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भारतीय 'नाविक' को दुनिया ने दी सिर झुका कर सलामी

भारत ने अपनी खुद की भारतीय क्षेत्रीय नौवहन उपग्रह प्रणाली (आईआरएनएसएस) को इसी नवंबर में हासिल कर लिया है. भारत अब अमेरिका, रूस, चीन के बाद यह प्रणाली खुद विकसित करने वाला दुनिया का चौथा देश बन गया है.

Source: News18Hindi Last updated on: December 1, 2020, 11:17 AM IST
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भारतीय 'नाविक' को दुनिया ने दी सिर झुका कर सलामी
भारतीय क्षेत्रीय स्वायत्त उपग्रह नौवहन प्रणाली को नाविक नाम दिया गया है. (प्रतीकात्मक)
अपने आप को साबित करने और दूसरों पर अपनी निर्भरता कम करने की दिशा में भारत ने बड़ी कामयाबी पा ली है. इस ऐतिहासिक उपलब्धि को दुनिया ने भी सिर झुका कर सलामी दी है. भारत ने अपनी खुद की भारतीय क्षेत्रीय नौवहन उपग्रह प्रणाली (आईआरएनएसएस) को इसी नवंबर में हासिल कर लिया है. भारत अब अमेरिका, रूस, चीन के बाद यह प्रणाली खुद विकसित करने वाला दुनिया का चौथा देश बन गया है. इसे भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने बनाया है. यह पूर्णतया भारत सरकार के अधीन रहने वाली क्षेत्रीय स्वायत्त उपग्रह नौवहन प्रणाली है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसका नाम भारत के मछुवारों को समर्पित करते हुए 'नाविक' रखा है.

अत्याधुनिक नेविगेशन प्रणालियों की सूची में शामिल होने वाला भारत अब अमेरिकी, रूस और चीनी दबदबे से बाहर निकल आया है. इस प्रणाली को अंतरराष्ट्रीय समुद्री संगठन (आईएमओ) की समुद्री सुरक्षा समिति ने अपने 102वें सत्र के दौरान (11 नवंबर को) ‘भारतीय क्षेत्रीय नेविगेशन उपग्रह प्रणाली’ (आईआरएनएसएस) को ‘विश्वव्यापी रेडियो नेविगेशन प्रणाली’ के एक घटक के रूप में मान्यता दे दी है. आईएमओ, संयुक्त राष्ट्र (यूएन) की एक विशेष संस्था है, जो कि मुख्यतः अंतरराष्ट्रीय शिपिंग की सुरक्षा में सुधार करने एवं जहाजों द्वारा होने वाले प्रदूषण को रोकने हेतु उत्तरदायी है.

आत्मनिर्भरता भारत की दिशा में ऐसे होंगे दूरगामी परिणाम
‘भारतीय क्षेत्रीय नेविगेशन उपग्रह प्रणाली’ (आईआरएनएसएस) एक क्षेत्रीय उपग्रह नेविगेशन प्रणाली है. यह हिंद महासागर में भारतीय तट सीमा से 1500 किलोमीटर तक ग्लोबल पोजीशनिंग सस्टम (जीपीएस) का स्थान ले सकता है. इसे ‘आत्मनिर्भर भारत’ की दिशा में ऐतिहासिक उपलब्धि माना जा रहा है. वहीं, अमेरिका का जीपीएस विश्व में सबसे अधिक उपयोग होने वाला नेविगेशन सिस्टम है. भारतीय जलक्षेत्र में एक भारतीय नेविगेशन प्रणाली के रूप में उपयोग होने के अलावा भारत की यह क्षेत्रीय नेविगेशन प्रणाली, रणनीतिक दृष्टिकोण से अत्यंत अहम है. इससे भारत की अन्य वैश्विक नेविगेशन प्रणालियों पर निर्भरता कम होगी और भारत अपनी रणनीतियां गुप्त रख सकेगा. अब जब इसे आईएमओ ने भारतीय जलक्षेत्र में वैकल्पिक नेविगेशन मॉड्यूल के रूप में स्वीकार कर लिया है तो अब भारतीय जलक्षेत्र में सभी व्यापारिक जहाज और मछली पकड़ने वाले छोटे जहाज इस प्रणाली का उपयोग कर सकेंगे.
नौवहन महानिदेशक अमिताभ कुमार की माने तो किसी भी समय भारतीय जल सीमा में 2,500 व्यापारी जहाज होते हैं जो सभी आईआरएनएसएस का उपयोग कर सकते हैं. यह नेविगेशन की एक आधुनिक और अधिक सटीक प्रणाली है. इसे हिंद महासागर में जहाजों के नेविगेशन में सहायता के लिए सटीक स्थिति सूचना सेवा प्रदान करने के लिए डिजाइन किया गया है.


