PM मोदी के न्यू इंडिया में आत्मनिर्भर कृषि और गांधीजी!

यह आत्मनिर्भरता का सूत्र हमेशा ही प्रासंगिक रहा है. न्यू इंडिया को लेकर जो सपने संजोए जा रहे हैं, उसमें इसी आत्मनिर्भरता से रंग भरे जाएंगे. ऐसे देखा जाए तो राष्ट्रपिता महात्मा गांधी, आधुनिक इतिहास में आत्मनिर्भरता के विचार के शुरुआती प्रस्तावकों में से एक थे.

Source: News18Hindi Last updated on: October 26, 2020, 3:53 PM IST
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PM मोदी के न्यू इंडिया में आत्मनिर्भर कृषि और गांधीजी!
PM मोदी के न्यू इंडिया में आत्मनिर्भर कृषि और गांधीजी!
कोरोना वायरस से आई वैश्विक महामारी के कारण उपजे घोर आर्थिक संकट के इस दौर में सबसे अधिक चर्चा आत्मनिर्भरता को लेकर हो रही है. भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारी-भरकम आत्मनिर्भरता पैकेज की घोषणा भी की. अब तो निम्न आय वाले और सड़कों पर छोटे व्यवसाय करने वालों को तो बाकायदा बैंकों से आर्थिक ऋण आदि भी मिलना शुरू हो गए हैं. इस पैकेज में राहत देने के लिए कई तरह के प्रावधान हैं, ताकि देश विषमता के दौर से उबरे. देश भर के किसानों के लिए सम्मान निधि की शुरुआत हो गई है. दरअसल, यह आत्मनिर्भरता का सूत्र हमेशा ही प्रासंगिक रहा है. न्यू इंडिया को लेकर जो सपने संजोए जा रहे हैं, उसमें इसी आत्मनिर्भरता से रंग भरे जाएंगे. ऐसे देखा जाए तो राष्ट्रपिता महात्मा गांधी, आधुनिक इतिहास में आत्मनिर्भरता के विचार के शुरुआती प्रस्तावकों में से एक थे. उनका स्वदेशी उत्पादों को बढ़ावा देना, हर गांव को आत्मनिर्भर बनाने का सपना देखना और इसके जरिए ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाना आज भी प्रासंगिक है.

महात्मा गांधी ने लिखा था, "भारतीय गांव, कस्बों और शहरों की जरूरत की सभी चीजों का उत्पादन और आपूर्ति करते थे. भारत उस समय दरिद्र हो गया, जब हमारे शहर विदेशी बाजार बन गए तथा विदेश से आई सस्ती और घटिया वस्तुओं को भरकर गांवों को खोखला करने लगे." यह सच्चाई आज भी हमारे सामने है.

विदेशी सामान और उसके तमाम लालच अगर ठुकरा दिए जाएं तो भारत ही दुनिया की सबसे बड़ी शक्ति होगा, इसमें तनिक मात्र संदेह नहीं है.


महात्मा गांधी चाहते थे कि गांव सशक्त हों, इसके लिए गांवों में पर्याप्त आर्थिक गतिविधियां हों. गांधीजी ने स्वदेशी की अवधारणा देते हुए गांवों में कृषि, आजीविका, रोजगार, बुनाई और कताई, ग्रामीण परंपरागत व्यवसायों पर आधारित अर्थव्यवस्था पर बल दिया. आधुनिक मशीनी सभ्यता से महात्मा गांधी अरुचि रखते थे, वे चाहते थे केवल उन वस्तुओं की खपत हो, जिनका निर्माण मशीनों के बगैर किया जा सकता हो. गांधीवादी विचारक मानते हैं कि श्रम बचाने के लिए मशीनें रखने का विचार परोपकार की नहीं, बल्कि लालच की भावना से संचालित होकर अधिक धन कमाने के लिए होता है.
गांवों में नई जान डालने की जरूरत केवल गांवों की आर्थिक गतिविधियों से पूरी होनी चाहिए. यहां मेक इन इंडिया की जगह मेड इन इंडिया फॉर इंडियन विलेज ही होना चाहिए. किसी भी छल प्रपंच से बहुत दूर गांधीजी की आत्मनिर्भरता, आत्मनियंत्रण और नैतिक विकास से सीधे जुड़ी हुई है. महात्मा गांधी का जीवन, उनकी सादगी, अर्थव्यवस्था और राजनीति के संबंध में उनके विचार कहीं न कहीं आत्मनिर्भरता की ओर इशारा करते हैं. यहां शरीर, मस्तिष्क और आत्मा के विकास वाला सिद्धांत भी है. इच्छाओं पर संयम, सदाचार और धन कमाने की अतिरेक हवस न होकर उच्च विचारों को प्राथमिकता देकर कोई भी व्यक्ति आत्मबल पा सकता है. ऐसा करने से किसी भी परिस्थिति में आत्मनिर्भरता कम नहीं होती.

