रघुवंश बाबू: एक ऐसा समाजवादी फकीर जिसने खुद को 5 स्टार कल्चर से आजीवन दूर रखा

Raghuvansh Prasad Singh Death: सादगी और देसी अंदाज के कारण रघुवंश बाबू की पहचान न केवल सर्व सुलभ नेता के तौर पर होती थी बल्कि वो अपने बेबाक बोल और विजन के लिए भी जाने जाते थे.

Source: News18Hindi Last updated on: September 14, 2020, 8:04 AM IST
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रघुवंश बाबू: एक ऐसा समाजवादी फकीर जिसने खुद को 5 स्टार कल्चर से आजीवन दूर रखा
न्यूज 18 के संवाददाता सुधीर कुमार से बात करते रघुवंश बाबू (फाइल फोटो)
मुजफ्फरपुर. एक पत्रकार मित्र आमिर हमजा ने फोन करके कहा कि रघुवंश बाबू नहीं रहे, ऐसी खबर आ रही है, पुष्टि कीजिए. मोबाइल से बात करते हुए मैंने अपना दरवाजा खोला तो मेरे घर के सामने अपार्टमेंट में खामोशी थी, जिसमें रघुवंश बाबू किराए पर एक फ्लैट लेकर रहते थे. दिल दिमाग को विश्वास नहीं हुआ. फिर अंदर लौटकर टीवी स्वीच ऑन किया तो देखा कि न्यूज़ 18 पर रघुवंश बाबू के गुजर जाने की ब्रेकिंग न्यूज़ चल रही थी. अचानक ऐसा लगा जैसे मेरा पूरा वजूद शून्य हो गया हो क्योंकि मेरी बात सुनने वाला एक बड़ा नेता दुनिया को अलविदा कह चुका था.

किचन हो या बेडरूम कहीं जाने की नहीं थी मनाही

चार बार मेरे सांसद रह चुके, केंद्र सरकार में मंत्री रहे, जिस बिहार विश्वविद्यालय से मैंने पढ़ाई की वहां गणित के प्रोफेसर रहे. ये तमाम वजहें काफी थी रघुवंश बाबू से करीबी के लिए. अपने अंतिम दिनों में रघुवंश बाबू ने मेरे आवास के करीब अपना किराए का डेरा ले लिया. मेरे और उनके आवास के बीच एक सड़क की चौड़ाई का फैसला है. यह मेरा सौभाग्य था कि वह मेरे और भी करीब थे. रघुवंश बाबू बेबाक बोली के धनी थे. जब कभी चैनल से किसी मुद्दे पर मुझे उनका रिएक्शन लेने का निर्देश आया मैं बैग लेकर अपनी बेटी उन्नति के साथ सीधे उनके घर में प्रवेश कर जाता. वहां एक युवक उनके घर की देखभाल के साथ-साथ उनका किचन संभालता था और मैं सीधे किचन से होते हुए उनके कमरे तक प्रवेश कर जाता था.

पूर्व केंद्रीय मंत्री और चार बार के सांसद लेकिन नहीं बना सके अपना मकान
मेरे साथ मेरी बेटी को देखकर वे बहुत प्रसन्न होते और कहते कि नन्ही पत्रकार आई है. इसको बिस्कुट खिलाओ रे भाई. रघुवंश बाबू की यह सादगी कभी भुलाई नहीं जा सकती. रास्ते से गुजरते अक्सर उनसे अनौपचारिक मुलाकात होती और चाय पर रघुवंश बाबू मुझसे देश, दुनिया, राजनीति, पार्टी और व्यक्तिगत बातें शेयर किया करते थे. मैंने एक दिन पूछ लिया कि इतने दिनों तक प्रोफेसर रहे, सांसद रहे, मंत्री रहे तो एक घर क्यों नहीं बना जो किराए के मकान में रहते हैं. रघुवंश बाबू ने कहा कि 70 के दशक में विश्वविद्यालय के पीछे होमलेस चौक के पास जमीन खरीदा हुआ है अब उसी पर घर बनेगा लेकिन वह दिन नहीं आया जब मुजफ्फरपुर में उनका अपना मकान हो.

5 स्टार कल्चर से दूर रहना पसंद

जाड़े के दिनों में अपार्टमेंट के बाहर धूप सेकते थे और मैं टहलते हुए उनके पास पहुंच जाता था. 5 स्टार सियासत से दूर बिल्कुल खांटी अंदाज़ में बैठे रहते थे. रघुवंश बाबू का व्यक्तित्व इतना विराट था कि वे हर तबके के व्यक्ति को स्वीकार करते थे. मुजफ्फरपुर में वे जब भी रहते हैं तो उनके आवास के पास मिलने वालों की भीड़ लगी रहती थी और मैंने महसूस किया कि वे वाकई गरीब गुरबे, दबे कुचले और कमजोर वर्ग की आवाज थे.
रघुवंश बाबू का निधन
मुजफ्फरपुर का अपार्टमेंट जहां रघुवंश बाबू किराये के फ्लैट में रहते थे


गरीब के घर जाना अमीरों की पार्टी में जाने से बेहतर

बेटी की शादी में न्योता दिया तो वह सबसे पहले उसके यहां जाना पसंद करते थे जो सबसे गरीब हो. वे कहते थे कि बड़े बड़े बाबू लोग के यहां तो सब लोग पहुंच जाएगा लेकिन इस गरीब के घर पर कोई नहीं जाना चाहता, इसलिए वहां मेरा जाना जरूरी है. तैयार होकर बाहर निकलते, गाड़ी में पीछे की सीट पर केदार को बैठा लेते और निकल पड़ते यायावर की तरह. मैंने करीब से देखा है कि रघुवंश बाबू से मिलने वालों में सभी दलों के लोग शामिल थे. कुछ लोग दिन में आते थे और कुछ लोग रात में ताकि कोई उन्हें देख ना ले.

वैचारिक सादगी के विरोधी भी कायल

संक्रांति के अवसर पर प्रत्येक वर्ष वे अपने आवास पर चुड़ा-दही का भोज करते थे. उनके भोज में भी न्योता सब को होता था. दरवाजे पर बैठकर और लोगों को बुला-बुला कर खिलाते थे. पिछले संक्रांति का एक मार्मिक संस्मरण याद आता है. मैं रघुवंश बाबू के संक्रांति भोज में शामिल होने के बाद निकल चुका था, उसी समय बेटी की स्कूल में छुट्टी हुई. स्कूल से बेटी को लेकर जब मैं अपने घर पहुंचा तो उन्होंने देख लिया. अपने एक समर्पित कार्यकर्ता तत्कालीन राजद महानगर अध्यक्ष वसीम अहमद मुन्ना को भेज कर मेरी बेटी को बुलवाया और अपने पास बिठाकर भोज खिलाया. संसदीय जीवन की इतनी लंबी पारी खेलने और संसदीय जीवन में इतनी ऊंचाई को हासिल करने वाले व्यक्ति की वैचारिक सादगी उनके महाप्रयाण पर आंखों में आंसू भर देती है. पिछले दिनों एक सम्मान समारोह में रघुवंश बाबू मुख्य अतिथि थे. मेरी बारी आई तो वे मंच पर आ गए और इस अवसर को ऐतिहासिक बना दिया।
अंत में--
आपको आपका मोक्ष मुबारक
आज मुझे आंसुओं से मोहब्बत है
ये मुस्कुराहट आख़िरी हीं सही
आपसे जितना मिला वो ख़ुदा की नेमत है।

श्रद्धांजलि स्वीकार कीजिए रघुवंश बाबू.....
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First published: September 14, 2020, 7:59 AM IST
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