‘ट्रांस फैट’ के धीमे जहर से आपको बचाने में जुटी है दुनिया, आप क्या कर रहे हैं?

ट्रांस फैट के कारण होने वाली बीमारियों से भारत में हर साल करीब 60,000 लोगों की मौत होती है तो दुनियाभर में यह आंकड़ा पांच लाख से अधिक का है.

Source: News18Hindi Last updated on: October 13, 2020, 11:18 AM IST
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‘ट्रांस फैट’ के धीमे जहर से आपको बचाने में जुटी है दुनिया, आप क्या कर रहे हैं?
स्‍वास्‍थ्‍य के लिए खतरा है ट्रांस फैट.
अगर आप खाद्य तेल का उपयोग करते हैं तो यकीन मानिए आप धीमे जहर 'ट्रांस फैट' के शिकार हैं और आपको बचाने में दुनिया जुटी हुई है. इस ट्रांस फैट के कारण होने वाली बीमारियों से भारत में हर साल करीब 60,000 लोगों की मौत होती है तो दुनियाभर में यह आंकड़ा पांच लाख से अधिक का है. ट्रांस फैट से हार्ट, लिवर, मोटापा, डायबिटीज और पेट से जुड़ी बीमारियों के साथ कुछ तरह के कैंसर जैसी घातक बीमारियां हो रही हैं. इस खतरे को देखते हुए 2003 में ही नॉर्वे ने फूड में ट्रांस फैट को पूरी तरह से बैन कर दिया था. विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने 2022 तक दुनिया को ट्रांस फैट से मुक्त करने का लक्ष्य रखा है.

प्रकृति में बहुत कम मात्रा में मिलने वाला ट्रांस फैट एक प्रकार का असंतृप्त वसा अम्ल (अनसैचुरेटेड फैटी एसिड) है, जिससे सेहत को नुकसान नहीं होता है. लेकिन, जब इसे उद्योग द्वारा तैयार कर खाद्य के रूप में उपयोग किया जाता है, तो यह धीमा जहर बन जाता है.


क्‍या है ट्रांस फैट
ट्रांस फैट एक प्रकार की वसा है जिसको तरल वनस्पति तेल में हाइड्रोजन मिलाकर तैयार किया जाता है, ताकि उसे और भी ठोस बनाया जा सके और खाद्य पदार्थ की शेल्फ लाइफ बढ़ाई जा सके. घटिया तेल, व‍नस्‍पति तेल में खतरनाक ट्रांस फैट होता है, इसके बावजूद ये होटल, ढाबे, रेस्त्रां में बहुत इस्तेमाल हो रहे हैं. ट्रांस फैट बड़े पैमाने पर वनस्पति तेल, कृत्रिम मक्खन और बेकरी के खाद्य पदार्थों में पाया जाता है. यह फटाफट भोजन बनाने में खुले तौर पर उपयोग में आ रहा है.
क्‍या है खतरा
भोजन में ट्रांस फैट होने से कई खतरे हैं. बात केवल चिंताजनक कैलोरीज की नहीं है, यह तेल ही एक प्रकार से जहरीला है, इससे नुकसान ही नुकसान है. एक ही तेल को बार-बार इस्तेमाल करना और ज्यादा नुकसानदेह है. इससे ट्रांस फैट की तादाद बढ़ जाती है. ट्रांस फैट आपके कई अंगों की सेहत धीरे-धीरे खराब कर देता है. ट्रांस फैट से सेहत को कोई भी लाभ नहीं होता है. यह हृदय, पाचन तंत्र, खून और रक्त परिवहन तंत्र, खून की नलिकाओं व सेहत से जुड़ी अन्य परेशानियों का खतरा बढ़ा देता है.