मानव और प्रकृति का गांधीवादी संबंध
भारत में करीब 45 फीसदी कामकाजी आबादी कृषि और उससे जुड़ी हुई है, इस क्षेत्र का सकल घरेलू उत्पाद में योगदान मात्र 14-16% है. आधुनिक भारत की जरूरतों को लेकर सोचा समझा जाए तो हम पाते हैं कि खेती में, कृषि उत्पादन की होड़ में कहीं न कहीं हम प्रकृति से खिलवाड़ कर रहे हैं. जंगलों की कटाई या खेती की जमीन पर आवासीय (रिहायशी) कालोनी आदि के लिए भी आदमी का लालच बढ़ा है. रासायनिक खाद, कीटनाशक और खेतों की उर्वरा शक्ति को बढ़ाने के लिए तमाम तरह के केमिकल का बेतहाशा उपयोग के कारण अब तो धरती अपनी शक्ति खोने लगी है.पंजाब और आसपास का कुछ इलाका बंजर जैसा हो गया है, जो कभी कृषि उत्पादन को लेकर देश में अव्वल होते थे, वे अपने लिए अन्य राज्यों की ओर मौके तलाश रहे हैं. महात्मा गांधी चाहते थे कि मानव और प्रकृति के बीच अच्छे रिश्ते बने रहें. धरती के अति दोहन पर उनकी चिंताएं थी, तो कृषि को लेकर स्पष्ट मत था. आज हमारा कृषि क्षेत्र संकट में है, देश में बहुत सारे कुपोषित लोग हैं. हमारे पास 70 मिलियन टन खाद्यान्न का भंडार है, लेकिन कीमत इतनी अधिक है कि हम इसका निर्यात नहीं कर सकते. हम लागत बढ़ाने और न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाने के लिए बाध्य हैं. ऐसी परिस्थितियों में गांधीवाद के जरिए ही हम आत्मनिर्भर कृषि की ओर आगे बढ़कर, उत्पादकता बढ़ा सकते हैं.

देश में ज़ीरो बजट नेचुरल फार्मिंग से हैं बहुत उम्मीदें
सत्य और अहिंसा को लेकर महात्मा गांधी ने कई प्रयोग करके स्वयं अनुभव लिए. उन्होंने इन प्रयोगों को अपने जीवन में भी उतारा. ये प्रयोग व्यवहार में लाए जाने से गांधी महात्मा बने. गांधीजी को प्रयोगधर्मी व्यक्ति माना जाता है, लेकिन यह प्रयोग केवल बौद्धिक स्तर तक सीमित नहीं था. कुछ लोग आज के दौर में गांधीजी और उनके विचारों की आलोचना भी करते हैं, लेकिन उनके चिंतन और प्रयोगों में ‘लोग क्या कहेंगे’ जैसे शब्दों का स्थान नहीं था. कुछ ऐसी ही सोच लिए अमरावती (महाराष्ट्र) ज़िले के सुभाष पालेकर सामने आए और उनके दिमाग की उपज, ज़ीरो बजट नेचुरल फार्मिंग पर नीति आयोग द्वारा ध्यान केंद्रित किया गया है. उनका मानना है कि खेती की यह जुदा तकनीक किसानों के लिए अच्छे परिणाम ला सकती है.

ज़ीरो बजट नेचुरल फार्मिंग (ZBNF) खाद्य आवश्यकताओं को पूरा कर सकती है. दरअसल जीरो बजट नेचुरल फार्मिंग, देसी गाय के गोबर एवं गौमूत्र पर निर्भर होती है.