दुनिया की महत्वपूर्ण नेविगेशन प्रणालियां
दुनिया में केवल चार देशों के पास मान्यता प्राप्त नेविगेशन प्रणालियां हैं. इसमें सबसे पहला नाम अमेरिका का है. अमेरिका का ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम (जीपीएस) उपग्रह आधारित नेविगेशन प्रणाली है. इसे अमेरिकी अंतरिक्ष विज्ञान संस्था नासा ने बनाया है. इसमें 24 कक्षीय उपग्रह शामिल हैं. इसे अमेरिकी वायु सेना संचालित करती है. इसके समकक्ष रूस की ग्लोबल ऑर्बिटिंग नैविगेशन सैटेलाइट प्रणाली है जिसे जीएलओएनएएसएस (ग्लोनास) कहते हैं. इसके बाद चीन का बाइडू सैटेलाइट नेविगेशन सिस्टम है. इसमें तीन अलग-अलग कक्षाओं में कुल 30 उपग्रह हैं. इनके अलावा यूरोपीय संघ का ग्लोबल नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम गैलीलियो और जापान द्वारा उपग्रह नौवहन के लिए तैयार की गई प्रणाली कासी-जेनिथ सैटेलाइट सिस्टम भी है.अमेरिकी और रूस के बीच हुए कोल्ड वार के बीच हुई थी शुरुआत
जब अमेरिका और रूस के बीच कोल्ड वार शुरू हुआ और दुनिया दो पक्षों में बंटी तब सेना के नेविगेशन के लिए एक तकनीक की जरूरत महसूस हुई. एक ओर अमेरिका था तो दूसरी ओर सोवियत रूस. दोनों ओर की जानकारी के लिए सेटेलाइट का उपयोग करने वाली प्रणाली विकसित करने की कोशिश हुई. अमेरिकी सेना की ओर से 1973 में ग्लोबल पोजीशनिंग सिस्टम की शुरूआत हुई. आम आदमी के लिए यह 1980 में इस्तेमाल हुआ और 1995 में यह पूरी तरह से ग्लोबल हो सका. जीपीएस में 24 उपग्रह होते हैं जो धरती के चारों ओर लगातार 20,000 किमी तक चक्कर लगाते रहते हैं. ये हर मौसम में काम कर सकते हैं.

जीपीएस के जुड़े हुए उपग्रह हर लोकेशन की जानकारी तुरंत देने में सक्षम होता है. यह इस तरह मुमकिन होता है क्योंकि उपग्रह, धरती के जीपीएस रिसिवर को हर समय प्रकाश की गति से सिगनल भेजते रहते हैं. जीपीएस अब मोबाइल फोन के माध्यम से हर आदमी की पहुंच में है. इससे हवाई जहाज, समुद्र के जहाज को रास्ते और पोजिशन तो बताते हैं, अब इनका उपयोग धरती पर कुरियर वाले सामान पहुंचाने में भी करने लगे हैं. यहां तक की पिज्जा की डिलीवरी भी इसके माध्यम से हो रही है. इस टेक्नीक के माध्यम से ऐसे लोगों को भी मदद मिल रही है जो अपनी आंखों से देख नहीं पाते हैं. वे बिना भटके और बिना किसी से पूछे सही स्थान तक पहुंच सकते हैं. अब आधुनिक तकनीक से यह भी पता चल जाता है कि मंजिल तक पहुंचने के लिए किस रास्ते से जाना सही होगा, किस स्थान पर जाम लगा है, मंजिल कितनी दूर है और उसके आसपास क्या क्या है.