टेस्‍ट और टेक्‍सचर करता है बेहतरनॉन वेज कुकिंग में 'लार्ड' और बेकरी आयटम्‍स के लिए 'मार्जरीन' का इस्‍तेमाल हो रहा है. ये टेस्‍ट और टेक्‍सचर को बेहतर कर देते हैं. मार्जरीन से फूड में करारापन आता है. नॉन वेज के लिए वनस्पति घी जैसा काम लार्ड भी काम करता है, जो स्‍वाद और बेहतर कर देते हैं. घटिया तेल, व‍नस्‍पति तेल, अन्य अच्‍छी क्‍वॉलिटी के तेल से आधी कीमत में मिल जाते हैं. इसमें खतरनाक ट्रांस फैट होता है. जिस तरह से फ्राइड चीजों का चलन बढ़ा है, उसी अनुपात में खाद्य तेलों की खपत भी बढ़ चुकी है. इन तेलों का स्‍मोक प्‍वाइंट अधिक होता है, इसलिए फटाफट कुकिंग में इनका इस्‍तेमाल किया जाता है. बार-बार उपयोग में लाने के बावजूद ये धुआं बन कर उड़ते नहीं, बल्कि अपनी चिकनाई के गुण को बरकरार रखते हैं. ऐसे में सैचुरेटेड फैट में बनी हुई चीजें देर तक जस की तस बनी रहती हैं, बल्कि बार-बार इस्‍तेमाल करने या गर्म करने लायक बनी रहती हैं.

WHO की सीमा से पहले लक्ष्‍य प्राप्ति की कोशिश
भारत सरकार ने पहली बार 2013 में तय किया कि खाने में इंडस्ट्रियल प्रोड्यूस्ड ट्रांस फैट की सीमा 10% से ज्यादा नहीं होगी, 2017 में इसे 5% कर दिया गया था जिसे शून्य तक करने पर जोर दिया जा रहा है. वहीं, भारतीय खाद्य संरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) का दावा है कि ट्रांस फैट के लिए दी गई डब्‍ल्‍यूएचओ की समय सीमा से पहले ही भारत में लक्ष्‍य प्राप्ति की कोशिश हो रही है. ट्रांस फैट के कारण होने वाली बीमारियों के बारे में लोगों को जागरूक करने के लिए एफएसएसएआई ने बड़ा मीडिया अभियान शुरू किया है. इसमें बिलबोर्ड, सोशल मीडिया और पब्लिक सर्विस एनाउंसमेंट को शामिल किया है.

एफएसएसएआई की स्थापना खाद्य सुरक्षा तथा मानक अधिनियम, 2006 के तहत किया गया है. यह प्राधिकरण स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के अंतर्गत आता है. इसका उद्देश्य खाद्य सामग्री के लिए विज्ञान पर आधारित मानकों का निर्माण करना तथा खाद्य पदार्थों के विनिर्माण, भंडारण, वितरण, बिक्री तथा आयात आदि को नियंत्रित करना है ताकि मानव-उपभोग के लिए सुरक्षित व संपूर्ण आहार की उपलब्धि सुनिश्चित की जा सके. एफएसएसएआई 2022 तक चरणबद्ध रूप से औद्योगिक रूप से तैयार होने वाले ट्रांस फैटी एसिड को 2 प्रतिशत से भी कम करने के लिए प्रतिबद्ध है.

भारत में निगरानी के लिए संसाधनों का अभाव
घर के बाहर खाने या रेडिमेड खाने के चलन ने ट्रांस फैट का खतरा बढ़ा दिया है. ठेलों, ढाबों और रेस्‍त्रां में हानिकारक ट्रांस फैट का धड़ल्‍ले से उपयोग हो रहा है. आश्चर्य है कि लोगों को भी बस खा लेने से ही मतलब है, वे कभी सोचते भी नहीं कि किस प्रकार के तेल-घी में उनका भोजन तैयार किया गया है. इधर कानून और उनको लागू करवाने वाली एजेंसियों की अपनी समस्‍याएं हैं. हर गली-मोहल्‍ले में खुली चाट, पकौड़े जैसे खाने-पीने की दुकानें और ठेलों की लगातार निगरानी कैसे करें? इन छोटे व्‍यवसायियों के रोज खाने-कमाने को लेकर एक नर्म पक्ष है तो दूसरा पक्ष इनको मिलने वाला राजनीतिक संरक्षण भी है. एफएसएसएआई और फूड सेफ्टी डिपार्टमेंट के सीमित साधनों, लैब संख्‍या और कर्मचारियों की कमी के कारण वे लगातार निगरानी नहीं कर पाते हैं.

फास्‍ट फूड, ठेलों और सड़क के खान-पान की दुकानों की संख्‍या हर रोज बढ़ रही है. और यही वजह है कि ट्रांस फैट के कारण बीमार होने वाले लोगों की संख्या भी तेजी से बढ़ी है.


