या मुश्किल आती? लेकिन हकीकत यह है कि भारी मुश्किल आती है और इसीलिए बड़े स्तर पर इस तरह का इंतजाम नहीं किया जा सकता.

गैरसरकारी विशेषज्ञों को भी सोचने पर लगना पड़ेगा
मान लिया जाना चाहिए कि अर्थव्यवस्था का मसला बहुत बड़ा होता जा रहा है. अर्थव्यवस्था को उठाने या तेजी से घुमाने के लिए भारी भरकम धन की जरूरत तो पड़ेगी ही. इसके अलावा कोई विकल्प दिखाई नहीं देता कि सरकार निवेश बढ़ाने के लिए कर्ज के अलावा कहीं और से धन का प्रबंध करे. समयसिद्ध तरीका एक ही है कि सरकार अपना राजस्व बढ़ाए या पहले से घोषित खर्चीले कार्यक्रमों को निलंबित करे. किसी के पास इसके अलावा और कोई नया तरीका हो सकता है तो वे अर्थशास्त्री ही हो सकते हैं और वे ही कुछ सुझा सकते हैं.

कुलमिलाकर इतना साफ दिख रहा है कि सरकार अभी भी अपने राजकोष पर बोझ नहीं बढ़ाना चाहती. वह यह भी नहीं चाहती कि राजस्व बढ़ाने के उपाय करके मघ्य और उच्चवर्ग की नाराज़गी मोल ली जाए. वह अबतक घोषित की जा चुकीं सैकड़ों महत्वाकांक्षी योजनाओं को भी निलंबित या रद्द नहीं करना चाहती. बड़ी-बड़ी सरकारी कंपनियों को बेचकर भी जरूरत के मुताबिक रकम का इंतजाम मुश्किल दिख रहा है. ऐसे में एक अनुमान यह लगाया जा सकता है कि सरकार के पास किफायत का विकल्प बचेगा. बहुत संभव है कि आखिर में उसे नागरिकों से भी यही कहना पड़े कि किफायत बरतकर संकट से उबरने तक इंतजार करिए. (डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं.) 
ब्लॉगर के बारे में
सुधीर जैन

सुधीर जैन

अपराधशास्त्र और न्यायालिक विज्ञान में उच्च शिक्षा हासिल की. सागर विश्वविद्यालय में पढाया भी. उत्तर भारत के 9 प्रदेश की जेलों में सजायाफ्ता कैदियों पर विशेष शोध किया. मन पत्रकारिता में रम गया तो 27 साल 'जनसत्ता' के संपादकीय विभाग में काम किया. समाज की मूल जरूरतों को समझने के लिए सीएसई की नेशनल फैलोशिप पर चंदेलकालीन तालाबों के जलविज्ञान का शोध अध्ययन भी किया.देश की पहली हिन्दी वीडियो 'कालचक्र' मैगज़ीन के संस्थापक निदेशक, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ क्रिमिनोलॉजी एंड फॉरेंसिक साइंस और सीबीआई एकेडमी के अतिथि व्याख्याता, विभिन्न विषयों पर टीवी पैनल डिबेट. विज्ञान का इतिहास, वैज्ञानिक शोधपद्धति, अकादमिक पत्रकारिता और चुनाव यांत्रिकी में विशेष रुचि.

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First published: October 14, 2020, 11:04 PM IST
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