कई उपग्रहों से संचालित होगी ‘भारतीय क्षेत्रीय नेविगेशन उपग्रह प्रणाली’
आईआरएनएसएस, भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) द्वारा विकसित एक स्वतंत्र क्षेत्रीय नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम है. इसका उद्देश्य देश तथा देश की सीमा से 1500 किलोमीटर की दूरी तक के क्षेत्रों में विश्वसनीय पोज़ीशन, नेविगेशन और समय संबंधी सेवाएं प्रदान करना है. आईआरएनएसएस के कांस्टेलेशन को नाविक के नाम से जाना जाता है, यानी नाविक कांस्टेलेशन के आठ उपग्रहों से मिलकर बना है. इस प्रणाली में चार उपग्रह ही निर्गत कार्य करने में सक्षम हैं लेकिन तीन अन्य उपग्रह भी जुटाई गई जानकारियों को और सटीक बनाते हैं. इसके अतिरिक्त दो उपग्रह भी हैं, जिनमें से एक अतिरिक्त कार्य के लिए नियुक्त होता है. हर उपग्रह (सैटेलाइट) की कीमत करीब 150 करोड़ रुपए के करीब है. वहीं पीएसएलवी-एक्सएल प्रक्षेपण यान की लागत 130 करोड़ रुपए है.

जीपीएस से अधिक सटीक है आत्मनिर्भर नाविक
भारतीय क्षेत्रीय स्वायत्त उपग्रह नौवहन प्रणाली को नाविक नाम दिया गया है. यह जीपीएस से कहीं बेहतर है. नाविक 5 मीटर तक की स्थिति सटीकता वाले सभी उपयोगकर्ताओं को मानक पोजीशनिंग सेवा प्रदान करता है. जबकि जीपीएस, तुलना के लिए, 20-30 मीटर की स्थिति सटीकता दे पाता है. जीपीएस केवल एल-बैंड पर निर्भर है, वहीं नाविक में दोहरी आवृत्ति (एस और एल बैंड) हैं. इस कारण से यह मानक स्थिति निर्धारण सेवा (Standard Positioning Service-SPS) दे पाता है. यह सभी आम उपयोगकर्ताओं को उपलब्ध है. इसके साथ ही प्रतिबंधित सेवा भी उपलब्ध है जो केवल अधिकृत संस्थाओं व उपयोगकर्ताओं को दी जा रही है.

अमेरिकी जीपीएस में 24 उपग्रह हैं जबकि नाविक में मात्र 8 उपग्रह हैं. अमेरिका का जीपीएस एक वैश्विक नेविगेशन सिस्टम है और भारत का नाविक एक क्षेत्रीय नेविगेशन सिस्टम है. इसके अनुप्रयोगों में नक्शा तैयार करना, जियोडेटिक आंकड़े जुटाना, समय का बिल्कुल सही पता लगाना, चालकों के लिए दृश्य और ध्वनि के जरिये नौवहन की जानकारी, मोबाइल फोनों के साथ एकीकरण, भूभागीय हवाई तथा समुद्री नौवहन तथा यात्रियों तथा लंबी यात्रा करने वालों को भूभागीय नौवहन की जानकारी देना आदि हैं. विभिन्न क्षेत्रों जैसे आपदा प्रबंधन, वाहनों का पता लगाने, समुद्री नौवहन में मदद करना आदि कार्य भी इसके आंकड़े विश्लेषण करने पर पता चल सकते हैं. इसके संचालन व रख रखाव के लिए भारत में लगभग 18 केंद्र बनाए गए हैं.
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First published: December 1, 2020, 11:17 AM IST
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