इससे खेती करने वाले किसान को बाजार से किसी प्रकार की खाद और कीटनाशक रसायन खरीदने की जरूरत नहीं पड़ती. इसमें किसान, गाय के गोबर से तैयार की हुई खाद बनाते हैं. ऐसी खाद गाय-भैंस के गोबर, गौमूत्र, चने के बेसन, गुड़, मिट्टी तथा पानी से बहुत आसानी से बनाई जा सकती है. इसमें नीम और गौमूत्र का कीटनाशक के तौर पर उपयोग किया जाता है. इसी तरह पारंपरिक भारतीय कृषि प्रणाली में रसायन का कम-से-कम प्रयोग किया जाता है. इसके जरिए किसानों ने रासायनिक खादों पर निर्भरता बिलकुल खत्म करके पर्यावरण और सेहत को अच्छा रखने की दिशा में काम शुरू कराया गया है. इस मिशन में लीडर बनकर उभरा है आंध्र प्रदेश. यहां के 5.23 लाख से अधिक किसान इस मिशन में जुड़ चुके हैं. जबकि कर्नाटक, हिमाचल प्रदेश और केरल ने भी इस दिशा में कदम बढ़ा दिए हैं.

ऐसी खेती को बढ़ावा देने के पीछे सरकार की कोशिश है कि किसानों को किसी भी फसल को उगाने के लिए किसी तरह का कर्ज न लेना पड़े. इससे किसान कर्ज से मुक्त होगा और आत्मनिर्भर बनेगा. जीरो बजट खेती का उत्पाद महंगा बिकेगा. इससे उसकी आय बढ़ेगी. हालांकि अभी इस तकनीक और उसके परिणामों का गहन अध्ययन नहीं हुआ है, ऐसे में सावधानियां जरूरी हैं. कुछ कंपनियां इसका विरोध कर रही हैं, उनका मानना है कि इस योजना को ऐसे लागू किया जाना चाहिए कि कंपनियां और उनका निवेशित शोध बेकार न जाए.

आत्मनिर्भर भारत के भविष्य में भी काम आएंगे गांधीजी के विचार
एक बार कोरोना काल में प्रवासी मजदूरों के संकट को महसूस करके सोचिए. प्रवासी मजदूरों ने बड़ा कष्ट उठाया है. यदि वे अपने गांवों में ही रोजगार पा जाते, यदि उनके हुनर, हस्तशिल्प और अन्य परंपरागत कामों के जरिए ही काम मिलता रहता तो यकीनन वे कभी महानगरों का रुख नहीं करते. गांधीजी, ऐसे मजदूरों को उनके गांवों में ही रोजगार देने की बात करते हैं. गांधीजी का चिंतन भविष्यवादी है और उनके विचारों में आत्मनिर्भर गांवों के बारे में अत्यंत व्यावहारिक प्रस्ताव हैं. वे कहते हैं कि गांव, ऐसी मशीनों का उपयोग करते हुए उत्पादन की छोटी इकाइयां बनें, जहां श्रमिकों का स्थान बना रहे, उन्हें श्रम में कठिनाई न हो.

गांवों में आजीविका का सृजन करने के लिए कृषि और संबंधित क्रियाकलापों (कृषि आधारित और अन्य गैर-कृषि गतिविधियां) में नई जान डाली जाए. कृषि में मौसम के मुताबिक होने वाली बेरोजगारी को रोका जाए. इसके कारण ही गांवों से पलायन होता है, इस पर रोक लगाने के लिए उचित व्यवस्था गांव के भीतर ही होनी चाहिए. गांवों की अर्थव्यवस्था, परंपरागत शिल्प और अन्य कामों की रक्षा होगी, जिसमें विश्व बाजार का सृजन करने का सामर्थ्य मौजूद है. गांवों में कारोबार होगा, बाजार होगा तो गांवों और शहरों के बीच में विकास संबंधी भेद और विषमताओं में कमी आएगी. गांवों में ऐसे आर्थिक क्रियाकलापों का सृजन होना चाहिए जिनसे आजीविका मिले.

गांव-गांव में जब उत्पादन और खपत होगी, तो किसी क्षेत्र विशेष पर उत्पादन का दबाव नहीं होगा, इससे संसाधनों का इस्तेमाल भी सीमित होगा. अभी बड़े पैमाने पर उत्पादन के लिए संसाधनों के अतिशय इस्तेमाल के कारण पर्यावरण पर बहुत बुरा असर पड़ता है. संसाधनों का जब गांवों में ही उपयोग होना है तो उनकी मौजूदगी के लिए भी प्रयास होंगे और उन्हें संरक्षण भी मिलेगा. इसी तरह नवीकरणीय स्रोतों के माध्यम से बिजली में और अपने जलस्रोतों के माध्यम से पानी में आत्मनिर्भरता लानी होगी. (यह लेखक के निजी विचार हैं.)
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First published: October 26, 2020, 1:57 PM IST
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