ज्यादातर केक और कुकीज के लेबल पर मिश्रण में शून्य ग्राम ट्रांस वसा लिखी होती है, लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं होता. चालाकी ऐसी है कि कानूनन यदि ट्रांस वसा सामग्री 0.5 ग्राम से कम है तो इसे शून्य ग्राम ही मानते और समझाते हुए लिख सकते हैं. इसकी मात्रा फ्रॉस्टिंग में रखी हुई मिठाई खाने से बढ़ जाती है. औसतन फ्रॉस्टिंग वाले पदार्थो में 2 ग्राम ट्रांस वसा होती है और इतनी ही मात्रा में चीनी होती है. बिस्कुट में 3.5 ग्राम ट्रांस वसा होता है. इसमें रोजाना लिए जरूरी सोडियम की आधी मात्रा होती है.

दुनिया पर प्रभाव: ट्रांस फैट से पाम ऑयल की मांग बढ़ी
ट्रांस फैट से दुनिया भर में तरह-तरह के दुष्प्रभाव देखे जा रहे हैं. कहीं लोगों के सेहत से खिलवाड़, कहीं बाजार प्रभावित तो कहीं पर्यावरण ही संकट में आ रहा है. ट्रांस फैट को शून्य करने के लिए दुनिया भर में पाम ऑयल को अधिक अपनाया जा रहा है. पाम ऑयल प्राकृतिक रूप से संतृप्त होता है, इसलिए खाद्य कंपनियां इसी पर टूट पड़ी हैं. पाम ऑयल वनस्पति तेल के मुख्य वैश्विक स्रोत के रूप में उभरा है, जो दुनिया के उत्पादन मिश्रण का लगभग 33% है. लिहाजा पाम तेल के प्रमुख स्रोत वाले वनों का तेजी से सफाया हो रहा है. इंडोनेशिया, मलेशिया, नाइजीरिया, थाईलैंड और कम्बोडिया आदि में पाए जाने वाले पाम वनों की अंधाधुंध कटाई ने दुनिया की चिंता बढ़ा दी है. भारत दुनिया में पाम ऑयल का सबसे बड़ा आयातक है, जो इंडोनेशिया और मलेशिया से कुल वैश्विक मांग का लगभग 23% आयात करता है. वर्तमान में भारत में आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और तमिलनाडु पाम ऑयल के प्रमुख उत्पादक राज्य हैं. सबसे पहले स्थान पर आंध्र प्रदेश है जो देश के कुल पाम ऑयल के 80% से अधिक का उत्पादन करता है.

पाम ऑयल की खेती में भारत की कोशिशें
पाम ऑयल की खेती के महत्त्व को देखते हुए पहले प्रयास 1991 में शुरू हुए थे. इसके लिए संभावित क्षेत्रों में मिशन के तौर पर कार्य शुरू किए गए. कृषि सहकारिता एवं किसान कल्‍याण विभाग ने तिलहन और दलहन पर प्रौद्योगिकी मिशन को देश को समर्पित किया. आठवीं और नौवीं पंचवर्षीय योजना के तहत केंद्र प्रायोजित योजना में तेल पाम विकास कार्यक्रम शुरू किया था. फिर दसवीं और ग्यारहवीं योजना के दौरान, भारत सरकार ने तिलहन, दलहन, पाम ऑयल और मक्का की एकीकृत योजना बनाई. इसमें पाम ऑयल की खेती के लिए सहायता प्रदान की. भारत सरकार ने 2011-12 में राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के तहत पाम ऑयल के क्षेत्र को विस्तार देने के लिए दो सालों के लिए एक कार्यक्रम शुरू किया, जिसका उद्देश्य पाम ऑयल की खेती के अंतर्गत 60,000 हेक्टेयर क्षेत्र को लाना था. बारहवीं योजना के दौरान, तिलहन और पाम ऑयल पर राष्ट्रीय मिशन शुरू किया गया. भारत में पाम ऑयल के रोपण की संभावनाओं को तलाशा जा रहा है. (ये लेखक के निजी विचार हैं)
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First published: October 13, 2020, 11:18 AM IST
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